भारतीय उपन्यास में लोक और इतिहास का मेल

श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर के ‘समिति शताब्दी सम्मान समारोह के दो दिवसीय कार्यक्रम में पहले दिन शिवाजी भवन सभागार में दीप प्रज्ज्वलन एवं मां सरस्वती की सस्वर वन्दना के साथ उद्घाटन की पारंपरिक विधि का निर्वाह किया गया। पहले सत्र में ‘लोक इतिहास और भारतीय उपन्यास विषय पर वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। अतिथियों का स्वागत प्रचार मंत्री अरविन्द ओझा, अर्थ मंत्री अरविन्द जवलेकर, प्रबंध मंत्री देवकृष्ण सांखला एवं प्रकाशन मंत्री राजेश शुक्ल ने किया। समारोह में सूर्यकांत नागर, जवाहर चौधरी, मीनाक्षी स्वामी, अपूर्व पुराणिक और दुर्गाप्रसाद सिंह सरोज को ‘हिन्दी सेवी सम्मान दिए गए। सम्मान पत्रों का वाचन शोध मंत्री डॉ. पद्मा सिंह ने किया। स्वागत प्रधानमंत्री सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ने तो संचालन साहित्य मंत्री हरेराम वाजपेयी ने किया। समिति की मासिक पत्रिका ‘वीणाÓ के संपादक राकेश शर्मा ने आभार व्यक्त किया। बड़ी संख्या में साहित्यकारों, पत्रकारों और पाठकों ने पहुंचकर समारोह को गरिमा प्रदान की। प्रस्तुत है उद्घाटन सत्र में हुआ बलराम का भाषण। पत्रकारिता पर मुकेश वर्मा का भाषण भी पाठक अगले पन्नों पढ़ सकते हैं। कुछ अन्य लोगों के विचार भी दिए जा रहे हैं साहित्य के लिए इतिहास में अनंत संभावनाएं होती हैं। इतिहासकार द्वारा खोजे गए तथ्यों में मानवीय सत्य और संवेदना के ईंट-गारे का मिश्रण कर भाषाई स्थापत्य से रचनाकार उसे न सिर्फ वर्तमान के लिए, बल्कि भविष्य के लिए भी जीवित और जीवंत कर देता है। वह चाहे होमर का ‘इलियड हो, शेक्सपीयर का ‘हैमलेट, तोल्स्तॉय का ‘युद्ध और शांति, फेदेयेव का ‘बाबर, गिरिराज किशोर का ‘पहला गिरमिटिया, कामतानाथ का ‘कालकथा, चो का ‘तुगलक, जगदीशचंद्र माथुर का ‘कोणार्क, मोहन राकेश का ‘आषाढ़ का एक दिन या प्रेमचंद के ‘शतरंज के खिलाड़ी, सभी इतिहास केंद्रित हैं, लेकिन वे सिर्फ इतिहास केंद्रित होने की वजह से महत्वपूर्ण नहीं हैं, वे महत्वपूर्ण हैं मनुष्य के जीवन और मूल्यों के बीच उठनेवाले द्वंद्व की वजह से, उस द्वंद्व और दुविधा को झेलनेवाले पात्रों से पाठक, दर्शक या श्रोताओं के होनेवाले नित नए तादात्म्य और उन्हें रस सिक्त कर सकने की अपनी क्षमता के कारण। उनके सहज ग्राह्य और तादात्म्यीकरण के पीछे एक कारण उनका इतिहास केंद्रण होता जरूर है, लेकिन लोक से जुड़े बिना वैसा साहित्य सृजन का दर्जा नहीं पा सकता। राजकिशोर कहते हैं कि ‘प्रेमचंद हैं, जयशंकर प्रसाद रहेंगेÓ। प्रेमचंद की परंपरा का जाप करते-करते लोग भूल गए कि सर्जकों की परंपराएं उस तरह से उतनी सांप्रदायिक और कबीलाई नहीं हुआ करतीं, जितनी परंपरापोषियों ने प्रचारित कर रखी हंै। कला और प्रतिबद्धता को परस्पर विरोधी गुणों के रूप में देखा और दिखाया जाता है। रेणु और शैलेश मटियानी लाख जनपक्षीय साहित्य रचते रहे, लेकिन लोग उन्हें घेर-घारकर दूसरे खेमे में डाल ही देते रहे। मध्यमार्गी लेखकों के लिए न इधर जगह है, न उधर, लेकिन अब वह कट्टरता शिथिल हो रही है और ये आग्रह लोगों की समझ में आ रहे हैं कि कला और प्रतिबद्धता एक दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं। आप आग्रही तो रहें, पर दुराग्रही नहीं, लेकिन अधिसंख्य लोग दुराग्रहों की पालकी पर सवार होकर ही साहित्य का सफर करते रहे हैं। वे भूल जाते रहे कि कला और विचारधारा की धुरी तो लोक ही होता है। लोक से रचनाएं उठानेवाले रेणु को समझने में हुई भूल को नामवर सिंह ने काशी से हुई वार्ता में स्वीकार कर अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। मूढ़ अस्वीकार की जगह समझदार और संवेदनशील स्वीकार हमेशा बेहतर होता है। मनोहरश्याम जोशी ने कहा था कि वे जो लिख रहे हैं, अपना जीवन लिख रहे हैं और प्रेमकुमार मणि जो हैं, वे अपना जीवन लिख रहे हैंं, जो वृहत्तर संदर्भों में सार्वभौम हो जा सकता है। अशोक वाजपेयी के अनुसार पोलिश कवि जगयेफस्की मानते हैं कि ‘सभी कवियों का यह धर्म होना चाहिए कि वे वाम और दक्षिण, दोनों तरह के लोगों के कामों-कथनों की पड़ताल करें, क्योंकि कवि और लेखक तो जन्मजात मध्यमार्गी होते हैं। उनकी संसद कहीं और होती है, जिसमें जीवित और मृत, दोनों निवास करते हैं। वाम और दक्षिण भी। मध्यमार्गियों की जमात लेकिन वाम और दक्षिणपंथियों की तरह संगठित नहीं होती। इसीलिए उसकी आवाज अनसुनी रह जाया करती है, लेकिन साहित्य की मुख्यधारा वही होती है और वही किसी भाषा के साहित्य को समग्रता में सहेजती है। वह अतिवादी छोरों पर खड़े लोगों की तकलीफ को भी समझते हुए उनके साथ भी न्याय के लिए जिरह करती है, क्योंकि उसके पास हर ‘जेनुइन के लिए स्वीकार की अंतर्दृष्टि होती है, क्योंकि उसे पता है कि काल के पास एक छलनी होती है, जिससे फेक रचनाएं स्वत: छंटती रहती हैं। और हां, नीर-क्षीर विवेक से ही आलोचक गण नामवर हो सकते हैं, अन्यथा सर्जकों की नजर में वे घोड़ों को परेशान करनेवाली मक्खियों से च्यादा अहमियत नहीं रखते। आलोचना से जुड़े हर शख्स को याद रखना होता है कि संवेदनशील ज्ञान, न्याय विवेक और न्यूनतम सार्वभौम प्रतिमानों का स्पर्श करने वाले पाठ में ही रचना और आलोचना की मुक्ति संभव है। सच्चा और अच्छा आलोचक फकीर जैसा होता है, क्योंकि वही सच्चा और अच्छा आलोचक हो सकता है, पर वहीं यह भी सच है कि नामवर वह चाहे जितना हो ले, शहंशाह कभी नहीं हो सकता। शहंशाह तो सर्जक ही होता है, जो सच्चे आलोचक को आंगन में कुटी छवाकर रखने का ख्वाहिशमंद होता है। आलोचक का फकीरी सोच ही साहित्य का संस्कार कर सकता है, जिससे संस्कृति विकसित होती है, नवीकृत और पुनर्संस्कारित भी, क्योंकि समय के साथ संस्कृति को भी नवा-पुनर्नवा होते रहना होता है। शास्त्र और लोक में कई समानताएं मिलती हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी में बहुत कुछ लोक से आया मिलता है। बहुस्तरीय भारतीय संस्कृति में बहुत कुछ ऊपरी स्तर से निचले स्तर में और निचले स्तर से ऊपरी स्तर में आता-जाता रहता है। लिखंत-पढं़त में ऊपरी स्तर वाले लोग किसी राष्ट्र के मस्तिष्क हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र की आत्मा तो लोक में ही निवास करती है। सुसंस्कृत लोग अक्सर अपनी संस्कृति खो बैठते हैं, लेकिन अशिक्षित और अल्प शिक्षित जन अपनी संस्कृति के उदार और उदात्त चरित्र को बचाए रखते हैं। प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान के उगावर्गीय पात्र मालती और मेहता उगा शिक्षित हैं, लेकिन ‘गोदान की अमरता का रहस्य तो होरी और धनिया के हृदय में ही बसता है, जो प्रेम, करुणा और मर्यादा के शिखर को छू लेते हैं। मालती और मेहता तो वहां मौजूद भर हैं, वे पाठक के दिमाग को भले ही छू लेते हों, लेकिन दिल में तो होरी और धनिया ही बस पाते हैं। ऐसे साहित्य से शहंशाह और फकीर एक साथ रस ग्रहण करते और प्रेरणा पाते हैं। गहरे अर्थों में ऐसा साहित्य ही जनसाहित्य होता है, पर जन की सहजता से जुड़ते हुए रचनात्मक ऊंचाइयां हासिल करना जरा मुश्किल होता है, लेकिन मुश्किल डगर पर चलकर ही ऐसे साहित्य का सृजन हो पाता है, जो सबको एक जैसी तृप्ति देता हुआ आलोचकों से न्याय विवेक की अपेक्षा करता है। शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास ‘नीला चांद पर पहले तो कोई कुछ बोला ही नहीं, और जब किसी ने मुंह खोला भी तो उसे तीसरे दर्जे का कह दिया, जबकि हमने सर्वे में उसे प्रथम स्थान पर रखा था। ‘नीला चांदÓ ने कुछ समय बाद साहित्य अकादेमी पुरस्कार ही नहीं, ‘व्यास सम्मान तक हासिल किया। ‘नीला चांदÓ का प्रतिष्ठित होना बहुत महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि वह समय आधुनिकता और प्रगतिशीलता, दोनों के लिए आत्मालोचन का समय था और वही वह समय भी था, जिसमें आंदोलनधर्मी लेखकोंं के हवामहल के कंगूरे ढहते देखे गए और उसी समय में देखा जा सका जीवन और साहित्य का यह सत्य कि आज और अभी पर टिकी दृष्टि में दोष है, उसे भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों पर केंद्रित होना चाहिए। कमलेश्वर के उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान और नासिरा शर्मा के ‘पारिजातÓ को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलने से भी इसकी पुष्टि हुई। इस बात को प्रेमचंद और प्रसाद के सृजन भी पुष्ट करते हैं लेकिन न जाने किस अति के मुहाने पर खड़े होकर एक समय प्रसाद की तरफ पीठ और प्रेमचंद की तरफ मुंह कर इतिहास को एकदम से भुला दिया गया था। अर्से तक सिर्फ प्रेमचंद को देखा जाता रहा, सिर्फ प्रेमचंद को प्रासंगिक माना जाता रहा। जयशंकर प्रसाद की दृष्टि को गलत और प्रेमचंद की दृष्टि को सही मानने की जिद वस्तुत: सही न थी। अपने-अपने तरीके से दोनों ने ही हिंदी का भंडार भरकर उसे समृद्ध किया। एक वर्तमान को खंगाल रहा था तो दूसरा इतिहास को और अपने-अपने तरीके से दोनों ही भारतीय मनुष्य में स्वाधीनता और समता का स्वप्न जगा रहे थे। आधुनिकता और प्रगतिशीलता ने हिंदी साहित्य को जहां अनेक वरदान तो कुछ अभिशाप भी दिए हैं, जिनके कारण आधुनिकता और प्रगतिशीलता में नहीं, उनकी गलत व्याख्या में छिपे हैं। आधुनिक और प्रगतिशील हुए बिना न तो हम इतिहास के आईने में वर्तमान की व्याख्या कर सकते हैं, न ही बृहत्तर मानवीय यथार्थ से खुद को जोड़ सकते हैं। शिवप्रसाद सिंह ने इतिहास में प्रवेश कर उसके जरिये समकालीन भारत के कुछ भयावह दृश्य दिखाए कि किस तरह केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने से राष्ट्र बिखरने लगता है। ‘तमसÓ और ‘हानूशÓ के जरिए जैसे भीष्म साहनी अतीत की कंदराओं में घुसे, वैसे ही हजार साल पहले के भारत के इतिहास की अनेक बंद अर्गलाएं ‘नीला चांदÓ के जरिये शिवप्रसाद सिंह ने खोलीं। काशी को केन्द्र में रखकर ‘नीला चांदÓ लिखा जरूर गया, मगर यह हजार साल पहले के भारत के रहन-सहन, आचार-विचार और सभ्यता-संस्कृति को जीवंत कर देता है। सिर्फ इतिहास के आइने में इसे देखना नाइंसाफी होगी, क्योंकि नायक कीर्ति वर्मा को इतिहास सम्मत नहीं कह सकते। ‘नीला चांदÓ में उस समय के राजनीतिक जीवन के भरपूर चित्र और चरित्र तो हैं ही, लोक जीवन के चित्र उनसे कहीं च्यादा हैं। गौर करने की बात यह है कि कीर्ति वर्मा इतिहास सम्मत नहीं, लोक सम्मत नायक है, जिसे कोई सर्जक ही सृजित कर सकता है, इतिहासकार नहीं। बिखराव को रोकने के उस अभियान में सत्ताच्युत काशी नरेश भले ही कोई रुचि प्रदर्शित नहीं करते, मगर कर्ण कल्चुरी के कुशासन से भयाक्रांत समाज का निचला वर्ग तुरंत ही कीर्ति वर्मा के साथ हो गया और काशी को कर्ण के कुशासन से मुक्त करा लिया। इस अभियान का नायक तो निसंदेह कीर्ति वर्मा है, लेकिन वह सिंहासन पर नहीं बैठता। उसने सिंहासन पर बिठाया अपदस्थ काशी नरेश गोविंद चंद्र को, जैसे कभी कंस को मार कर कृष्ण ने मथुरा का ङ्क्षसहासन उग्रसेन को सौंपा था। प्रश्न उठता है कि ‘नीला चांदÓ का कीर्ति वर्मा लोक की सृष्टि है या उपन्यासकार की? सीधा-सा उत्तर नही है इसका, लेकिन ‘नीला चांद से शिवप्रसाद सिंह ने कीर्ति वर्मा जैसे महानायक को काशी की उर्वर जमीन पर उगा दिया है। जीवन का बहुत कुछ ‘नीला चांदÓ में है, जहां एक विस्मृत युग के लोग साहित्य के आकाश में नीले चांद की रोशनी में नहा उठे। यह चांदनी स्नान इतिहास को शायद इतिहास नहीं रहने देता, उसे समकालीन बना देता है, क्योंकि वैसा स्नान सिर्फ समकालीन कर सकते हैं। इतिहास के जीवन को यहां साहित्य ने उससे छीन लिया और जब भी ऐसा होता है, अच्छा ही होता है। इतिहास का गुप्त काल जयशंकर प्रसाद के हाथों पड़ा तो इतिहास ने मातम नहीं मनाया, क्योंकि उससे इतिहास खुद कुछ-कुछ संवर गया। ऐसे ही शिवप्रसाद सिंह ने सन् 1060 के आसपास की काशी के इतिहास को काफी कुछ संवार दिया है, मगर है यह उपन्यास ही, जिसे संवेदना का साथ मिल गया, क्योंकि इतिहास तो सिर्फ ज्ञान देता है, लेकिन साहित्य से पाठक को सिर्फ ज्ञान नहीं, संवेदनात्मक ज्ञान हासिल होता है, जो उसके सूखे संवेदन तंत्र को हरा कर देता है, लेकिन बड़े से बड़ा इतिहासकार अपने किसी ग्रंथ से ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि वह न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठकर तथ्यों पर आधारित फैसले भर देता है, जबकि छोटे से छोटा रचनाकार भी चरित्रों का अधिवक्ता बन सकता है। इतिहासकार बेशक न्यायाधीश के आसन पर विराजमान हो सकता है, लेकिन न्याय के लिए वह किसी की लड़ाई नहीं लड़ सकता। वह मर्यादाओं में बंधा लकीर का फकीर होता है, जबकि सर्जक सारी सीमाएं तोड़ मर्यादाएं भंग कर सकता है, लेकिन इसके लिए उसे बहुत-बहुत साहसी होना होता है। ‘नीला चांदÓ में कीर्ति वर्मा जैसे चरित्र की सृष्टि कर उसे नायकत्व प्रदान करने का साहस शिवप्रसाद सिंह जैसे बड़े सर्जक ही कर सकते हैं, जिसे इतिहासकार चाहे जितना नकारें, लेकिन जन मानस उसे सहज ही स्वीकार कर लेता है, क्योंकि लोक मानस में ऐसे चरित्र सदियों तक सोये पड़े रहते हैं, जिनका विकास इतिहासकार नहीं, रचनाकार ही कर सकता है। कीर्ति वर्मा की सृष्टि शिवप्रसाद सिंह का ऐसा अवदान है, जिसे मिटा पाना अब किसी के लिए भी संभव नहीं। कीर्ति वर्मा के होने न होने पर अब कोई भी बहस व्यर्थ है। वह था तो ठीक, अन्यथा ‘नीला चांद के जरिये काशी की जमीन पर वह अवतार ले चुका है, जिसके आलोक में सन् 2014 की घटनाओं पर विचार कर देखिए कि कीर्ति वर्मा जैसी इच्छा शक्ति से एक आम आदमी क्या नहीं कर सकता! आधुनिक हिंदी के निर्माताओं में से एक भारत के इतिहास पुरुष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जीवन काल में काशी के लोग मल्लिका को लेकर लोग सहज नहीं थे, जिन्हें धर्मपूर्वक अपनाने की बात भारतेन्दु ने अपने भाई को लिखी थी, लेकिन भ्रम थे कि बने ही रहे, जिनका निवारण भारतेन्दु के फुफेरे भाई राधाकृष्ण दास की पौत्री प्रतिभा अग्रवाल ने ‘प्यारे हरिचन्दजूÓ जैसी औपन्यासिक जीवनी लिखकर किया है। बहुत थोड़ी उम्र पाकर भारतेंदु ने जितना यश कमाया और कौन कमा सका! हिंदी में प्रकांड पंडित, श्रेष्ठ निबंधकार, उपन्यासकार और भाषाशास्त्री के रूप में हजारीप्रसाद द्विवेदी की जितनी महत्ता है, कुछ वैसी ही स्थिति काशी में आकर निखरे श्रीचंद्रधर शर्मा गुलेरी की है, लेकिन हिंदी के सामान्य पाठक तो क्या, सिद्ध-प्रसिद्ध लोग तक उन्हें सिर्फ एक कहानी ‘उसने कहा था लिखकर अमर हो जाने वाला कथाकार मानतेे हैं। अधिसंख्य लोग उनका पूरा नाम तक नहीं जानते। वे ‘चंद्रधर नहीं, ‘श्रीचंद्रधर शर्मा गुलेरीÓ हैं। विशाखदत्त के अपूर्ण नाटक ‘देवी चन्द्रगुप्तम् पर शोध कर गुलेरी ने सिद्ध किया था कि चंद्रगुप्त द्वितीय से पूर्व उसका भाई रामगुप्त कुछ समय के लिए सिंहासन पर बैठा, जिसने खारवेल आक्रमण के समय ध्रुव देवी को दुश्मन को सौंप देने का प्रस्ताव मान लिया था, लेकिन चंद्रगुप्त ने देवी का छद्म रूप धारण कर दुश्मन को मार डाला। इसी शोध के आधार पर जयशंकर प्रसाद ने ‘ध्रुवस्वामिनी लिखा। च्यादातर लोग गुलेरी संबंधी ऐसी जानकारियों से अनभिज्ञ हैं। उनकी कहानी ‘उसने कहा था से अधिक वे कुछ जानते ही नहीं, लेकिन अब हम जानते हैं कि भारतेंदु हरिश्चन्द्र की तरह बहुत कम आयु पाकर भी हिंदी का यह महारथी क्या-क्या नहीं रच गया! गुलेरी के बारे में जैनेंद्र कुमार कहते हैं कि ‘गुलेरी विलक्षण विद्वान थे। उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी। उनमें गजब की जिंदादिली थी। उनकी शैली भी अनोखी है। वह पंडित परंपरा के कथाकार थे। उन्हें उनकी कहानी ‘उसने कहा था ने महान बना दिया। इस कहानी में वह कला है कि वे लेखन के श्रेष्ठतम आयामों को छूते हैं। वह न केवल विद्वता में अपने समकालीन साहित्यकारों से ऊंचे ठहरते हैं, अपितु एक दृष्टि में वह प्रेमचंद से भी ऊंचे साहित्यकार हैं।Ó ऐसे ही हिंदी की पहली कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी के सर्जक माधवराव सप्रे का रचना संचयन पेश कर विजयदत्त श्रीधर ने लोगों की आंखें खोल दीं, जिनके बारे में भी पाठकों को बहुत कुछ मालूम न था। इसी तरह प्रसाद के कथा साहित्य, खासकर उपन्यासों का उचित मूल्यांकन नहीं हुआ और जो हुआ, प्राय: गलत हुआ। प्रभाकर श्रोत्रिय और प्रो. हरिमोहन शर्मा जैसे आलोचकों ने ही उनका मूल्यांकन गंभीरता से किया है। एक लंबे कालखंड में प्रसाद के साहित्य को तो जैसे अस्पृश्य ही माना जाता रहा और प्रेमचंद साहित्य को देव साहित्य की तरह पूजा जाता रहा। निराला भी खूब पुजे, लेकिन प्रसाद पर प्राय: बात ही नहीं हुई, लेकिन जयशंकर प्रसाद सिर्फ वही नहीं हैं, जो जाने-अनजाने और चाहे-अनचाहे बता और बना दिए गए हैं। उनका इतिहास प्रेम इस तरह त्याच्य और उपेक्षणीय नहीं। ‘कंकालÓ, ‘तितली और ‘इरावती जैसे उनके उपन्यासों का ऐतिहासिक महत्त्व है। उनके उपन्यास ‘तितली और प्रेमचंद के ‘गोदान के पात्रों को पढ़कर देखिए, उनमें कितना साम्य है। यक्ष प्रश्न यह है कि प्रसाद के उपन्यासों में व्याप्त समाज के नवनिर्माण की बेचैनी को अधिसंख्य आलोचक क्यों नहीं देख सके? इतिहास को इतिहासकार अपनी नजर से देखता है और साहित्यकार अपनी नजर से, लेकिन विवेकशील दृष्टिक रखते हों तो दोनों ही पाठक का जीवनबोध विकसित कर सकते हैं। भारत के स्वाधीनता संग्राम पर लिखी गई तमाम ऐतिहासिक कृतियों से एकदम भिन्न और बेहतर परिणाम देने वाला उपन्यास है कामतानाथ का दो हजार पृष्ठ का महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘काल कथा, क्योंकि यहां तोल्स्तोय के उपन्यास ‘युद्ध और शांति की तरह एक निश्चित काल है और है उसकी प्रामाणिक कथा। अंग्रेजों की सत्ता है और सत्ता से संघर्ष करते योद्धा भी, जिनमें महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय, लाला लाजपतराय, चितरंजन दास, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, शिव वर्मा, अशफाकउल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल, मोहनलाल सक्सेना, गणेशशंकर विद्यार्थी और जिन्ना जैसे सिद्ध-प्रसिद्ध लोग तो हैं ही, मुंशी रामप्रसाद का बेटा रतन, उसके चाचा बबउनू के साथ सगान, मुनव्वर, बांके, बगाल सिंह, ललई पंडित, बगान, हेमंत, असित, प्रीति, लक्ष्मी, अब्दुल गनी, जमना देवी, शारदा, रगाो, मुन्नी बाई, छैलबिहारी, बासुदेव नारायण, तहफ्फुज, वाहिद, शम्मो, जसोदा, नजमा, सिल्लो, मेवा लाल और कासिम जैसे तमाम सामान्य लोगों का समकालीन जीवन संघर्ष भी ‘काल कथा में है। ‘काल कथा के एक प्रसंग में सवाल उठता है कि मोतीलाल नेहरू के लिए देश प्रेम बड़ा था या पुत्र प्रेम? लोगों ने गांधी जी से पूछा तो उन्होंने इसका सीधा उत्तर न देकर सिर्फ इतना कहा था कि उनका देश प्रेम भी उनके पुत्र प्रेम की ही उत्पत्ति है। मोतीलाल नेहरू ने गांधी जी को पत्र लिखकर एक बार इच्छा व्यक्त की थी कि कांग्रेस अध्यक्ष का ताज कम से कम एक बार उनके जीवन काल में ही जवाहरलाल के सिर की शोभा बने और गांधी जी ने सन् 1929 में उनकी इच्छा पूरी कर दी और गांधी जी एक बार हार भी गए थे, पर सुभाषचंद्र बोस ने उन्हें बचा लिया, पर स्वाधीनता मिलने पर गांधी जी ने सुभाष की बजाय नेहरू का फेवर लेना शुरू कर दिया, अन्यथा इस देश के पहले प्रधानमंत्री सुभाषचंद्र बोस होते, जिन्ना होते या फिर होते वल्लभभाई पटेल। कामतानाथ का ‘कालकथा ऐसी स्थितियों की ओर संकेत करता न्याय के तराजू पर भारत के इतिहास को तोलता हुआ विकसित करता है एक नया जीवनबोध ताकि हम अपने इतिहास को नए तरीके से देख सकें। जीते हुए हम जीवन को प्राय: समझ नहीं पाते। इतिहास हमें जीवन को समझने की तमीज सिखाता है, खासकर साहित्य के माध्यम से पुनर्सृजित इतिहास। कामतानाथ के ‘कालकथा में चंद्रशेखर आजाद और नेहरू और महात्मा गांधी और भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस और जिन्ना का यथास्थान अवतरण तो है ही, लेकिन उपन्यास के केंद्र में है उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद के ग्रामीण जीवन के साथ लखनऊ-कानपुर और बनारस से लेकर कोलकाता और लाहौर-अमृतसर जैसे नगरों तक का जनजीवन और उसके बीच चल रहा भारत का स्वाधीनता आंदोलन। तब हिंदू-मुसलमान के बीच इतना अलगाव नहीं था और देश बंटा भी नहीं था। लाहौर, रंगून और ढाका तब हमारे अपने ही शहर हुआ करते थे और हमारे बाप-दादे वहां नौकरियां करने या रोजगार पाने के लिए आया-जाया करते थे। रौलेट कमेटी रिपोर्ट के तहत युद्ध के समय किसी को भी बंदी बनाने का विशेषाधिकार प्राप्त करने का बिल असेंंबली में पेश हुआ तो गांधी जी ने एक दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल की अपील कर दी, जिससे देश भर में बाजार बंद रहे, जुलूस निकले और व्यापक प्रदर्शन हुए। पुलिस ने कई जगह गोलियां चलाईं। इन घटनाओं से क्षुब्ध होकर कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेज सरकार से मिली ‘सर की उपाधि लौटा दी थी। सो, प्रथम विश्वयुद्ध के आखिरी दिनों के आसपास गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए स्वाधीनता आंदोलन से शुरू होकर भारत विभाजन तक के काल खंड को समेटे कामतानाथ का ‘कालकथा बड़ा ही नहीं, बहुत बड़ा उपन्यास ठहरता है, जिसे लिखने में कामतानाथ को तीस बरस लगे। उन्हें सन् 1942 का वह दौर पूरी तरह याद रहा, जब महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, लाला लाजपत राय और सुभाषचंद्र बोस जैसे लोगों के दर्शन मात्र से लोगों में जोश भर उठता था। भगतसिंह तो किसी दंतकथा के पात्र जैसे लगते थे। साहित्य अकादेमी के एक आयोजन में कपिला वात्स्यायन ने कहा था कि गांधी, अंबेडकर और नेहरू एक ही समय के तीन बड़े नाम हैं, जिन्होंने हमारे दिमाग को प्रभावित किया। प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी मानते हैं कि तीनों नेताओं में भले ही कुछ मतभेद थे, लेकिन उनका लक्ष्य एक था-भारत की स्वतंत्रता और उसका विकास। शिक्षाविद् कृष्ण कुमार मानते हैं कि गांधी की कल्पना स्वाधीन मनुष्य की थी। वे मनुष्य पर राच्य का नियंत्रण नहीं चाहते थे। यह एक ऐसी कल्पना थी, जिसको साकार करने के लिए अंबेडकर ने पहल की थी। सच्ची स्वतंत्रता का सपना तभी सच होगा, जब अभिव्यक्ति की आजादी मिलेगी। बीसवीं शताब्दी के उथल-पुथल भरे काल में इन तीनों के चिंतन ने ही देश में आजादी और समता का सपना जगाया, जिसे कामतानाथ ने ‘कालकथा में साकार कर दिया है। गिरिराज किशोर का ‘पहला गिरमिटिया भी यही काम करता है। प्रियंवद की ‘भारत विभाजन की अंत:कथा तो है ही उस काल की घटनाओं की ऐतिहासिक गाथा। दोनों तरह की कृतियां अपना काम प्रामाणिक तरीके से अंजाम देती हैं। उपन्यास के भारतीय स्वरूप को लेकर हिंदी के उपन्यास बहुत आश्वस्त नहीं करते, जबकि अन्य भारतीय भाषाओं के समकालीन उपन्यासों ने भारतीय उपन्यास के स्वरूप को अक्सर उजागर किया है। ऐसे उपन्यासों में ‘उल्लंघन हिंदी उपन्यासों की तुलना में अपनी जातीय चेतना और स्मृति के कहीं च्यादा करीब है, जो भैरप्पा के साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत कन्नड़ उपन्यास ‘दाटु का हिंदी रूपांतर है। उसे पढ़कर लगता है कि भैरप्पा कर्नाटक के ग्रामीण जीवन की गहरी समझ ही नहीं रखते, उससे उनका रागात्मक लगाव भी है, अन्यथा इतना आत्मीय चित्रण संभव ही न होता। अपने समग्र प्रभाव में ‘उल्लंघनÓ भारतीय समाज के जड़ विचारों और सड़े-गले मूल्यों पर प्रहार करने वाला उपन्यास है और भैरप्पा ने तो ‘महाभारतÓ को न सिर्फ नया नाम ‘पर्व दिया, बल्कि समकालीन जीवन के संदर्भ में उसे व्याख्यायित भी किया है। ‘पर्व यहां व्यास का नहीं, भैरप्पा का अपना ‘महाभारत हो गया, जहां प्राचीन और समकालीन का भेद मिट गया। उपन्यास के भारतीय स्वरूप के संदर्भ में कभी हजारीप्रसाद द्विवेदी के ‘चारुचंद्र लेख, कभी के.एम.मुंशी के ‘कृष्णावता और कभी वीरेंद्रकुमार जैन के ‘अनुत्तर योगी को चर्चा का आधार बनाया जाता रहा, लेकिन ‘पर्व की चर्चा प्राय: नहीं हुई, जबकि उपन्यास के भारतीय स्वरूप को समझने के लिए ‘पर्व को पढऩा जरूरी है। ‘पर्वÓ में किसी भी चरित्र को अतिरिक्त गरिमा नहीं सौंपी गई, क्योंकि भैरप्पा ने ‘पर्वÓ के रूप में उपन्यास लिखा है, धर्म ग्रंथ नहीं। भीष्म, दुर्योधन, कर्ण, द्रोणाचार्य तथा शल्य से लेकर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और कृष्ण तक सारे लोग पुरुषों में पाये जाने वाले गुणों-अवगुणोंं से युक्त हैं। भैरप्पा ने कुंती, द्रौपदी और गांधारी के चरित्रों को भी मानवीय रूप देकर उनके भी हास और रुदन को वाणी दी है। इस रूप में ‘पर्व महाभारत के पात्रों का आत्ममंथन हो गया और सभी के आत्ममंथन मिलकर भारतीय समाज के मंथन हो गए, जिनका निष्कर्ष यह है कि कोई भी व्यक्ति अपने आप बुरा नहीं हो जाता। पक्षपातपूर्ण जीवन स्थितियां और अन्याय उन्हें वैसा होने के लिए विवश कर देते हैं, लेकिन भैरप्पा ने ‘पर्व में कृष्ण का साधारणीकरण कुछ च्यादा ही कर दिया है, जबकि के.एम.मुंशी ने उन्हें ‘अवतार तक ऊंचा उठा दिया, जिसे दिनकर जोशी ने ‘श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते में नई ऊंचाई सौंपी है, पर काशीनाथ सिंह ने ‘उपसंहार में बूढ़े कृष्ण के नायकत्व को ध्वस्त कर दिया, लेकिन नरेंद्र कोहली ने ‘शरणम् में उनका नायकत्व फिर से स्थापित कर दिया है। उन्होंने तो ‘तोड़ो कारा तोड़ोÓ में विवेकानंद का समय का इतिहास भी प्रत्यक्ष कर दिया है। फणीश्वरनाथ रेणु, नागार्जन और हरेप्रकाश उपाध्याय के उपन्यास बिहार तो राधाकृष्ण और राकेशकुमार सिंह के झारखंड के लोकजीवन को उठाते हैं तो अमरकांत, ह्रदयेश, राजकुमार गौतम और राजकमल ने नगर जीवन के लोक सत्य को पकड़ा है। हिमांशु जोशी, सुभाष पंत, केशव और हरनोट के उपन्यास पहाड़ी लोक को प्रत्यक्ष करते हैं तो जगदीशचंद्र और स्वदेश दीपक पंजाब के। जगदंबाप्रसाद दीक्षित, दया पवार और दामोदर खड़से ने महाराष्ट्र के लोक को अपने उपन्यासों से सामने रखा है। संजीव का ‘फांसÓ भी यही काम करता है। महाश्वेता देवी बंगाल, प्रतिभा राय ओडि़सा, इंदिरा गोस्वामी असम तो अरुंधति राय केरल का लोक हमें सौंपती हैं। रमेशचंद्र शाह, मंजूर एहतेशाम, सूर्यकांत नागर, वीरेंद्र जैन और नीलेश रघुवंशी मध्यभारत तो परितोष चक्रवर्ती छत्तीसगढ़ का लोक लाते हैं। उत्तर भारत का लोक जीवन हमें काशीनाथ सिंह, विभूतिनारायण राय, शैलेंद्र सागर, अखिलेश, राजेंद्रप्रसाद पांडेय, शिवमूर्ति, सूर्यनाथ सिंह, रूपसिंह चंदेल और सोमेशचंद्र के उपन्यासों में मिलता है, लेकिन हीरालाल नागर का ‘डेक पर अंधेरा श्रीलंका की धरती पर विचरण करता हुआ वहां और यहां के भी सैनिक लोक यथार्थ से हमें रूबरू करा देता है। हमेशा घर-बेघर रहने वाले कबूतरा समाज के लोक पर केंद्रित है मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास ‘अल्मा कबूतरीÓ। घुमंतू समाज के ऐसे लोग गाडिय़ा लोहार तो कहीं सिकलीगढिय़ा और नट तो कहीं कंजर कहे जाते हैं। यूरोप तक फैले इस समाज को वहां जिप्सी कहते हैं। मैत्रेयी ने ‘अल्मा कबूतरीÓ के बहाने देश के उस सर्वहारा समाज का आख्यान रचा है, जो अपना सब कुछ हार चुका है। उसके पास न तो अपने घर-दालान हैं, न ही जमीन-जायदाद। उनकी सामाजिक हैसियत शून्यवत है और वे सभ्य समाज द्वारा लगातार शोषित-पीडि़त होने के लिए अभिशप्त हैं। उस समाज का कोई व्यक्ति पढ़-लिखकर हमारी तरह जीना चाहे तो लोग उसे जीने नहीं देते। ‘अल्मा कबूतरी के जरिये मैत्रेयी बताती हैं कि ”इस समाज के लोग खुद को महाराणा प्रताप, रानी पद्मिनी और झलकारी बाई की संतान मानते हैं। प्रचलित किंवदंती का अनुसार ”मुगल शहंशाह ने चित्तौडग़ढ़ तो लूट लिया, लेकिन रानी पद्मिनी अपनी सखियों और रानी रक्कासाओं को लेकर सैनिकों के साथ भाग निकली। शहंशाह ने सोचा कि सब कुछ खत्म हो गया। पद्मिनी के बिना चित्तौड़ भी क्या? तभी शहंशाह को पता चला कि पद्मिनी तो भाग गई। उसका कारवां नदी-पहाड़ और घाटियां लांघता रात-दिन आगे बढ़ रहा था कि शहंशाह का कहर बरपने लगा। कारवां जिन किसानों का मेहमान होता बहां आग लगा दी जाती। जिस बस्ती से गुजरता, वह उजाड़ दी जाती। पेड़ों पर फल नहीं, लोगों की लाशें झूलतीं। राशन-पानी खत्म हो गया और हथियार टूट गए। ऐसे में रानी ने अपने लोगों को हुक्म दिया कि ‘बल नहीं तो छलÓ से जीतो इन्हें, नहीं तो मुगल फौजें हमें खा जाएंगी। फौज के लिए आने वाला रसद लूट लो। छावनी में घुसकर हथियार चुराओ। बादशाह के सिपाहियों पर डोरे डालो और लहंगे में छिपी कटार से उन्हें खसिया कर दो। इस तरह रानी का कारवां आगे बढ़ता रहा। भूख और कामेच्छाएं बढ़तीं तो अपने सैनिकों से रानियां, बांदियां और रक्कासाएं गर्भवती होने लगीं। इस तरह आगे चलकर चित्तौड़ से भागी हुई फौजों की पीढिय़ां रसद लाने-ले जाने वाली कहलायीं। नाचने-गानेवाले कबूतरा हो गए। घाटियों को लांघने में माहिर लोग नट कहलाए। औजार बनाने वाले गाडिय़ा लोहार हुए। बंदरों और भालुओं को नचाने वाले कलंदर। इन्हींं लोगों की दहकती दास्तान है मैत्रेयी की ‘अल्मा कबूतरी। ऐसा ही है चित्रा मुद्गल का बड़े फलक का उपन्यास ‘आवां, सही अर्थों में महाकाव्यात्मक, जिसमें चित्रा की अकूत अनुभव संपदा और इंद्रधनुषी भाषा काम आयी है, लेकिन ‘आवां में आयी नमिता पांडे सुरेंद्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए की वर्षा वशिष्ठï की याद दिलाती है और संयोग देखिए कि दोनों नायिकाएं ब्राह्मïण हैं, लेकिन उदय प्रकाश की ‘पीली छतरी वाली लड़की नहीं, क्योंकि नमिता पांडे को चित्रा उस पंक से निकाल ले गयीं। नमिता त्याग और तप का मार्ग चुनती है। ब्राह्मïण नायिका नमिता औैर दलित प्रतिनायक पवार के पारस्परिक आकर्षण के माध्यम से ‘आवांÓ में अगर दलित विमर्श आया है तो नमिता के पिता देवीशंकर पांडे की अनब्याही पत्नी किशोरी बाई के माध्यम से परकीया प्रेम भी औैर किशोरी बाई की बेटी सुनंदा का सुहेल से संबंध हिंदू-मुस्लिम प्रेम को उजागर कर गया है। नमिता अपने पिता और किशोरी बाई के अवैध संबंध को सहज रूप से स्वीकार करती है और संजय कनोई से अवैध संबंध के बाद लुट-पिटकर अपनी इच्छा से जब लौटती है तो सगी मां के पास नहीं, सौतेली मां के पास, जहां उसे मिलती है उसकी सौतेली बहन सुनंदा की अनाथ रह गयी बेटी। उस अनाथ बगाी की जिम्मेदारी नमिता ही उठाती है, जो चित्रा मुदï्गल की जीवन दृष्टिï बनकर ‘आवां को सार्थक उपन्यास बना देती है। कृष्णा सोबती के ‘जिंदगीनामा, अलका सरावगी के ‘कलिकथा वाया बाइपास और मृदुला गर्ग के ‘मिलजुल मन के बाद नासिरा शर्मा के उपन्यास ‘पारिजात को पिछले वर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला है, जिसमें नासिरा एक भर नहीं रहीं, वे सर्जक हो गईं, खुदा की तरह न्याय और विवेक की बात कहने वाली। पत्नी को जिस्मानी नुकसान पहुंचाने के आरोप में फंसकर शरीयत कानून की वजह से जेल पहुंचने और बमुश्किल छूटकर पुत्र पारिजात और पत्नी एलेसन की खोज में पागल उपन्यास ‘पारिजात के नायक रोहनदत्त को वे तो नहीं मिलते, लेकिन मित्र रूही जरूर मिल जाती है, जो उसके मरहूम दोस्त काजिम की विधवा है। शादी से पहले कभी हंसी-मजाक में ही रूही ने कहा था कि मैं तुम दोनों से ही शादी कर लूंगी। ब्रिटेन, जर्मनी, इटली तथा अरब की रोचक-रोमांचक और भयावह भूमियों के साथ चलती ‘पारिजातÓ की कथा देश के लखनऊ-इलाहाबाद के आसपास बिखरी गंग-जामुनी संस्कृति में हिंदू, मुस्लिम और ईसाइयत के बीच पसरी अनेकता में एकता को तलाशते हुए हिंदी की अत्यंत महत्वपूर्ण कृति हो उठी है। नासिरा ने कई पीढिय़ों की संवेदनाओं, सरोकारों, मूल्यों और करुणा का मानो महाकाव्य रच दिया है। गंग-जामुनी संस्कृति का जितना गहरा और सूक्ष्म चित्रण ‘पारिजात में हुआ है, इससे पहले हिंदी के किसी उपन्यास में नहीं। अवध में ‘पारिजात का इकलौता पेड़ अब लुप्त होने को है, जिसे बचाए रखकर उसका संवर्धन जरूरी है। रोहन को उसका पुत्र पारिजात मिलेगा या नहीं, पारिजात का आखिरी पेड़ बचेगा या नहीं, हम नहीं जानते, लेकिन नासिरा के उपन्यास ‘पारिजात के जरिये वह अमर हो गया और गंग-जामुनी संस्कृति की लुप्तप्राय संस्कृति के पुरावशेषों की खोज भी हो गई, जिससे उसके जीवित और जीवंत हो सकने की उम्मीद बढ़ गई है। उपन्यास कहता है कि जो जिस धर्म में है, वहीं बना रहकर सभी धर्मों का सम्मान करे। रोहनदत्त का पहले ईसाई युवती एलेसन और फिर मुस्लिम लड़की रूही से विवाह इसी ओर संकेत करता है, जबकि रोहनदत्त खुद हुसैनी ब्राह्मण है। कमलेश्वर ने कभी लिखा था कि फिल्म अभिनेता सुनीलदत्त हुसैनी ब्राह्मण थे। तब से यह सवाल मन में घुमड़ रहा था कि ये हुसैनी ब्राह्मण क्या होते हैं? ‘पारिजात पढ़कर इस सवाल का जवाब भी मिल गया, क्योंकि इसका नायक इस बेचैनी भरी खोज में भी है कि हुसैनी ब्राह्मणों की उत्पत्ति कब-कहां और कैसे हुई, एलेक्स हेली के उपन्यास ‘दि रूट्सÓ के नायक की तरह। खुदा खैर करे। – अगले अंक में रमेशचंद्र शाह और शिवनारायण के उद्गार साहित्यिक पत्रकारिता का आविर्भाव फ्रांस में हुआ: नर्मदाप्रसाद उपाध्याय साहित्यिक पत्रकारिता का आविर्भाव फ्रांस में हुआ: नर्मदाप्रसाद उपाध्याय मेरे विनम्र अभिमत में साहित्य और पत्रकारिता दो ऐसी समांतर धाराएं हैं जिनमा संयोग होता है। यह धरती और आकाश का क्षितिज के रूप में एक मिलन बिंदु कहा जा सकता है। आमतौर पर यह माना जाता है कि पत्रकारिता तात्कालिक होती है, उसमें तात्कालिकता का तत्व विद्यमान होता है जबकि साहित्य यह दावा करता है कि वह चिरस्थायी है, चिरतंन है और शाश्वत है। पत्रकार मनुष्य के चेहरों को देखता है जबकि साहित्यकार उसके चेहरों को पढ़ता है और इसीलिए शायर की निगाह मेें दोनों कहीं आमने-सामने हो जाते हैं। जब वो कहता है कि ‘दिल सुलगता है कलम की नोंक पर/यूं ही कागज का बदन जलता नहीं/लोग अखबारों के आदी हो गए/वरना चेहरों पर क्या लिखा नहीं।Ó लेकिन मेरे मत में यह अवधारणा कहीं अधूरी है, साहित्य और पत्रकारिता दोनों एक-दूसरे पर अन्योन्याश्रित है। ये दोनों धाराएं जब मिलती है तो कहीं महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, महाप्राण निराला और माखनलाल चतुवेर्दी जैसे ऐसे प्रयागराजी व्यक्तित्व भी जन्मते हैं जो इतिहास के क्षितिज को अपनी इंद्रधनुषी उपलब्धियों से रच देते हैं। यूरोप में साहित्यिक पत्रकारिता का आविर्भाव फ्रांस से हुआ। हिन्दी में साहित्यिक पत्रकारिता का प्रादुर्भाव और उसका श्रेय जो दिया जाता है वह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को दिया जाता है जिन्होंने 1863 में ‘कविवचन सुधा नामक पत्रिका निकाली। बालमुकुन्द गुप्त ने उस समय शिवशम्भू के चि_े लिखे जिसमें लार्ड कर्जन की सीधी-सीधी मुखालफत की गई थी, अंग्रेजों की नीतियों का विरोध। उपन्यास में लोक संस्कृति अपनी सम्पूर्णता में व्यक्त होती है: संतोष चौबे आईसेक्ट विश्वविद्यालय के कुलाधिपति सुविख्यात कवि एवं कथाकार श्री सन्तोष चौबे ने कहा कि राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास में फर्क होता है। भारतीय समाज चन्द्रगुप्त मौर्य के कजाकिस्तान से लेकर कर्नाटक, अकबर का भारत, अंग्रेजों का भारत, रामायण और महाभारत काल का भारत, भारत के अनेक स्वरूप इनको आज भी इतिहास और उपन्यासों में नहीं समेटा जा सकता। श्री चौबे ने कहा कि सांस्कृतिक चेतना और दृष्टि ही उपन्यासों को महत्व प्रदान करती है और इसी चेतना व दृष्टि से उपन्यास में लोक संस्कृति अपनी सम्पूर्णता में अभिव्यक्त होता है। इसी चेतना में लोक की धार्मिकता, गीत संगीत, भजन और समृद्ध लोक परम्पराएं मान्यताएं प्रकट होती है। श्री चौबे ने आगे कहा कि उपन्यासकार की संवेदनशील दृष्टि से ही लोक और इतिहास उपन्यास में प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त होता है। उन्होंने कुछ उदाहरण देते हुए कहा कि एकदानैमिषारण्य (अमृतलाल नागर), भैरप्पा के आवरण और स्वयं के लिखे उपन्यास ‘जलतरंगÓ पर विस्तृत चर्चा की। श्री चौबे ने कहा कि हमें अपने सोच को व्यापक बनाना होगा जैसे अष्टछाप के कवियों को संगीत का आधार मानना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *