पत्रकारिता का मूलमंत्र प्रतिरोध: शिवनारायण

आपका जन्म कब और कहाँ हुआ? आपकी शिक्षा कहाँ और कितनी हो सकी? इस क्रम में आपका आरंभिक जीवन-संघर्ष कैसा रहा?
मेरा जन्म बिहार-झारखंड के सीमांत क्षेत्र बांका जनपद स्थित धोरैया थाना के गाँव योगडीहा में हुआ। कब हुआ, नहीं जानता। सर्टीफिकेट के अनुसार मेरी जन्मतिथि 19 जनवरी, 1962 है। अपनी बड़ी मां से जितनी जानकारी पा सका, उसके अनुसार तीन बहनों के उपरांत बड़ी मन्नतों से मेरा जन्म हुआ, लेकिन जन्म के पांच-छह महीने बाद ही तीनों बहनों समेत मेरी मां महामारी में अकाल काल कवलित हो गई। मुझे मां की कोई स्मृति नहीं है। मेरा शैशव बड़ी मां और बुआ की परवरिश में गुजरा। मेरे पिता मामूली किसान थे। कुछ बड़ा होने पर पिता मुझे लेकर गंगा पार कटिहार में बस गए। उसी शहर में पहली कक्षा से लेकर बी. ए. तक की शिक्षा प्राप्त की और पटना विश्वविद्यालय से एम. ए. किया। पी-एच. डी. रांची विश्वविद्यालय से प्राप्त हुई। जहां तक आरंभिक जीवन संघर्ष की बात है तो उसकी कहानी बहुत पीड़ादायक है और उस तक पहुंचने के लिए दर्द की एक लंबी सुरंग पार करनी होगी और फिर मेरे अतीत के तार को छेडक़र आपको हासिल भी क्या होगा, सिवा दु:ख और यंत्रणा के! सो, जीवन-संघर्ष को अभी रहने दीजिए। अवसर मिला तो इस पर फिर कभी बात करेंगे।
हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता एवं सृजनात्मक लेखन में विशिष्ट योगदान के लिए आपको भारत सरकार के केंद्रीय हिन्दी संस्थान ने ‘गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान’ से अंलकृत किया। इस पुरस्कार को ग्रहण करते हुए कैसा महसूस किया? आज के परिवेश में साहित्यिक पत्रकारिता को किस रूप में पारिभाषित करना चाहेंगें?
केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का ‘गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान’ अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का सम्मान है, जिससे धर्मवीर भारती, डॉ. एन.वी. कृष्ण वारियर, बालशौरि रेड्डी, बालकृष्ण पिल्लै, अक्षयकुमार जैन जैसे महान संपादक विभूषित किए जा चुके हैं। पत्रकारिता की इस समृद्ध परम्परा में अपना नाम देखना मेरे लिए जितना आह्लादकारी था, वहीं गहन दायित्वबोध के साथ गौरव का अहसास भी हुआ। पैंतीस बरस से पत्रकारिता कर रहा हूं। इस बीच अनेक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन के अलावा ढाई दशक से हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘नई धारा’ का संपादन कर रहा हूं, जो 1950 से अनवरत छप रही है, जिसके संपादकों में रामवृक्ष बेनीपुरी, शिवपूजन सहाय, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, कमलेश्वर और उदयराज सिंह जैसे प्रसिद्ध साहित्यकार शामिल रहे। जहां तक साहित्यिक पत्रकारिता को पारिभाषित करने की बात है तो साहित्य यदि जीवन और संस्कृति के सौंदर्य की संरक्षा में या फिर एक बेहतर समाज के निर्माण में अपने समय की आवारा पूंजी और बर्बर सत्ता के प्रतिरोध में एक सार्थक रचनात्मक हस्तक्षेप है तो कविता-कहानी आदि सृजनात्मक विधाओं के द्वारा करुणा, संवेदना और प्रतिरोध की सक्रियता से जन सरोकार बनाना साहित्यिक पत्रकारिता का धर्म है। आज के दौर में साहित्य मनोरंजन मात्र नहीं हो सकता। उसे जन कल्याण की संस्कृति के विकास का सहचर बनना होगा। आखिर करुणा, संवेदना और प्रतिरोध साहित्य का मूल स्वभाव है। आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में आवारा पूंजी ने विकासशील मुल्कों की जनतांत्रिक सरकारों को अपनी दासता के बंधन में कसना आरंभ कर दिया है, उससे मुक्ति के शंखनाद का दायित्व साहित्यिक पत्रकारिता का ही है। प्रतिरोध उसका मूल मंत्र है।
भोपाल की प्रतिष्ठित संस्था ‘स्पंदन’ द्वारा आपको सन् 2017 के लिए ‘स्पंदन आलोचना पुरस्कार’ दिए जाने की घोषणा हुई। आप अनुभवसिद्ध संपादक होने के साथ-साथ हिन्दी के श्रेष्ठ आलोचक भी हैं। इस क्षेत्र में किए गए अपने कामों के बारे में कुछ बताएं?
हिन्दी में कविता के बाद मेरी रुचि और अध्ययन का क्षेत्र आलोचना ही है। हालांकि मैंने कोशविज्ञान, भाषाविज्ञान तथा संस्मरण-डायरी आदि कथेतर गद्य के क्षेत्र में भी काफी काम किया है। आलोचना में मेरी दर्जनाधिक पुस्तकें हैं, जिनमें ‘कला, साहित्य और समय’, ‘संस्कृति का विवेक’, ‘रचना का जनपक्ष’, ‘साहित्यिक पत्रकारिता का साधु संग्राम’, ‘विज्ञापनों का समकालीन विमर्श’ और ‘प्रतिरोध का कथा शिल्प’ की खासी चर्चा हुई। मेरी पुस्तक ‘विद्रोहिणी कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान’ लोकप्रिय हुई। चंपारण आंदोलन पर भी मैंने काम किया। ‘स्पंदन आलोचना पुरस्कार’ मिलने के बाद संभव है कि हिन्दी संसार का ध्यान मेरे आलोचना कर्म की ओर भी जाए, जिसे मेरे पत्रकारिता कर्म से मिली प्रसिद्धि ने ओझल कर रखा है। आलोचना कर्म मेरे लिए अपने समय की चेतना के आलोक में देश-समाज और साहित्य को देखने-समझने की एक दृष्टि है। मेरी इस दृष्टि में केवल साहित्य ही नहीं, ज्ञान के सभी अनुशासन आते हैं। आप मेरे आलोचना कर्म में साहित्य के साथ-साथ अन्य अनुशासनों का वैचारिक विमर्श भी पाएंगे।
हिन्दी के विकास में साहित्यिक पत्रकारिता का क्या योगदान रहा है?
देखिये, साहित्य अन्तत: और तत्वत: भाषा की साधना है। एक सक्षम भाषा के रूप में हिन्दी भारत के स्वाधीनता आन्दोलन की अभिव्यक्ति की संवाहिका रही है। इस दृष्टि से भाषा और समाज की मुक्तिकामी चेतना को विकसित करने में साहित्यिक पत्रकारिता का खासा योगदान रहा है। भारतेन्दुकालीन पत्रकारिता हो या पिछली सदी के पूर्वाद्र्ध में ‘सरस्वती’, ‘सुधा’, ‘जागरण’, ‘मतवाला’, ‘इन्दु’, ‘साहित्य’ और ‘कर्मवीर’ से लेकर ‘नवनीत’, ‘वीणा’ और ‘नई धारा’ आदि पत्रिकाओं का साहित्य-कर्म, सबने युगीन चेतना और हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। अपने समय की चुनौतियों से रचनात्मक मुठभेड़ साहित्यिक पत्रकारिता का मूल उत्स है। उसने सदैव अपना प्रतिरोध दर्ज किया है।
साहित्यिक पत्रकारिता के जिस गौरव का बोध आपने कराया; उसके बरक्स आज की साहित्यिक पत्रकारिता को कैसे देखते हैं?
कभी पूंजीपति घरानों से अच्छी साहित्यिक पत्रिकाएं निकलती थीं, जिन्होंने व्यापक जन मानस पर रचनात्मक प्रभाव छोड़ा। उसकी जगह आज सांस्थानिक एवं स्वायत्त पत्रिकाओं ने ले ली है। अनेक अच्छी साहित्यिक पत्रिकाएं हैं, जो जन सरोकार से जुड़े साहित्य को प्रकाशित कर रही हैं। साहित्यिक पत्राकारिता की परम्परा जनभाषा और जन साहित्य को लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के साथ संवद्र्धित करने की रही है, जिसमें आज की अनेक पत्रिकाएं अपनी भूमिका निभा रही हंै।
सितंबर शुरू होते ही हिन्दी की दशा-दिशा पर तमाम तरह की सकारात्मक-नकारात्मक बातें होते रहने के बावजूद हिन्दी का भविष्य क्या और कैसा है?
हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही इस भाषा पर अधिक मंथन चलता है। सोशल मीडिया में हिन्दी दिवस के नकारात्मक पक्षों पर अधिक चर्चा होती रही है, खासकर इस भाषा के प्रति सरकारी उपेक्षा या उदासीनता को लेकर। ये सब मौसमी विमर्श हैं, लेकिन हिन्दी ने वैश्विक स्तर पर हजारों भाषाओं के बीच अपनी सशक्त पहचान बनाई है तो वह किसी सत्ता या सरकार के प्रयासों से नहीं, बल्कि अपनी लचीली बनावट और प्रयोग में सामासिक उदारता के कारण। हिन्दी की ताकत जनता है। जनता की जुबान पर हिन्दी सहज रहती है, इठलाती नहीं। साहित्य अकादेमी के प्रतिनिधि मंडल में शामिल होकर दक्षिण अफ्रीका गया था, जहां अनेक क्षेत्रों में हिन्दी बोलने वालों का उस भाषा के प्रति स्वाभिमान देखकर दंग रह गया। हिन्दी का भविष्य स्वर्णिम है और तमाम प्रायोजित विरोध के बावजूद वह निरंतर दुनिया की जुबान पर चढ़ती चली जा रही है।
हिन्दी दिवस क्या अब एक प्रशासनिक औपचारिकता भर है या फिर हिन्दी भाषा उत्सवधर्मी संस्कृति का अंग बन रही है?
हिन्दी के कई रूप हैं। बातचीत की हिंदी अलग है और दफ्तरों में कामकाज की हिन्दी अलग। साहित्य रचना की हिन्दी अलग है और कला, वाणिज्य, विज्ञान, पत्रकारिता आदि अनुशासनों में प्रयुक्त होने वाली हिन्दी अलग। 14 सितंबर, 1949 में हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में मान्यता मिली, जिसके कारण हर वर्ष 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाकर राजकाज में हिन्दी के बढ़ते प्रयोग की समीक्षा की जाती है। संयुक्त राष्ट्रसंघ में 10 जनवरी को हिन्दी को मान्यता दी गई तो उस दिवस को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसकी अपनी परम्परा है, जिसके साथ हिन्दी के शेष सभी रूपों को जोडक़र उसकी आलोचना सही नहीं है। भाषा के साथ हमारी राष्ट्रीय अस्मिता जुड़ी होती है, जिसके गौरव से जुडक़र ही हम भाषायी उत्सवधर्मी संस्कृति का हिस्सा बन सकते हैं। यह हिन्दी की अपनी ताकत है कि लोग आलोचना के बावजूद उससे बेतहाशा प्रेम करते होते हैं।
हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता से आप लंबे समय से जुड़े हैं। इस पर बाजार का प्रभाव किस रूप में देख रहे हैं?
सामान्य पत्रकारिता की तरह साहित्यिक पत्रकारिता पर बाजार का प्रभाव प्रत्यक्षत: मुखर नहीं है, पर यह है बाजार के दवाब में। देखिये, बाजार व्यक्ति के विचार और उसकी संवेदना को शून्य करना चाहता है। उसके सोचने-समझने की क्षमता को कुंद करना चाहता है। ऐसा करके ही बाजार अपने उत्पादों को घर-घर तक पहुंचा सकता है। पहले मनुष्य तय करता था कि अपनी किन जरूरतों के लिए वह हाट-बाजार तक जाए, जबकि आज बाजार तय करता है कि अपने हर उत्पाद के लिए वह किस प्रकार से मनुष्य को अनुकूलित करे। साहित्यिक पत्रकारिता को बाजार की इस चालाकी के प्रतिरोध में अपनी भूमिका निभानी है और ऐसा वह कर भी रही है, जबकि मीडिया बाजार का सहचर है। इलेक्ट्रॉनिक चैनल और अखबार पूंजी घरानों की गिरफ्त में हैं, जो उसके हित में बाजार को खुशहाल बनाने में उसके साथ कदमताल कर रहे हैं। साहित्यिक पत्रकारिता पर बाजार का वैसा बर्बर प्रभाव नहीं है, क्योंकि वह पूंजी घरानों की गिरफ्त से मुक्त है।
इन दिनों धारणा बन रही है कि मीडिया हिन्दी भाषा को भ्रष्ट कर रहा है। इसके बारे में आप क्या सोचते और क्या कर रहे हैं?
जब यवन, मुगल और ब्रिटिश हुकूमत हिन्दी को नष्ट नहीं कर सके तो मीडिया उसे कैसे भ्रष्ट कर सकता है? मीडिया की भाषा से ऐसा भ्रम अवश्य होता है, पर वास्तव में वे उसकी ताकत को ही बढ़ा रहे है। भाषायी शुद्धता के पंडितों-पुजारियों को लग सकता है कि हिन्दी भाषा के शब्दों से खिलवाड़ कर मीडिया अपने मन माफिक शब्द बनाकर उसे भ्रष्ट कर रहा है। हिन्दी के शब्दों में अंग्रेजी उड़ेलकर उसके शुद्ध रूप को नष्ट कर रहा है या फिर बाजार के उत्पादों के प्रचार-प्रसार के लिए हिन्दी का मजाक बना रहा है। इन सबसे हिन्दी प्रेमियों को भ्रम हो सकता है कि हिन्दी को मीडिया द्वारा भ्रष्ट किया जा रहा है, लेकिन एक भाषाविज्ञानी के रूप में हिन्दी के इस विस्तार के मूल में उसकी बनावट की लचक और किसी भी भाषा या संस्कृति से अनुकूलित होते उसके स्वरूप की ताकत को तो देखिये। इन्हीं खूबियों के चलते तो हिन्दी तमाम विरोधों-प्रहारों के बावजूद लगातार बढ़ती-फैलती जा रही है। आप निश्चिंत रहिए, बाजार या मीडिया अपने हित में हिन्दी का उपयोग अपने उत्पादों के अनुकूलन के लिए जरूर कर रहा है, लेकिन उससे हिन्दी का कोई अहित नहीं होने जा रहा है।
हिन्दी साहित्य में सृजनात्मक लेखन के लिए प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर अनेक बड़े-बड़े पुरस्कार दिए जाते हैं। हिन्दी के विकास में इनको कितना महत्वपूर्ण मानते हैं?
सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर आज साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े-बड़े पुरस्कार दिए जा रहे हैं। जो लोग हिन्दी और साहित्य के विकास में एकांत भाव से अपनी सेवा दे रहे हैं, उसकी साधना का सम्मान होना ही चाहिए। समाज और लोकतांत्रिक सरकारों का दायित्व होता है कि वे उनकी सेवा का सम्मान करें, जिससे एक स्वस्थ संस्कृति और परम्परा विकसित हो। इससे समाज में सकारात्मक एवं रचनात्मक परिवेश बनता है। भाषा और संस्कृति के विकास में भी सहयोग मिलता है। सेवा को पुरस्कार मिलना चाहिए, लेकिन पुरस्कार मात्र के लिए सेवा नहीं की जानी चाहिए। सेवा में त्याग की भावना होनी चाहिए, न कि पाने की लालसा। पाने की लालसा से की जाने वाली सेवा के सम्मान से समाज में नकारात्मक संदेश जाता है और आजकल ऐसा ही अधिक हो रहा है। हिन्दी के विकास में पुरस्कारों का महत्व है, किंतु इसमें तटस्थ सावधानी आवश्यक है।
आपके लेखकीय जीवन की बड़ी चुनौतियां कौन-सी रही हैं?
मेरी रचनाओं में जनपक्षधरता है। धर्मनिरपेक्ष जीवन मूल्यों के प्रति मेरी अटूट आस्था है। मैं चाहता हूं कि धर्म, भाषा और संस्कृति की बहुलता वाले अपने देश में समरस-सामासिक जीवन का स्वच्छन्द प्रवाह हो। हर व्यक्ति अपनी निजता की स्वतंत्रता में जीते हुए देश की एकता और समृद्धि में अपना योगदान करता रहे। एक लेखक होने के नाते देखता हूं कि अनेक ऐसी पाशविक शक्तियां हैं, जो अपने स्वार्थ सिद्ध करने में तमाम नैतिकता एवं प्रकृत नियमों का क्षय करते हुए मनुष्य और समाज का अटूट दोहन करती हैं, जिन्हें सत्ता या सरकारों का सहयोग भी मिलता है। इन पाशविक शक्तियों का प्रतिरोध मेरे लेखकीय जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है। केवल लिखने और छपने भर के लिए मैंने कभी लेखन नहीं किया। लेखन की सामाजिक प्रतिबद्धता को सक्रिय रखना हमारी चुनौती है। समय-समाज की चिंताओं से मुक्त लेखन का कोई अर्थ नहीं।
आपने अपने लेखन का आरंभ कविता से किया। आपके कई कविता संग्रह प्रकाशित हुए। कविता के लिए आपको बिहार सरकार का सर्वोच्च सम्मान ‘नागार्जुन पुरस्कार’ मिला है। आपकी कविता अपने समय को किस तरह व्यक्त कर रही है, पूछने का आशय यह है कि किन नए मूल्यों की तलाश आज की कविता कर रही है?
मैं मुख्यत: कवि हूं। मेरे चार कविता संग्रह- ‘धार के आर-पार’, ‘काला गुलाब’, ‘सफेद जनतंत्र’ और ‘दिल्ली में गांव’ प्रकाशित हुए, जिनकी कविताओं के अनेक भाषाओं में अनुवाद ‘काला गुलाब’ के लिए सन् 2003 में बिहार सरकार का सर्वोच्च सम्मान ‘नागार्जुन पुरस्कार’ तत्कालीन मुख्यमंत्री के हाथों मिला। इसके अलावा कविता के लिए दर्जन भर अन्य पुरस्कार भी प्राप्त हुए। इसके बावजूद मेरे अंदर का कवि खुल-खिलकर समाज के सामने पहचान में नहीं आ सका, जिसके कई कारण हैं। फिलहाल आज की कविता को देखें तो उसमें बाजार की पाशविक प्रवृत्तियों का जबरदस्त प्रतिरोध है। नए कवियों को ये बात समझ में आ रही है कि आज उनके जीवन एवं समाज का संकट बाजार का आरोपित किया हुआ है।
यह समझ केवल हिन्दी कविता नहीं, भारतीय भाषाओं के नए कवियों में भी विकसित हो रही हे। पिछले दिनों मुझे एक ऐसे आयोजन में शामिल होने का अवसर मिला, जहां भारतीय भाषाओं के युवा कवियों को काव्य पाठ करना था। मैंने पाया कि उनकी कविताओं में बाजार के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश है। वे सरकार की जनविरोधी नीतियों का प्रतिरोध भी करते हैं, लेकिन एक सुखद आश्चर्य यह देखकर हुआ कि इधर के कवियों में प्रेम के प्रति आसक्ति बढ़ी है। प्रेम शाश्वत तत्व है, जो जीवन के सुख-वैभव को समृद्ध करता है। इधर की कविताओं में प्रेम पाने-जीने की लालसा में ही आक्रोश व्यक्त हो रहा है। जाति, धर्म, संप्रदाय, भेदभाव, क्षेत्रवाद आदि के प्रति नकार का भाव उनमें है। वे कविता में विश्व मानव की कामना करते हैं, जिसकी नागरिकता भी वैश्विक हो। संकीर्णताओं को वे नकार रहे हैं। ये आज की कविता का वह स्वर है, जो हमें नए जीवन मूल्यों के प्रति उनकी सकारात्मक सोच से आश्वस्त-प्रसन्न करता है। कभी मैंने भी ‘विश्वासों की दुनिया’ शीर्षक कविता में लिखा था-‘बाजार को चाहिए भीड़/भीड़ को एक चेहरा/और चेहरे को जन-जन का विश्वास/पर विश्वास तो रिश्तों में पलता है/जिन्हें नहीं होती बाजार की दरकार/वे कौन हैं जो बोना चाहते हैं/रिश्तों में बाजार/मुझे तलाश है भीड़ में एकांत की/और वे एकांत में भीड़ उगाना चाहते हैं!/ये कैसी उत्तर आधुनिक बाजार संस्कृति में जी रहे हैं हम/ कि अब अपनी निजता भी अपनी नहीं रही!’
साहित्य अकादमी की ओर से पिछले दिनों आप एक विशिष्ट लेखक के रूप में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर गए प्रतिनिधि मंडल में शामिल किए गए थे। वहां से कैसे अनुभव लेकर लौटे। वहां आप ने ऐसा क्या देखा, जिसे देर तक याद रखना चाहेंगे?
दक्षिण अफ्रीका को आजाद हुए बीस बरस हो गए और महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के 100 साल भी पूरे हुए। इन्हीं दो अवसरों के निमित्त दक्षिण अफ्रीका के संस्कृति मंत्रालय और भारत उच्चायोग के संयुक्त तत्वावधान में वहां 25 से 30 अगस्त, 2014 तक भारत साहित्य महोत्सव का आयोजन हुआ था। उसी महोत्सव में मुझे भारत के लेखकों के प्रतिनिधिमंडल के साथ साहित्य अकादेमी की ओर से भाग लेने का अवसर मिला, जिसका अनुभव सुखद रहा। वहां के अनुभवों पर एक पुस्तक लिख रहा हूं, जिसमें विस्तार से हिन्दी की स्थिति, अफ्रीकी जीवन में गांधी का प्रभाव आदि की चर्चा होगी। दोनों देशों में काफी समानता है। हिन्द महासागर के दो छोरों पर बसे इन देशों में ऐसा बहुत कुछ है, जिनसे हमारा प्रेम, सद्भाव और सामाजिक सरोकार परस्पर बढ़ेगा। हिन्दी वहां भाषा नहीं, मातृभाषा की तरह पढ़ी जाती है। इसका अनुमान आप इतने भर से लगा ले कि वहां रेडियो का नाम ‘हिन्दवाणी’ है।

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