अहिंसक आदमी का युद्ध

सूर्यकांत नागर उन कथाकारों में हैं, जो आधुनिक संवेदना की जटिलता और उसकी सहज अभिव्यक्ति के बीच सार्थक पुल बनाते हैं। नित नए शिल्प और प्रयोगों की दुनिया में ऐसे लेखकों का गुम हो जाना स्वाभाविक है। भले ही सूर्यकांत जीवन के नये से नये प्रसंग उठाने के लिए प्रयत्नशील रहते हों, भले ही वे मनुष्य की प्रवृत्ति, सीमाओं और बाध्यताओं को निजी स्तर पर समझने की कोशिश करते हों, फिर भी मुझे उनमें वह तड़प, तड़प क्या कोशिश भी नहीं दिखती, जो आधुनिक लेखक में शिल्प के स्तर पर होती है। सरल वर्णनात्मकता, पूर्व-स्मृतियां और कथा-कथन की रोचकता के बीच उनकी अभिव्यक्तिशैली सीमित रहती है। उनकी सारी चिंताओं और प्रयत्नों का केन्द्र जीवनानुभवों को लेकर है और ये जीवनानुभव भी वे हैं, जो शहरी निम्न मध्यवर्गीय खासकर नौकरीपेशा व्यक्ति के हैं। परिवार की समस्याएं भी उन के लिए आमतौर पर वे ही हैं, जो कुटुम्ब से कटकर पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित रह गई शहरी लेखक की हैं। जाहिर है कि हमें सूर्यकांत नागर की उपलब्धियां इसी सीमा में परखनी हैं। मेरे विचार से ऐसे लेखकों की सार-सम्हाल आवश्यक है, जो उपभोक्ता संस्कृति की प्रक्रियागत लोकप्रियता से टक्कर लेते हुए जनता के लिए सार्थक विकल्प प्रस्तुत करते हैं। सूर्यकांत किसी क्रीड़ा या आत्मबल के मोह में रचना नहीं करते। उनकी हर कहानी सोद्देश्य और उत्तरदायी होती है, तभी वे किसी ऐसे क्षेत्र की विषय वस्तु का चुनाव नहीं करते, जिस पर उनकी पूरी पकड़ न हो। ज्यादा से ज्यादा अनुभव विस्तार के सहारे वे कथा-विस्तार करते जाते हैं। उनके चरित्र आमतौर पर व्यक्तिगत समस्याओं और द्वंद्वों के चक्कर में ही घूमते नहीं रहते, बल्कि सामाजिक और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए भी संघर्ष करते हैं। अगर उनकी कोई व्यक्तिगत समस्या है तो वह भी स्वीकार या निषेध की सामाजिकता से जुड़ी है, क्योंकि यह रचनाकार स्वयं अपने चरित्रों या विषयवस्तु के प्रति ऐसा आचरण करता है ताकि उसमें निहित सामाजिकता, मूल्यपरकता, आधुनिकता आदि प्रतीकात्मक बनकर निजी दायरे से निकल जाती हैं। कहीं-कहीं ये प्रयत्न अधिक उजागर भी हो जाते हैं। उदाहरण के लिए ‘शरीफ आदमीÓ का हॉस्टल में रहने वाला लड़का जब उसके मालिक ठाकुर साहब की हत्या कर देता है तो भाग जाने के अवसरों के बावजूद वह थाने में जाकर अपराध स्वीकार करना आवश्यक मानता है, क्योंकि वह इस घटना को मंच की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। ‘हरिश्चंद्र की औलादÓ का मिश्रा बेईमान अधिकारी बतरा द्वारा त्रस्त करने के बावजूद आत्महीनता से उबरकर संघर्ष करने का संकल्प लेता है। यह संकल्प मिश्रा के चरित्र के अनुरूप है, जिसने कभी अनैतिक मूल्यों से समझौता नहीं किया, यहां तक कि समय से पूर्व सेवा-निवृत्ति भी इसी उद्देश्य से ली ताकि इस रूप में वह ‘कंकड़ फेंककर, ‘एक लहर पैदा कर सके। यह बात अलग है कि ‘वहां गंदगी इतनी अधिक थी कि लहरें उठना तो दूर, पानी थरथराया तक नहीं। तब भी ऐसे माहौल में मिश्रा की अकेली लड़ाई जीवन मूल्यों के लिए मानवता की ओर से लड़ी जाने वाली लड़ाई है, उसकी कोई निजी लड़ाई नहीं। वास्तव में सूर्यकांत के रचनाकार की मार्मिकता मनुष्य के विशिष्ट स्वभाव और स्थितियों में उतरकर उन्हें पहचानने के गुण में निहित है। उनकी वे ही कहानियां अच्छी हैं, जो मनुष्य के चरित्र, अंतर्विरोध, द्वंद्व और अंतत: उससे पाए जाने वाले मानव मूल्य के केन्द्र में हैं, जबकि अवधारणा के सामन्यीकरणों पर टिकी उनकी कहानियां अक्सर सपाट हैं। वैसे भी चरित्र के सूक्ष्मातिसूक्ष्म भेद, मूल्य चेतना अथवा मूल्यभ्रंश के कारण कई बार मनुष्य अपने वर्ग से पृथक होकर अच्छाइयों या बुराइयों से घिरा व्यक्ति मात्र होता है। अक्सर इस व्यक्ति की खीज और विश्लेषण में ही अपनी सक्रियता दिखाने का, लेखक को सबसे अधिक अवसर मिलता है, क्योंकि मनुष्य के चरित्र को वर्ग या स्थिति स्वीकार कर लेने के बाद तो ढर्रे पर चलना ही शेष रहता है। अगर लेखक धारणा बना ले कि डॉक्टर जहां होगा, शोषक, कू्रर या मरीज को वस्तु समझने वाला अंतत: भत्र्सना के योग्य होगा। मरीज जहां होगा वह या उसके साथी यदि गरीब हुए तो अवश्य ही संवेदना के पात्र होंगे, भले वे कैसा ही आचरण करें। अफसर और नेता अनिवार्यत: भ्रष्ट, क्रूर, कृतघ्न और स्वार्थी होंगे और अध्यापक, बाबू, मजदूर, बेरोजगार युवक या स्त्रिायां हमेशा ही शोषित और लेखकीय पक्षधरता की पात्र होंगी, जहां भी पूंजीपति या मालिक आएगा, खंूखार, लालची और अत्याचारी बनकर ही आएगा तो ऐसे अविचल पूर्वग्रहों के चलते लेखक की सक्रियता के कौन से अवसर शेष रहेंगे? अन्वेषण के क्या मुद्दे होंगे? उसे तो करना सिर्फ यही होगा कि एक वर्ग के प्रति हो रहे अन्याय और उत्पीडऩ का जोरदार खाका खींचो या उसके प्रति संवेदना से विगलित हो शोषकों के अत्याचार के तरह-तरह के रूप प्रकट करो। स्थितिबद्ध और वर्गबद्ध अवधरणात्मक ढांचे में सूर्यकांत ने भी यही किया। इसलिए उनकी ऐसी कहानियां सपाट कथात्मक लेखन भर रह गई, जबकि ढांचे से निकलने पर जहां वे वस्तु और चरित्र के गहरे अन्वेषण में जुट सके वहां उनके सर्जनात्मक औजारों में भी खास तरह की वक्रता और विशेषता दिखाई पड़ी। इसका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य की वर्ग, स्थिति आदि की अवधारणा गलत या काल्पनिक हैं और इन्हें सर्जनात्मक गहराई नहीं दी जा सकती। यहां सिर्फ कहना यह है कि सूर्यकांत जैसे कथाकार को अवधारणात्मक ढांचा सर्जनात्मक उत्प्रेरण नहीं देता, भले ही अपनी स्वाधीन राह पर चलकर ये वहीं पहुंचे हों, जहां अवधरणा पहुंचती है, क्योंकि एक तो स्वयं उनका सर्जना विधन सीधा-सादा है, उस पर यदि वे सहज समीकरण स्वीकार कर लेते हैं तो दोनों के योग से उनकी रचनाएं भीतर से बाहर तक सरलीकृत हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, ‘दरिंदे, ‘शरीफ लोग, अफसर जात, ‘हरिश्चंद्र की औलाद आदि कहानियां ले सकते हैं। इन कहानियों की सामाजिकता, उद्देश्यपरकता और मूल्यवत्ता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता, परंतु इनकी सर्जनात्मकता में वे खूबियां कहां हैं, जो ‘तबादला, ‘भोगा हुआ यथार्थ, ‘अधूरा सच, ‘बिना चेहरे का पेट, ‘एक सच यह भी और ‘शवयात्रा आदि में हैं। यहां प्राय: चरित्र अपने वर्ग चरित्र से हटकर बर्ताव करते हैं और ऐसा करते हुए वे लेखक की सर्जनात्मक शक्तियों को चुनौती देते हैं, उससे वक्रता और विश्वसनीयता की मांग करते हैं। ‘तबादलाÓ में एक ईमानदार अध्यापक महाजन को मंत्री के आदेश पर दूर-दराज गांव में फेंक देना, उसकी शिकायत को अनसुना किया जाना, मंत्रियों या मुख्यमंत्रियों के चेहरों पर ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का मुखौटा होना और वास्तविक स्थिति आने पर उघडऩा विश्वसनीय है। इसलिए जब महाजन के निवेदन पर ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ माने जाने वाले मुख्यमंत्री कहते हैं- ”और क्या होता है ईमानदार और निष्ठावान होने से? क्या रखा है इसमें? सब बकवास है। आज इसका कोई मूल्य नहीं। आज के माहौल में तुम मिसफिट हो, अवांछनीय। तो पाठक को यह व्यवहार वर्तमान नेताओं के अनुरूप ही लगता है। उसे लगता है कि लेखक मुखौटा उतारने की सामान्य प्रक्रिया अपना रहा है, परंतु जब लौटते हुए महाजन अखबार में पढ़ता है कि अपनी ईमानदारी और निष्ठा के कारण मुख्यमंत्री से इस्तीफा देने को कहा गया था, वे दे भी चुके हैं, अर्थात जब महाजन मिला था, वे इस्तीफा दे चुके थे। तब उनका यह कथन एक तरह से ‘स्वगत में बदल जाता और ऐसी स्थिति उजागर होती है जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हमारे समय में मूल्य पर दृढ़ रहने वाला चाहे अध्यापक हो या शीर्षस्थ नेता, उसे परास्त होना ही है। इस अप्रचलित कथ्य को उपलब्ध करने के लिए सूर्यकांत को कहानी में बारीक ताना-बाना बुनना और रहस्योद्घाटन तक उसे सहज बनाए रखने के लिए सहजता को औजार के रूप में इस्तेमाल करना पड़ा। ‘अधूरा सचÓ का उमेश, कारखाने में जल गए श्रमिक नंदू की यातना से सहानुभूति रखता है, वह उसके लिए एक हद तक अपने अफसर मेहता से लड़ाई भी लड़ता है, परंतु जब उसे लगता है कि नंदू के पक्ष में बयान देने से मेहता उसकी पदोन्नति रोक देगा तो वह आत्म द्वंद्व से गुजर कर भी अंत में नंदू के खिलाफ बयान देने को तैयार हो जाता है। इस कथा के लिए कहानी के रचना विधन में जिस सर्जनात्मक संघर्ष की जरूरत थी, वह तो लेखक ने किया ही है, परंतु युधिष्ठिर के अर्धसत्य की याद दिलाने वाला शीर्षक ‘अधूरा सच रख कर उसने ऐसी अव्यक्तता व्यक्त कर दी, जो कहानी के आयाम को विस्तृत करते हुए स्वार्थ और सत्य के संघर्ष की विवश परंपरा की ओर भी इशारा कर देती है। ‘भोगा हुआ यथार्थ ऐसी ही मार्मिक कहानी है, जो आत्मीयता या स्वार्थ का एक विचित्र पारंपरिक पैटर्न बनाती है। विवाहित बेटी का कष्ट दूर करने के लिए स्वयं घोर कष्ट उठाते हुए भी मां तब तक के लिए अपना गैस सिलेंडर बेटी को दे देती है, जब तक उसके दहेज वाला सिलेंडर आ न जाए, परंतु जब बेटी का सिलेंडर आ जाता है तो वह मां का सिलेंडर नहीं लौटाती, बल्कि अपनी नवजात बेटी के दहेज में देने के लिए नया सिलेंडर सुरक्षित रख लेती है। यह कहानी मां- बेटी के परिचित संबंध, खासकर बेटी की अपने माता-पिता के प्रति सिद्ध ममता पर तीखा प्रश्नचिन्ह लगाती है और कोमलतम संबंधों में घुस आए स्वार्थ का उद्घाटन करती है। यह हमारे परिवारों के विकास की दिशा बताते हुए जुडऩे और कटने की अजीब त्रसद कहानी है। एक और पारिवारिक कहानी लीजिए ‘त्रिशंकु। लेखक ने आधुनिक परिवार में पत्नी की आत्मनिर्भर स्थिति के कारण उत्पन्न पति की स्थिति का मार्मिक प्रसंग उठाया है। परंपरा को नई स्थितियों से संतुलित न कर पाने के कारण पति ‘त्रिशंकु बन गया और अब भी पत्नी के भाई और अपने भतीजे को समान दृष्टि से नहीं देख पाता। इसी तरह मां के चरित्र पर ‘जन्मदात्री में तीखी टिप्पणी है। आधुनिक युग में स्त्री चीज- वस्तु नहीं रही कि कोई भी उसे फंसा ले या छल ले। ‘बिना चेहरे का पेट यद्यपि इस उद्देश्य से लिखी कहानी नहीं है, फिर भी ध्वनित करती है कि बदली हुई परिस्थिति के अनुरूप अपना उद्देश्य प्राप्त करने के लिए जरूरी चालाकी स्त्री में आ गई है। यों कहानी अपने रचना विधन से यह आघात देने वाला प्रभाव छोड़ती है कि मनुष्य के सामने ऐसी बाध्यताएं उपस्थित हो जाती हैं कि वह अपने मूल स्वभाव के विरुद्ध ऐसा कुछ करने को बाध्य होता है, जो उसकी रक्षा करने पर संभव नहीं था। यहां तक कि अच्छे उद्देश्य के लिए भी उसे गलत काम करना पड़ता है, यहां तक कि छल-कपट भी। इसे एक अत्यंत सहृदय, उत्तरदायी, सच्चरित्र स्त्री के माध्यम से कहना कितना सार्थक रहा, यह इस कहानी में देख सकते हैं। इसका रचना विधान भी कुशलता से बुना गया है। काफी दूर तक लगता है कि ‘सुजाताÓ फर्म के मालिक के बेटे पुनीत मेहता के जाल में फंस गई है और उसके साथ कोई दुर्घटना घटने वाली है, परंतु अंत में प्रकट होता है कि जाल की ओर बढऩा और पुनीत को ललचाने का अवसर देना सुजाता की आवश्यकता की मांग और एक तरह से भावी छल की पूर्व प्रक्रिया थी। वह झूठ बोल कर पुनीत से पैसे ऐंठ लेती है ताकि भाई-बहनों की फीस भर सके। यद्यपि पढऩे वाले को सुजाता के चरित्र और घटनाओं से इस परिणाम का पहले कोई संकेत नहीं मिलता, परंतु लेखक इस कथ्य के लिए प्रारंभ से ही सर्जनात्मक रूप से तैयार था। इस कहानी का पहला ही वाक्य है-”जिस ढंग से सुजाता चर्चगेट स्टेशन पर उतरी, उसे उतरना नहीं कहा जा सकता, जैसे किसी ने जबरन टे्रन से ढकेल दिया हो।ÓÓ क्या अंत में भी सुजाता जिस समस्या से ‘उबरीÓ, उसे आप उबरना कह सकेंगे? बीच में भी इस कहानी में ऐसे प्रसंग हैं, जिनसे वह बाध्यता सघन होती है, सुजाता यदि यह सब न करती तो उसे स्वाभाविक रूप में वह नहीं मिल सकता था, जिसकी उसे जरूरत थी। मसलन प्राकृतिक आवश्यकता की पूर्ति की कोई जगह; यानी महिलाओं के लिए कोई ‘प्रसाधनÓ दफ्तर में या इर्द-गिर्द नहीं था, जिसकी शिकायत करने पर पुनीत के पिता सेठ भोलू भाई क्या कहते हैं, जरा गौर करें- ”महिला की बात नहीं है, इध्र तो आदमी लोग के वास्ते भी कहीं कोई जगह नहीं है। इस बेशर्मी और नासमझी का कोई जवाब है? तो यहां कुछ भी सहज नहीं है, हर कुछ वक्र ढंग से ही पूरा होता है तो सुजाता की सही जरूरत का भी गलत ढंग से ही पूरा होना लाजमी था। एक कहानी है ‘एक सच यह भीÓ-इसमें बारीक स्पर्श है। अफसर चरित्रवान और संवेदनशील है। ड्राइवर उसके सामने रोज-रोज अपने दुकड़े रोता है, परेशान जीवन से मुक्त होने के लिए आत्महत्या करने का संकल्प करता है। इस पर अधिकारी उसकी आर्थिक सहायता करके उसे इस विचार को त्यागने की प्रेरणा देता और हिम्मत बंधता है, परंतु जब वास्तव में आदिवासी ड्राइवर की हत्या करने लगते हैं तो स्वयं को बचाने के लिए वह उस ‘पागलÓ; ड्राइवर के शब्दों में अफसर पर ही सारा दोष मढ़ देता है, जिसने उसे कथित आत्महत्या से बचाया था। ‘शवयात्राÓ में लेखक ने ऐसे स्वार्थी का चित्र खींचा है, जो मृत्यु को भी स्वार्थ-साधन में इस्तेमाल करना चाहता है। एम.एल.ए. और भावी मंत्री केशव भाई की निगाह में बढऩे के ‘वीरूÓ के करतब बहुत रोचक हैं और व्यंग्यात्मक ढंग से वर्णित हैं, परंतु इसके भीतर एक बहुत तीखी टिप्पणी है मृतक की बहन के प्रति- ”मृतक की बहन जो उज्जैन से आयी थी शायद अपनी विध्वा भाभी को उन एक हजार रुपयों की याद दिला रही थी, जो उसके अपने बड़े भाई को उधर दिए थे। मुझे याद आया किसी ने सुबह बताया था, छोटी बहन का अपने बड़े भाई से बड़ा स्नेह था। श्मशान में लोगों की गप्प गोष्ठी और मृतक की ओर से निरपेक्षता आदि के वर्णन तो कई कहानियों में हुए हैं, लेकिन सूर्यकांत का उपर्युक्त स्पर्श निजी है और मुख्य प्रसंग में ऐसी प्रसंगवत्ता पैदा करता है कि ‘शवयात्राÓ आधुनिक युग में मनुष्य की स्नेह संवेदना की ‘शवयात्राÓ में परिणत हो जाती है। ‘टुकड़े- टुकड़े आदर्श का दर्द अलग है, जहां बेटी को सिनेमाघर के कामुक मालिक से बचाने और स्वयं की नौकरी बचाने के बीच तड़पती ‘जगत जीÓ की आत्मा है, जिसके लिए दोनों चीजें एक-सी अनिवार्य हैं, परंतु द्वंद्व का एक और प्रबल केन्द्र है बेटी का सिनेमा मालिक के प्रति आकर्षण है-लालसा और नासमझी। सूर्यकांत चाहते तो इस द्वंद्व को और तीव्र तथा जटिल बना सकते थे, लेकिन निजी अन्वेषण में ही उनकी सर्जना खिलती और नए-नए अर्थ खोजती है। इसी प्रक्रिया में उन्होंने समाज, व्यक्ति और मूल्य का त्रिकोण रचा है, वे अपनी कहानियों में इनके अंतसंबंधों के प्रति व्यग्र दिखाई देते हैं। ऐसी व्यग्रता, अपने समय की ऐसी उत्तरदायी सर्जक का रूप लेती है, जिसके आगे संलग्नता के प्रासंगिक सूत्र भी होते हैं और संलग्नता की अप्रासंगिकता की समझ भी। ऐसी व्यग्रता अलग प्रकार के समीकरण बनाती है, जिसकी अनिवार्य शर्त विषमता ही नहीं, विसंगति और मूल्यहीनता को हर स्तर पर समाप्त करने की उत्कटता भी होती है। सूर्यकांत के पास एक सहज, व्यावहारिक और प्रवाहमयी भाषा है, साफ-सुथरी सीधी-सादी शैली है, जिसमें कहीं-कहीं व्यंग्य का मार्मिक और अनायास स्पर्श है, जो वर्णन, संवाद और चरित्रंकन-तीनों में है। उनके शीर्षक भी कई बार व्यंग्यात्मक होते हैं, जो आकर्षण, विसंगति और वक्रोक्ति रचते हैं-जैसे ‘चोर, ‘शरीफ आदमीÓ, ‘देश बचाओÓ आदि। कहीं भाषा में भी व्यंग्य के पुट हैं, मसलन ‘शवयात्रा में विशेषज्ञ, ‘चिंता विशेषज्ञÓ या ‘शापग्रस्तÓ में ऊपर से अफसर उनकी कार्यकुशलता पर मुग्ध थे। यहा ‘मुग्धÓ व्यंग्य है, जिसके कारण आदमी पर लगातार काम का बोझ लादा जाता है, परंतु यह कहना जरूरी है कि सूर्यकांत के यहां ये सब अगर आते हैं तो बिन बुलाए, सहज। कथा-कथन में सूर्यकांत सिद्ध हैं। पाठक कहानी पढऩा प्रारम्भ करने के बाद शायद ही समाप्त किए बिना छोड़ पाता होगा। यह गुण आज कहानियों में दुर्लभ होता जा रहा है। काव्यात्मकता आदि का प्रयोग शायद उनकी सादा स्वभाव की कहानियों को अलंकरण की तरह बोझिल लगता है। संवाद उनकी कथाओं में जरूरत भर को होते हैं, जो ‘यदा-कदा कहानी की एकरसता को तोड़ते हैं। वे जीवन से ऐसे प्रसंगों की तलाश में रहते हैं जो कथा के अनुरूप मार्मिक हों, इसमें वे प्राय: सफल होते हैं। अप्रत्याशित या अनोखापन लाने में उनकी रुचि नहीं है, यों कथा में यदि वे स्वयं चले आएं तो उनका इस्तेमाल वे बड़े सलीके और धीरज से करते हैं। कथा रचते हुए उनमें उत्तेजना या द्रवित होने जैसा भाव नहीं दिखता। एक वैज्ञानिक तटस्थता से वे अपनी रचना में प्रवृत्त लगते हैं। इन तमाम बातों को देखते हुए लगता है कि सूर्यकांत बाहर से भीतर तक सहज लेखक हैं। कहीं- कहीं अनावश्यक रूप से सहजता का आरोपण भी रचना को सपाट बना देता है। ‘तबादलाÓ जैसी अच्छी कहानी का अंत इसी प्रवृत्ति के कारण कुंठित हो गया। सूर्यकांत नागर की कहानियों के बारे में मैंने कई बार सहजता का जिक्र किया है तो इसका यह अर्थ नहीं कि उनके यहां यह कोई निस्सत्व सादगी है। उनके भीतर आग की गहराइयां और आयाम भी हैं- अलबत्ता कहानी में नोंके उभरी हुई नहीं हैं, परंतु भीतरी चुभन प्राय: हर महत्तवपूर्ण कहानी में मौजूद है। उदाहरण के लिए ‘सूखते पोखर की मछलीÓ बहुत शांत कहानी है, जिसमें एक सम्पूर्ण समर्पित पत्नी, अस्पताल में अपने पति की सेवा में मौन निष्ठा से लगी है। अभावग्रस्त स्त्री न तो त्याग का स्वांग भरती है, न अस्पताल को कोसती है, परंतु लेखक कहानी की लय में ही जो कहते हैं, उसमें सब कुछ पारदर्शी हो जाता है- ”अगले दिन देखा, उसके कान नंगे हो गए हैं, क्या डॉक्टरों के नंगेपन ने उन्हें नंगा किया है? इस विचार के साथ मैं कांप उठा। अस्पताल की दुव्र्यवस्था और डॉक्टरों की यमराज जैसी वृृत्ति को उघाडऩे वाली कहानी ‘दरिंदे में काफी शोरगुल के बावजूद इन दो पंक्तियों जैसा वजन और कसक नहीं आ पायी। सूर्यकांत का अंत:सत्व कैसे अपने को संयत और व्यंजक बनाने की कोशिश करता है, इसका एक उदाहरण ‘देश बचाओÓ जैसी मुखर कहानी का यह अंत भी है- ”मेरे दांत बज उठे। अंदर से नफरत और प्रतिहिंसा का अंधड़ बहने लगा। एक पत्थर जरूर फेकूंगा विरोध स्वरूप, पर तभी जुलूस संसद भवन की ओर मुड़ गया। कोई भी पाठक समझ सकता है कि इस कथन का संबंध जुलूस के मुडऩे और ओझल हो जाने से नहीं है- इसका फैलाव संसद, जुलूस और आम जनता के नाजुक संबंधों से है। ‘अफसरजात कहानी में जब कृतघ्न अफसर से निराश अध्यापक लौटता है तो रास्ते में शोर मचता है। ऐसे में कोई बताता है कि एक आदमी रेल से कट मरा। क्या कहानी के अंत में दी गई यह सूचना सिर्फ सूचना मूलक है? ऐसे अनेक संदर्भ सूर्यकांत के सर्जन की क्षमता और भीतर की आग की सूचना देते हैं। मुझे लगता है कि सूर्यकांत नागर अपने रचना संसार में तीन तरह के युद्ध में लगे हैं- पहला युद्ध सहज और सपाट के बीच है, दूसरा वर्ग-व्यक्ति और मूल्य के बीच और तीसरा परंपरा और आधुनिकता के बीच। इसमें वे पूरी तरह से सफल हुए हैं। कथाकार सूर्यकांत नागर पर केंद्रित कुछ और सामग्री अगले अंक में…

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