पत्रकारिता को संस्कार सर्जकों से मिले

मित्रो, श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर का बहुत आभारी हूं जिसने मुझे आपसे बातचीत करने का अवसर प्रदान किया। यद्यपि मैं आप लोगों के बीच धूमकेतु की तरह प्रकट हुआ हूं और इसका क्या अंजाम होगा, यह आपके हाथ है। साहित्यिक पत्रकारिता और हिंदी पर विशेष रूप से साहित्यिक पत्रकारिता पर बात करने के पहले हमें एक-दो बातें बहुत साफ कर लेनी चाहिए। एक तो यह कि कथा, कविता, उपन्यास, कथेतर गद्य इत्यादि जो भी विधाएं हैं, वो साहित्य हंै, साहित्यिक पत्रकारिता नहीं। जिस प्रकार अखबारी पत्रकारिता राजनीति नहीं है। राजनीतिक घटनाओं, कार्रवाइयों, उनके जो कार्यक्रम हैं, अवसर हैं, असंयोग है, संवाद है, विमर्श है। इन सबका जो वर्णन होता है जो, विवरण होता, जो विश्लेषण होता है, उसको अखबारी पत्रकारिता कहते हैं और वो राजनीति से उपजती है, लेकिन राजनीति नहीं होती। अक्सर साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता को आपस में गडमड कर दिया जाता है। लोग साहित्यिक पत्रकारिता की बात करते-करते हमेशा साहित्य पर बात करते हंै, जबकि साहित्यिक पत्रकारिता का अपना एक अस्तित्व है और जिस तरह साहित्यिक संवाद होते हैं, जो बहसें होती है, जो विमर्श होते हैं, जो हमारी साहित्यिक घटनाएं होती है, साहित्य की जो किताबें आती हंै, उन पर हम जो बातचीत करते हैं, उसको साहित्यिक पत्रकारिता कहते हैं। इसलिए यह फर्क बहुत साफ-साफ समझ लेना चाहिए ताकि आज जो समग्र है, वह वक्त पर काम आये। आधुनिक मनुष्य के जीवन में राजनीति प्रमुख है और साहित्य, कला, संस्कृति गौण होते चले गए हैं तो परिणाम उसका यह हुआ है कि अखबारी पत्रकारिता का वर्चस्व, फैलाव, प्रभाव और दबाव बहुत ज्यादा है, जबकि साहित्यिक पत्रकारिता बहुत सीमित क्षेत्र में सिमट कर रह गई है। मैं अपनी बातें बहुत ही सूत्र में आपसे कहूंगा, क्योंकि बहुत से विद्वान् लोगों को बोलना है और उस पर वो गम्भीरतापूर्वक प्रकाश डालेंगे। इसलिए मैं बहुत सूत्र में, बहुत कम समय में, बहुत कम शब्दों में अपनी बात करना चाहूंगा। आप समय के रंग में देखिए-भारत में पत्रकारिता की शुरूआत साहित्यकारों ने की और इसमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे नाम रहे। फिर माखनलाल चतुवेर्दी, धर्मवीर भारती आये। रघुवीर सहाय की एक लम्बी परम्परा हमारे सामने आती है। इन्हीं लोगों के कारण अखबारों को भाषा के संस्कार मिले और भाषा की सम्पन्नता मिली, वर्णन की कला मिली और सम्प्रेषण किस प्रकार से किया जाता है, इसकी दक्षता भी इन्हीं साहित्यकारों के द्वारा इनको दी गई। इसलिए अखबारों की भाषा में जो संवेदनशीलता आयी, वह साहित्य की संवेदनशीलता थी और शब्दों की प्रामाणिकता भी इन्हीं साहित्यकारों के कारण अखबारों में आयी। इसका परिणाम यह है कि आज भी हम अखबारों में छपी बात को बहुत प्रामाणिक मानते हैं, क्योंकि यह साहित्यकारों की देन है। आज के पत्रकारों के बारे में ऐसा कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिए यह भी कहा गया है कि एक अच्छा साहित्यकार अच्छा पत्रकार तो हो सकता है, लेकिन एक अच्छा पत्रकार अच्छा साहित्यकार नहीं होता। यह भी बहुत ध्यान देने वाली बात है। मित्रो, आजादी के समय हमारे जो अखबार थे, हमारी जो पत्रिकाएं थीं, उनका संचालन अधिकतर साहित्यकारों के हाथ में रहा और आजादी के बाद देश में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए और स्थितियों में उल्लेखनीय बदलाव आए, जिनको आप बेहतर जानते होंगे, फिर भी मैं उनको आपके सामने गिनाना चाहूंगा। एक पंडित नेहरु का आशावाद और समाजवाद। फिर कांग्रेसी कल्चर की स्थापना हुई। यह कांग्रेसी कल्चर जो हर पार्टी ने अपनाया है बहुत शिद्दत और बहुत मुहब्बत के साथ अपनाया है और इस देश में अगर कोई भी यह संस्कृति पनप रही है, चल रही है, वो कांग्रेस की ही देन है, लेकिन यह हमारे वातावरण में है, यह बात। फिर चीन से युद्ध हुआ, फिर मोहभंग के हालात पैदा हुए और आदर्शवाद की दुर्गति होना शुरू हुई। हमारे जो पुराने साहित्यकार थे, कथा साहित्य था, उसमें आदर्शवाद को बहुत हाइलाइट किया जाता था, लेकिन आप बाद का साहित्य देखें। सन् 1950 के बाद और 1960- 65 के बाद बहुत तेजी के साथ आदर्शवाद को कोने में रखा जाने लगा। उसके बाद फिर आपातकाल और उसका प्रभाव। फिर देश में राजनीतिक आपाधापी का भी एक बहुत जोरदार वातावरण रहा। फिर आया भूमंडलीकरण, उदारवाद, बाजारवाद। फिर संचार क्रांति, तकनीक का प्रवेश और विकास। इस तरह से बहुत सारी घटनाएं इस देश में होती गईं। अब इनके जो प्रभाव हैं, वो पत्रकारिता पर इस प्रकार पड़े कि अखबारी दुनिया पर कापोर्रेट का प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ा। उनका वर्चस्व बढ़ा। सम्पादकों की जगह खत्म हुई और सीईओ आ गए। अखबार को प्रोडक्ट के रूप में लिया जाने लगा और विज्ञापनों की, रंगीन विज्ञापनों की भरमार शुरू हो गई। इसी तारतम्य में आप देखेंगे कि लोकप्रिय पारिवारिक पत्रिकाएं जो थीं, साहित्यिक पत्रिकाएं जो थीं जैसे धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान, रविवार, सारिका, गंगा कहानी आदि-आदि ये सभी बन्द हुए। ग्लैमर, मनोरंजन, खेल को वरीयता और प्राथमिकता दी गई और अखबारों से साहित्य को खदेड़ा जाने लगा। इसको आप सहज रूप से स्वीकार करें कि हमारे जो श्रेष्ठ अखबार हैं, उनमें प्रत्येक सप्ताह में सात पृष्ठ मनोरंजन, सिनेमा, खेल को दिए जाते हैं। सप्ताह में सिर्फ एक पृष्ठ साहित्य को दिया जाता है। उसमें भी कहीं कुछ, कहीं कुछ और, एकाध छोटी कहानी, एकाध कविता। साहित्य की हैसियत इस तरह से हाशिए पर पहुंच गई। इसका प्रभाव एक यूं भी है कि जनता की टीवी, इन्टरनेट और मोबाइल में रुचि बढऩे से पढऩे की आदत में कमी आयी और साहित्य अपने आप धीरे-धीरे हाशिए पर पहुंच गया। साहित्यिक पत्रिकाओं पर अगर ध्यान दें तो साहित्यिक पत्रिकाओं का घर परिवार में प्रवेश अब न के बराबर हो गया है। लोकप्रिय पारिवारिक पत्रिकाओं का समय गुजर गया है। जिस तरह से हम हर घर में धर्मयुग देखते थे, साप्ताहिक हिन्दुस्तान देखते थे, दिनमान देखते थे। अब इस तरह की कोई पत्रिका नहीं है, जो घरों में पायी जाती हो। इस क्रिया की जो प्रतिक्रिया हुई है, उसमें विचारधारा के प्रभाव को लेकर लघु और अव्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में बढ़ोतरी हुई है और साहित्यिक पत्रकारिता अब इन्हीं लघु पत्रिकाओं तक सीमित होकर रह गई है, लेकिन वक्त के चलते-चलते इनमें भी गिरावट आयी है और उसके कारण ये हैं-एक तो छोटी पत्रिकाओं, लघु पत्रिकाओं के लिए आर्थिक संसाधनों का बड़ा अभाव रहा है। साहित्यिक रचनाओं के प्रति अभिरुचि घट रही है। वह भी एक कारण है। तीसरा विज्ञापनों की कमी। चौथा आप देखें बहुत ध्यानपूर्वक कि जेपी के आन्दोलन के बाद इस देश में किसी भी प्रकार के आन्दोलन होने बन्द हो गए। न कोई मजदूरों का आन्दोलन है, न विद्यार्थियों का और न ही किसानों के आन्दोलन, किसी भी तरह का कोई आन्दोलन नहीं हंै, जो देश को झकझोर दें। इस तरह के आन्दोलन न होने से लघु पत्रिकाओं का जो कलेवर था, उनकी जो व्यापकता थी, उस पर असर पड़ा। फिर उपभोक्तावाद में वृद्धि हुई। अब लोग मानकर चलने लगे है कि हम अपने पैसे का उपयोग पत्र-पत्रिकाओं में न करके दूसरे सामान खरीदने में करें, जो परिवार की मांग है, जिसको बच्चे मांगते हैं, जिसको पत्नी मांगती है। साहित्यिक पत्रिका खरीदना एक गौण काम हो गया। तीसरे हमारे साहित्यकार भी कम खुदा नहीं है। वे भी पत्रिकाएं खरीदते नहीं, मांगकर पढऩा पसन्द करते हैं। फिर अखबारों में चटपटी, सनसनीखेज और कामुक सामग्रियों का लगातार प्रदर्शन हुआ है, उससे लोगों की अभिरुचि उस ओर बढ़ी है। अक्सर वे अखबार अच्छा और पठनीय माना जाता है, वह पत्रिका पठनीय मानी जाती है, जिसमें कुछ सनसनीखेज हो, कुछ मजेदार बात हो। बाकी मनहूसियत तो हमारी जिन्दगी में है ही, दैनिक जीवन में। हम लोगों का एक समय था, जब हम लोग विद्यार्थी थे, तब हम पत्रिकाओं को खरीद के पढ़ते थे और एक-दूसरे से लेकर भी पढ़ते थे, क्योंकि सारिका और धर्मयुग से हम लोगों का अपना एक लगाव था, एक रुचि थी, लेकिन आज के विद्यार्थियों का जो लगाव है, वह कैरियर की ओर है। मैं न अच्छा कहता हूं, न बुरा कह रहा हूं, उनका अपना आशय है, लेकिन कैरियर के प्रति उनका मोह होने के कारण वह साहित्यिक पत्रिकाओं और लघु पत्रिकाओं से धीरे-धीरे विमुख होते जा रहे हैं। मुक्तिबोध का प्रभाव इतना जबर्दस्त हुआ कि हिन्दी कवियों ने इस तरह की कविताएं लिखनी शुरू कर दीं। इतनी दुरूह और कठिन कविताएं कि लोगों की समझ में नहीं आतीं। कवि से पूछो तो कवि भी बताने से इधर-उधर होता है। वो बोलता है, जो कुछ है, वह मैंने कविता में लिख दिया है। जब तुमने अपनी कविता में जो लिख दिया, जो तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है तो मेरी समझ में कहां से आएगा। बहरहाल, इस भाषा ने इस शैली ने इन रचनाओं ने भी दूर किया हुआ पाठक को, लेकिन जैसा कि संतोष चौबे कहते हैं कि विज्ञान और तकनीक अपना प्रभाव छोड़ता है और धीरे-धीरे वह समय को भी अपनी गिरफ्त में बांधता हुआ चलता है। एक नया वृत्तांत खुल रहा है, जिसकी तरफ आपका मैं ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा और जिसे आप मुझसे बेहतर जानते हैं कि तकनीकी विकास की तेज गति में मोबाइल, लैपटॉप, डेस्कटॉप आदि उपकरणों का उदय हुआ। जन-जन में फैलाव हुआ और इन्टरनेट का प्रभाव अब गली-गली में है। इस कारण वाट्सअप हुए, फेसबुक हुए, ब्लॉग हुए, पेज आदि के माध्यम से साहित्यिक सृजन और उसकी गतिविधियां बहुत तेजी से फैल रही हैं। इसका परिणाम यह है कि वे लोग जो साहित्य से हमने बाहर कर दिये थे, जिनको हम साहित्यकार मानते ही नहीं थे, जो दूर-दूर तक आपके घर के बाहर खड़े रहते थे, अब वे बहुत सक्रियतापूर्वक फेसबुक में, वाट्सअप में लिख रहे हैं और अपने जिस भी तरह के उद्गार हैं, प्रकट कर रहे हैं। विशेष रूप से महिलाएं, जिनको इस तरह के अवसर नहीं मिले थे, अब घर-गृहस्थी के कामों के बाद लिखती हैं। कुछ न कुछ लिखती हैं जिस तरह से भी, लेकिन फेसबुक और वाट्सअप वगैरह में आप महिलाओं की उपस्थिति जरूर पाते हंै।

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