सोती है सरकार,जागते हैं मच्छर

छत्तीसगढ़ में डेंगू का आतंक फैला हुआ है। प्रदेश के पांचों संभाग डेंगू की चपेट हैं। अस्पतालों में मरीजों का तांता लगा हुआ है। सैकड़ों डेंगू पीडि़त रोगियों का इलाज, राज्य के विभिन्न शासकीय और निजी चिकित्सालयों में चल रहा है। डेंगू का कहर कितना जबरदस्त है, इसका अंदाजा इससे लगता है कि जुलाई से अगस्त अंत तक अकेले इस्पात नगरी भिलाई के 10 हजार 3 सौ 85 लोगों के ब्लड सेंपल की जांच में 2 हजार 2 सौ 88 नमूने पॉजिटिव मिले और डेंगू मुक्त इलाका माना जाने वाला बस्तर अंचल भी इसकी चपेट में है। एक माह के भीतर प्रदेश में डेंगू से कई मौतें हुई हंै। राजधानी रायपुर, भिलाई तथा दुर्ग के शासकीय और निजी अस्पताल डेंगू और संदिग्ध रोगियों से पटे पड़े हैं। तमाम मौतों के बाद स्वास्थ्य विभाग ने दुर्ग जिला को डेंगू महामारी ग्रस्त जिला घोषित कर दिया है, मौत के आंकड़े भयावह हंै, लोग डरे हुए हैं और उनकी घबराहट जायज है, क्योंकि पता नही कब-कौन डेंगू की चपेट में आ जाये।
राज्य की सबसे बड़ी औद्योगिक नगरी भिलाई डेंगू से बुरी तरह प्रभावित है। यहां डेंगू से सवार्धिक मौतें हुई हैं। आंकड़ों के अनुसार सितंबर के दूसरे पखवाड़े तक 40 लोग डेंगू से मर चुके हैं। भिलाईवासियों की नजर में डेंगू से थोक मौतों की वजह स्वास्थ्य विभाग, स्थानीय निकाय और सरकार का अनमनापन है। समय रहते बचाव के यथेष्ट उपाय नहीं किये जाने की चूक का खामियाजा भिलाईवासी भुगत रहे हैंं। अत्याधुनिक उपचार की बेहतर सुविधा मुहय्या कराने के बाबत बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार ने 21 दिन में 23 मौतें होने के बावजूद यह माना कि भिलाई के खुसीपजर में डेंगू बेकाबू है। जन सामान्य में नाराजगी प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री की बेफिक्री को लेकर भी है। भिलाई से राजधानी रायपुर की दूरी महज 27 किलोमीटर है, लेकिन इतना फासला तय करने में उन्हें एक माह लगा, वह भी तब, जब मीडिया ने उनकी इस जादुई गुमशुदगी को लेकर जमकर खिंचाई की और आक्रोशित लोग सडक़ों पर उतरे आये। इससे पहले भारतीय जनता पार्टी की सांसद सरोज पाण्डेय ने भी स्वास्थ्यमंत्री अजय चंद्राकार के काम-काज के प्रति खिन्नता का इजहार करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा को पत्र लिखा था। गौरतलब है कि भिलाई नहीं जाने पर जब विपक्ष और मीडिया से घिरे स्वास्थ्य मंत्री ने दवाब हटाने के लिए कहा था कि वीआईपी दौरे से स्वास्थ्य सेवा और इलाज प्रभावित होता है, लेकिन उनकी यह दलील किसी के गले नहीं उतरी और पार्टी के भीतर भी उनकी आलोचना शुरू हो गयी। आखिरकार चौतरफा घिरे स्वास्थ्य मंत्री को भिलाई जाने का मन बनाना ही पड़ा।
वहां आने पर स्वास्थ्य मंत्री ने भिलाई के सर्वाधिक डेंगू प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया और सख्त ताकीद दी कि डेंगू से मौतें बर्दाश्त नहीं की जायेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि डेंगू से बचाव और डेंगू पीडि़तों के इलाज के लिए संसाधनों की कोई कमी नहीं है, पर लोगों का कहना है कि इलाज में यह देर अंधेर का सबब है। अगर स्वास्थ्य मंत्री डेंगू से हुई पहली मौत के बाद ही भिलाई का हाल जानने के लिए आ जाते तो शायद कुछ जिंदगियां बच जातीं और हजारों लोगो की जान सांसत में न पड़ती, लेकिन इतनी हिदायत देने में उन्हें एक माह का वक्त लगा, जबकि जानलेवा डेंगू का फैलाव, रोक थाम के उपायों और जांच-उपचार की कमियों के होने की चर्चा हर जुबां पर थी। सूत्रों के अनुसार जुलाई माह में जब डेंगू से मौतें हुई थीं, तब जिला अस्पताल में 32 और लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल, सुपेला में महज 9 किट थी खुर्सीपार, बापू नगर, छावनी और बैकुंठधाम के स्वास्थ्य केंद्रों में एक भी किट न थी, जबकि इन बस्तियों में डेंगू के मरीज सबसे ज्यादा थे। डेंगू किट के साथ ही मच्छर और लार्वा को मारने की दवा की कमी खलने वाली रही। डेंगू बुखार एंडीस मच्छर से फैलता है। प्रभावित क्षेत्रों में डेंगू मच्छर और लार्वा के खात्मे के लिए असरकारी टैमिफास जरूरत के मुताबिक उपलब्ध न थी। अत: मिथालियोन और डेल्टा मेथेलिन के छिडक़ाव से काम निकालने की कोशिश की गयी, लेकिन इससे डेंगू के मच्छर और लार्वा मरते नहीं हैं। शासकीय अस्पतालों में किट की कमी और जांच में देर से मरीजों के सही उपचार में विलंब होने के कारण 3 अगस्त से 5 अगस्त के बीच हुई 5 मौतों के बाद प्रशासन ने निजी पैथालॉजी को प्लेट्सलेट की जांच के लिए जोड़ा गया और तकरीबन दो दर्जन मौतों के बाद निजी अस्पतालों में नि:शुल्क इलाज का आदेश सरकार ने दिया, लेकिन शुरुआती कोताही से परवान चढ़ा डेंगू का तांडव शहर को रुलाता रहा। हर आयु वर्ग के लोग काल कवलित हुए हैं। इनमें बड़ी संख्या कम उम्र के छात्रों और नौजवानों की है। रवि 8 वर्ष, यामिनी यादव 8 वर्ष, मीमांसा माही 13 वर्ष, प्रियंका 4 वर्ष, अनन्या 11 वर्ष, छाया वर्मा 19 वर्ष, ध्रुव यादव 13 वर्ष, सरस्वती यादव 16 वर्ष, अर्पित, ईशा सिंह, छाया वर्मा, पीहू 6 वर्ष जैसे कम उम्र के बच्चे और साई कुमार साहू ,रौनक कुमार साहू ,विजय, रणवीर यादव, सुरेश निर्मलकर 34, मोहम्मद अब्दुल मेनन 32, मुकेश, महेश महानंदा, प्रवीण अग्रवाल 30 वर्ष, चंद्रा देवी 35,पार्वती 27, टोमेन्द्र सेन, रुद्र प्रसाद यादव 21 वर्ष करण यादव 20 , दुष्यंत मारकंडे 21, झुमुकलाल 45 वर्ष आदि अपने आत्मीयों से सदा के लिए बिछुड़ गये। शासन ने कर्तव्य पालन में लापरवाही बरतने के दोष में मुख्य चिकित्सा अधिकारी संतोष दुबे और नगर निगम आयुक्त के. एल. चौहान को हटाकर अन्यत्र पदस्थ कर दिया, लेकिन इससे परेशान हाल लोगों को कितनी दिलासा मिलेगी, कह पाना मुश्किल है।
प्रदेश की अन्य प्रभावित जगहों का हाल भिलाई जैसा नहीं है, लेकिन सहमें सभी हैं कि उनकी दुर्गत भिलाई जैसी न हो। भिलाई से सटे दुर्ग शहर में भी कम अफरा-तफरी नहीं है। जिला और संभाग मुख्यालय होने के कारण चिंतित अधिकारियों ने अपने स्तर पर हर संभव पहल की कि दुर्ग की हालत भिलाई जैसी न हो, लेकिन 61 वर्षीय सीता पवार की मौत से बौखलाहट बढ़ गयी। मृतका को 5 सितंबर को भर्ती किया गया था, लेकिन उसकी गंभीर हालत को देखते हुए उसे चंदुलाल चंद्राकर अस्पताल भिलाई में दाखिल कराया गया, लेकिन वहां स्थिति में सुधार न होने के कारण रायपुर रेफर कर दिया गया। धमधा, पाटन, कुम्हरी, नंदनी, अहिवारा और उतई में भी डेंगू के रोगी मिले। गंभीर रोगियों को विभिन्न अस्पतालों में उपचार के लिए रेफर किया गया है। जांच में उतई क्षेत्र में जानलेवा जापानी इंसेफ्लाइटिस पाया गया। यह चावल के खेत मे पनपने वाले मच्छर के काटने से फैलता है। बालोद जिले के पंगरी गांव की 19 वर्षीय हेमा और बेमेतरा जिले के अमोरा ग्राम की 19 साल की अनीता वर्मा की मौत एक निजी अस्पताल हो गयी। अनीता को 16 अगस्त को भर्ती किया गया था। राजनांदगांव और कबीर धाम, कवर्धा जिले में भी डेंगू दस्तक दे चुका है। राजनांदगाव में 47 डेंगू मरीज मिलने से खलबली है। प्रशासन की कोशिश है कि इन जिलों में डेंगू और अधिक नहीं फैले। मुख्यमंत्री का गृह जिला कवर्धा और विधानसभा क्षेत्र राजनंदगांव होने कारण यहां के लोगों को लगता है कि भिलाई जैसा हाल न होगा।
अगस्त माह तक बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर में 39 रोगियों को इलाज के लिए भर्ती किया जा चुका था, जिनमें 5 ग्रामीण और शेष शहरी हैं। सबसे ज्यादा पीडि़त कालीपुर अटल आवास में मिले हैं। कोंडागांव में 2 रोगी थे, जिनमें एक आगंबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका संघ की जिला अध्यक्ष पुष्पा राय है। बस्तर के अन्य जिले सुकमा, नारायणपुर में भी डेंगू की पुष्टि हो चुकी है। इससे पहले माना जाता रहा है कि बस्तर में डेंगू का कोई असर नहीं है।
राजधानी रायपुर में फैला डेंगू चिराग तले अंधेरे जैसा है। रायपुर के जवाहर नगर मुहल्ला निवासी 37 वर्षीय गिरधारी मिश्र की मौत हो गई है। इसके बाद अमला जागा और कथित युद्ध स्तरीय साफ-सफाई और चाक चौबंद इलाज में जूट गया, लेकिन शासकीय मेडिकल कॉलेज और नामचीन निजी अस्पतालों में लोग लगातार भर्ती हो रहे हैं। अगस्त माह के अंतिम सप्ताह में महासमुंद जिले की 15 वर्षीय बालिका ओमेश्वरी की डेंगू से मौत हो गयी। धमतरी जिला के वनाचल क्षेत्र के भाखरा और कुरुड नगरी में डेंगू मरीज मिलने के बाद जिले को संवेदनशील घोषित कर दिया गया। ग्राम रत्नाबांधा, जोधापुर बेलरगांव में डेंगू की पुष्टि हुई है। स्वास्थ्यमंत्री धमतरी के होने की वजह से स्वास्थ्य विभाग अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है। यहां भिलाई जैसी देरी किए बिना रोक थाम के प्रयास शुरू हो गये थे। गरियाबंद जिले के विकासखण्ड देवभोग के देवगुड़ा गांव के निवासी तुलाराम को इलाज में परेशानी का सामना करना पड़ा। सरकार ने निजी चिकित्सालयों में स्मार्ट कार्ड और कार्ड न होने की स्थिति में भी इलाज करने के निर्देश दिये हैं। इलाज पर आए खर्च का भुगतान सरकार संजीवनी कोष से करेगी, लेकिन सूत्रों के अनुसार स्मार्ट कार्डधारी तुलाराम को इलाज के एवज में 72 हजार रुपये जेब से भरना पड़ा।
बिलासपुर संभाग के सभी जिलों में डेंगू के रोगी मिले। बिलासपुर के अपोलो और मेडिकल कॉलेज सिम्स और जिला अस्पताल तथा अन्य बड़े निजी अस्पतालों में शहर और जिले के अलावा अन्य जिलों के नये मरीज रोज भर्ती हो रहे हंै। जांजगीर-चाम्पा जिले के मालखरौदा ब्लाक के गांव बसंतपुर की रहने वाली छात्रा संगीता पटेल की मौत कृष्णा मेडिकल सेंटर किम्सत्न में हो गयी। अकलतारा ब्लाक के गांवों तरौद की रुक्मिणी, पोड़ी दलहा की सरस्वती साहू और सरस्वती नवरंगे, बम्हनीडीह विकासखण्ड के गांव सरवानी की छात्रा सुधा सूर्यवंशी, सक्ती तहसील के मोहतरा ग्राम के 56 वर्षीय सुखीराम पटेल को इलाज के लिए सिम्स बिलासपुर रेफर किया गया है। सितंबर माह में जाजगीर नगर के वार्ड न. 17 के निवासी किशोर सौम का एलीजा टेस्ट रिपोर्ट पॉजेटिव रही। जांजगीर जिले में इलाज के संसाधनों और विशेषज्ञों की कमी है। इसके चलते पहले चरण के रोगियों को भी बिलासपुर, रायपुर भेजा गया।
कोरबा जिले में 25 जुलाई को पोड़ी खुर्द निवासी 40 वर्षीय इतवार खैरवार की मृत्यु एक निजी अस्पताल में हुई थी, लेकिन उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। इससे डेंगू का दायरा बढ़ा। हाल ही में कई संदिग्ध रोगी मिले। इनमें 2 का इलाज बालको अस्पताल में चल रहा है और 2 को उपचार के लिए रायपुर रेफर किया गया है। कोरबा में कई कोयला खदानें हैं। मणिकपुर कॉलोनी की दुरगवाती शर्मा और भगतसिंह कॉलोनी के निवासी 22 वर्षीय अंकित गिरि के बीएलडी टेस्ट रिपोर्ट पॉजेटिव आने पर उन्हें अपोलो अस्पताल, बिलासपुर रेफर किया गया।
मुंगेली जिले के लोरमी विकासखण्ड में डेंगू के कई सदिग्ध रोगी मिले हैं। बिलासपुर के सीपत विकासखण्ड के राठ गांव निवासी 20 वर्षीय आशीष की मृत्यु अपोलो में इलाज के दौरान हो गयी। अपोलो प्रबंधन ने मौत का कारण डेंगू बताते हुए सीएमओ को सूचना भेजी। रतनपुर में भी डेंगू के संदिग्ध रोगी मिले। शहर के गोड़पारा में डेंगू मरीज मिलने के बाद कुछ एतिहाती कदम उठाये गए हंै। रायगढ़ जिले में डेंगू के रोगी मिलने की पुष्टि हुई है। 172 संदिग्ध रोगी रायगढ़ मेडिकल कॉलेज और जिंदल फोर्टिस में लगातार आ रहे हंै। सरगुजा संभाग में डेंगू के विस्तार और मौत से लोगों में दहशत है। सरगुजा संभाग के अंतर्गत आने वाले जिलों में डेंगू पसर चुका है। कई डेंगू पीडि़तों का इलाज अम्बिकापुर मेडिकल कॉलेज और होलीक्रास मिशन अस्पताल में चल रहा है।
सुरजपुर जिले के ग्राम बेदमी की 11वीं की छात्रा 17 वर्षीय सुंगति अगारिया की मौत 13 अगस्त को मिशन अस्पताल में हो गयी और बलरामपुर जिले के रामानुजगंज के वार्ड नंबर 5 निवासी 40 वर्षीय मीरा यादव की रांची में मौत हो गयी। उनका इलाज रांची में चल रहा था।
सितंबर माह में जशपुर जिले के गांव मयूर नाचा की धुरनी बाई के एन एम टेस्ट में डेंगू की पुष्टि होने के बाद उन्हें बेहतर उपचार के लिए जशपुर अस्पताल से रायगढ़ मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था। कोरिया जिले में सन् 2012 में दो दर्जन से अधिक लोगों की मृत्यु डेंगू से हुई थीं, लेकिन इस साल जब डेंगू ने वहां दस्तक दी तो बचाव के लिए जिम्मेदार लोगों के हाथ-पांव फूल गये। जिला मुख्यालय से सटे नगर पंचायत चरचा निवासी 11वीं की छात्रा श्वेता राजवाड़े की मौत के बाद जो तथ्य सामने आये, वह स्वास्थ्य विभाग की कलई खोलने के लिए काफी हैं। बताया जाता है कि छात्रा जब पहली बार 23 जुलाई को शहर के निजी अस्पताल में भर्ती हुई थी तो उसके रक्तका नमूना जांच के लिए रायपुर भेजा गया था। सेंपल जांच में डेंगू की पुष्टि हुई। निजी अस्पताल ने इसकी सूचना स्वास्थ्य विभाग को दी, लेकिन महकमा सोया रहा। 6 अगस्त को तबीयत बिगडऩे पर छात्रा को दोबारा भर्ती किया गया तो उसकी स्थिति को गंभीर देखते हुए रायपुर के बालाजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 9 अगस्त को उसने दम तोड़ दिया । उसकी मृत्यु के बाद स्वास्थ्य विभाग जागा और दवा का छिडक़ाव कराया गया लेकिन तब तक डेंगू पैर पसार चुका था। छ: शासकीय कर्मचारियों में डेंगू पॉजिटिव पाये जाने के बाद जिले में हडक़ंप मच गया। संभाग के कोयला क्षेत्र में मिले मरीजों को साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड से समुचित उपचार के लिए अपोलो अस्पताल, बिलासपुर भेजा गया।
डेंगू के तीव्र विस्तार और मौत के नंगे नाच की मुख्य वजह हद से ज्यादा हुई लापरवाही है। मुख्य सचिव अजय सिंह को एक बैठक में बताया गया कि डेंगू का पहला रोगी जून में मिला था। इसके बाद जो सावधानी बरती जानी थी, उसे पूरी तरह से नजरंदाज किए जाने से डेंगू महामारी में बदल गया। जिला मलेरिया विभाग ने भिलाई नगर निगम और अन्य संबद्ध महकमों को सतर्क तो किया था, लेकिन इसकी ओर ध्यान नहीं दिया कि डेंगू से बचाव के लिए क्या किया जा रहा है? प्रदेश में डेंगू से हुई मौतों के लिए केंद्रीय निरीक्षण दल ने स्थानीय एजेंसी की लेट लतीफी को जिम्मेदार माना है। सेंट्रल टीम के अनुसार वक्त पर दवा का छिडक़ाव न होने से मच्छर पनपे और शहरों को चपेट में ले लिया।
डेंगू की जांच के लिए आईजीजी, आईजीएम, एनएसआई, और एएनआईजीइएन टेस्ट हैं। इनमें एनएसआई और एएनआईजीइएन को अधिक प्रामाणिक माना जाता है। डेंगू तीन प्रकार के होते हंै। प्रथम स्टेज जानलेवा नहीं है। सेकेंड स्टेज डेंगू हेमरीज डीएचएफ और तीसरा स्टेज डेंगू शॉक सिंड्रोम डीएसएस है। स्पर्श अस्पताल भिलाई के डॉक्टर गोपीनाथ के अनुसार डेंगू बुखार की कई किस्में हैं। इनमें हेमरीज डेंगू और शाक सिंड्रोम डेंगू खतरनाक होते हंै। प्लेटलेट्स तेजी से घटते हैं, शरीर में प्लेटलेट्स घटकर 20 हजार होने पर किडनी,लीवर, फेफड़ा और हार्ट काम करना बंद कर देता है। जबलपुर स्थित इंडियन मेडिसिन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च आईसीएचआर लैब ने पुष्टि की है कि जांच में टाइप 3 वायरस मिले हैं, जो खतरनाक होते हैं। राष्ट्रीय जन जाति स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान, जबलपुर के विशेषज्ञों ने रक्त नमूनो की जांच में पाया कि सेकेंड स्टेज के वायरस के कारण मौतें हुई हैं। नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल, दिल्ली के उपनिदेशक अमरपाल सिंह भदौरिया की टीम पीडि़त क्षेत्र का जायजा लेने के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि जिम्मेदार महकमों की लापरवाही और असावधानी से डेंगू फैला है।
सूत्रों के अनुसार सरकारी नाकामी की मुख्य वजह प्यास लगने पर कुआं खोदने जैसा कामकाजी तरीका है। यह एक तरह से सांप निकलने के बाद लकीर पीटने जैसा काम है । इससे किसी को लाभ नहीं मिलता, बल्कि सरकार खुद परेशान होती है और दूसरों को हलकान भी करती है। इस बार भी जब तक डेंगू से कहर नहीं बरपा, तब तक माना जाता रहा कि सब कुछ चुस्त-दुरुस्त है, लेकिन डेंगू को कितनी गंभीरता से लिया गया, मलेरिया विभाग की चूक इसका नमूना है कि जब डेंगू की पुष्टि हुई, तब पत्र से सूचना देकर मान लिया गया कि सब ठीक है। यह जानने की जरूरत नहीं महसूस की गयी कि छिडक़ाव के लिए जरूरी औषधियां हंै कि नहीं या छिडक़ाव हुआ या नहीं। मुख्य सचिव अजय सिंह को एक बैठक के दौरान बताया गया कि डेंगू का पहला रोगी जून में मिला था, लेकिन उस क्षेत्र में डेंगू का विस्तार रोकने के लिए आवश्यक सतर्कता नही बरती गयी। किसी महकमे ने बचाव प्रबंध तो दूर, निरीक्षण तक की जरूरत नहीं समझी। इसी तरह डेंगू पीडि़तों की जान बचाने के लिए शासकीय चिकित्सालयों में समुचित व्यवस्था न होने से बीमारों को भारी परेशानी से दो-चार होना पड़ा। प्रदेश स्वास्थ्य मंत्री के भिलाई दौरे के मध्य परेशान हाल लोगों ने बताया कि रक्तके नमूने की जांच की रिपोर्ट के लिए 24 घंटे से ज्यादा समय इंतजार करना पड़ता है। आम शिकायत है कि सरकार ने निजी अस्पतालों में नि:शुल्क इलाज की घोषणा करने में देर की। इसकी वजह से निजी अस्पतालों ने भारी चांदी काटी। सूत्रों के अनुसार 21 अगस्त को फ्री यानी सरकारी खर्च पर इलाज करने के निर्देश को कई निजी अस्पताल नहीं मान रहे हैं। जांच, इलाज, खाना पूर्ति में भागदौड़ के साथ हजारों रुपये लग रहे हैं। कुछ लोगों को शिकायत है कि कतिपय बड़े निजी अस्पताल में इलाज के लिए राशि भी वसूली जा रही है। मरीज और उसके परिजनों या शुभचिंतकों की हालत ‘मरता क्या न करता’ जैसी है। एक और बड़ी दिक्कत डेंगू से मौत के प्रमाणीकरण की है। जिन मरीजों की मौत रिपोर्ट आने से पहले हो गयी और जिन डेंगू पीडि़तों की मौत निजी अस्पतालों में हुई, उसको लेकर काफी नुक्ताचीनी हो रही है। स्वास्थ्य विभाग हर तरह से परदेदारी कर रहा है। नियम कायदों की तकनीकी औपचारिकता की आड़ लेकर तथ्य और सत्य को नकारा जा रहा है। 9 अगस्त तक 21 मौतें हो चुकी थीं, लेकिन स्वास्थ्य आयुक्त आर.प्रसन्ना ने रायपुर की एक पत्रकार वार्ता में कहा कि सिर्फ 7 मौतें हुई हैं।
अंदर की जानकारी रखने वालों के अनुसार यह सरकार का चेहरा साफ रखने की कोशिश है ताकि गिरने वाली गाज से बच सकें। कुछ लोगों का यहां तक मानना है कि विपक्षी दल मृतकों को मुवाआजा देने की मांग कर रहे हैं। चुनावी वर्ष होने के कारण सरकार ऐसा कर भी सकती है ताकि कम से कम राशि देनी पड़े और बदनामी भी उतरप्रदेश के गोरखपुर कांड जैसी न हो।
लोगों का कहना है कि निजी अस्पतालों को डेंगू के इलाज करने के लिए कहा गया है, लेकिन जब स्वास्थ्य विभाग डेंगू से मृत्यु को मानेगा ही नहीं तो उपचार और अस्पताल का खर्च मृतक के परिजनों के सिर ही आना है। कमोवेश यही बात डेंगू का इलाज करा रहे रोगियो पर भी लागू होती है। सूत्रों के अनुसार दुरुस्त ग्रामों में भी डेंगू पीडि़तों की मौतें हुई हंै। स्वास्थ्य विभाग के पास डेंगू किट न होने और स्वास्थ्य संयोजकों के हड़ताल पर होने के कारण मृतक अस्पताल का मुंह तक नहीं देख पाये। पहले की तरह ही तकनीकी कारणों से इन मौतों को डेंगू मौत नहीं माना जा रहा है, लेकिन इस बहाने वनों में स्थित गांवों और पिछड़े ग्रामों को नजरंदाज करना उचित नहीं। यह न्यायसंगत भी नहीं है।
तमाम गड़बडिय़ों के बीच अकेले मुख्य सचिव अजय सिंह ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने इस मोर्चे पर अपनी जिम्मेदारी पूरी गंभीरता से निभायी है। उन्होंने खुद आगे बढक़र मरीजों को डेंगू से बचाने के लिए जो संभव था, किया है। वे बिना ढोल पीटे प्रभावित जिलों मे गए, बैठकें लीं, काम-काज की समीक्षा की और बचाव प्रबंध से आम आदमी को भी जोडऩे के लिए डेंगू से बचने के उपायों की जानकारी जन साधारण तक पहुंचे, इसके लिए जरूरी निर्देश भी दिये। साथ ही पस्त हाल अधिकारियों और नागरिकों की हौसलाअफजाई भी की। प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के अनुसार तापमान गिरने तक डेंगू मच्छर बने रहेंगे। अनुमान है कि अक्टूबर से तापमान में कमी आना शुरू होगी और डेंगू का प्रकोप क्रमश: कम होगा। लोग अपनी सलामती की दुआ कर रहे हैं कि यह मुश्किल दौर जितना जल्द गुजर जाये, उतना ही अच्छा है। डेंगू पीडि़तों के मरने का कारण भले ही यह रोग है, लेकिन इलाज के दौरान जिस मानसिक और शारीरिक यंत्रणा से रोगी और उनके परिजन तथा हितैषी गुजर रहे हंै, सरकार अथवा गैरसरकारी संस्थाओं की ओर से की जाने वाली कोई भी मदद उसकी भरपाई नहीं कर सकती। इसलिए डेंगू को बढऩे से रोक देना ही उसका सही इलाज है।

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