लघुकथा को आर्य स्मृति साहित्य सम्मान

हिंदी भवन में आयोजित सम्मान समारोह में 25वें आर्य स्मृति साहित्य सम्मान से भगवान वैद्य ‘प्रखरÓ और हरीश कुमार ‘अमितÓ को उनकी लघुकथाओं के लिए सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें ग्यारह-ग्यारह हजार रुपये भेंट किए गए। यह सम्मान उन्हें वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया ने प्रदान किया। ममता कालिया ने कहा कि लघुकथा एक रिलीफ का काम करती है। मैं पत्रिकाओं में सबसे पहले लघुकथाएं और कविताएं ही पढ़ती हूं, लेकिन लघुकथा को फिलर न बनाया जाए। किताबघर प्रकाशन ने अपने रजत जयंती वर्ष में इस विधा को समर्पित यह आयोजन कर एक बड़ा काम किया है। मुझे लगता है कि लघुकथा लिखते समय किसी लोकोक्ति या सुनी हुई रचना की झलक न मिले। लघुकथा की शक्ति है उसकी तीक्ष्णता। उसमें अपूर्णता नहीं नजर आनी चहिए। लघुकथा कहानी की हाइकू है। प्रारंभ में किताबघर के संस्थापक जगतराम आर्य के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया गया। स्वागत भाषण में किताबघर प्रकाशन के निदेशक सत्यव्रत ने कहा कि प्रति वर्ष 16 दिसंबर को हम यह आयोजन किताबघर के संस्थापक जगतराम आर्य की स्मृति में करते हैं। हर बार एक नई विधा पर प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इसके विजेता को सम्मानित किया जाता है। इस बार लघुकथा की पांडुलिपियां आमंत्रित की गई थीं। इसके लिए हमारे निर्णायक मंडल के सदस्य थे सर्वश्री असगर वजाहत, सुदर्शन वशिष्ठ और लक्ष्मीशंकर वाजपेयी। हमें खुशी है कि इस आयोजन में पांडुलिपियों की हाफ सेंचुरी पूरी हो गई। इनमें से दो आज पुस्तक रूप में लोकार्पित होंगी और उनके रचनाकार पुरस्कृत होंगे। सम्मान अर्पण के बाद ‘लघुकथा की प्रासंगिकताÓ पर एक परिसंवाद भी हुआ, जिसकी शुरुआत की गोष्ठी के संचालक कथाकार महेश दर्पण ने। उन्होंने लघुकथा के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समय की चाल देखते हुए इस विधा का भविष्य उज्ज्वल है। बलराम ने ‘हिंदी लघुकथा कोशÓ से ‘विश्व लघुकथा कोशÓ तक का सफर पूरा किया। खलील जब्रान से विष्णु प्रभाकर और महाराज कृष्ण से लेकर कमलेश्वर तक ही नहीं, महावीरप्रसाद जैन से रमेश बत्तरा तक और जगदीश कश्यप से लेकर मधुदीप, सुकेश साहनी, कमल चोपड़ा और बलराम अग्रवाल तक के संपादन की बात करते हुए उन्होंने लघुकथा के विकास में इन सबके योगदान की चर्चा की। इस अवसर पर वरिष्ठ कथाकार प्रदीप पंत ने कहा, ”लघुकथा बहुत पहले से लिखी जा रही है। मैंने पहली लघुकथा पढ़ी थी यशपाल की ‘मजहबÓ। कमलेश्वर ने इस विधा की शक्ति को पहचाना और लघुकथा पर अनेक विशेषांक प्रकाशित किए। इस विधा में करुणा और गहरा व्यंग्य बड़ा काम करते हैं, किंतु लघुकथाकारों को चर्चित कहानियों के संक्षेपण से बचना चाहिए। वरिष्ठ लघुकथाकार बलराम अग्रवाल का कहना था कि लघुकथा का काम है अपने समय की पहचान। किसी घटना को लघुकथा कैसे बनाया जा सकता है, यह बड़े कथाकरों से ही सीखा जा सकता है। उन्होंने सीरिया की एक लघुकथा की बानगी भी पेश की। याद दिलाया कि ‘उल्लासÓ के लिए पहले भी किताबघर ने चैतन्य त्रिवेदी को सम्मानित किया था। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने कहा कि अपने समय में मैंने लघुकथाएं नेशनल चैनल से नियमित प्रसारित कीं। वे खूब सुनी जाती थीं। मेरी पहली ही रचना लघुकथा के रूप में प्रकाशित हुई थी सन् 1975 में। कुछ लघुकथाएं कमलेश्वर ने सारिका में प्रकाशित की थीं। आज का जैसा वीभत्स और डरा देने वाला माहौल है, उसमें साहित्य ही दिशा दे सकता है। मूल्यों से भले ही सत्ता और राजनीति अलग हो जाएं, साहित्य कभी अलग नहीं होता। लघुकथा यह काम बड़ी शिद्दत से कर रही है। उन्होंने दोनों पुरस्कार विजेताओं की लघुकथाओं के उदाहरण सामने रखकर कहा कि अच्छी रचनाएं हमेशा याद रहती हैं। वरिष्ठ कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने सम्मानित रचनाकारों को बधाई देते हुए कहा कि एक समय ‘तारिकाÓ के जरिए महाराज कृष्ण ने लघुकथा के लिए बड़ा योगदान किया। गुलेरी ने भी एक समय लघुकथाएं लिखी थीं। लघुकथा को उन्होंने सूक्ष्म, सूत्र रूप में काम करने वाली और बड़ी मारक विधा बताया। उनका कहना था कि लघुकथा लिखनेवाला बड़ा रचनाकार होता है। पंजाबी में तो सारी-सारी रात बैठकर लघुकथाएं सुनाई जाती हैं। लघुकथा में व्यंग्य की शक्ति उसे बड़ी विधा बनाती है। सम्मानित लघुकथाकारों ने अपनी लघुकथाओं का पाठ किया और लघुकथा की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। भगवान वैद्य ‘प्रखरÓ ने कहा कि लेखक की मु_ी में समय का कोई टुकड़ा आ जाता है। वही उसे सृजन के लिए मजबूर करता है। मैं भी ‘सारिकाÓ में प्रकाशित हुआ था। यह मेरा दूसरा लघुकथा संग्रह है। उन्होंने अपने संग्रह की महत्वपूर्ण रचना ‘पेटÓ का पाठ किया। हरीश कुमार ‘अमितÓ ने किताबघर प्रकाशन के प्रति आभार का इजहार करते हुए बताया कि यह उनका पहला लघुकथा संग्रह है। मेरी यह प्रिय विधा है। इस विधा में अन्य विधाओं का प्रभाव भी आ रहा है। उन्होंने अपनी लघुकथा ‘अपने-अपने संस्कारÓ का पाठ किया। समारोह में वरिष्ठ कथाकार गंगाप्रसाद विमल, कथाकर विवेकानंद, राजेंद्र उपध्याय, हीरालाल नागर, राजेश जैन, ममता किरण, साजदा खान, हिमालयन रन एंड ट्रैक के संपादक चद्रशेखर, अतुल प्रभाकर और लहरीराम सहित अनेक रचनाकार और साहित्यप्रेमी मौजूद थे।

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