विश्व पुस्तक मेला

विश्व पुस्तक मेले के पहले दिन राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर यशस्वी कवि केदारनाथ सिंह ने अपनी किताब ‘प्रतिनिधि कविताएंÓ से कविता पाठ करने के बाद पाठकों से बातचीत करते हुए बताया कि कविताओं की दुनिया एक ऐसी दुनिया है जिसमें रंग, रोशनी, रूप, गंध, दृश्य एक दूसरे में खो जाते हैं, पर यही दुनिया है, जिसमें कविता का ‘कमिटमेंटÓ खो जाता है।
पहली बार ऑडियो बुक्स
हिंदी में पहली बार ‘अब सुनिएÓ किताबें लेकर आया है राजकमल प्रकाशन, जिसमें आप किताबों को पढऩे के साथ उन्हें सुन पाने का नायाब अनुभव हासिल कर सकते हैं। पुस्तक मेले में लोकार्पित हुई रमाशंकर कुशवाहा की किताब ‘लोक के प्रभासÓ पर चर्चा हुई। इस लोक संबद्ध व्यक्तित्व की जीवन गाथा के अनेक पड़ाव हैं। इस जीवनी में आपको उन पड़ावों का विस्तृत और प्रामाणिक विवरण मिलता है। प्रभाष जोशी के जीवन के अनजाने प्रसंगों से रूबरू होते हुए उनके सार्वजनिक जीवन के सोच से अवगत हो सकते हैं।
पुस्तक मेले में हिंदी की सुप्रसिद्ध कहानीकार मन्नू भंडारी के कहानी संग्रह ‘बन्दीÓ का लोकार्पण कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने किया। मन्नू भंडारी की पुत्री रचना यादव ने लोकार्पण के बाद किताब के बारे में बताया।
मेले में बॉम्बे की बारबालाओं की जिंदगी को वास्तविक ढंग से सामने लाती विवेक अग्रवाल की किताब ‘बॉम्बे बारÓ का लोकार्पण सत्यनारायण जटिया और अशोक महेश्वरी ने किया। विवेक की यह किताब बारबालाओं के समाज को समझने की एक अलग खिड़की खोलती है, जिस पर लेखक से विनीत कुमार ने बातचीत की। विवेक अग्रवाल ने बताया कि यहां बारबालाओं के जीवन की कुछ ऐसी कठोर और मर्मभेदी सच्चाइयां उजागर हुई हैं, जिन्हें कोई नहीं जानता। ये बारबालाएं क्या करती हैं, कितने दिन इस रुपहले संसार में अंधियारा जीवन जीने के बाद कहां गुम हो जाती हैं और कैसा इनसान उनके भीतर बसता है? इन बारबालाओं को कैसा पति, पिता, दोस्त और परिवार मिलता है? ऐसी हर जानकारी इस किताब में आईने की तरह दिखाई देती है।Ó
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने विश्व पुस्तक मेले में राजकमल प्रकाशन पर ‘आपÓ के प्रवक्ता दिलीप पांडेय और चंचल शर्मा के कहानी संग्रह ‘कॉल सेंटरÓ का लोकार्पण किया। आशुतोष, मैत्रेयी पुष्पा और अशोक महेश्वरी भी मौजूद थे। शशिभूषण द्विवेदी ने कहा कि ये कहानियां कुछ नए ढंग का हस्तक्षेप करती हैं।
जग दर्शन का मेला
पुस्तक मेले में शिवरतन थानवी की किताब ‘जग दर्शन का मेलाÓ का लोकार्पण पुरुषोत्तम अग्रवाल ने किया, जहां अपूर्वानंद, बनवारी और मंगलेश डबराल मौजूद थे। इस किताब में उनकी डायरी के चुनिंदा पन्ने हैं, जिसकी भूमिका केदारनाथ सिंह ने लिखी है। शिवरतन थानवी के पुत्र ओम थानवी ने बताया कि हमें नहीं मालूम था कि वे 1950 से डायरी लिखते आ रहे हैं। घर-परिवार और मित्रों की बात ही नहीं, राहुल सांकृत्यायन, काजी नजरुल इस्लाम, गिजुभाई, गोर्की, अज्ञेय, नामवर सिंह, पाउलो फरेरे, इवान इलिच, कुमार गंधर्व, अजय चक्रवर्ती आदि से जुड़े शिक्षा के साथ साहित्य, संगीत, पर्यावरण, मनोविज्ञान और मानवशास्त्र आदि पर उनके अनुभवों का फलक इतना विशद है कि उसे देखकर लगा कि अब तो इसका एक संचयन प्रकाशित होना चाहिए।
क्षितिज रॉय की किताब ‘गन्दी बातÓ पर उर्मिला गुप्ता ने उनसे बातचीत की। यह किताब अन्ना आन्दोलन के दौरान एक-दूसरे के संपर्क में आने वाले दो युवाओं की कहानी है, जिनके रोमांस में महानगर दिल्ली विलेन की भूमिका में दिखाई देती है तो भाषा और परिवेश के देसीपन के साथ पटना का रोमांस भी दिखता है।
‘आज के आईने में राष्ट्रवादÓ में राष्ट्रवाद के तीखे मुद्दे पर जेएनयू में हुए तेरह व्याख्यानों का संकलन रविकांत ने किया है। वीरेंद्र सारंग की रामायणकाल की अनुभूतियों, सवेंदनाओं और व्यवहार की परतों को खोलकर नवीन कथा-प्रसंगों को सामने लाता उपन्यास ‘आर्यगाथाÓ, सुनील विक्रम सिंह की मार्मिक प्रेम कहानी ‘तेरी कुड़माई हो गईÓ, रविभूषण की दो किताबें ‘रामविलास शर्मा का महत्वÓ और ‘वैकल्पिक भारत की तलाशÓ और रामशरण जोशी की आत्मकथा ‘मैं बोनसाइ अपने समय काÓ का लोकार्पण मैत्रेयी पुष्पा, मैनेजेर पांडे, रामदरश मिश्र और राजकमल प्रकाशन के निदेशक अशोक महेश्वरी ने किया।
राजकमल प्रकाशन स्टॉल पर लेखकों और पाठकों का भारी जमवाड़ा रहा, जहां सुप्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने नई किताबों-सुरेन्द्रनारायण यादव की ‘अलक्षित गौरव रेणुÓ, रामसागर प्रसाद सिंह की ‘अलुआ बुलुआ और मैंÓ का लोकार्पण किया। आशा प्रभात के उपन्यास ‘मैं जनक नंदिनीÓ पर लेखक के साथ प्रेम भारद्वाज और प्रभातरंजन ने बातचीत की तो उपन्यास ‘कौन देश को वासीÓ की लेखिका सूर्यबाला से उषाकिरण खान और चित्रा देसाई ने चर्चा की। नासिरा शर्मा ने छह खंडों की अपनी नई सीरीज ‘एफ्रो-एशियाई कहानियांÓ से कुछ रोचक अंशों का पाठ किया।
रामसागर प्रसाद सिंह ने अपनी किताब ‘अलुआ बुलुआ और मैंÓ के बारे में कहा कि इस ग्लोबलाइज्ड दुनिया में जहां चारों ओर समरूपता का हठ पांव पसार रहा है, ऐसे में ‘अलुआ बुलुआ और मैंÓ भरी दुपहरी में छांव की तरह है। उजैर ई. रहमान की किताब ‘यादों के आईने मेंÓ पर आर. जे सायमा ने लेखक से बातचीत की तो अल्पना मिश्र ने अपनी किताब ‘स्याही में सुर्खाब के पंखÓ से अंश पाठ किया। ‘स्याही में सुर्खाब के पंखÓ अल्पना मिश्र की कहानियों का संग्रह है, जिसमें ‘स्याही में सुर्खाब के पंखÓ, ‘कत्थई नीली धारियों वाली कमीजÓ, ‘चीन्हा-अनचीन्हाÓ, ‘सुनयना! तेरे नैन बड़े बेचैनÓ, ‘राग-विरागÓ, ‘इन दिनोंÓ और ‘नीड़Ó जैसी कहानियां शामिल हैं। अल्पना मिश्र की कथा क्षमता और विवरण बहुलता में वास्तविकता के और-और करीब जाने की कोशिश दिखाई देती है, जिसमें वे एक कुशल शिल्पी की तरह सफल होती नजर आयी हैं।
रजा फाउंडेशन के ‘रजा पुस्तक मालाÓ के बारह किताबों के पहले सेट का लोकार्पण कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी, पत्रकार ओम थानवी, अपूर्वानन्द, सोपान जोशी, राजीव रंजन गिरि और राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने किया।
इस मौके पर अशोक वाजपेयी ने कहा कि इस पुस्तक माला में दो किताबें प्रार्थना प्रवचन खंड-1 और 2 और दूसरी किताब गांधी की मेजबानी गांधी पर आधारित हैं। चित्रकार सैयद हैदर रजा अथक हिन्दी प्रेमी थे और उनकी इच्छा के अनुरूप यह पुस्तक माला शुरू की जा रही है। सैयद हैदर रजा पर महात्मा गांधी की गहरी छाप थी। वे गांधी से पहली बार 8 वर्ष की उम्र में मिले थे, जब बटवारा हुआ तो सैयद हैदर रजा ने पाकिस्तान न जाने का फैसला किया, उन्हें लगा वे अगर ऐसा करेंगे तो महात्मा गांधी के साथ विश्वासघात होगा।
कलाओं में भारतीय आधुनिकता के एक मूर्धन्य सैयद हैदर रजा एक अथक और अनोखे चित्रकार तो थे ही, उनकी अन्य कलाओं में भी गहरी दिलचस्पी थी। रजा की एक चिन्ता यह भी थी कि हिन्दी में कई विषयों में अच्छी पुस्तकों की कमी है। सन् 2016 में साढ़े चौरानवें वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु के बाद रजा फाउंडेशन के प्रबन्ध न्यासी अशोक वाजपेयी ने रजा की इच्छा का सम्मान करते हुए हिन्दी में कुछ नई किस्म की पुस्तकें प्रकाशित करने की पहल ‘रजा पुस्तक मालाÓ के रूप की है।
साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित उपन्यास ‘कलिकथा वाया बायपासÓ की लेखिका अलका सरावगी के एक और दिलचस्प उपन्यास ‘एक सच्ची-झूठी गाथाÓ का लोकार्पण अशोक वाजपेयी, प्रियदर्शन और राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक माहेश्वरी द्वारा किया गया। अशोक वाजपेयी ने अलका सरावगी के उपन्यास से कुछ अंश पढ़ते हुए कहा कि ‘मैं गद्य का ऐसा बुरा पाठक नही हूं, जैसा लोंगों ने मुझे बदनाम कर दिया है।
अलका सरावगी की यह पुस्तक इक्कीसवीं सदी के स्त्री और पुरुष के संवाद और आत्मालाप से बुनी गई है। यहां सिर्फ सोच की उलझनें और उनकी टकराहट ही नहीं, आत्मीयता की आहट भी है, किन्तु यह सम्बन्ध इंटरनेट की हवाई तरंगों के मार्फत है, जहां किसी का अनदेखा, अनजाना वजूद पूरी तरह एक धोखा भी हो सकता है। यह गाथा पाठकों को एक साथ कई अनचीन्ही पगडंडियों की यात्रा कराएगी। कई बार उन्हें ऐसी जगहों पर ले जाएगी, जहां आगे जाने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा, लेकिन यह जोखिम उठाना खुद के अंदर के और बाहरी ब्रह्मांड की गहरी पहचान करवाएगा, एक ऐसी तृप्ति के बोध के साथ, जो सिर्फ दुस्साहस और नई अनुभूतियों को जीने के संकल्प से ही मिल सकती है।
उपन्यास कुम्भ
विश्व पुस्तक मेले में वाणी प्रकाशन द्वारा ‘उपन्यास कुम्भ : अपना सत्य, अपना उपन्यासÓ 21वीं सदी में साहित्य के सामाजिक सरोकार का आयोजन किया गया। शुरुआत में वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण महेश्वरी ने युवा उपन्यासकार बालेन्दु द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार राकेश तिवारी, साहित्य अकादमी से पुरस्कृत नासिरा शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ और कथाकार-पत्रकार गीताश्री का स्वागत किया। साहित्य के इस कुंभ का संचालन वरिष्ठ पत्रकार अजित राय ने किया।
बाल साहित्य कुम्भ
विश्व पुस्तक मेले में लेखक मंच पर वाणी प्रकाशन ने ‘बाल साहित्य कुम्भÓ का आयोजन किया। वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिति माहेश्वरी गोयल कहती हैं कि बच्चों को बौद्धिक आतंकवाद में नहीं डालना चाहिए। इससे उनका विकास अवरुद्ध हो सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *