सपाट जीवन किसी को कुछ नहीं देता : नागर

समकालीन हिंदी कथा जगत के वरिष्ठ सितारे सूर्यकांत नागर अब 85 बरस के पार हैं, लेकिन पिछले दिनों महेश्वर यात्रा में हमारे साथ गए नागर जी वहां किसी युवा जैसे तरोताजा और चंचल लग रहे थे। कामना है कि वे भीष्म पितामह की तरह अजर-अमर रहें। शाजापुर (म.प्र.) में फरवरी,1933 को जन्मे नागर विज्ञान में स्नातकोत्तर तथा विधि में स्नातक हैं। दस कहानी संग्रह, ‘गुदड़ी के लालÓ और ‘टीवी युग की महरीÓ जैसे व्यंग्य संग्रह छपे। भावना प्रकाशन, दिल्ली से इनकी ‘संपूर्ण कहानियांÓ एक जिल्द में छपी हैं। लघुकथा संग्रह ‘विष बीजÓ, साहित्यकारों के पत्रों का संग्रह ‘आईनाÓ, निबंध संग्रह ‘अपने ही जाये दु:खÓ और ‘सड़क जो है, सेक्यूलर हैÓ, आत्मकथ्य संग्रह ‘सरे राह चलते-चलतेÓ तथा ‘यादों के गलियारे सेÓ आदि भी प्रकाशित। ‘नई दुनियाÓ और ‘दैनिक भास्करÓ जैसे प्रतिष्ठित अखबारों से जुड़े रहे तो ‘वीणाÓ जैसी पुरानी पत्रिका के संपादक भी रहे। संप्रति मासिक पत्रिका ‘समावर्तनÓ से संबद्ध। सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार, दुष्यंत कुमार अलंकरण, भाषा भूषण सम्मान तथा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान से विभूषित। राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, वर्धा के सौजन्य से मॉरीशस तथा जोहानिसबर्ग में हुए विश्व हिंदी सम्मेलनों में भाग लिया। पच्चासी पार होने पर युवा कवि-संपादक राकेश शर्मा ने उनसे बातचीत की, जिसे हम यहां दे रहे हैं… नागर सर, अब आप पच्चासी पार कर रहे हैं। बधाई। ऐसे में पाठक जानना चाहेंगे कि जहां आपका जन्म हुआ, वह परिवेश कैसा था? 3 फरवरी, 1933 को मेरा जन्म शाजापुर में हुआ, नाना जी के घर में। बचपन से शाजापुर में आने-जाने का सिलसिला बना रहा, लेकिन बाद में पिता के साथ इंदौर शिफ्ट हो गया। शाजापुर ने मुझे जो ग्रामीण और आंचलिक परिवेश दिया, वह स्मृति के रूप में आज भी मेरे दिलो-दिमाग पर अंकित है और कहीं न कहीं उसका लाभ मुझे अपने लेखन के लिए मिलता है। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए बचपन तुलनात्मक रूप से काफी कठिनाइयों में गुजरा। जीवन अभावग्रस्त रहा। उन दिनों हमने जो संघर्ष करते हुए जो तकलीफें झेलीं, जो कष्ट देखे, कहीं न कहीं उनकी छाप-छाया मन-मस्तिष्क पर बनी रही। इस वजह से एक तरह की हीन भावना भी कहीं न कहीं पैदा हुई, जिससे आज तक मुक्त नहीं हो पाया। मां का अनुशासन कठोर था, जिसका लाभ मुझे जीवन में मिला। मां की इजाजत के बिना हम घर से बाहर नहीं जा सकते थे। शाम को दिया-बत्ती से पहले घर में आ जाना जरूरी होता था। यदि हम किसी से लड़-झगड़कर आते तो दोष किसी का भी हो, बुरी तरह से पिटाई होती थी। आजकल के बच्चों में तो उस तरह की चीजें नहीं हैं, लेकिन मां की वह सीख हमारे साथ हमेशा रही। पिता पर बहुत कर्ज था। हम छोटे थे। कर्जदार हमारे सामने आते और पिता को अपमानजनक शब्द बोलकर चले जातेे, उसका दर्द आज तक मन में दर्ज है। किराने वाले के पास जातेे तो वह उधार देने से मना कर देता। निराश होकर लौटता तो बहुत दु:ख होता। ऐसी स्थितियां मैंने बचपन में देखीं। मैं समझता हूं जब तक तकलीफ न हो, कष्ट न हो, संघर्ष न हो, चुनौतियां न हों, तब तक कोई भी व्यक्ति संवेदनशील लेखक बन नहीं सकता। कहीं न कहीं उनका उपयोग सृजन में होता है, क्योंकि सपाट जीवन किसी को कुछ भी नहीं देता। संघर्ष और जीवनानुभवों से ही लेखक को अपने लेखन के लिए सूत्र मिलते हैं। सर, आपके जीवन के प्रारंभिक दौर में परिवार में आर्थिक तंगी थी। तब का साहित्यिक परिवेश कैसा था? अपने परिवार से बीज रूप में जो संस्कार ग्रहण कर रहे थे, उसकी कोई स्मृति है? देखिए, इस संबंध में मेरे विचार स्पष्ट हैं। एक तो आप संस्कारों की बात करते हैं, परिवेश की बात करते हैं, माहौल और वातावरण की बात करते हैं, लेकिन मेरा यह कहना है कि मात्र संस्कार कुछ नहीं करते। संस्कार उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं, लेकिन जब तक व्यक्ति में उस तरह की आंतरिक रुचि न हो, लगाव न हो, प्रतिभा न हो, कल्पनाशीलता न हो तो केवल संस्कार काम नहीं आते। प्रतिभावान और संवेदनशील हुए बगैर आप सर्जक बन ही नहीं सकते। कई उदाहरण ऐसे हैं, जहां पर दो बेटे एक ही संस्कारों में पले, एक बहुत पढ़-लिख कर विद्वान बन जाता है, दूसरा गलत काम करता है, जबकि संस्कार और माहौल दोनों को एक-जैसे मिले। सो, आंतरिक रुचि भी होनी चाहिए। वैसी मानसिक बुनावट का होना जरूरी है। आप किसी को मार-मार के न मुसलमान बना सकते हैं, न हिन्दू। खैर, मेरे साथ संस्कार भी थे और आंतरिक रुचि भी। इन दोनों चीजों ने मिलकर मुझे लेखन की ओर बढ़ाया, जोड़ा। जहां तक संस्कार का सवाल है तो दादाजी बहुत अच्छे चित्रकार थे। उनकी हैंड राइटिंग इतनी अच्छी थी जैसे छापे से लिखी हो। कलम से लिखते थे, काली स्याही से। दूसरी ओर उनकी चित्रकारी थी। जब हम छोटे थे और पढ़ते थे तो दीवार पर उन्होंने बाराखड़ी बड़े-बड़े रंगीन अक्षरों में लिख दी थी। उसको शेड वगैरह भी दी ताकि हम आसानी से पढऩा सीख सकें। वे ऐसे चित्र बनाते थे, जिन्हें एक तरफ से देखो तो औरत तथा दूसरी तरफ से देखो तो आदमी दिखाई देता था। देखिए, उनमें कितनी प्रतिभा थी। वे बोतल के अन्दर लिख लेते थे या चित्र बना लेते थे। बोतल के अंदर वे यह करते थे। मेरे पास वह विधि लिखी हुई थी। वे एक कागज लेते थे, उसके ऊपर गंधक का लेप और दो-तीन अन्य चीजें मिलाकर उस पर अक्षर या चित्र बनाते। फिर उसकी भोंगली बनाकर उसे बोतल में उतार देते। फिर लकड़ी या कलम या पेन जैसी किसी चीज से कागज को उसमें फैलाकर चिपका देते और दो दिन बाद कागज को निकाल लेते तो सारे अक्षर या चित्र बोतल के भीतर उभर आते। एक दृष्टि से देखें तो यह संस्कार वाली बात है। दूसरी बात, पिता कविता करते थे। उन्होंने नाटक भी लिखे। एक लंबी कविता है उनकी। खंड काव्य जैसी-‘बाबा जी की लीलाÓ। कथित बाबा लोगों की सारी लीलाएं और पाखंड उसमें उन्होंने लिखे थे। तब जो साप्ताहिक पत्र ‘अशोकÓ निकलता था, उसमें उन्होंने खूब लिखा। बोल्शेविक व्यंग्य नाटक भी लिखा था। उनकी एक कविता ‘वीणाÓ में छपी थी। जब मैं ‘नई दुनियाÓ में था तो पुरानी ‘वीणाÓ में अभय जी ने मुझे वह कविता दिखाई थी। इस तरह आप इन्हें संस्कार मानें तो इनसे निश्चित रूप से मुझे लाभ मिला होगा। इससे अलहदा, निश्चितत: मेरे अंदर साहित्य के प्रति कहीं लगाव था। नौवीं-दसवीं में आप शाजापुर में थे? उस समय की आपकी लेखकीय गतिविधियां क्या थी? नहीं, तब मैं इंदौर में था। उसके बाद ज्यादातर इंदौर में ही रहा। जब नौवीं-दसवीं में था, मैंने हस्तलिखित पत्रिका ‘विद्याÓ शुरू की थी। तीन ही उसके अंक निकल पाए, जो स्वाभाविक था, क्योंकि सारी पत्रिका हाथ से लिखना पड़ती थी और कोई साधन नहीं था। (पत्रिका का अंक दिखाकर) आप देखेंगे कि इसको मैं पूरी तरह से डेकोरेट करता था। चित्र बनाता था अलग-अलग रंगों से, अलग-अलग स्याही से-कहीं लाल, नीली, हरी स्याही से उनको रेखांकित करके पत्रिका को आकर्षक बनाता था। उसमें सभी तरह की रचनाएं होती थीं, लेख थे, कहानी थी, नाटक थे, अनुवाद थे, चुटकुले भी थे और सिनेमा की जानकारी भी। मुझे पता नहीं, कहां से ये सब उस समय मुझमें आया था, क्योंकि तब कोई पत्र-पत्रिकाएं मेरे घर आती नहीं थी। यह बात सन् 1948-49 की है। केवल ‘फ्री प्रेसÓ अखबार आता था, जिसे पढऩा मेरे बस में नहीं था, लेकिन बाद में जरूर लाइब्रेरियों में जाने लगा। सराफा की मोरसली गली में एक जनरल लाइब्रेरी थी तो उस तरह से मेरे अंदर कहीं न कहीं पढऩे के प्रति रुचि थी, जो शायद मुझसे ये काम करवाती रही। उसके बाद सन् 1953-54 से पुन: लिखना शुरू किया। वल्लभ विद्या नगर, गुजरात से निकलने वाली पत्रिका ‘जीवनÓ में मेरे दो लेख छपे थे। एक ‘आत्महत्या पाप क्यों?Ó और दूसरा ‘पिता-पुत्र संबंधÓ। पिता से उन दिनों मैं नाराज था। इसलिए कि उनकी जो गतिविधियां और कर्ज वगैरह का मामला था, उससे हम लोगों के बीच एक तरह का तनाव बना रहता था। इसलिए मैंने लेख लिखा था ‘पिता-पुत्र संबंधÓ। ‘इंदौर समाचारÓ के दीपावली विशेषांकों में भी दो, व्यंग्य लिखिए। धीरे-धीरे क्रम बढ़ता गया। उच्च शिक्षा भी आपकी इंदौर से ही हुई है और कौन-सी विधा से आपने उच्च शिक्षा प्राप्त की? मैंने केमिस्ट्री विषय के साथ बी.एस.सी किया और उसके बाद कलकत्ता से ए.आई.सी.सी एक्जाम पास की। वह एम.एस.सी के समकक्ष है। इसलिए कि उसमें खाद्य पदार्थों और पानी के विश्लेषण का विशेष कोर्स होता है जो मेरे शासकीय काम से सम्बंधित था। इस डिग्री को सेन्ट्रल गवर्नमेंट द्वारा एम.एस.सी के समकक्ष माना गया है। सम्बंधित एक्ट में भी इसका उल्लेख है। बाद में ”लॉÓÓ में भी ग्रेजुएशन किया। आपने बताया कि कक्षा नौ से ही आप लिखने की ओर प्रेरित हुए थे, आपके प्रेरणा स्त्रोत जो लेखक रहे होंगे उस जमाने में, जिन्होंने वैचारिक रूप से आपकी बांह पकड़कर कहा होगा कि चलिए लेखन में आइए। तो उन लोगों का स्मरण। हां, उस वक्त का तो एकदम नहीं, पर इसके बाद का समय था जब मैंने थोड़ा-बहुत पढऩा शुरू किया था। बाहर के वरिष्ठ लेखकों को देखें तो जैनेन्द्रकुमार, प्रेमचंद, भगवतीचरण वर्मा, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि। ये तमाम लोग थे जिनका मुझ पर असर पड़ा। खास कर मैं जैनेंद्रकुमार के लेखन से बहुत प्रभावित था। क्योंकि प्रेमचंद ने जिस तरह की शुरूआत की थी और उसको इश्क, मुहब्बत, अय्यारी से निकालकर समाज से जोड़ा था, किसान से जोड़ा था, महिलाओं और विधवाओं से जोड़ा था। लेकिन जहां तक शिल्प और भाषा का सवाल था, क्योंकि वह हिन्दी कहानी के उत्कर्ष का शुरूआती दौर था, इसलिए प्रेमचंद की भाषा और शिल्प के बारे में हमें शिकायत नहीं करना चाहिए। लेकिन पीडि़त-शोषित जन के प्रति उनकी जो जीवन-दृष्टि थी, वह बहुत महत्वपूर्ण थी। जैनेंद्रकुमार ने सबसे पहले शिल्प, कथ्य और भाषा के स्तर पर प्रयोग किए। उनकी बिल्कुल अलग तरह की भाषा थी, प्रेमचंद की भाषा से एकदम भिन्न। स्त्री अस्मिता पर उन्होंने काफी कुछ लिखा। पत्नी, प्रेयसी और लेखन पर लम्बी चर्चा छिड़ी थी। स्थानीय लोगों में आप देखें तो डॉ. श्यामसुंदर व्यास थे। श्याम व्यास थे। उनको नई पीढ़ी शायद नहीं जानती। बहुत अच्छे कथाकार, उपन्यासकार थे और श्यामू सन्यासी थे। वे भी उपन्यासकार थे। बाद में जापान में भी रहे। रामविलास शर्मा जो प्रकृति के कवि थे। कृष्णकान्त दुबे, गणेशदत्त त्रिपाठी थे। चंद्रकान्त देवताले थे। उनसे दो-तीन बार गोष्ठियों में मुलाकात हुई थी। इस तरह यहां एक वातावरण था। कृष्णकान्त दुबे और गणेशदत्त त्रिपाठी, जानकर आपको आश्चर्य होगा कि ये इंदौर के प्रगतिशील लेखक संघ में शुरू से सक्रिय थे। दुबेजी के घर पर ही बैठकें हुआ करती थीं। साहित्य की विविध विधाओं पर चचार्एं होती थीं। नई रचनाओं पर बहस होती थी। सर, आपने जिन वरिष्ठ कथाकारों के नाम लिये हैं, उनमें कोई कवि नहीं है। तो ये मानकर चलें कि शुरू से ही आप कहानी और उपन्यास की ओर गए होंगे, कविता की ओर आपका रुझान शायद उतना न रहा हो, क्या ऐसा है। हां, शुरू में तो रुझान नहीं था यह सही बात है। एक बात और बताता हूं कि दो-तीन नाम जो मैंने अभी बताए, जिनसे मैं प्रभावित रहा, बाहर के लेखकों में मुझे स्वयंप्रकाश, उदयप्रकाश और नवनीत मिश्र की कहानियां बहुत प्रिय हैं। स्वयंप्रकाश इसलिए प्रिय हैं क्योंकि वे अनुभव में विचाराधारा और विचारधारा में कला को मूर्त करते हैं। उनमें एक समावेशी दृष्टि है। विचारधारा के आग्रही होने के बावजूद वे कहानी की सीमा को पहचानते हैं। उदयप्रकाश की शैली विशिष्ट है। व्यंग्य और फेंटेसी का वहां अद्भुुत मेल है। आपने कविताओं की बात कही। शुरू में इस तरह का रुझान नहीं था। लेकिन जैसे-जैसे कविताएं पढ़ता गया, तब अचानक ही लगने लगा कि कुुछ संवेदनाएं काव्य के माध्यम से बेहतर व्यक्त की जा सकती हैं। जैसे कभी अनायास व्यंग्य लिखने की इच्छा होती है वैसे ही लगा कि कुछ चीजे हैं जो केवल कविता में ही बेहतर व्यक्त की जा सकती हैं। फिर मैंने कुछ कविताएं लिखीं और वे ‘काव्यमÓ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपीं भी। आपकी रचना प्रक्रिया का मूल कहां से है? ये क्या आप सोच लेते हैं और फिर उसे कहानी, लघुकथा या उपन्यास में ढालते हैं। देखिए, सबसे बड़ी बात तो यह है कि कोई भी रचना, कोई भी लेखन बिना अनुभव के नहीं होता। हर रचना अनुभवजन्य होती है। अनुभव बीज में होता है। ये अलग बात है कि अनुभव कितना बड़ा है, कितना व्यापक है? वह सूक्ष्म भी हो सकता है और स्थूल भी हो सकता है। वह किसी घटना से उपजी प्रतिक्रिया भी हो सकती है। यह प्रतिक्रिया कभी-कभी आप सामने वाले के चेहरे को, उसके हाव-भाव को, उसकी बॉडी लैंग्वेज को देखकर पता करते हैं कि इस आदमी का चरित्र कैसा होगा? उसका अंदर-बाहर कैसा होगा? तो लेखक किस तरह से चीजों को ग्रहण करता है, उन्हें पचाता है, यह इस पर बहुत निर्भर करता है। तो अनुभव सबसे पहली चीज है। वह निजी होगी, तो लेखक को अपनी कल्पनाशीलता, अपनी प्रतिबद्धता, अपने सामाजिक सरोकारों से उसको समष्ठिगत बनाना होगा, सार्वजनिक, सार्वलौकिक, सार्वभौमिक बनाना पड़ेगा। तब जाकर वह बहुसंख्यक के काम की चीज होगी। हम अपना रोना रहते हैं कि साहब ये तो मेरा खुद का अनुभव है, खुद का देखा-भाला है। आप इसे गलत या अस्वाभाविक कैसे कह सकते हैं? या अप्रमाणिक कैसे कह सकते हैं? लेकिन जब तक लिखा हुआ बहुसंख्य का यथार्थ नहीं बनता, उसकी संवेदना से नहीं जुड़ता, पाठकीय संवेदना का हिस्सा नहीं बनता, तब तक आपके भोगे यथार्थ का कोई अर्थ नहीं। आपने अनुभव की बात की है आपको विषय प्राय: समाज से मिलते हैं। कहानी का (प्लॉट) पृष्ठभूमि समाज से ली, ये कैसे तय करते हैं कि इसको लघुकथा में ढालना है, या कहानी में ढ़ालना है या उपन्यास में ले जाना है। ये क्या शुरूआत से होता है या आप सायास करते हैं? नहीं, सायास नहीं है। ऐसा है कि विषय-वस्तु या प्रतिक्रिया जो हमारे मन में हुई, उसे जिस तरह से हमने ग्रहण किया, वह खुद अपनी विधा तय कर लेती है। इसीलिए मैंने कहा कि जैसे कविता भी मैंने लिखीं। तो कहीं न कहीं ऐसा लगा कि यह चीज कविता की ही है और वह कविता में उतर आयी। इसी तरह कभी लगता है कि यह विषय तो उपन्यास का है, तो पहले तो सोचा नहीं, पर जब विषय दिमाग में आया, तो विषय ने खुद अपनी विधा चुन ली। बस, यह अंदर से अनायास क्लिक होता है। आपने पुराने कहानीकारों के नाम लिये और नये कहानीकारों पर भी बात की। आपका अनुभव-संसार विस्तृत है। हम ये जानना चाहेंगे कि आज के कहानीकार को किस बात पर सबसे ज्यादा कन्संटेऊट होना चाहिए? क्या उसमें सबसे ज्यादा केन्द्रीयता विचारों की होनी चाहिए? देखिए, सबसे बड़ी बात है समकालीनता। समसामयिक और समकालीन विषयों पर लिखना चाहिए। उसकी जन पक्षधरता स्पष्ट होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि आप अपना रोना रोते रहें। ‘स्वÓ की बजाय ‘परÓ की चिन्ता ज्यादा होनी चाहिए। यदि हमारे लेखन में स्व का आग्रह ज़्यादा हुआ तो हम पर कायाप्रवेश नहीं कर पाएंगे। आपके सामाजिक सरोकार स्पष्ट होने चाहिए। आपके दिमाग में क्लिअर कान्सेप्ट होना चाहिए कि आप कहना क्या चाहते हैं, किसके लिए कहना चाहते हैं और किस तरह कहना चाहते हैं? आपके दिमाग में ये बातें होनी चाहिए। अन्यथा तो वह स्वांतसुखाय लेखन होगा। आज जो कुछ भी समाज और देश में घट रहा है, उसके प्रति लेखक का सजग होना बहुत ज़रूरी है। उसके प्रति प्रतिबद्धता ज़रूरी है। यह प्रतिबद्धता असंदिग्ध होनी चाहिए, बँटी हुई नहीं। यदि प्रतिबद्धता बँटी हुई है तो सही मायने में आप प्रतिबद्ध हैं ही नहीं। तब तो आप अवसरवादी हैं। सच का समथज़्क होने का नैतिक साहस आप में नहीं है। आपकी प्रतिबद्धता स्पष्ट होनी चाहिए कि आप किसके साथ खड़े हैं! और हाँ, बिना विचार के तो किसी भी रचना का कोई महत्व नहीं। वैचारिकता के बगैर रचना का उद्देश्य पूरा नहीं होता। कहानी है तो विचार और अनुभव के बीच सामंजस्य बैठाना होगा। कोरा विचार या केवल अनुभव कहानी नहीं होता। कथानक जरूरी है जो आपके विचार को पुष्ट करे। प्रतिबद्धता से आशय आपका विचाराधारा से है, राजनैतिक विचारधारा से है या लेखक की जो प्रतिबद्धता समाज के साथ है, उससे है? देखिए, ये ज़रूरी नहीं है कि प्रतिबद्धता राजनैतिक विचारधारा से जुड़ी हो। किसी विचारधारा से बंधा होना गलत नहीं है, पर हमें विचारधारा का गुलाम नहीं होना चाहिए। प्रतिबद्धता का मतलब यह है कि आप अभिव्यक्ति में ईमानदार हैं। कई बार राजनैतिक विचारधारा वाले लोग उसे एक फैशन की तरह ओढ़ लेते हैं। जब तक विचारधारा आपकी संवेदना का अंग नहीं बनती, आपके अंदर पूरी तरह रच-बस नहीं जाती, तो ऊपरी तौर पर विचारधारा का पोषक बनना, कोई मतलब नहीं रखता। बार-बार आप उस चीज को लिख रहे हैं और अंत में लाल झण्डा फेहरा दिया तो उसका कोई अर्थ नहीं। विचारधारा की अभिव्यक्ति के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि जीवन के दूसरे पक्ष के साथ अन्याय ना हो, वह अनदेखा, उपेक्षित न रह जाए। वैसे हर साहित्यकार किसी न किसी विचार आदर्श या सिद्धांत से जुड़ा होती ही है। आपने अपने इस लम्बे जीवन अंतराल में विचारधाराओं को उगते हुए देखा, स्थापित होते हुए देखा और अब यूँ कहें कि विस्थापन भी देख रहे हैं। इसने कहाँ, कितना कहानी को विशेष तौर पर आपके उपन्यास और कहानियों को प्रभावित किया है? कृपया बताएँ आज का लेखन किस मुकाम पर खड़ा है और उसकी क्या स्थिति है? जिस प्रवाह में आज अधिकांश युवा रचनाकार सृजन कर रहे हैं वे ज्यादातर समकालीन मुद्दे हैं- चाहे वे राजनीति से जुड़े हों, चाहे धर्म से जुड़े हों, चाहे भ्रष्टाचार से जुड़े हों, आतंकवाद से जुड़े हों या इस तरह के अन्य समकालीन मुद्दों से जुड़े हों। लेकिन जो जीवन मूल्य है, मानवीय मूल्य हैं, हमारी संस्कृति है, श्रेष्ठ परम्पराएँ हैं, संस्कार हैं, उस ओर उनका ध्यान कम है। उनका संरक्षण बहुत जरूरी है। हम देख रहे हैं कि जीवन मूल्यों में कितनी तेजी से गिरावट आ रही है। भूमण्डलीकरण की पूंजीवादी सोच एक नई अपसंस्कृति या कहें। उपभोक्तावादी संस्कृति को जन्म दे रही है। युवा पीढ़ी भ्रमित है। इससे हमारी भाषा, साहित्य और संस्कृति पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए ये जरूरी है कि हम इन चीजों पर ध्यान दें। हमने लोक को भी भुला दिया है। आंचलिक कथाएँ बहुत कम आ रही हैं। हमारी मूल संस्कृति गाँवों में है, वहाँ से हम यहाँ तक आए हैं। आज लेखक समझता है कि गाँव या अंचल की कहानी लिखने का मतलब है कि उसमें आधुनिकता-बोध नहीं है और वह लेखन की मुख्य धारा से कटा हुआ है। तो आप यदि गाँव की कहानी उठाएंगे तो वहाँ की संस्कृति से जुड़ेंगे। जड़ों की तरफ जाना बहुत जरूरी है। (राकेश शर्मा बीच में हस्तक्षेप करते हुए: बहुत महत्वपूर्ण बात आपने की है और लोक की तरफ वापस जाने की जो बात आप कह रहे हैं वह ठीक है। आप ये भी कहा करते हैं कि मैंने आपको व्याख्यानों में सुना है कि मुहावरे अब गायब हो रहे हैं जबकि प्रेमचंद की कहानियों में मुहावरे होते थे जो भाषा को परिमार्जित करते थे। ये लोक का गायब होना आप मानते हैं बहुत चिंता का विषय है। क्योंकि हम अपनी जड़ों से कट रहे है। उदारीकरण और वैश्वीकरण के नाम पर जो हो रहा है उससे बाजार का वर्चस्व बढा है। आज गाँव में बाजार जा रहे हैं और बाजार में गाँव आ रहा है। गाँव का शहर में लाना एक नाटक है। भ्रमित करने की कोशिश। यह लोक के माध्यम से अपना बाजार तैयार करना है। लोक-उन्नयन की सच्ची भावना शायद वहाँ है ही नहीं। आप देखते हैं कि लोक-संस्कृति के नाम से कितनी प्रदर्शनियाँ होती हैं, नाटक होते हैं। सब केवल प्रदर्शनियों तक सीमित हो कर रह जाता है। नुमाहश की तरह। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और जो दूसरी कंपनियाँ हैं, गाँवों में प्रवेश कर रही हैं। आपको गाँव में बुनियादी जरूरतों की चीजें चाहे न मिलें, कोकाकोला जरूर मिल जाएगा। जिस तरह बाजार गाँव में जा रहा है, चिंता का विषय है। इससे हमारी भाषा और साहित्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। आपने कहानी और कहानीकारों के संदर्भ दिये और कहानी की रचना-प्रक्रिया पर बात की। कविता पर थोड़ी-सी बात आपने की और यह भी कहा कि आपने गिनती की कविताएं रची हैं। आपकी स्मृति में इंदौर का वह परिदृश्य भी होगा ही जब इंदौर में बड़े-बड़े कवि सम्मेलन होते थे, बड़े कवि आते थे। कोई ऐसी स्मृति। निश्चित ही पहले यहां विशाल कवि-सम्मेलन होते थे। लोग रात-रात भर कवियों को सुनते थे। मैंने ज्यादातर नीरज को सुना है। एक दफा भवानी प्रसाद मिश्र को सुना। उस समय उनके साथ प्रयाग शुक्ल भी आए थे। पुराने लोगों में वीरेन्द्र मिश्र को सुना, उनकी वो ‘भारत माताÓ कविता बहुत लोकप्रिय थी। जब वे उसे सस्वर सुनाते थे तो श्रोता मंत्र मुग्ध हो जाते थे। बालकवि बैरागी को भी काफी सुना। शिवमंगल सिंह सुमन का कविता-पाठ श्रोताओं को बांधे रखता था। लोकल कवियों में देवताले, कृष्णकांत दुबे, रमेश महबूब, रामकिसन सोमानी आदि थे। बाद मेें शरद जोशी भी अपनी व्यंग्य-रचनाओं का पाठ करने लगे थे। हास्य कवियों में कुंज बिहारी पांडेजी को बहुत सुना। मालवी के कवियों में आनंदराव दुबे के अलग ही ठाठ थे। सरोजकुमार बहुत बाद में आए और मंचों पर छा गए। आज कविता में कई तरह के प्रयोग और हो रहे हैं। उसमें भी समकालीन जीवन का चित्रण है। गीत और नई कविता वालों के बीच एक अघोषित द्वंद्व है। ये लोग एक-दूसरे के प्रति नाक-भों सिकोड़ते हैं। यह गलत है। दोनों विधाएं अपना काम करें। गीत-गजल वाले अपने छायावादी दृष्टिकोण से भिन्न जनपक्षधरता की बात कर रहे हैं। यदि नई कविता में गद्य इतना अधिक हो कि वह कविता ही न रहे, न उसमें लय रहे, न प्रवाह तो यह सोचने वाली बात है। कहीं न कहीं वहां भी कहीं छन्द काम करता है, ऐसा मेरा मानना है। (बीच में राकेश शर्मा ने जोड़ा: आप सही कह रहे हैं कि छन्द तो वस्त्र है कविता का। अंतत: कविता की आत्मा की बात होनी चाहिए। वस्त्रें की क्यों बात हो, आदमी की बात कीजिए। आपने बहुत अच्छा सवाल सामने रखा है।) एक सवाल जो हम कहानी और कविता से अलग आपसे पूछना चाहेंगे वो ये है कि आपने हिन्दी के तमाम आलोचकों को सुना भी है, देखा भी है और पढ़ते भी रहे हैं। आलोचना की स्थिति के बारे में हिन्दी साहित्य जगत में ये माना जाता है कि ये शिविरबद्ध हो गई हैं, खेमों में बंट गई है और जो जिस खेमे का आदमी है उसी को लेखक, कहानीकार या उपन्यासकार माना गया। जो दूसरे खेमे का था उसको मटियामेट किया गया। ऐसा लोग कह रहे हैं, आपका क्या अनुभव है? यह बात सही है कि आज आलोचना और समीक्षा का जो क्षेत्र है, वह प्रायोजित है। आप छोटे लेखक की बात छोड़ दीजिए, मैंने देखा है, बड़े-बड़े लेखक इस प्रयास में रहते हैं, इस कोशिश में रहते हैं कि उनकी कोई कृति आई है तो जल्दी से उसकी आलोचना छपे, समीक्षा छपे और इसके लिए वे जमकर प्रयास करते हैं। सम्पादकों को फोन करते हैं, कई लोगों को कहते हैं कि आप कृति पर लिखो। संपादक भी किसी वरिष्ठ लेखक की समीक्षा प्रकाशनार्थ आती है तो वह भी उसे अप्रसन्न करना नहीं चाहता। निश्चित ही यह ले-दे का मामला है। तो ये सारी चीजें प्रायोजित और शिविरबद्ध हो गई हंै। आप देखें, नामवर ने किसी पर हाथ रख दिया तो वह रातों रात महाकवि हो गया। उसी की सब जगह वाह-वाह हो रही है। तूती बोल रही है। एक रुप बन जाता है जो बार-बार उन्हीं-उन्हीं की चर्चा करता है। यह गलत है। आलोचना वास्तव में रचनात्मक होनी चाहिए। लेखक को सही आलोचना का बुरा नहीं मानना चाहिए। बल्कि आलोचना तो रचना का सफर तय करती है, सहयात्री है। वह पाठक के लिए ही नहीं, लेखक के लिए भी होती है। वह उसकी सहायक है। मौका देती है कि लेखक आत्म-विश्लेषण करे। यदि नाराज होकर बैठ जाएगा तो आगे कुछ न कर पाएगा। देखा गया कि नाराज होकर बड़े-बड़े लेखकों ने आलोचकों से आजीवन कुट्टी कर ली। जिसने आलोचना की, उस आलोचक से जिंदगी भर बात नहीं की। महावीरप्रसाद द्विवेदी से कई लोग नाराज रहे। गुस्सा हो गए तो उनसे बोलना बंद कर दिया। इस तरह अबोला करने की जरूरत नहीं है। यदि राग-द्वेष रहित आलोचना है तो आप उस पर गंभीरता से विचार करें। आत्मसमीक्षा करें, तब आप लेखन को परिष्कृत कर सकते हैं। संस्कारित कर सकते हैं। सर, आप सृजनात्मक लेखन के प्रति जितना प्रतिबद्ध रहे हैं, उतना ही प्रतिबद्ध पत्रकारिता में भी अपने को पाते हैं। मैं चाहूंगा कि आप जब पत्रकारिता में रहे थे उस समय कौन से लोग थे जो आपका आव्हान कर रहे थे कि आइए, पत्रकारिता में भी आपका स्वागत है। कुछ उनके बारे में बताएं और अपनी पत्रकारिता के रुझान किस तरह से पैदा हुआ उसके बारे में बताए। पत्रकारिता की ओर जाने का और उसके प्रति रुचि जाग्रत होने का और उसमें आगे बढऩे का सबसे पहला, बड़ा कारण तो यह है कि मैं लिख रहा था लगातार पत्रिकाओं में। पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहा था तो उन पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप के बारे में, उनके संपादन के बारे में और मीडिया आदि की तरफ ध्यान जाता था। इस बहाने पत्रकारों से भी परिचय होता जा रहा था। सबसे पहले मैं नगर निगम की मुख-पत्रिका निकलती थी ‘नागरिकÓ। उसमें कमलाकान्त मोदी और महेन्द्र त्रिवेदी जैसे लोग संपादक थे, जिनकी साहित्य में रुचि थी। वे जनसंपर्क अधिकारी थे और पत्रिका के संपादक भी। जब मैंने सन् 1953-54 में ड्यूटी जॉइन की थी, नगर-निगम में तो मैं ‘नागरिकÓ से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ गया। वहां लिखना शुरू किया। वे लोग मुझे कभी-कभार थोड़ा बहुत काम सौंप देते थे। वह मैं कर दिया करता था। उसके बाद क्या हुआ कि ‘व्यंग्य ओ व्यंग्यÓ नाम की पत्रिका निकलती थी। मालवीयजी थे जो चित्रकार भी थे, आर्टिस्ट भी थे। वे इस पत्रिका का संपादन करते थे। इसमें भी वो मेरी मदद लेते थे। मैंने उसमें भी लिखना शुरू किया। लिखने के वातावरण की वजह से ही मैं पत्रकारिता की ओर गया। ‘नई दुनियाÓ में उन दिनों ज्यादा लिख रहा था तो लोगों का ध्यान जाता था। अखिल भारतीय राष्ट्रीय अंधत्व की संस्था ‘हमारी आंखेÓ नामक पत्रिका निकलती थी। डॉ. महाशब्दे उसके संपादक थे। उन्हें जब मालूम पड़ा कि मैं नई दुनिया वगैरह में लिख रहा हूं तो उन्होंने पहले तो मुझे ‘हमारी आंखेÓ के संपादक मण्डल में ले लिया। शुरू में रवीन्द्र शुक्ला उसके संपादक थे जो नई दुनिया में उपसंपादक थे। धीरे-धीरे उनकी रुचि कम होती गई। वे ध्यान ही नहीं दे पाते थे तो महाशब्देजी ने उनको बंद कर दिया। चूंकि मैं संपादक मंडल में था तो मुझे ‘हमारी आंखेÓ के संपादक का भार सौंप दिया। मैं ‘हमारी आंखेÓ का संपादन करने लगा पूरा मन लगाकर। लेकिन एक-डेढ़ साल ही काम किया मैंने, उसके बाद मुझे दिल्ली जाना पड़ा। वहां से लौटकर आया तो फिर लिखना-पढऩा शुरू हुआ। जब रिटायर हुआ फरवरी, सन् 1991 में तो कुछ दिनों बाद मेरे पास संदेश आया नई दुनिया से। उसका बड़ा ही रोचक किस्सा है। डॉ. रनवीर सक्सेना वहां काम कर रहे थे। प्राध्यापक पद से रिटायमेंट के बाद वे पुन: नई दुनिया में आ गए थे और संपादकीय लिखने लगे थे। एक दिन उनका फोन आया कि आप रिटायर हो गए हैं तो यहां हम वार्षिकी निकाल रहे हैं नई दुनिया की। मुझे कोई सहायक चाहिए, तो क्या आप मेरी सहायता करेंगे असिस्टेंट के रूप में? मैंने कहा, अंधे को क्या चाहिए-रोशनी। मैंने हां भर दी। लेकिन उस बात को तीन-चार महीने गुजर गए। कोई सूचना नहीं आई। मैंने सोचा बात आई-गई हो गई। फिर एक दिन अचानक फोन आया कि अभय जी ने आपको बुलाया है। मैं समझा वार्षिकी निकालने वाली वही पुरानी बात होगी। मैं गया तो एक नया ही प्रस्ताव था मेरे सामने। क्योंकि प्रभु जोशी पहले वहां काम कर रहे थे। वे छह-आठ महीने पूर्व छोड़ कर चले गए थे। फीचर डेस्क पर निर्मला भुराडिय़ा थी, यशवंत व्यास थे और एक प्रभु जोशी वाली कुर्सी खाली थी। तीन डेस्क थी तो एक मुझे मिल गई। मुझे आश्चर्य हुआ। उन्होंने जैसे ही प्रस्ताव रखा, मैंने हां भर दी। नई दुनिया में रहकर मैंने पत्रकारिता के बहुत से गुर सीखे। पत्रिकारिता क्या होती है, कैसे ले-आऊट होता है, कैसे संपादन होता है, कैसे कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहा जा सकता है, संपादक की क्या जवाबदारियां होती हैं आदि। संपादक के लिखे एक शब्द के क्या परिणाम हो सकते हैं? क्योंकि आपने कुछ गलत लिखा तो उसका सीधा असर संपादक और समाचार-पत्र पर होगा। पहले संपादक से पूछा जाएगा कि आपके अखबार में ये ऐसे कैसे छप गया? तो वह सब भी ध्यान में रखा। एक बार तीर हाथ से छूट जाने के बाद आप कुछ नहीं कर सकते। अत: लिखने से पहले पुष्टि कर लेना आवश्यक है। यह भी देखा कि किस तरह शीर्षक दिये जा सकते हैं, यह कि रिपोर्टिंग, फीचर्स, समाचार, संपादकीय और आलेख में क्या अंतर है? यह भी सीखा। एक बार मुझसे सक्सेनाजी ने वीरेन्द्र मिश्र के देहावसान के मौके पर संपादकीय लिखने को कहा था। उसमें छोटी-सी भूल हो गई तो सक्सेना जी ने बाद में मुझे बताया। भूल सहसा ध्यान में आने वाली नहीं थी, फिर भी उन्होंने कहा कि संपादकीय लिखना बड़ी जवाबदारी का काम है। हां एक बात और! नई दुनिया जॉइन करने से पहले जब मैं नौकरी में था, ओम नागपालजी ने मुझे ‘भास्करÓ के लिए बुलाया था। कुछ समय के लिए नागपालजी उसके संपादक थे। एक दिन मिले तो बोले ‘मियां तुम कहां हो, तुम्हें कब से तलाश रहा हूं।Ó और फिर उन्होंने मुझे भास्कर में काम दिया। मैं हर हफ्ते हरियाणा और राजस्थान के घटना-क्रम पर विश्लेषणात्मक टिप्पणी लिखता था। अलावा इसके ‘सप्ताह की तस्वीरÓ नाम से एक कांलम चलाया था जिसमें कुछ अच्छी, विचित्र और जानकारीपूर्ण नई तस्वीरें चुनकर छापना होती थीं। जब नगर निगम में सचिव बन गया तो समयाभाव के कारण मुझे वह काम छोडऩा पड़ा। नई दुनिया में जब आप गए थे तो संपादक राहुल वारपुते थे या राजेन्द्र माथुर? नहीं, जब मैं गया तब अभय छजलानी संपादक थे। मंै पहले जब जाता था और लगातार लिख रहा था तब राजेन्द्र माथुर से संपर्क ज्यादा रहा। उनका काम करने का तरीका अलग था। नए लोगों को भी बहुत प्रोत्साहित करते थे। यकीन मानेंगे एडिटर्स पेज पर उन्होंने अपमिश्रण संबंधी किताब की मेरी लिखी समीक्षा छापी थी। वे साहित्यिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति नहीं थे, फिर भी उनका भाषा पर कमांड था। अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी अच्छी पकड़ थी। मैंने जब जॉइन किया तब अभय छजलानी प्रधान संपादक थे। उनसे पहले जो संपर्क में आए वे राहुल वारपुते थे। राहुल वारपुते विद्वान व्यक्ति थे। उनकी विशेष रुचि संगीत, नाटक और चित्रकला में थी। अंग्रेजी साहित्य की उन्हें अच्छी जानकारी थी। आखिरी में उन्होंने संपादक का पद छोड़ दिया था। उसके बाद राजेन्द्र माथुर को संपादक बनाया गया। तब की एक बात बताता हूं। माथुर को संपादक बनाने के बाद राहुल से कहा गया कि वे नई दुनिया के पार्टनर बन जाएं। उन्होंने मना कर दिया। जब जोर दिया गया तो मात्र एक प्रतिशत अंशधारक के रूप में उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार किया। वह भी एक-दो साल के बाद छोड़ दिया। एक और रोचक किस्सा। राजेन्द्र माथुर गुजराती कॉलेज में प्रोफेसर थे। गुजराती कॉलेज से उनको नई दुनिया में बुलाया गया, क्योंकि वे बहुत अच्छा लिख रहे थे। उनको संपादक बनाया गया तो उनका जो वेतन यहां मिल सकता था नई दुनिया में, उससे उनका वेतन गुजराती कॉलेज में ज्यादा था। तो उन्होंने कहा कि उससे कम तो नहीं लूंगा। अधिक ही लूंगा। राजेन्द्र माथुर की बढ़ी हुई तनख्वाह, राहुल वारपुते की तनख्वाह से अधिक थी। राहुल वारपुते को कहा गया कि माथुर आ रहे हैं और इतनी तनख्वाह मांग रहे हैं जो आपकी तनख्वाह से ज्यादा होगी तो आपकी भी बढ़ा देते हैं। लेकिन राहुल वारपुतेजी ने मना कर दिया। कहा, मेरा काम इतनी तनख्वाह में चल रहा है। जब नहीं चलेगा तब मैं आपको बता दूंगा। आप माथुर को जितनी तनख्वाह देना चाहें, दे सकते हैं। इस तरह के कैरेक्टर्स आजकल कहां मिलते हैं! अभय छजलानी में उस तरह की वैचारिक गहराई और गहरा लेखन नहीं है, लेकिन चूंकि वे शुरू से अखबारी दुनिया से जुड़े थे, उन्हें संपादन और अखबार से जुड़ी छोटी से छोटी चीजों की जानकारी थी। सर, हम लोगों ने आपकी बहुत महत्वपूर्ण किताबें पढ़ी हैं, आपने अपना पूरा आत्मकथ्य लिखा-‘सरेराह चलते-चलतेÓ। उसमें आपने इंदौर के परिदृश्य को भी याद किया है और बीते हुए अतीत को भी। कुछ अतीत का संस्मरण जो आप देना चाहें यहां पर वह और आज का जो दौर है और विशेष कर हिन्दी का जो लेखन करने वाले जो लोग हैं उनके बारे मेें आप कुछ कहें। पहले का माहौल शांत था। गतिविधियां सीमित थीं। रचनाकार भी तुलनात्मक रूप से कम थे। न इतने कार्यक्रम होते थे, न इतना प्रचार-प्रसार होता था, न इतने अखबार थे, न इतने लोकार्पण होते थे। आजकल तो लोकार्पण का ही जमाना है। साहित्य की चर्चा कम होती है लोकार्पण की अधिक। कुछ लोग समझते हैं लोकार्पण कर दिया तो हमने साहित्य की बहुत सेवा कर दी। खेर, यह अलग बात है। उन दिनों छोटी-मोटी गोष्ठियां होती थीं। उसमें लोग अपना रचना पाठ करते थे। कृष्णकान्त दुबे, देवताले, रमेश मेहबूब वगैरह तमाम लोग थे। शांति से काम होता था। उस तरह का हल्ला-गुल्ला नहीं था। कविताओं में छायावादी प्रवृत्ति अधिक थी। आज युवा वर्ग काफी लिख रहा है। समकालीनता के प्रति उसका जज्बा बढ़ा है। वह अधिक सजग है। जागरूक भी। उसकी जनपक्षधरता बढ़ी है। वर्तमान में जो अच्छा काम कर रहे हैं उनमें महत्वपूर्ण नाम हंै नर्मदाप्रसाद उपाध्याय। वे श्रेष्ठ ललित निबंधकार हैं। ललित निबंधकार ही नहीं उन्होंने चित्रकला और मूर्तिकला पर भी बहुत काम किया है। बहुत शोध किया है। न केवल देश की, बल्कि विदेश की चित्रकला पर भी उनका बहुत काम है। प्रभु जोशी हैं। शुरू से ही लिख रहे हैं। कहानीकार के रूप में जाने जाते थे। लेकिन अब चित्रकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। कृष्णकान्त निलोसे हैं। श्रेष्ठ कवि हैं। पहले उनके घर पर काफी गोष्ठियां होती थीं। सतीश दुबे हैं जो लघु कथाकार के पुरोधा हैं। जवाहर चैधरी, व्यंग्य में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। इन्होंने इधर कुछ अच्छी कहानियां और लघुकथाएं भी लिखी हैं। वे उनमें नया प्रयोग कर रहे हैं। सरोजकुमार को कौन नहीं जानता। संचालक, वक्ता और कवि-रूप में। कवि सम्मेलनों में उनका विशेष दखल है। उनका शहर में इतना महत्व है कि आयोजन चाहे सामाजिक हो, चाहे साहित्यिक, उनकी उपस्थिति के बिना अधूरा-सा लगता है। वे अपनी शर्तों पर जीते हैं। चन्द्रसेन विराट हैं, जो गजल सम्राट और गीतकार हैं। चंद्रभान भारद्वाज बहुत अच्छे गजलकार हैं। उनके लेखन में जो वैचारिकता, दार्शनिकता और भाषा पर अधिकार है, उससे उनकी गजलों का वजन बढ़ा है। रवीन्द्र व्यास बहुत एक्टिव हैं। पत्रकार हैं, कवि-कहानीकार और चित्रकार हैं। बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। अपनी बात रखने का नैतिक साहस है उनमें। हमारे एक निकट के मित्र हैं राकेश शर्मा। कवि हैं, संपादक हैं, लेखक हैं, निबंधकार हैं। ‘बहुरंगÓ पत्रिका का बहुत अच्छे से संपादन कर रहे हैं। उनका क्षेत्र बहुत व्यापक है। श्रीमध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति में वे पुस्तकालय मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। राहुल ब्रजमोहन हैं, युवा कवि, गजलकार। बहुत उत्साही हैं और पूरे समर्पण भाव से अपना काम करते हैं। कथाकार स्वाति तिवारी यहां रही हैं। फिर वापस इन्दौर आने की संभावना है। उनको कहानी के लिए बहुत सारे सम्मान मिले हैं। मंगला रामचंद्रन हैं, संध्या भराड़े हैं जो हिन्दी और मराठी दोनों में लिखती हैं। हेमलता दीखित है जो अंग्रेजी की प्रोफेसर थीं, प्राचार्य भी रहीं, उन्होंने बहुत-सी अंग्रेजी कहानियों का हिन्दी में अनुवाद किया है। बहुत अच्छी अनुवादक हैं। साहित्य से इतर बात हम करें तो प्रोफेसर सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ने क्रिकेट संबंधी अनेक पुस्तकों का सृजन हिन्दी में किया है। क्रिकेट के बारे में हिन्दी में लिखने वाले बहुत कम हैं। अंग्रेजी में तो सैकड़ों किताबें हैं क्रिकेट के बारे में। लेकिन हिन्दी में जो 10-12 उल्लेखनीय किताबें हैं वे सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ने लिखी हैं। उनकी हिन्दी साहित्य में भी रुचि है। कौतुक जी हैं, हरेराम वाजपेयी हैं। इस तरह बहुत सारे लेखक हैं जो इन दिनों लिख रहे हैं। कथाकार सत्यनारायण पटेल और कवि प्रदीप मिश्र अच्छा लेखन कर रहे हैं। अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त राजकुमार कुंभज के पास निराली काव्य-दृष्टि है। वे तार-सप्तक के कवि हैं और निरंतर पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे हैं। आप तो अपना जन्मदिन मनाते ही नहीं? नहीं मनाता हूं। आखिर जन्म दिन मनाने में क्या तुक है। ऐसा कौन-सा तीर मार लिया कि बर्थ-डे सेलिब्रेट करें और हां, बात का पिछला सूत्र अधूरा रह गया…। इस तरीके से काफी सहयोग मुझे पत्नी से मिलता है। मुझे कोई संदर्भ नहीं मिलता है या मैंने कोई पत्रिका कहीं रख दी है, कोई किताब रख दी है, ढूंढता रहता हूं यहां-वहां, लेकिन इनके कान पर एक बार पड़ गया कि मुझे फलां संदर्भ नहीं मिल रहा है, तो ढूूंढने के लिए टूट पड़ती हैं। मैं कहता भी हूं कि नहीं मिल रहा है तो छोड़ो। लेकिन ये जब तक ढूंढ कर निकाल नहीं लेतीं, तब तक चैन नहीं लेतीं। एक सवाल सर आपसे करेंगे वो ये कि जीवन के इस मोड़ पर आपको क्या ऐसा लगता है कि ऐसा कुछ छूटा जा रहा है जो मुझे लिखना था और अभी तक नहीं लिख पाए। या कोई ऐसी योजना जिस पर आप बरसों से विचार कर रहे हैं कि इसको हम पूरा करेंगे। दो चीजें दिमाग में हैं। एक तो मैं फिर से एक उपन्यास लिखना चाहता हूं। उसके लिए काफी जददोजहद चल रही है। लेकिन काम ठीक से हो नहीं रहा। मनवांछित तरीके से बात बन नहीं रही। भाई, लेखन की भी कई चुनौतियां हैं। एक मुकाम पर आकर लेखक के अंदर खुद एक आत्म-समीक्षक बैठ जाता है। जब तक संतोष न हो, व्यर्थ की कलम-घिसाई का कोई अर्थ। सृजनात्मकता में जल्दबाजी अच्छी नहीं। धैर्य लेखक की बड़ी पूंजी है। सच मानिए लेखक की आजादी सीमित है। उस पर कई पहरे हैं। दूसरा जो है, आत्मकथा का दूसरा भाग। पहले में बहुत सारी चीजें छूट गई थीं। खास करके उन कई वरिष्ठ साहित्यकारों से साझा किये अनुभव जिनके संपर्क में आया। उनके कृतित्व के बारे में भी। जो पहला खण्ड आया है, उससे कुछ हटकर, अलग तरीके से आत्म कथात्मक संस्मरण लिख रहा हूं। वे पूर्णता की ओर हैं। बाकी जीवन में अब कुछ ज्यादा आशा-अपेक्षा नहीं है। एक अजीब सी अवसाद भरी उदासी और बैचेनी अक्सर महसूस करता हूं। पता नहीं यह सब क्यों है, क्या है। मन प्राय: अशांत रहता है।

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