सरकारों को नहीं बेघरों का गम

हर साल शीत पड़ती है और ठंड से सैकड़ों मौतें होती हैं, असमय मृत्यु पर चर्चा भी खूब होती है, लेकिन मौसम बदलते ही आम आदमी से लेकर आला हुजूर तक भूल जाते हैं कि सर्दी कैसी कटी? नतीजतन, शीत से मृत्यु की समस्या से निपटने के लिए कोई परिणाम मूलक धरातलीय कार्य योजना आकार नहीं लेती। अभी तक कडक़ड़ाती ठंड से बचाव का तरीका प्यास लगने पर कुआं खोदने वाला ही रहा है।
जाड़ा से मरने वालों में ज्यादातर खुले आसमान के नीचे सोने वाले और ऐसे लाचार लोग भी हैं, जिनके सिर पर कहने को टूटी फूटी झोंपड़ी तो है लेकिन शरीर को गर्म रखने के लिए गरम कपड़े नहीं हैं। साल दर साल ठंड से मौत का बढ़ता आंकड़ा बताता है कि शीत से बचाव का प्रबंध कच्चा है। मानवीय दृष्टि से संवेदनशील मसला होने के बाद भी बचाव और राहत की गति अत्यंत धीमी है, लाल फीताशाही और लेट लतीफी के चलते पिछले साल बिहार में बेसहारों को मुफ्त दिया जाने वाला कंबल, जरूरतमंदों तक पहुँचते या पहुँचाते मौसम बदल चुका था। उत्तर भारत के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में बीते नवम्बर माह से ठंड का प्रकोप बदस्तूर जारी है। कड़ाके की ठंड से सैकड़ों बेघर व गरीब बेमौत मर चुके हैं। शहरी इलाकों खासतौर से महानगरीय क्षेत्रों में हुई मौतों की कुछ चर्चा सुनने-पढऩे को मिल जाती है, किंतु दूरस्थ अंचल में ठंड की वजह से कितने मरे, इसका कोई सही हिसाब-किताब नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार, सन 2001 से 2014 के बीच 14 सालों में तकरीबन 10,933 यानी औसतन प्रति वर्ष 781 बेघरों की मौत ठंड की वजह से हुई है। एक गणना के मुताबिक शीत की वजह से सन 2016 में डेढ़ हजार से अधिक लोग मरे हैं। शीत से मृत्यु के उपरोक्त आँकड़े, तथाकथित आर्थिक तरक्की का मुँह चिढ़ाने वाले हैं। आम लोगों का मानना है कि ऐसी अमीरी किस काम की है, जिसमें गरीबों के हित उपेक्षित हों। कहने को असहाय लोगों की शीत से सुरक्षा का खासा इंतजाम है। कागजों में सर्दी से बचाने के लिए केंद्र, राज्य, स्थानीय निकाय बचाव के लिए बहुत कुछ करते हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि उत्तर भारत के पहाड़ी और मैदानी राज्यों में जबरदस्त सर्दी के बावजूद बचाव प्रबंध बहुत ढीला है। अधिकांश प्रभावित क्षेत्रों में बचाव का इंतजाम ना के बराबर है। परिणामस्वरूप बेघर और गरीब भगवान भरोसे ही रहते हैं।
गौरतलब है कि सरकारी काम काज की सुस्ती और ठंड से हो रही मौतों के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि ‘बेघरों के लिए रैन बसेरों का समुचित इंतजाम किया जाये ताकि ‘एक भी आदमी की ठंड से मौत न हो।’ सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कितनी गंभीरता से लिया गया यह लगभग हर प्रदेश में ठंड से हुई मौतों की खबरें बताती हैं। देश की सबसे ऊँची अदालत के नाक तले अकेले दिल्ली में, खुले में गुजर कर रहे 40 से ज्यादा बेघर ठंड से मरे हैं। कारकून असंवेदनशील नियम कायदे से बंधे हुए हैं और नीति तय करने वालों को इसकी जरा भी परवाह नहीं है कि उनके द्वारा बनाये गए नियम के चलते किसी निर्दोष लाचार की जान भी जा सकती है। खबरिया चैनलों के अनुसार दिल्ली रैन बसेरों में आधार कार्ड न होने के कारण सैकड़ों लोगों को चाहने के बाद भी आसरा नहीं मिला। ऐसे लोग भीषण सर्दी सहते हुए खुले आसमान के नीचे रहने पर मजबूर हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने 10 जनवरी को दिल्ली में कड़ाके की ठंड में आधार कार्ड न होने पर रैन बसेरों में बेघरों को रुकने की जगह नहीं देने पर न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता व मदन लोकुर की पीठ ने कहा कि जिनके पास आवास नही हैं, उनका आधार कार्ड नहीं बनेगा, क्योंकि उनके पास आवश्यक प्रमाण पत्र नहीं हैं। पीठ ने सरकार को नोटिस जारी करके पूछा है कि जिनके पास आधार कार्ड नहीं है उनका वजूद है कि नहीं? गौरतलब है कि रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले बेरोजगार ज्यादातर महानगरों की ओर रुख करते हैं। एक अध्ययन के अनुसार अकेले दिल्ली में करीब दो लाख लोग खुले आसमान के नीचे सोते हैं। इसके अलावा कमोबेश पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों की राजधानी सहित अन्य बड़े शहरों का हाल भी दिल्ली से मिलता जुलता है। केंद्रीय राजधानी की स्थिति को देखते हुए अन्य स्थानों में बेघरों पर क्या गुजरती होगी, इसकी कल्पना सहज है।
ठंड से बचाव की अधिकांश गतिविधियाँ नगर केंद्रित हैं। गाँव की ओर ध्यान कम है, लेकिन गरीब की दुर्दशा हर जगह है चाहे वह गाँव हो या शहर। ग्रामीण अंचलों में भी, सर्दी की वजह से कम मौत नहीं होतीं। बेघर लोगों की मौत शहर में हो या गाँव में, लेकिन बस एक ही है। बेसहारों का दर्द समूचे हिंदुस्तान में छिटका हुआ है।
छत्तीसगढ़ की मरवाही तहसील के टिकथी गाँव में ईंट भट्टा में काम करने वाले दो आदिवासी मजदूर झोपड़ी में जल कर मर गये। पुलिस के अनुसार मध्यप्रदेश की बुढ़ार तहसील के अरछुआ के रहने वाले 45 साल के संजू बैगा और 20 साल के विकास बैगा एक ईट भट्टे में काम करते थे। दोनों घास फूस की झोपड़ी बना कर रह रहे थे। 10 जनवरी की रात दोनों ने रोजमर्रा की तरह चूल्हा जलाकर खाना बनाया और खाना खाने के बाद सो गये। ठंड से बचने के लिए उन्होने चूल्हे को नहीं बुझाया, जिससे झोपड़े में आग लग गयी और झोपड़ी को जलता देखकर गाँव वाले भी वहाँ पहुँचे, लेकिन तब तक दोनों जिंदा जल कर मर चुके थे। बताया जाता है कि दोनों मजदूरों ने पैरा (पुआल) को ही बिछौना और ओढऩे का कंबल बना रखा था। लोगों का कहना है कि दोनों शराब के आदी थे और काम खत्म होने के बाद अक्सर शराब पीते थे। कयास है कि घटना की रात भी वे नशे में थे। इसलिए उन्हें आग और तपिश का पता ही नहीं चला। बैगा आदिवासी संरक्षण प्राप्त जनजातियों में से एक है, जिनके बचाव के लिए सरकार की ओर से विशेष इंतजाम किए गये हैं, किंतु इसके बावजूद गरीबी उन्हें मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ खींच लायी, जहाँ कडक़ती ठंड से बचने के लिए वे अपने हाथों से बनायी घास-फूस की झोपड़ी में पुआल को ओढऩा-बिछौना बनाकर रह रहे थे।
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के इब्राहिमपुरा गाँव के मछरीहवा रोशनपुरा में एक छप्पर तले अपने दो छोटे बच्चों, डेढ़ साल के रोहित और सात साल के श्रवण के साथ गुजर कर रही सोमारा देवी की ठंड से मौत हो गई। डेढ़ साल के रोहित की हालत गंभीर है। गाँव वालों के अनुसार स्व. सोमारा के सिर पर घास फूस की छप्पर तो थी, लेकिन वह तीन तरफ से खुली हुई थी, गौरतलब है कि सोमारा देवी की मौत के दो दिन पहले कलेक्टर ने ताकीद की थी कि जनपद में कोई बेघर खुले में न सोये। इसके लिए माकूल इंतजाम किए जायें, लेकिन किसी ने भी खोज खबर लेने की कोशिश नहीं की। घटना से द्रवित संवेदनशील पुलिस उप महानिरीक्षक विजय भूषण ने अनाथ बच्चों के लिए दस हजार रुपए और दो कंबल की मदद के साथ आगे और सहायता की पेशकश की।
पंजाब के बटाला के दो झंडे बस स्टैंड में 7 दिसंबर, 2017 को एक प्रवासी मजदूर की लाश मिली। बताया जाता है कि कडक़ड़ाती सर्दी का सामना करने के लिए उसके पास ओढऩे-पहनने के जरूरी कपड़े नहीं थे। जालंधर के ढन्न मोहल्ले में एक अज्ञात बुजुर्ग की लाश मिली, जिसकी पहचान नहीं हो सकी। लुधियाना के एक निर्माणाधीन भवन में अंगीठी जलाकर सो रहे दो मजदूरों की मौत दम घुटने से हो गयी।
झारखंड की सहसराम ग्राम पंचायत के गाँव बथनाहा के महेंद्र चौधरी 9 जनवरी को ट्राई साइकिल से बिरौल प्रखंड मुख्यालय में लगे शिविर में पेंशन के लिए आवेदन पत्र देने के लिए गए थे, लेकिन आधार कार्ड की छायाप्रति न होने की वजह से उन्हें लौटा दिया गया। रास्ते में ठंड लग गयी और वे बीमार हो गए। संभव इलाज तो हुआ, लेकिन शीत भारी पड़ी।
आंकड़ों के अनुसार बिहार में ठंड की वजह से औसतन हर वर्ष 118 मौतें होती हैं। अक्सर वहाँ जरूरतमंदों के पास मदद तब पहुँचती है, जब उसे किसी प्रकार की सहायता की जरूरत नहीं रहती। कमोबेश उत्तर प्रदेश की दशा भी बिहार से मिलती-जुलती है। हरियाणा की खट्टर सरकार ने हर बेघर को घर देने का ऐलान किया है, लेकिन वहाँ भी बेघरों को रैन बसेरा तक नहीं नसीब है। आये दिन खुले आसमान के नीचे सोने वालों की मौत की खबर सुनने को मिलती है। बतौर मिसाल हरियाणा स्थित घरौड़ा के रेलवे स्टेशन के पास सडक़ किनारे सोने वाले दो बुजुर्गों की मौत ठंड लगने से हो गयी। बताया जाता है कि एक संवेदनशील नागरिक ने इन बेसहारा वृद्धों को कंबल दिये थे ताकि ठंड से बच सकें और नगर पालिका से रैन बसेरा में उन्हे आसरा देने का अनुरोध भी किया था, लेकिन कारकुनों के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। जनवरी के पहले हफ्ते में टोहाना गाँव में एक साधु की लाश मिली, जिसकी मौत ठंड से हो चुकी थी। वह कौन था इसका पता नहीं चल सका। नवम्बर, 2017 से प्रदेश में शुरू हुए ठंड के तांडव ने जनवरी, 2018 तक कई लोगों को लील लिया।
मौसमी मार से बेघरों को बचाने के लिए सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है। कहने को केंद्र और राज्य सरकार ऐसी सुनहरी योजनाएँ संचालित कर रही हैं, जिससे किसी भी बेघर की असमय मौत न हो, लेकिन ठंड से बेघरों और गरीबों की मौत का बढ़ता आंकड़ा कुछ और ही कह रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद भी लचर बचाव प्रबंध की जिंदा तस्वीर दिल्ली है। बचाव योजनाएं कागजी सिद्ध हो रही हैं। सर्दी से मौत कम हो, यह बचाव के समुचित प्रबंधन पर निर्भर है।
पिछले साल संयुक्त राज्य अमेरिका में सदी की सबसे कड़ाके की ठंड पड़ी। जानकारों के अनुसार 133 साल के बाद इतनी कड़ी सर्दी पड़ी है। यूएसए के 90 फीसदी हिस्से में पारा जीरो डिग्री के नीचे चला गया, बर्फीले तूफान से बचाव के लिए कुछ राज्यों ने इमरजेंसी घोषित कर रखी है। इसके बाद भी वहाँ मौत की दर कम है। शीत प्रभावित, फ्लोरिडा, नार्थ कैरोलिना, वर्जीनिया, विस्कोन्सिन में पाँच, टेक्सास में चार, डकोटा और मिसौरी में दो लोगों की ठंड से मरने की खबर है। सरकार की ओर से बेघरों के लिए अस्थायी रैन बसेरे बनाये गये हैं, साथ ही सर्दी से बचाव के तगड़े प्रबंध किये गये हैं। इससे वहाँ प्राकृतिक आपदा से मरने वालों की संख्या तुलनात्मक रूप से काफी कम है। हमारा देश, भले ही अमेरिका जैसा धनी और साधन सम्पन्न न हो लेकिन अब इतना भी गरीब नहीं है कि ठिठुरते हुए बेघरों के लिए, अलाव तक न जला सके और जरूरत मुताबिक अस्थायी रैन बसेरा तक भी न बना सके। राजधानी दिल्ली में बचाव-प्रबंध को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक दूसरे के खिलाफ बढ़-चढ़ कर दोषारोपण तो हुआ किंतु इस मसले पर ऐसा कोई जमीनी काम नहीं हुआ है, जो अन्य राज्यों के लिए सनद बन सके। सरकारी कोताही के पीछे मुख्यतया असंगठित असहाय बेघरों की आवाज का कमजोर होना है। दूसरे उनके हित में कदम उठाने का जिम्मा जिनके सिर है उसका एक बड़ा तबका ऐसा है जिसने कभी गरीबी नहीं देखी। यह वर्ग विपन्न के दुख से अन्जान है। इसलिए हर साल रस्मी पहल होती है, लेकिन नीति निर्माता और कारकुन यह भूल जाते हैं कि दुनिया देख और समझ रही हैं कि आर्थिक महाशक्ति का दम भरने वालों के यहाँ लाचार आदमी साल दर साल ठंड से बेमौत मर रहा हैं।
व्यवस्था को सुंदर को सुंदरतम बनाने की चिंता है, सौंदर्यीकरण के नाम पर शहरों की खूबसूरती बढ़ रही है और आर्थिक प्रगति के नाम पर अमीरों की अमीरी बढ़ रही है, किंतु किसी गरीब की बिगड़ी बनाने में नीतिकारों की रुचि कम है। जिम्मेदार लोगों की इस बाबत सारी चिंता दिखावे की है। कई ऐसे भी हैं, जो गरीब की मौत से भी पैसा बनाने के उपाय खोजते रहते हैं। सामग्री क्रय, वितरण, परिवहन, चिकित्सा, निरीक्षण और अन्य बचाव प्रबंधन की बैठकों पर खर्च हुई राशि को लेकर गाहे-बगाहे सवाल उठते रहते हैं। सूत्रों के अनुसार बेघरों को आश्रय देने के उद्देश्य से, बने रैन बसेरे तक में कई जगह ठहरने देने के एवज अतिरिक्त पैसे वसूलना आम है। मामूली चूक पर लाल-पीले होने वाले उच्च पदस्थ, बचाव कार्य में लापरवाही के कारण हुई असमय मौत के लिए शाब्दिक चेतावनी देकर उसे छपवाकर वाहवाही लूटते हैं या फिर बनावटी जवाबतलबी करके अपना पिंड छुड़ा लेते हैं।
मानवीय मूल्यों के क्षरण से निर्मित स्थिति का नमूना साल दर साल, ठंड से होती मौतें हैं। आज की व्यवस्था में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अंतिम छोर का आदमी कहाँ खड़ा है, इसे जाड़ा, गर्मी, बाढ़ और अति वृष्टि का संताप झेलते बेघरों को देखकर आसानी से जाना जा सकता है। सरकारें बनीं और बिगड़ीं, लेकिन कामकाजी तौर तरीकों में कोई रद्दोबदल नहीं आया। बदलती ऋतु के साथ केवल मौसम के नाम की सुर्खी बदलती है परंतु कहानी वही रहती है। अभिशप्त गरीबी के चलते मौसमी मार से दर्दनाक मौत, बेघरों की नियति है।
अगले माह सर्दी की जगह गर्मी ले लेगी और जनता ठंड का संताप भूलकर गर्मी से बचाव की बात करने लगेगी। न वह बतायेगी और न कोई, पलटकर पूछेगा कि ठंड से पहले भी बहुत मौतें हुई हैं तो बचाव का भरपूर इंतजाम पहले से क्यों नहीं किया गया और किसकी चूक से, बड़ी संख्या में खुले आसमान के नीचे सोने वालों गरम कपड़े न होने के कारण टूटी फूटी झोपड़ी में रहने वालों की असमय जान गई हैं? सरकारी ढुलमुल नीति व अप्रभावी प्रबंध को देख, स्व. रघुवीर सहाय की पंक्तियाँ बरबस याद आती हैं : ‘फिर जाड़ा आया फिर गर्मी आयी/फिर आदमियों के पाले और लू से मरने की खबर आयी/वे खड़े रहते हैं तब नहीं दिखते/मर जाते हैं तब जाड़े और लू की मौत/बताते हैं।

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