सफलता का महामंत्र : एकदम नई सोच

‘इंडस्ट्री 4.0’ यानी ‘उद्योग क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल होने वाली उच्चतम टेक्नोलॉजी’ हमारे यहां भी मजबूती से अपनी जगह बना रहा है। आगे देखें तो हमारा ऑफिस हो, हमारी कार्यशैली हो या हमारा कॅरियर का माहौल हो, हर जगह हमें अब तक की स्थिति से एक अलग स्थिति से रूबरू होना पड़ेगा। मात्र बड़े नाम वाले डिग्री या तकनीकी ज्ञान हमारे लिए अच्छी नौकरी या उत्कृष्ट उपलब्धि की गारंटी नहीं दे सकते हैं। पुरानी तरीके के जरिए नयी समस्या से हम हमेशा सफलतापूर्वक नहीं निबट सकते, यह सच है। साथ ही यह भी सच है कि आज के नियोक्ता हमसे किन योग्यताओं-दक्षताओं की अपेक्षा कर रहे हैं, यह भी साफ नहीं है। पेशेवर लोगों के सामने यह एक बड़ी चुनौती है।
इन्हीं सब बातों के परिप्रेक्ष्य में कुल आठ कड़ी के इस विमर्श, जिसका विचार विभिन्न कक्षाओं में छात्रों से बात करने और उन्हें मार्गदर्शन देने के क्रम में आया, के मार्फत हम चंद आइडिये आपके सामने रख रहे हैं। और हम यह आशा करते हैं कि युवा पेशेवर इन आइडिया के साथ खुद को जोड़ पाएंगे, जिससे वे अपने जीवन में सफलता एवं उपलब्धि को अपेक्षित गति से साध सकें।
किसी भी पेशेवर में एक दक्षता तो यह होनी ही चाहिए कि वह समस्या का समाधान तलाश सके, खासकर वैसी समस्याओं का, जो आने वाले समय में ज्यादा जटिल, कठिन और अनेपक्षित रूप में सामने आती रहेंगी। इसके लिए कई कामों को करने की निपुणता के अलावे कई कार्य क्षेत्रों से जुड़ी समस्याओं के विस्तृत अनुभव का होना लाजिमी है। हाँ, ऐसे पेशेवर का आकलन इस बात से भी होगा कि किसी समस्या विशेष के बारे में उनकी राय क्या है, वह उसके विषय में क्या और कैसे सोचते हैं। मसलन, एक पुल के निर्माण में लगे एक सिविल इंजीनियर से मात्र यह अपेक्षा नहीं होगी कि इस कार्य में आने वाली समस्या का इंजीनियरिंग समाधान जानें-सुझाएं, बल्कि पुल निर्माण के कारण पर्यावरण, यातायात की स्थिति, स्थानीय समुदाय की प्रतिक्रिया और अपेक्षाएं, नियमन संबंधी जरूरतें और परियोजना लागत जैसे मुद्दों के प्रति वह जागरूक हो और इनके संभावित असर की पूरी जानकारी रखे।
यही कारण है कि कार्य को संपादित करने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी हो जाता है कि वह समस्या से जुड़े सारे सन्दर्भों को जाने, समझे और तदनुसार परियोजना विशेष को सफल बनाने के लिए समुचित कदम उठाए।
एक अहम बात और। दरअसल, समस्या के संबंध में सही सवाल पूछना सही दिशा में बढऩे का पहला संकेत होता है। समस्या को ठीक से जाने बगैर सही समाधान की ओर बढऩा संभव नहीं होता। अत: पहले थोड़ा रुककर इन बातों पर गौर करना चाहिए कि नियोक्ता या बॉस हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं, वे सफलता को किस प्रकार आंकते हैं? गहन सोच-विचार कार्य को सही अंजाम तक पहुंचाने की अनिवार्य शर्त है। इससे कार्य विशेष के छोटे-बड़े बिन्दुओं पर फोकस करने, उनके बीच के रिश्ते को जानने, एक दूसरे पर निर्भरता को समझने में मदद मिलती है। इस प्रक्रिया में कई सवाल जेहन में स्वत: उठते हैं, जिससे कई पूर्वाग्रहों और मान्यताओं आदि को भी जांचने-परखने का अवसर मिल जाता है। कहने का तात्पर्य यह कि किसी भी समस्या को सभी तरीकों और आयामों से जांचने-परखने से बेहतर समाधान प्राप्ति की संभावना बढ़ जाती है।
दिलचस्प बात यह है कि नियोक्ता अच्छी तरह जानते हैं, बेशक वे आपको न बताएं, कि किसी भी समस्या का सामान्यत: बिल्कुल सही एवं सर्वमान्य जवाब नहीं होता, एकमात्र सही एवं सर्वमान्य जवाब का तो प्रश्न ही नहीं। इतना ही नहीं, दस में से आठ बार ऐसा हो सकता है कि आपके द्वारा अपनाए गए समाधान के रास्ते काम ही न करें यानी आपके समाधान काम न आएं, लेकिन यह तो फिर भी सही है कि आप इसके बावजूद संभावित एकदम सही एवं सर्वमान्य समाधान के कुछ नजदीक तो पहुंच ही जाएं।
सभी जानते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर देनेवाले को पुरष्कृत किया जाता है, तथापि हम इस तरह सोचने के आदी नहीं हैं। हम मानते हैं कि समाधान या उत्तर तक पहुंचने का सर्वोत्तम तरीका पुनरावृत्ति प्रक्रिया का उपयोग है। इस सोच प्रक्रिया में आगे बढऩे के लिए आपको ऑन लाइन एकाधिक समस्या समाधान प्रविधियां और गहन विचार के लिए तैयार ढांचे (फ्रेमवर्क) मिल जाएंगे।
हम इस तरह के नए सोच से अवगत होने और सच कहें तो डिजाइन थिंकिंग के पक्षधर हैं। अच्छा, अब यह मत सोचने लगिए कि यह सब सिर्फ डिजाइनरों और अन्वेषकों (इनोवेटर्स) का ही क्षेत्र है। सच तो यह है कि यह हर उस शख्स के लिए है, जो समस्या समाधान की समेकित प्रक्रिया को अपना कर सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचना चाहता है।
पर्याप्त जागरूकता, मानवीय संवेदना, समुचित ज्ञान और दिमागी कौशल का यथोचित उपयोग करके हम यह जान सकते हैं कि किसी समस्या को कितने अच्छे तरीके से जान और समझ रहे और उसका सही विश्लेषण कर पा रहे हैं। इससे हमें फायदा यह होता है कि हम परियोजना से जुड़े अहम लोगों के दृष्टिकोण को भी ठीक से समझ पाते हैं और समय-समय पर उनके फीडबैक से कार्यान्वयन के स्तर पर सुधार करते चलते हैं।
यहां यह याद रखना भी जरूरी है कि समस्या समाधान के क्रम में यही काफी नहीं होता कि हमने उसे प्राप्त कर लिया। समस्या की बारीकियों को, समाधान की सार्थकता को, उससे जुड़े और प्रभावित होनेवाले लोगों को मिलने वाले फायदे के विषय में सभी को ठीक से बताने के लिए संवाद और संप्रेषण की कला में पारंगत होना भी जरूरी है। हम भली भांति जानते हैं कि समस्या से मुतल्लिक लोगों की शंकाओं-आशंकाओं को धैर्यपूर्वक सुनना, उनके विचारों पर सोच-विचार करना, उनसे खुले मन से उस विषय पर बातचीत करना समाधान को सुगमतापूर्वक लागू करने-करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
ऊपर बताये गए तरीके से किसी भी समस्या को जानने, समझने और समाधान पाने की इस महती सोच को हमें अपनी आदत में शामिल करने के लिए तब तक प्रयास करते रहना पड़ेगा, जब तक यह हमारी सामान्य दिनचर्या का हिस्सा न बन जाए, जब तक कि समस्या के सामने आते ही स्वत: हम इस प्रक्रिया को अपनाने न लगें।
तो क्यों न अभी से इसे शुरू करें और इस वक्त अपने काम से जुड़ी जो भी समस्या सामने हो, उसे इस नए सोच और दृष्टिकोण के रास्ते समाधान की मंजिल तक ले जाएं। देखें तो क्या होता है और कैसा लगता है?

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