शब्दों की तिलिस्मी सुरंग में धुंए से उभरते अक्स

अशोक गुप्ता वरिष्ठ साहित्यकार हैं। रचनाओं के धनी। कई विधाओं में बहुत कुछ अर्जित किया है उन्होंने। चार कहानी संग्रहों की मंजूषा में सजाकर अठ्ठावन कहानियों का उपहार अपने पाठकों को दे चुका यह कहानीकार अभी चुका नहीं है। उसका कथाशिल्प, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और भाषा पर पकड़, सब दिन-ब-दिन निखरते ही जा रहे है। अशोक के नवीनतम कहानी संग्रह ‘सुरंग के उस पार’ की सुरंग में पाठक एक बार घुसता है तो कभी उसकी अंधेरी छत से टपकते विषाद, संत्रास, उलझन और अकुलाहट के बर्फीले स्पर्श से सिहरने लगता है, कभी एक अपरिचित, अछूते आनंद की ऊर्जा महसूस करने लगता है। उसकी दीवारों पर उकेरे चित्रों में झांकते हुए वह उन चेहरों के अंतर्मन में पैठने का प्रयत्न करता है तो प्राय: एक उलझे हुए मनोवैज्ञानिक मकडज़ाल में स्वयं को ही घिरता महसूस करने लगता है। इतने विराट फलक पर बनी हुई इन तस्वीरों से कभी कविता की कोमलता झांकती है तो कभी उनके पात्रों का सिनिसिज्म (चाहे इसका अर्थ कुटिलता समझा जाए, चाहे निराशावादी सनक)। रचनाओं का यह संसार वैविध्यपूर्ण तो है, लेकिन पहली ही नजर में आक्रान्त करने वाला और बदरंग-सा लग कर पाठक को सहमा देता है। इस निराशाजनक विस्तार से सहमा हुआ पाठक जब स्वयं हताशा और संत्रास में गोते लगाने लगता है तो सुरंग के उस पार से इस अंधेरे को चीरती हुई ताम्रवर्णीय कोंपल जैसी नाजुक आशा की एक क्षीण किरण घुस आती है और सुरंग में व्याप्त अंधेरे से लडऩे का साहस दिखाकर पाठक को एक ऐसा संदेश दे जाती है, जिसकी उस अंधेरे से जूझते समय वह कल्पना भी नहीं कर सकता।
सात दशक का जीवन जी चुके अशोक आयुध कारखाने में इंजीनियर का किरदार अदा करते-करते कैसे एक सशक्त कथाकार बन बैठे, जिसेे तो वे आत्मकथा लिखकर ही उजागर कर सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि जीवन के गलियारों से गुजरते हुए उसके हाशिये पर खड़े लोगों से लेकर सामथ्र्य की ऊर्जा में चूर हर आते-जाते को टक्कर मारते पात्रों तक किसी के भी भीतर झांकने में उन्होंने कभी कोताही नहीं की होगी। ये रंग-बिरंगे अनुभव उनकी जीवन दृष्टि को जो परिपक्वता देते हैं, वह एक सामान्य पाठक के लिए कभी-कभी रूढ़ भी हो जाती है, जिसे समझने के लिए अशोक को ही उद्धृत करूं (इस संग्रह से नहीं, उनकी फेसबुक वाल से) तो बेहतर होगा। मोहन राकेश के शब्दों को वे याद करते हैं- ‘लेखक अपने विकास के साथ अपना पाठक वर्ग बदलता रहता है। कोई लेखक समूचे पाठक वर्ग की समझ के अनुकूल लिखे, यह संभव नहीं’ और फिर अपनी बात जोड़ते हैं कि ‘अगर कोई लेखक व्यापक पाठक वर्ग की संतुष्टि के लिए अपने लेखन में सरलीकरण अपनाता है तो वह अपने विशिष्ट पाठक वर्ग तथा खुद अपने साथ अन्याय करता है।’
जब लेखक स्वयं साफ कर दे कि ‘यह घर तो है साहित्य का, खाला का घर नाहिं, सीस कटावै भुईं धरे तब पैठे घर मांहि’ तो फिर उसके आगे गिड़गिड़ाने का विकल्प ही नहीं बचता। यही है अशोक की खासियत। उनकी कहानियों को प्राय: प्रबुद्ध पाठक की तलाश रहती है, लेकिन व्यापक पाठक वर्ग से वे पूरी तरह उदासीन नहीं, इसलिए पहले उन कहानियों की चर्चा कर लें, जो हर वर्ग के पाठक को बांधकर रखने में सक्षम है। ‘कोई रास्ता नहीं’ जैसी कहानी में सन् 1984 के सिख दंगों और फिर सन् 1993 के मुंबई धमाकों का जिक्र पढक़र पाठक को लगता है कि वह पहचाने हुए रास्तों पर एक बार फिर गुजर रहा है। केश और कृपाण त्यागकर जसकरण सिंह से जैकब बन जाने की मजबूरी हो या वामनराव भोंसले से बवंडर बन जाने का कड़वा विकल्प, दोनों ही उनके पात्रों को आम आदमी की पहुंच में रखते हैं। घटनाओं की डगर पर तेजी से चलती यह कहानी अप्रत्याशित मोड़ लेते हुए पाठक को सजग और उत्सुक बनाए रखती है। ‘चीकट लबादा’ में वर्णित गरीबी कम लोगों के लिए अनदेखी होगी, लेकिन इस कहानी में वह दैन्य से हटकर एक अन्य अनुभूति को जन्म देती है, जिसमें करुणा तो है, लेकिन मुस्कान में लिपटी हुई। इसी तरह ‘गर्माहट’ में कहानी का नायक मामूली पढ़ा-लिखा नहीं, बाकायदा अर्थशास्त्र में एमए है, लेकिन अर्थ के नाम पर उसके पुराने मटमैले कुरते की जेब में बचा हुआ आखिरी दस रुपये का नोट है। उधार का कोट पहनकर पढ़े-लिखों के बीच अपनी मेधा का प्रदर्शन करके वह अपना कद कुछ देर के लिए तो ऊंचा कर लेता है, लेकिन भूख से कुलबुलाते पेट और कुरते के झीनेपन से ठंडे पड़ते शरीर के लिए वह गर्म कोट बहुत तात्कालिक सांत्वना है। पैसे का प्रतिदान न दे सकने की उसकी मजबूरी को जानते हुए भी जब एक कुरमुरे चने बेचने वाला एक गर्मागर्म ठोंगा उसके हाथ में पकड़ा देता है तो उसे महसूस होता है कि जैसे वह गर्माहट एक प्रज्ञा की तरह उसके भीतर फैल रही है।
जाने-पहचानों चरित्रों को भी बड़े अभिनव मुखौटे पहना देने में अशोक माहिर हैं। किसी रिक्शेवाले और रिक्शे की सीट पर बैठी सवारी के बीच लम्बे और सुनसान रास्ते को काटने के लिए की गयी बातचीत में कुछ असमान्य नहीं है, लेकिन बातचीत को बतरस में बदल देने के लिए किसी ऐसे असामान्य रिक्शेवाले को तलाश कर वह अपनी कहानी का नायक बनाते हैं, जिसके पास खुद की अपनी कहानियां हैं, जो अलिफ लैला की तरह हर रात एक नयी और दिलकश कहानी सुनाने में माहिर हो। अपनी कहानियों का नायक भी वह स्वयं ही बना रहता है, लेकिन हर बार एक नया किरदार बनकर। गजब की कहानियां गढऩे वाला वह अनोखा नायक टोके जाने पर कहता है- ‘कहानी मेरी न हो, किसी की तो होगी ही।’ पर इसके बाद अशोक की रहस्यमय कहानी उस समय एक सशक्त व्यंग्य में बदल जाती है, जब दो लेखक एक दूसरे की रचनाओं और उन पर लिखी समीक्षाओं को लेकर आपस में भिड़ जाते हैं। पाठक के कानों में गूंजते रह जाने वाले अंतिम शब्द हैं। ‘लिखने-पढऩे वालों की दुनिया में उतनी सच्चाई नहीं होती, जितनी कहानी में होती है।’
अशोक की पुस्तक की समीक्षा लिखते हुए यह वाक्य मेरे कानों में गूंजकर मुझे भी सचेत कर रहा है। मेरे लिए इस कहानी की सार्थकता इसी वाक्य में निहित है।
अशोक की कलम अक्सर चित्रकार का ब्रश बनकर घटनास्थल का विस्तृत वर्णन करती है, जैसे किसी नाटक के मंचन से पहले मंच संयोजन का निर्देश दे रही हो। ‘आज कौन सी तारीख है’ में कमरे का दृश्यांकन हो या ‘मौसम’ में नायक की प्रिय दुछत्ती का विवरण, जिसमें बैठे-बैठे वह चारों तरफ नजरें जमाये रखता है और लिखता-पढ़ता भी रहता है या फिर ‘ऊंची अटरिया पे कागा’ की काठ की सीढिय़ों के सत्रह पायदान, जो अपनी थरथराहट से आगंतुक की बेकली का आभास दे देते हैं, सभी कहानियों में परिवेश का सूक्ष्म चित्रण कहानी को जीवंत कर देता है, लेकिन उनकी कल्पनाशीलता और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से पात्रों का जो व्यापक चित्र उभरता है, वह प्राय: रोजमर्रा के जीवन में दिखने और मिलने वाले उस तरह के पात्रों से भिन्न छवि वाला लगता है। ‘सूर्योदय’ कहानी में नायिका के चेहरे पर टिकी हुई बिंदी में नायक को उसका सारा सौन्दर्य सिमटता दिखता है। उसे याद करता कथानायक कहता है- ‘रेलयात्रा में जिसका सौन्दर्य किसी के लिए शरीर भर था, वह मेरे लिए गहरी अछूती अंतरानुभूति है। तुम्हारे सम्पूर्ण में मेरा बिंदी भर हिस्सा। तुम जब अपने सूर्योदय में हिस्सा दो, उसकी जड़ता तोड़ो, एक सूर्योदय उसके भीतर, एक मेरे भीतर कर दो।’ पढऩे में बेहद खूबसूरत यह पंक्तियां एक साधारण परिवेश मे पले-बढ़े साधारण युवक के मुंह से कहलाई गईं तो उनकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ गई।
एक रेलयात्रा में किसी सहयात्री युवती की बिंदी पर फिदा हो जाने वाला यह नौजवान एक मुलाकात में ही उसके विषय में सब कुछ जान लेने पर आमादा हो जाए, यह तो संभव लगता है, लेकिन किसी छोटे से कस्बे में रहने वाली साधारण-सी नौकरी करती बौने व्यक्तित्व वाले लोगों के संपर्क में आयी उस युवती का दूध की जली होने के बावजूद दो एक मुलाकातों में ही उसके इतने निकट आ जाना चौंकाता है। इतनी जल्दी उसके कन्धों पर सर टिकाये वह ऐसे स्नेहसिक्त संवाद उसके मुंह से सुनती रहे, कुछ अव्यावहारिक लगता है। कुछ ऐसा ही अटपटापन ‘आज कौन-सी तारीख है’ के हरखू उर्फ हक्र्युलिस के कथोपकथन में दीखता है। पहाड़ के ग्रामीण परिवेश की उपज एक पंद्रह वर्षीय बालक एक लेखक के पास रह कर उसके घरेलू काम करता है। जब अमृतराय द्वारा अनूदित ‘आदि विद्रोही’ को सन्दर्भ बनाकर अपने मालिक के एक लेखक मित्र से (जिसे वह अप्रत्याशित अनौपचारिकता से उसके प्रथम नाम से बुलाता है) कहता है-‘शेल्फ से कोई दूसरी किताब उठाइये।’ आप ‘आदि विद्रोही’ पढक़र तो ज्यादा ही घबरा गए हैं, मानो हर ग्लेडिएटर के साथ दूसरे योद्धा आप हों। ‘हक्युर्लिस’ केवल अच्छे साहित्य का मर्मज्ञ ही नहीं, समकालीन राजनीति पर भी मनन करता है और इंदिरा की इमरजेंसी की विनोबा भावे द्वारा ‘अनुशासन पर्व’ कह कर अनुशंसा करने पर तंज भी कस लेता है। आम पाठक के गले हरक्युलिस के छोटे मुंह से निकली बड़ी बातें उतर भी जाएं, कैलेंडर के पन्नों पर तारीखों का उडऩा, अदृश्य हो जाना, कुछ अबूझा छोड़ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।
शायद जमीनी सच्चाइयों को कभी-कभी भूल जाना उस लेखक के लिए क्षम्य है, जो मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की राह पकड़ कर मन की गहराइयों में उतरने में माहिर है। ‘संतूरवादक’ और ‘सुरंग के उस पार’ जैसी कहानियों में अशोक इन्हीं धुंध भरे गलियारों में अपने साथ पाठक को भी उतार लेते हैं। संग्रह के शीर्ष को सजाने वाली कहानी’ सुरंग के उस पार’ का आकर्षण है उसका अंत, जहां पाठक घुटन और संत्रास की संकरी सुरंग में चट्टानी दीवारों से टकराता हुआ अचानक मानवीय संवेदना के उजास से जगमगाता खुले में आ जाता है। अपने विवाहित पुरुष से अलग रहते हुए किसी अन्य व्यक्ति के संसर्ग से दूसरे बच्चे को जन्म देने के बाद इस कहानी की नायिका में किसी अपराधबोध का न होना उस आदमी के लम्पट-व्यभिचारी होने के संदर्भ में समझना सरल है, जिसने अग्नि के सामने शपथ लेकर उसके साथ फेरे लिये, लेकिन उसकी भावनाओं की चिता जलाने में उसने कभी कोई संकोच नहीं किया। इतना उत्पीडऩ झेल चुकी कथा नायिका की आंतरिक शक्ति का आभास अपने उस कानूनी पति के बारे में उसके इस कथन से मिलता है-‘मैं उससे नफरत क्यों करूं, वह जो था, जग जाहिर था। उसने मुझे धोखा नहीं दिया, जैसा था, वैसा ही बना रहा।’
अपनी भीतरी शक्ति से अशोक की ज्यादातर नायिकाएं प्रदीप्त हैं। सशक्त हैं। जुझारू हैं। ‘इति क्रितम’ में एचआईवी से संक्रमित डॉक्टर शैलजा परिस्थितियों की शिकार होकर जब एड्स के असाध्य रोग से संक्रमित हो जाती है तो उसे अपने जीवन को बदरंग नहीं करने देती। अपने नामपट्ट पर नाम के आगे एचआईवी संक्रमित लिखवाकर वह अपनी ही नहीं, समाज की सुरक्षा के आगे भी एक लक्ष्मण रेखा खींच देती है। ‘एक कठिन पहेली’ में वकील का काला कोट पहने पति-पत्नी का एक दूसरे के विपरीत खड़ा होना अदालत के बाहर उनके जीवन को संक्रमित नहीं करता। ‘मौसम’ में विभिन्न मनोभावों को व्यक्त करने के लिए विभिन्न मौसम हैं। इनके बदलाव में नायिका को भुलावा देता नायक उसकी पैनी नजर से बच नहीं पाता। अंत में उसे लगता है कि ‘मौसम’ अचानक बदल गया। वह पारदर्शी कांच हो गया, जिसके आर-पार मैं दामिनी को साफ नजर आ गया, एकदम नंगा।’
भाषा पर लेखक की पकड़ पाठक को मुग्ध करती है। कुछ बानगी देखे: ‘पचहत्तर के साल का ताप पैंतालीस पर नहीं रुकेगा, बल्कि काल का डग भरेगा’। ‘उसने चेहरे के रास्ते चित्त का झंझावात पढ़ा, जो एक बदलाव के लिए वहां एक रास्ता बना रहा था।’ ‘मेरी खुशखबरी का छाता बहुत छोटा था और मैं उसे भीगने से बचाना भी चाहता था।’ ‘जब तक औरत अपने सपनों की गठरी अपने भीतर बेआवाज छिपाए रखती है, तब तक ठीक है, लेकिन जहां उसने अपने बिस्तर के तकिये से भी बांटा, वह एक निरंतर शंखनाद बन कर उसके कानों में गूंजने लगते हैं।
सुरंग के उस पार की सारी कहानियां पढ़ जाने के बाद विशिष्ट पाठक वर्ग के साथ जुडऩे की अशोक की सामथ्र्य तो समझ में आ जाती है, लेकिन यह भी साफ हो जाता है कि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और कुछ अद्भुत के सम्मोहन के अतिरिक्त भी उनकी कहानियों में इतना कुछ और है कि पाठक संशय और अबूझेपन की सुरंग के अंधेरे में भी उनका दामन नहीं छोड़ेगा।

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