स्त्री जीवन: स्वप्न और संघर्ष

पिछले दिनों हिंदी को मजबूती देने के लिए ‘दैनिक जागरण’ के नये मासिक आयोजन ‘हिंदी हैं हम’ का शुभारंभ साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सभागार में हुआ, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कवि, कथाकार, कलाकार और तमाम रंगकर्मी आ जुटे। प्रख्यात कथाकार ममता कालिया के सान्निध्य में कविता पाठ के साथ ‘स्त्री जीवन : स्वप्न और संघर्ष’ पर हुए परिसंवाद का विषय प्रवर्तन और संचालन कथाकार बलराम ने किया। ‘स्त्री जीवन : स्वप्न और संघर्ष’ पर हुए इस विमर्श में से निकले विचार समाज और साहित्य की सोच में बदलाव की भूमिका निभाते लगे। कविता पाठ के सत्र में हेमंत कुकरेती, जितेंद्र श्रीवास्तव, लीना मल्होत्रा और उमाशंकर चौधरी ने अपनी कविताएं पढ़ी। प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव के संचालन में सबसे पहले लीना मल्होत्रा राव ने अपनी कविता में महिलाओं के शरीर को बेधती दुनिया की आंखों से बचने के लिए तल्ख लहजे में कहा- ‘क्यों नहीं रख कर गई तुम घर पर ही देह। क्या दफ्तर के लिए दिमाग काफी नहीं था।’ दूसरी कविता में धर्म के नाम पर वहशीपन की तस्वीर सामने थी-‘खड़े रहे कई लोग जब फरखुंदा को जलाया जा रहा था/ उसे सबक सिखाया जा रहा था/ एक धार्मिक पुस्तक को जलाने का/ आसमान तक उठती थीं उसकी विह्वल चीखें।’ उमाशंकर चौधरी की कविताओं में वेदना और पलायन का पुट था- ‘एक दिन मैं भी घर से निकलूंगा और लौट कर नहीं आऊंगा/ पत्नी राह देखती रहेगी/ बच्चे नींद भरी आंखों के बावजूद/ पिता से किस्से सुनने का इंतजार करेंगे।’ इसके बाद एक बच्ची को लेकर पुरुष के मन में प्यार और उसे संदेह से देखती समाज की आंखों का चित्रण करती कविता दिल चीर गई- ‘बच्ची अन्तत: एक स्त्री है/ यह एक अतिरिक्त किस्म का संदेह/ एक अतिरिक्त किस्म की सतर्कता/ मुझे उस बच्ची को प्यार से महरूम करता है।’
इसके बाद हेमंत कुकरेती बेरोजगार के दर्द को उभारते हुए ‘दो घंटे पचास मिनट बाद/ जब उस कम बोलने वाले बेकाम लडक़े को/ अंदर बुलाता है वह असरदार आदमी/ उस लडक़े का रोम-रोम खुश दिखता है, करें क्या/ उसे सौ मुख और हजार जीभों से कहना तो चाहिए था, अरे कमीने, लेकिन ऐसा होता कहां है सर?’ जितेंद्र श्रीवास्तव की कविता में गांव, खेत, पेड़ पौधे सब थे- ‘आज उन खेतों ने मुझे पहचानने से इन्कार कर दिया है, जिनके मालिक थे मेरे दादा उनके बाद मेरे पिता।’
आरंभ में ‘दैनिक जागरण’ के संयुक्त संपादक अनंत विजय ने आयोजन के बारे में बताया कि ‘सान्निध्य’ का आयोजन हर महीने के दूसरे शनिवार को साहित्य अकादमी के सभागार में हुआ करेगा। ‘स्त्री जीवन: स्वप्न और संघर्ष’ पर हुए परिसंवाद में ममता कालिया के अलावा वंदना राग, ज्योति चावला और प्रज्ञा ने भाग लिया, जिसका विषय प्रवर्तन और संचालन बलराम ने किया। स्वप्न, स्त्री और लेखन के यथार्थ को सामने रखते हुए प्रज्ञा ने कहा कि एक स्त्री का सबसे बड़ा स्वप्न उसकी मुक्ति है, क्योंकि देश का संविधान और समाज का संविधान मेल नहीं खाता। संविधान सबको समान नजरिये से देखता है, लेकिन समाज का व्यवहार पितृसत्तात्मक है। यही हाल धर्म का है, जो स्त्री की आजादी को अमरबेल की तरह जकड़ता जाता है। महिला गृहिणी तो हो सकती है, लेकिन उसका कोई घर नहीं होता। इस सोच और मानसिकता की जकडऩ को पुराने कानूनों से नहीं तोड़ा जा सकता है। इस अवसर पर युवा कथाकार ज्योति चावला ने कहा कि लड़कियों को शुरू से ही यह बताया जाता है कि जब वह बड़ी होंगी तो घोड़े पर सवार राजकुमार आकर उसे अपने साथ ले जाएगा। इस तरह उसके सपनों की उड़ान राजकुमार तक सीमित हो जाती है। ऐसा कर परिवार और समाज की ओर से उसके सपने तय कर दिए जाते हैं। जब तक लड़कियों को सपने देखने की आजादी नहीं दी जाएगी, तब तक उनकी सोच में बदलाव नहीं होगा। कथाकार वंदना राग ने निराशा जताते हुए कहा कि अब भी स्त्री संघर्ष और आजादी की बात हो रही है। हमारी पहचान महिला साहित्यकार के रूप में कराई जाती है, साहित्यकार के रूप में नहीं। अंत में अध्यक्षीय संबोधन में ममता कालिया ने कहा कि स्त्री रचनाकारों को खुद को महिला विषय तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उसे पूरे मनुष्य समाज के संघर्षों को अपने लेखन में में शामिल करना होगा, तभी उन्हें संपूर्ण लेखक का दर्जा हासिल होगा। आयोजन में प्रो. सुधीश पचौरी, ‘पाखी’ के संपादक प्रेम भारद्वाज, भगवानदास मोरवाल, राजकमल प्रकाशन के निदेशक अलिन्द महेश्वरी के अलावा क्षमा शर्मा और वाणी की निदेशक अदिति महेश्वरी भी उपस्थित थीं।

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