शब्दों के बादशाह अशोक राज करते थे रिश्तों के बल पर

बात है सन् 2011 की। अस्पताल में फिजियोथेरपी सेशन में थी कि फोन बार-बार बजने लगा। उन दिनों एक पत्रिका में मेरी कहानी छपी थी, जिसे पढक़र पाठकों के फोन आ रहे थे, पर उस दिन वह फोन किसी आम पाठक का नहीं, एक विशिष्ट व्यक्ति का था। उस दिन उनसे जो रिश्ता बना, वह न सिर्फ साहित्यिक संस्था ‘ककहरा’ से मेरे जुड़ाव का कारण बना, बल्कि समय के साथ वह सघन आत्मीय रिश्ते में बदल गया। खासियत मेरी नहीं, उनकी थी। फोन जिन्होंने किया, वे रिश्तों को आत्मीयता में बदलना जानते थे। इसीलिए उनकी दुनिया लगातार पसरती रहती थी। जाने-अनजाने लोगों को आमंत्रण देना, उनके लेखन को गंभीरता से परखना और उस पर चर्चा करना। फिर बड़े ही अनौपचारिक ढंग से उनकी निजी जिंदगी में शामिल हो जाना अशोक जी के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था। ‘ककहरा’ की आरंभिक गोष्ठियों में मैं लगातार उपस्थित रही, क्योंकि उन दिनों दिल्ली से बाहर ट्रांसफर होने के बाद भी पारिवारिक मजबूरियां मुझे दिल्ली में ही रोके हुए थीं। तब तक दिल्ली आकर बसे काफी साल गुजर चुके थे, तब भी दिल्ली की साहित्यिक दुनिया से नाता बन नहीं पाया था। साहित्यिक दुनिया से इतर भी नए रिश्ते कम ही जुड़े थे। ‘ककहरा’ की गोष्ठियों ने नए आत्मीय रिश्ते जोड़े। गोष्ठी ने कई बार भले ही उत्तेजक साहित्यिक बहसों से समृद्ध नहीं किया, आत्मीय मेल-मिलाप का सुख तो दिया ही। इस आत्मीयता के प्रमाण मुझे अपने पहले संग्रह के विमोचन और पिताजी की स्मृति सभा में ‘ककहरा’ के सदस्यों की उपस्थिति से मिले। बाद के सालों में ‘ककहरा’ में मेरी उपस्थिति साल में दो-एक गोष्ठियों तक सीमित हो गई। तब भी उन्होंने ‘ककहरा’ से मुझे मुक्त नहीं किया।
वे मुझे कभी नीला जी, कभी बेटा नीला कहते। वरिष्ठ होने के अधिकार भाव से बात करते। दरअसल ‘ककहरा’ के सभी सदस्यों को-मुझ जैसी अपनी तथाकथित बेटियों समेत-वे खास होने का अहसास कराए रखते थे। मैंने कई बार उन्हें याद दिलाया था कि मैं उम्र में उनकी बेटियों से काफी बड़ी हूं, पर इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। ‘ककहरा’ में बारी-बारी सदस्यों का कहानी पाठ होता। बेटी जैसी होने की अपनी हैसियत भुलाकर दूसरों समेत मैं भी अशोक जी की कहानी की गहन आलोचना करती, पर वे अपने लिखे की बड़ाई नहीं करने वालों से कोई वैमनस्य नहीं बरतते धे। यह उदारता दिल्ली के साहित्यिक समाज में विरल है।
वे आदेश भाव से मुझसे अपनी किताब पर समीक्षा लिखवा लेते। कभी मेरी किसी कहानी पर कुछ लिखने का मन बनाते होने की सूचना देते। वैसे मेरी किसी रचना पर उनकी लिखित टिप्पणी कभी प्रकाशित हुई नहीं और मैंने इस बात का कतई बुरा नहीं माना। वे मुझसे स्नेह रखते थे, इतना काफी था। संयोग से उनकी एक बेटी मेरी पड़ोसन हो गई थी और जब कभी वे बेटी के यहां आकर कुछ दिन रहते, मुझे बुला लेते या मेरे घर आ जाते। फुर्सत से खूब सारी बातें होतीं। वे जिंदगी के अपने अनुभव और साहित्यिक हस्तियों के संस्मरण सुनाते और मैं मन लगाकर सुनती। न तो अक्सर फोन, न ही महीनों-महीनों तक मुलाकात। फिर भी, सन् 2011 से 2018 आते-आते उनसे अनौपचारिकता का अहसास पनप चुका था। मेरा अगला संग्रह किस प्रकाशक से निकले से लेकर मेरी बेटी के कॅरियर तक सब उनकी चिंता का विषय होते।
वे ‘ककहरा’ के प्रति अति गंभीर थे और उसके प्रसार की योजनाएं लगातार बनाते रहते थे। गोष्ठियों में खुलकर ठहाका लगाने वाले अशोक जी से सीखने को बहुत कुछ था। रिटारयमेंट के बाद गंभीरता से लिखने की उनकी जिद और जिंदगी जीने के उत्साह की छूत किसी को भी लग सकती थी।
अशोक जी की लिखी कहानियों से ज्यादा मुझे उनके लिखे लेख पसंद थे। जब कुछ साल पहले अशोक जी के आदेश पर मैंने उनके संग्रह की समीक्षा लिखी तो उसमें मेरी यह सोच प्रकट हो गई, पर अशोक जी मेरा लिखा पढक़र कतई नाराज नहीं हुए। समीक्षा प्रकाशित होने की सूचना उन्होंने ही फोन करके मुझे दी और लिखने के लिए धन्यवाद भी दिया। मुझे लगा कि अब दुबारा कभी अपनी किताब पर लिखने को वे नहीं कहेंगे, पर उनका कहानी संग्रह ‘सुरंग के उस पार’ आया तो फिर से उनका फोन आया कि समीक्षार्थ प्रति भिजवा रहे हैं। मैं लिखने को राजी तो हो गई, पर ऑफिस और निजी कारणों से हो रही लगातार यात्राओं के कारण लिखना टलता गया। बार-बार यह पूछने को उनका फोन आता कि समीक्षा लिखी या नहीं, बार-बार मैं शर्मिंदा होती सफाई देती रहती। उनकी तबियत का हाल पूछती और नोट करती कि कैंसर के मरीज होते हुए भी पहले भले बड़ी ठसक से कहते रहे थे कि ‘ठीक हूं, जल्दी ही अच्छा हो जाऊंगा’, अब ‘हाल ठीक नहीं है’ वाला बयान आने लगा है। मैं चिंतित और उदास होती। किसी तरह किताब पर टिप्पणी पूरी की और उनके द्वारा सुझाई पत्रिका को मेल कर दिया। समीक्षा पूरी तरह प्रशंसात्मक नहीं थी। कुछ दिनों बाद मुझे धन्यवाद देते अशोक जी का फोन आया। वे चाहते थे कि समीक्षा मैं उन्हें भी मेल कर दूं। मैंने मेल भेज दिया।
तब मुझे पता नहीं था कि डॉक्टर ने उनके जीवन के अंत का इशारा कर दिया है। मुझे यह भी पता नहीं चला कि समीक्षा उन्होंने पढ़ी या नहीं, क्योंकि उस पर उनकी कोई राय मुझे नहीं मिली। अशोक जी से मिलने की इच्छा जोर मारती रही। वे अपनी बेटी के यहां नोएडा आए और मैं उनसे मिली, उस मुलाकात को जाने कितने महीने बीत चुके थे। मैंने और अंजली ने मिलने का प्लान बनाया। अशोक जी ने मना कर दिया। जिस दिन जाने की बात थी, उस दिन उन्होंने मुझे भी फोन किया। उनकी आवाज़ कांप रही थी। ‘नीला जी, मत आइए।’ उन्होंने असहाय स्वर में कहा। लगा वे रो रहे हैं, ‘मुझे बोलने में बहुत तकलीफ हो रही है। सोना चाहता हूं। नोएडा शिफ्ट हो रहा हूं, तब आना।’ उन्होंने कहा, ‘हां, मुझे पता है कि आपने आने से मना किया है। मैं नहीं आ रही। आप आराम कीजिए और अपना खयाल रखिए। ठीक है, आऊंगी आपके नोएडा वाले घर’, कहकर मैंने फोन रख दिया।
अहसास हो गया कि नियति ने उनके जीवन का आखिरी अध्याय लिख दिया है। मैं उनके नोएडा वाले घर गई, तब वे आखिरी सफर के लिए सफेद कपड़ों में लिपटे गाड़ी की पिछली सीट पर लेटे थे। आखिरी प्रणाम के साथ मन ही मन उनसे माफी मांगी-क्या पता समीक्षा लिखने में हुई देरी, ककहरा से लगातार अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण उनके दिल को ठेस पहुंचाई हो!
दिल्ली शहर ने मुझे आत्मीय रिश्ते बहुत कम दिए, शायद इसीलिए जितने भी रिश्ते हैं, उन्हें पकड़े रहना चाहती हूं। यह अहसास बहुत तकलीफदेह है कि अब उन गिने-चुने रिश्तों में एक और की कमी हो गई है, पर किसी रिश्ते पर पूर्ण विराम कभी नहीं लगता। प्रत्यक्ष नहीं तो यादों में बने रहेंगे वे। ‘ककहरा’ के कार्यकलापों में भले ही डिक्टेटर रहे, लेकिन भीतर से भले और भावुक इंसान थे वे। शब्दों के बादशाह तो थे ही, रिश्तों के बादशाह उससे भी बड़े थे, जो अपने चाहने वालों के दिलों पर राज करते थे और आगे भी करते रहेंगे।

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