हरा-हरा खरगोश हुआ खामोश

कुछ लेखक पैदा बाद में होते हैं, उनकी पुस्तक पहले आ जाती है, लेकिन कुछ महानुभावों की लिखने में तो रु चि होती है, लेकिन छपने-छपाने में नहीं। मित्र-परिचित और कुछ सहृदय संपादक जरूर उन्हें छपने-छपाने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। फलत: लिखी जाने के बाद पत्र-पत्रिकाओं में तो उनकी रचनाएं छप जाती हैं, लेकिन पुस्तकें छपने का मामला देर तक लटका रह जाता है। किताबें छपने-छपाने के प्रति उदासीन रहे लोगों में जगदंबा प्रसाद दीक्षित और कामतानाथ जैसे अनेक बड़े लेखक शामिल हैं। अशोक गुप्ता का नाम उसी ‘उदासीन संप्रदाय’ के लोगों में शामिल रहा। अशोक के साथ एक चिप्पी और नत्थी है-पुरस्कार ठुकरा देने की। ऐसी ठकुराई (ठुकराई) कम ही लोग कर पाते हैं, क्योंकि उसके बाद ऐसे ठाकुरों को पुरस्कार देने से पहले सारे संस्थान हजार बार सोचते हैं। गौरतलब है कि अशोक के उपन्यास ‘उत्सव अभी शेष है’ को हिंदी अकादमी, दिल्ली का कृïïïïïïïïति सम्मान घोषित हुआ, जिसे उन्होंने घटना विशेष के विरोध में ठुकरा दिया था, लेकिन लगता है कि भावावेश में वे पॉवर पॉलिटिक्स के शिकार हो गए थे।
कोई पचपन बरस की उम्र में अशोक गुप्ता का पहला कहानी संग्रह ‘इसलिए’ छपा, किंतु छप्पन बरस में ही दूसरा ‘तुम घना साया’ आ गया, लेकिन तीसरे संग्रह ‘तिनकों का पुल’ को आने में सात बरस और लग गए। चौथा संग्रह ‘हरे रंग का खरगोश’ नौ बरस बाद आया। इस संग्रह में उनकी बीस कहानियां संग्रहीत हैं, जिनमें से पीर दुधारी वत्सला, नीले समंदर का पाठ, एक बूंद सहसा उछली, तिलचट्टïïे का मुखौटा,राग चिरंतन भोर विलास, नींद, सिद्घार्थ तथा रूस में एक लेखक था जैसी कहानियां पाठक को सोच-विचार के लिए विवश करती हैं। सनï् 2007 में उनका पहला उपन्यास ‘उत्सव अभी शेष है’ आ गया तो उनका कथा संचयन ‘मेरी प्रिय कथाएं’ भी। देर से ही सही, अशोक गुप्ता की पुस्तकों के प्रकाशन का सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर रुका नहीं। सौ से अधिक कहानियां लिखने वाले अशोक का दूसरा उपन्यास ‘भयकाल’ सन् 2013 में छपकर पाठकों के बीच पहुंच गया।
समकालीन हिंदी कथाकारों में अनेक ऐसे हैं, जिन्हें हमेशा विषय का टोटा पड़ा रहता है, लेकिन वरिष्ठï कथाकार विजय की तरह अशोक गुप्ता की कहानियों में किसिम-किसिम के विषय ही नहीं, तरह-तरह के पात्र और भिन्न-भिन्न परिवेश भरे पड़े हैं। फलत: उनकी कहानियों में कहीं भी किसी तरह का कोई दोहराव नहीं है-न विषय, न पात्र, न परिवेश और न ही कथ्य के स्तर पर, जिसे समझने के लिए अशोक की सिर्फ एक कहानी ‘कारण-अकारण’ को पढ़ लेना पर्याप्त होगा। कल्पना कीजिए कि आपको अपना खाना गरम करने के लिए जलती हुई किसी चिता की आंच का उपयोग करना पड़े तो कैसा लगेगा? निश्चित रूप से आप भूखे रह लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं कर पाएंगे, किंतु अशोक के संग्रह ‘हरे रंग का खरगोश’ की अठाहरवीं कहानी ‘कारण-अकारण’ के नायक छदामी के लिए यह रोजमर्रा का काम है। उसकी दिनचर्या एकदम तय है। शायद ही कोई लाश उसके पहुंचने के पहले आ पाती हो। जब तक कलंकी कम से कम दो मुर्दों की खुराक भर लकड़ी तौलकर तैयार करता है, तब तक छदामी की साइकिल फाटक के अंदर आ चुकी होती है। वह साइकिल के हैंडल पर टंगा रोटी का अपना थैला तभी उतारता है, जब पहली लाश अपना चबूतरा तय कर चुकी हो। फिर छदामी उस चबूतरे के पास वाले पेड़ में ठुकी कील पर अपना थैला टांगकर काम में जुट जाता है। काम भी छदामी का कम मेहनत का नहीं है, लेकिन छदामी तो जैसे उस मेहनत को गिनता ही नहीं। दोपहर में छदामी पेड़ की कील से अपना रोटी का थैला उतारता है तो किटकिटाती सर्दी के मौसम में भी उसे डिब्बे में रोटी गरम मिलती है। उसके थैले पर राख की एक हल्की परत जम चुकी होती है।
जाहिर है कि जलती चिता की राख जब हवा के साथ उड़ती है तो वह न रोटी का थैला देखती है और न किसी का चेहरा। छदामी हर रोज अपना थैला किसी जलती चिता के सामने पेड़ पर ठुकी कील पर ही टांगता है। इसके लिए उसने श्मशान के अहाते में लगे पांच पेड़ों के तनों पर एक-एक कील ठोंक रखी है। क्या पता, किस पेड़ की कील पर रोटी का थैला टांगना पड़े। रोटी वह गरम ही खाना पसंद करता है। खाने के समय वह कील से थैला उतारता, फूंक मारकर उस पर जमी राख उड़ाता और उधर चल पड़ता, जिधर कलंकी का लकड़ीघर है। कलंकी को यह सुविधा है कि लकड़ीघर एक कोठरी में है, जिसकी दीवार में दो खूंटियां हैं, जिन पर छदामी थैला टांगता है।
थैला उतारकर छदामी जब उस पर जमी राख अपने चेहरे पर छितरा लेता है, तब भी वह चेहरे पर हाथ या रूमाल नहीं फेरता। वह तो कलंकी की जिद है, जो छदामी से खाने से पहले उसका हाथ-मुंह धुलवा लेती है, वर्ना छदामी अपने श्मशान के काम को वैसे ही रच-बसकर करता है, जैसे ढाबेवाला गर्मी-सर्दी अपने तंदूर पर खड़ा होकर रोटी निकालता है। तंदूर वाले ने रोटी पकाते समय रोटी की सुगंध की बात बतायी तो छदामी ने उससे कहा था कि तुम्हारी रोटी की सुगंध की तरह लाश के जलने की गंध भी कोई बुरी नहीं होती। कई बार तो घी और लोबान की खुशबू उस गंध को मनभावन बना देती है, लेकिन छदामी के इस भाव पर कलंकी हैरत करता और उस पर लानत भेजता, ‘यार, पेट के लिए तो मजबूरी में कोई भी काम करना पड़ता है, लेकिन तू तो जैसे उसका कोई भी असर अपने ऊपर नहीं लेता, न भीगता है, न कांपता-थरथराता है। चाहे वह बच्ची की लाश हो, चाहे हथठेले पर अकेले आदमी द्वारा लादकर लायी गई लावारिश बूढ़े की लाश! तू कैसा पत्थर दिल आदमी है छदामी!’
समय, समाज और परिवेश की बर्बरता किसी व्यक्ति को किस कदर जड़ीभूत कर देती है कि उसे चिता की आंच से अपना खाना गरम करने में तो कोई असहजता नहीं ही लगती, किसी बच्चे और बूढ़े की लाश में भी फर्क लगना बंद हो जाता है। इसी तरह संग्रह की कहानी ‘जिंदा चेहरा’ के सरदार संतोष सिंह किसी भी तरह के कुत्ते को गोली मारने में कोई फर्क नहीं करते। फिर वह चाहे कुत्ता सुंदर हो या मरगिल्ला खजियाया कुत्ता। इस तरह छदामी और सरदार संतोष सिंह एक ही धरातल पर खड़े दिखते हैं।
यह है अशोक गुप्ता के कहानीकार की वह कला, जो तंदूर में पकती रोटी की महक और जलती हुई चिता से निकलने वाली गंध को एक साथ मनभावन बना देती है। वे लकडिय़ों को मुर्दों की खुराक बताकर और लाश द्वारा अपना चबूतरा तय करने का मुहावरा गढ़ते हुए यह भी बता देते हैं कि अपने कथा परिवेश का उन्हें कितना ज्ञान है। जैसे हम लोग अपना कोई भी काम तल्लीन होकर करते हैं, वैसे ही छदामी श्मशान में अपना कर्तव्य निभाता है। तंदूर पर खड़े होकर जैसे रोटी पकाता है ढाबे वाला, कुछ वैसे ही, जैसे सरदार संतोष सिंह किसी भी तरह के कुत्ते को मार देते हैं। कहने का मतलब यह कि अशोक नित नए विषय, परिवेश और चरित्र सामने रखते हुए चमत्कïृत करते हैं।
चित्र और चरित्र खड़ा करने की उनकी यह कला देखकर सहसा प्रभु जोशी की ऐसी ही कहानियों की याद आ गयी, लेकिन प्रभु जोशी कथा सृजन से विरत होकर चित्र सृजन में रम गए और यह मैदान अशोक को खाली मिल गया। अशोक गुप्ता के संग्रहों में से अगर उनकी कुछ श्रेष्ठï कहानियों का चुनाव करना हो तो मेरी नजर में वे इस प्रकार हो सकती हैं: ‘इसलिए’, ‘एक बूंद सहसा उछली’, ‘कारण-अकारण’, ‘कोई तो सुनेगा’, ‘ठहाका’, ‘देहावसान’, ‘राग चिरंतन भोर विलास’, ‘शोक वंचिता’, ‘हरे रंग का खरगोश’ और ‘उजास’ और ‘इतना सारा’ आदि।

मित्रो,
‘ककहरा’ के विशेष सत्र में अमेरिका निवासी कथाकार सुदर्शन प्रियदर्शनी का कहानी पाठ होगा। आपकी सुविधा के लिए यहां उनकी कहानी ‘सरहदें’ संलग्न है।
-राज कमल
यह है ‘ककहरा’ के संयोजक अशोक गुप्ता के जीवन काल में इंदिरापुरम (गाजियाबाद) के हिमालय टॉवर में 4 अप्रैल, 2018 को होने वाली गोष्ठी का मित्रों के लिए आमंत्रण। गोष्ठी में सुदर्शन प्रियदर्शनी ने अपनी कहानी का पाठ तो किया ही, पर अस्वस्थ अशोक ने अपनी बातें उसी तरह कहीं, जिस तरह बरसों से कहते रहे जबकि वे कैंसर के लास्ट स्टेज की जानलेवा तकलीफ में थे, लेकिन मार्फीन लेकर उन्होंने खुद को सहज दिखाने की कोशिश की।
हमारे अलावा अन्य मित्रों को भी पता नहीं था, लेकिन राज कमल जानते थे कि वे महीने दो महीने के मेहमान हैं। 4 अप्रैल को अपने घर की गोष्ठी में एक सामान्य इंसान की तरह भाग लेने वाले अशोक को उनकी बेटी ने 12 अप्रैल को अपने फ्लैट के सामने शिफ्ट करवा लिया था। 15 अप्रैल को यही कोई साढ़े ग्यारह बजे रात में उन्होंने परिचारक सेे सबके लिए चाय बनाने को कहा और सामने के फ्लैट से बेटियों को बुला लिया। सबके साथ उन्होंने चाय पी और फिर बोले, ‘अब तुम लोग जाओ, मुझे नींद आ रही है।’ सुनकर सब लोग सोने चले गए और रात दो बजे बेटी ने राज कमल को फोन किया, ‘अंकल, पापा चले गए।’
इसे हम अशोक की इच्छा मृत्यु कह सकते हैं। काफी समय से अशोक असहनीय दर्द की गिरफ्त में थे, लेकिन न तो उनके ठहाके रुके, न ही मित्रों से होने वाली बातें। ‘ककहरा’ और अपने लेखन की योजनाएं भी हम लोगों से डिस्कस करते रहे। लगभग अंत तक। उनके जीवन काल में ही राज कमल ने उन पर केंद्रित कुछ सामग्री ‘लोकायत’ के आने वाले अंक में छापने का अनुरोध किया और यह भी कि जल्दी ही उन्हें कोई पुरस्कार मिल सके तो अच्छा होगा। हमने दोनों का इंतजाम कर लिया, लेकिन हमें पता नहीं था कि ठहाके लगाते अशोक इस तरह अचानक चले जाएंगे।
सुदर्शन प्रियदर्शनी के कहानी पाठ वाले दिन उन्होंने अपनी एक कहानी देते हुए कहा कि इस पर बड़ा आलोचनापरक लेख लिखो और बताओ कि मेरी कहानी कला कितनी ऊंचाइयां छू सकी और यह काम तुम्हें ‘तत्काल’ करना है, लेकिन उनके ‘तत्काल’ पर मेरा ध्यान नहीं गया। उन्हें शायद लग गया था कि उनका ‘तत्काल’ टिकट आ चुका है। अशोक के जीते जी जो नहीं हो सका, उसका क्या गम, पर ‘ककहरा’ में वे हमेशा मौजूद रहेंगे।
उनके जाने के बाद पहली गोष्ठी उन्हीं पर केंद्रित थी, जिसकी रपट पाठक पिछले अंक में देख-पढ़ चुके हैं। हमने उनसे आत्मकथ्य लिखने के लिए कहा था, जिसे उन्होंने लिख दिया था। अपनी किताबों के कवर भी मेल पर कर दिए थे और अपने कुछ छायाचित्र भी भिजवा दिये थे। अंत में एक और मेल करते हुए उन्होंने लिखा था-‘वन मोर’, जो जीवन संगिनी कमल के साथ है। लगता है कि उस चित्र में उनकी वह मुस्कान अशोक को कुछ ज्यादा ही प्रिय थी, जिसे इस बार के ‘आखिरी पन्ना’ में देख सकते हैं।
यहां यह बता देना भी शायद जरूरी है कि जीवन काल में ही अशोक ने ‘ककहरा’ का उत्तराधिकारी चुनकर इस दायित्व को ग्रहण करने के लिए उसे मना लेने की जिम्मेदारी मुझ पर डाल दी थी। जब राज कमल को बताया तो वे इसके लिए राजी न हुए। चाहते थे कि उन्हें इस लफड़े में न फंसाया जाए। उनका कहना था कि इस काम के लिए उपयुक्त व्यक्ति तो आप ही हैं। जिम्मेदारी से कन्नी क्यों काट रहे हैं? तब हमने ‘लोकायत’ के बोझ के चलते अपनी मुश्किलों का हवाला देते हुए बमुश्किल उन्हें राजी किया और पूरे सहयोग के लिए आश्वस्त किया।
अशोक के रोहिणी से इंदिरापुरम आने पर ‘ककहरा’ शुरू हुआ और हम सब ने अशोक को संयोजक चुना। वह अशोक का सपना था, जिसमें हमने अपने सपने जोड़ दिये थे। दिल्ली जैसे महानगर में किसी के भी अकेले पडक़र दु:ख में डूब जाने की आशंका हमेशा बनी रहती है। कवि-पत्रकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कुछ पंक्तियां हैं-‘दु:ख तुम्हें क्या तोड़ेगा/ तुम दु:ख को तोड़ दो/ अपने सपनों को/ औरों के सपनों से जोड़ दो।’ सो, हम सबने अशोक के सपने से खुद को जोड़ लिया और महीने में एक बार एनसीआर के किसी इलाके में किसी भी मित्र के घर पहुंच कथा-कविता कहने-सुनने लगे। इस तरह ‘ककहरा’ का सिलसिला चल निकला।
बेरोजगारी का भय अगर मनुष्य को युवावस्था में हाल-बेहाल करता है तो कुछ इसी तरह का असुरक्षाबोध वृद्धावस्था में मनुष्य को पल-प्रतिपल डराता है। इस स्थिति पर अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ बताता है कि आज का आदमी किस-किस किसिम के भय की गिरफ्त में है? यह भय स्वतंत्र रूप से तो एकांतिक लगता है, लेकिन उससे अंतर्संबंधों के अनेक बारीक तार जुड़े होते हैं, जिन्हें अशोक बड़े धैर्य और सावधानी से खोलते हैं। उपन्यास में एक तरफ गांव की आबोहवा में जातीय वैमनस्य का हिंसात्मक भय नजर आता है तो इसके समानांतर संपन्न वर्ग और सामान्य जन के बीच दबंगई का भय मौजूद है, जो मनुष्य के सहज जीवन को संप्रभुता के बलाघात से नियंत्रित करने की कोशिश में है। यहां भय है तो संघर्ष भी। जिजीविषा है तो भय को चीरते हुए आगे बढऩे का आत्मविश्वास भी। इस संतुलन-असंतुलन और किंचित अंतर्दाह को ‘भयकाल’ में अशोक गहराई से पकड़ते हुए सहज जीवन की राह खोजने का प्रयास करते हैं। काशी का ‘रेहन पर रग्घू’ भी यही करता है। ‘भयकाल’ वृद्धावस्था के विविध पहलुओं को अपना विषय बनाता है। समाज के हर वर्ग के सेवानिवृत्त बुज़ुर्ग संतानों के साथ रहना तो बड़े उत्साह से शुरू करते हैं, लेकिन जल्दी ही उन्हें पता चल जाता है कि वे असुरक्षा बोध से घिर गए हैं। अशोक ने जिस मनोवैज्ञानिक ढंग से बुजुर्गों की समस्याओं को पकड़ा और उनके निदान की दिशा में सामाजिक संदर्भों की पर्तें खोली हैं, वह महत्वपूर्ण है। उपन्यास की संरचना में चित्रों और चरित्रों के बीच के अंतर्संबंध जिस सघनता से चित्रित हुए हैं, उससे विषय के प्रति उपन्यासकार के सरोकार प्रकट होते हैं। निर्मल नीर-सी बहती भाषा उपन्यास को पठनीय बनाती है। कथा प्रसंगों का कलेवर विस्तृत है। दोनों प्रकार की कथाएं समानांतर शैली में साथ-साथ चलती हैं। परस्पर टकराते पात्रों के माध्यम से कथारस का आस्वाद पाठक को मिलता चलता है। गांवों में गैरजिम्मेदार और बिगड़ैल किशोर किस तरह के कुकृत्य करते हुए कमजोर तबके के लोगों को परेशान करते हैं, इसका मार्मिक और मनोरंजक चित्रण भी ‘भयकाल’ में है। उपन्यास की भाषा और संवाद अपनी ताजगी से पाठकों को आकर्षित करते हैं।
आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने उपन्यास की रचनात्मक सार्थकता को रेखांकित करते हुए कहा था: ‘‘अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ मूलत: सामाजिक उपन्यास है। कथाविन्यास को देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक है। मनुष्य अपने संस्कार और रुचियों में ऐसी ग्रंथियां पाल लेता है कि वह प्रिय परिवारजनों, यहां तक कि वंशजों तक से भयाक्रांत हो अपनी दुर्गति की कल्पना से निरंतर व्यथित रहता है। मिलकीत तनेजा के माध्यम से अशोक ने इस मनोवैज्ञानिक ग्रंथि के वैयक्तिक और पारिवारिक परिणाम का चित्रण किया है तो जानकी बल्लभ और भानुमती क ी साहसिक और संघर्षमय जीवन कथा के माध्यम से मानवीय और प्रगतिशील बदलाव का भी चित्रण किया है।’’
इसके आलोक में ‘भयकाल’ के आरंभ पर नजर डालकर देखते हैं: ‘‘कुछ देर वहां ठहरकर जानकी बल्लभ ने जेब से बाइनॉक्यूलर निकाला और घूमकर पहाड़ी के सामने का क्षितिज देखने लगे। एक पल, दो पल, फिर कुछ लंबे और पल वह अपनी आंखों पर बाइनॉक्यूलर टिकाये आकाश देखते रहे। देखने को बहुत कुछ था वहां। भरपूर नीला आसमान, स्वच्छंद तैरते बादल, बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखला और उन पर फैला धूप-छांही सुनहरा-रुपहला जाल। बहुत कुछ था, पर जानकी बल्लभ उस सब में क्या देख रहे थे या वह देख रहे थे, उस सबके बहुत पार, खुद अपने-आपमें…,’ जानकी बल्लभ उम्र के इक्यावनवें वर्ष में थे। आंख पर चश्मा आ गया और शरीर पर कुछ भारीपन उतरने लगा था। भारीपन है, लेकिन न रक्तचाप है, न मधुमेह, क्योंकि जो यह क्षितिज समेटे आकाश वह देख रहे हैं, वह तो न जाने कब से है उनके भीतर, खुद अपना रचा हुआ। और भानुमती है उनके साथ।’’ सो, ‘भयकाल’ में अपने रचे हुए संसार को पचास पार की उम्र में एक बार फिर से देख रहे हैं जानकी बल्लभ। जीवन के धूप-छांही रंग देखते हुए पाठक ‘भयकाल’ में एक साथ हंसने और रोने का आनंद पा लेते हैं। आखिरी दिनों में खुद अशोक की हालत भी कुछ ऐसी ही हो गई।
‘ककहरा’ के डिक्टेटर अशोक गुप्ता के साथ याद आ रहे हैं कथाकार कामतानाथ, जिनका उपन्यास ‘काल कथा’ भारत की आजादी की लड़ाई पर केंद्रित है, जिसके लिखे जाने की शुरुआत कानपुर में तभी हो गई थी, जब वे रिजर्व बैंक में काम करते थे। उनके घर होने वाली गोष्ठियों में हमने जेनुइन और फेक लेखन का फर्क जाना-समझा था। उन्हीं दिनों मेरी ‘कलम हुए हाथ’, ‘शिक्षाकाल’ और ‘पालनहारे’ जैसी कहानियां छपीं, जिनकी वजह से एमए करते हुए दैनिक ‘आज’ में नौकरी पा गए। फिर ‘सारिका’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में आ गए।
गृह राज्य उत्तर प्रदेश से बाहर पहली बार कामतानाथ के साथ ही कच्छ (गुजरात)की वह यात्रा की, जिसकी व्यवस्था उन्होंने ही की थी। वापसी में ब्रेक जर्नी कर भोपाल उतरे और कवि मित्र राजेश जोशी के घर रुके थे। अगले दिन मध्य प्रदेश साहित्य परिषद जाकर कथाकार शानी से मिले तो उन्होंने भोपाल के लेखकों को बुलाकर सबसे हमारी मुलाकात करवा दी। कामता के संग-साथ ने मेरे जैसे एक छात्र को क्या से क्या बना दिया था।
ऐसे ही रहे प्रौढ़ावस्था में मित्र से घने मित्र बने कथाकार अशोक गुप्ता, जिन्होंने दिल्ली के रोहिणी से तंबू उखाडक़र उत्तर प्रदेश के इंदिरापुरम (गाजियाबाद) के हिमालय टॉवर में जमाया, जो हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं था। उनके उधर से इधर आ जाने पर मुलाकातें बढ़ीं, जिन्हें विस्तार देने के लिए अर्चना वर्मा, राज कमल, सुरेश उनियाल और सुबोध के साथ हम लोगों ने ‘ककहरा’ का गठन कर उसका डिक्टेटर अशोक को चुन लिया। बाद में अंजली देशपांडे, प्रितपाल, सुभाष अखिल, नीला प्रसाद और संजीव गुप्ता भी हमसे आ मिले।
अशोक को तकलीफ रही कि किसी शताब्दी संचयन में उनकी कहानी नहीं है। किसी आलोचक ने अपनी किताब में उनकी किसी किताब की चर्चा नहीं की। किसी पत्रिका ने उनके जीवन और साहित्य पर विशेषांक नहीं निकाला। अपनी तकलीफें उन्होंने शेयर की थीं तो… पिछले बरसों में कई संचयनों में उनकी कथाएं संग्रहीत हुईं, उनकी किताबों पर लेख लिखे गए, जो किताबों में भी छपे और ‘लोकायत’ के इस अंक में उन पर एकाग्र सामग्री जा ही रही है। उनके मित्र और ‘ककहरा’ के उत्तराधिकारी राज कमल ने कुछ दुर्लभ फोटो दे दिये थे, लेकिन ‘लोकायत’ की अनियमितता के चलते इतना विलंब हुआ कि सब कुछ छपे रूप में देखे बिना वे चले गए। काश, जीते जी उनकी इच्छा पूरी हो पाती।
कथेतर गद््य पर हर बरस मेरी किताब आ जाती और ‘ककहरा’ के डिक्टेटर अशोक को पहली प्रति पाने का हक हासिल रहा। उस हक का नमक भी उन्होंने सदा अदा किया, पहली समीक्षा लिखकर। ‘स्वाधीनता का महास्वप्न’ आयी है, लेकिन अशोक नहीं हैं। उनकी जगह शायद कोई नहीं ले सकता…

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