लोक इतिहास और भारतीय उपन्यास

अठारवीं सदी के उत्तराद्र्ध एवं उन्नीसवी सदी के पूर्वाद्र्ध में विश्व इतिहास की कुछ ऐसी महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुर्इं, जिसने मानवीय समाज का सदियों से चला आ रहा पूरा ढांचा ही चरमरा दिया। सन् 1789-99 का समय फ्रांस की राज्य क्रंाति का समय है। उसके बाद इंग्लैड से शुरू हुई औद्योगिक क्रांति की लहर। सन् 1917 में रूस की बोलशेविक क्रांति और इसी कालखण्ड में साहित्य की दुनिया में विश्व पटल पर उपन्यास विधा का उदय और विकास महत्वपूर्ण घटनाएं है।
औद्योगिक क्रांति ने समाज के परंपरागत ढांचे में बुनियादी परिर्वतन किया। इसके पहले जो कृषि पर आधारित ग्राम सभ्यता और संयुक्त परिवार की महान सामाजिक संस्था थी, उसमें बिखराव शुरू हुआ। केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में किसानों ने अपनी खेती-बाड़ी से निकलकर कारखानों में मजदूरी करने शहरों की ओर रुख किया। सन् 1800 तक दुनिया की मात्र तीन प्रतिशत आबादी शहरों में रहती थी। 21वीं सदी में दुनिया की पचास प्रतिशत आबादी शहरों में रह रही है। ब्रिटेन का मैनचेस्टर शहर सन् 1717 में दस हजार आबादी का शहर था, अब उसकी आबादी 2.3 लाख है। हमारा कलकत्ता सन् 1706 में मात्र दस हजार की आबादी वाली बस्ती थी, जो सन् 1752 तक एक लाख बीस हजार की आबादी वाला शहर बन चुका था, लेकिन अब उसकी आबादी एक करोड़ से ऊपर है। इसी तरह हमारी दिल्ली विश्व के दूसरे नम्बर का शहर है, जिसकी आबादी वर्तमान में 1.4 करोड़ तक पहुंच चुकी है। गांव वाले जो अपनी मर्जी के मालिक थे, शहरों में जाकर मजदूर हो गए। इस परिवर्तन से सामाजिक ताना-बाना बिखरा, उसने इस देश की सांस्कृतिक पंरपराओं और लोकजीवन, रीति-रिवाज और आपसी संबंध आदि की सूरत ही बदलकर रख दी। जहां-जहां अंगे्रजी शासन के उपनिवेश थे, वहां के प्राकृतिक संसाधनों की लूट और शोषण का एक नया दौर औद्योगिक क्रांति के साथ शुरू हुआ, और भारत जैसे देशों के घरेघू उद्योग-धंधों की कमर तोड़ी जाने लगी। पुराने समय में हमारा देश आर्थिक दृष्टि से एक समृद्ध राष्ट्र था, जिसके कारीगरों का माल अरब, मिस्र, इटली, फ्रांस और इंग्लैड तक बिकता था। महारानी विक्टोरिया भारतीय कारीगरों के हाथों का बुना हुआ वस्त्र पहनने में गौरव का अनुभव करती थीं, उस भारतीय ग्राम उद्योग, वस्त्र उद्योग और कुटीर उद्योगों की अब कमर टूटने लगी थी।
द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति तक भारत विश्व के प्रमुख आठ औद्योगिक राष्ट्रों में शामिल था, उसका घरेलू उद्योग चरमरा गया। दो सौ वर्षों के इस कालखण्ड में हमारेे ग्राम जीवन की संस्कृति, लोकजीवन और संयुक्त परिवार के ढांचे में शोषण का ऐसा पलीता लगा, जिससे हमारी पहचान ही खो गयी। शोषण का सिलसिला इस औद्योगिक क्रांति के पहले भी था, सामंतवादी व्यवस्था जमीदारों का आतंक, जातिवादी व्यवस्था, अशिक्षा, स्त्री वर्ग के प्रति दोयम दर्जे का व्यवहार और धार्मिक रूढिय़ां, अंधविश्वास और यौन शोषण का लंबा इतिहास है, परंतु इस दो सौ वर्षों में नये-नये शहरों के विकास, रेलवे लाइनों के बिछाए जाने के साथ-साथ खड़े होते कल कारखानों के रूप में एक ऐसी नई शोषक व्यवस्था का आगाज हुआ, जिसने परिवारों के ढांचे को ही तोड़ दिया।
भारतीय भाषाओं के उपन्यासों में सजग लेखकों ने इस परिर्वतन और इसके प्रभावों के असंख्य दृश्यों को अपने शब्दों के कैमरे में कैद करके रखा है। एक तरह से कहा जा सकता है कि ‘पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंग’ का विराट विस्तार अपने आपमें समेटे हुए भारतवर्ष के आसेतु हिमालय विशाल भूभाग को जिस एकता के सूत्र ने बांधकर रखा, वह सूत्र है हमारी सांस्कृतिक एकता। इस सांस्कृतिक एकता का सूत्र हमारी कृषि आधारित ग्राम सभ्यता और संयुक्त परिवार ने दृढता से थाम रखा था। भारतीय उपन्यास में इन दो सौ वर्षों के लोकजीवन का इतिहास और उसके हर पहलू और इसके हर दृश्य को असंख्य फ्रेमों में संजोकर अंकित कर लिया है, जिसे कुछ उदाहरणों से स्पष्ट कर सकते हंै।
सन् 1902 में ओडिय़ा में एक महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुआ था, जिसे लिखा था ओडिय़ा के प्रसिद्ध उपन्यासकार फकीर मोहन सेनापति ने, जिसका नाम है ‘छ: माड आठ गुंठ’। इसका प्रकाशन उतनी ही महत्वपूर्ण घटना है, जितना हिंदी में सन् 1936 में ‘गोदान’ का प्रकाशन। दोनों उपन्यासों के प्रकाशन में तीस वर्ष का अंतराल है, पर दोनों उपन्यास भारत के गांवों-किसानों और लोक जीवन की जिस कथा को कहते हंै, वह हमें स्तब्ध कर देती है। फकीर मोहन सेनापति का पात्र है भंगिया और प्रेमचंद का होरी। ‘छ: माड़ आठ गुंठ’ उपन्यास में फकीर मोहन सेनापति ओडि़सा के एक गांव की कहानी कहते है, पर यह ओडि़सा का गांव कैसे संपूर्ण भारत के एक प्रोटाटाइप गांव का उदाहरण बन जाता है, यह देखने योग्य है। ओडि़सा की चतुर्सीमा पश्चिम बंग, आंध्र प्रदेश, झारखंड और बिहार को छूती है, इन चार राज्यों की छाया में चित्रित ओडि़सा का गांव एक प्रतिनिधि भारतीय गांव की तरह देश के जनजीवन की कथा कहता है। ओडि़सा हमारे इतिहास का प्रसिद्ध राज्य कलिंग का नया अवतार है।
‘छ: माड़ आठ गुंठ’ का सन् 2006 में अंग्रेजी में अनुवाद हुआ तथा अमेरिका की येल युनिवर्सिटी तक के सेमिनार्स में इस पर चचार्एं हुईं। इसमें गरीब जुलाहों के खेती की जमीनें हड़पने, शोषण और आपसी फूट से बिखरते परिवारों की कथा तो है ही, साथ ही इसमें अंग्रेजी शासन काल में प्रारंभ की गयी शिक्षा प्रणाली की भी गहरी पड़ताल की गयी है। अंग्रेजों को तो अपना राज-काज चलाने तथा अपने काम के लिए बाबुओं की जरूरत थी। उन्होंने ऐसी शिक्षा प्रणाली खड़ी की , जो उसके लिए बाबुओं का उत्पादन करती थी। इस शिक्षा प्रणाली का प्रभाव फकीर मोहन सेनापति ऐसे दिखाते हैं कि जब नयी शिक्षा प्राप्त इन अंग्रेज बाबुओं से इनके दादा-परदादा का नाम पूछो तो वो बगले झांकने लगे और इंग्लैड के चाल्र्स तृतीय तक के पूर्वजों के नाम पूछो तो जबान फर्राटे से चलने लगती थी। यह उपन्यास आजादी से आधी सदी पहले लिखा गया था। अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली किस तरह हमारी चेतना से हमारे इतिहास को मिटा रही थी, कैसे हमारी सांस्कृतिक जड़ों को खोद रही थी, इसका दिगदर्शन यह उपन्यास कराता है। ‘दागिस्तान’ की जनजातियों में जब किसी को बद्दुआ दी जाती है तो कहते हैं : ‘जा तू अपने महबूब का नाम भूल जा।’ अमृता प्रीतम ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि यह बद्दुआ पूरी दुनिया को लग गयी है, लोग अपने महबूब का नाम भूल गये हैं। अपने भीतर सोए हुए खुदा का नाम भूल गये हैं। अपनी चेतना का नाम भूल गये हंै। जब हमारी चेतना से हमारे इतिहास को मिटा दिया जाता है, तब हम सांस्कृतिक रूप से निर्धन हो जाते हैं। यह उपन्यास कदम-कदम पर प्रेमचंद के ‘गोदान’ की याद दिलाता है कि कैसे किसान गांवों से निकलकर शहरों में जाकर मजदूर बन जाते हंै। एक किसान मरते दम तक अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का सूत्र बचाने की कोशिश करते-करते कैसे शोषण के अंधकार में दम तोड़ देता है। यह सब इसमें दर्ज है। इसके साथ ही इस उपन्यास में दर्ज हैं लोक परंपराएं, लोक आस्था, देहाती आदमी की हिम्मत और तत्कालीन समय का सामाजिक इतिहास।
ऐसा ही अद्भुुत लोक जीवन का चित्रण करने वाले ओडिय़ा के ही एक और उपन्यासकार हंै गोपीनाथ मोहंती, जिन्होनें आदिवासी जन की गाथा ‘अमृत संतान’ उपन्यास में कही है। संपूर्ण ग्राम संस्कृति और लोक जीवन की अविस्मरणीय महागाथा उनके दूसरे उपन्यास ‘माटी मटाल’ में लगभग तीन लाख बीस हजार शब्दों में वर्णित है। इसे लिखने में उन्हें दस वर्ष का समय लगा। वह इतने वृहद स्तर पर और इतनी सूक्ष्मता से भारतीय ग्राम एवं आदिवासियों के जीवन तथा हमारे ठेठ लोक जीवन का चित्रण करते हैं कि वह इतिहास से बाहर निकलकर हमारे वर्तमान में प्रविष्ठ कर जाता है। इसमें उनकी लेखनी कैमरा बन गयी है और दृष्यात्मकता उनकी शैली बनकर उभरी है।
हमारे देश की लोक संस्कृति और लोक जीवन में अपनी माटी, अपनी जमीन, अपने खेत और अंतत: अपने देश के प्रति जो प्रेम है, उसकी एक झलक बंगला उपन्यासकार आनंद शंकर राय के छ: खंडों में लिखे गये वृहद उपन्यास ‘सत्यासत्य’ में देखी जा सकती है। इस उपन्यास में एक बूढ़ा किसान कहता है: ‘तेल की शीशी फूट जाने पर तुम छोटे-छोटे बच्चों पर नाराज होते हो, पर तुम जो बड़े बच्चों ने देश को तोडक़र दो टुकड़े कर दिये हैं, अब उनकी बारी आने पर क्या कहोगे? ‘‘आनंद शंकर राय के उपन्यास की यह उक्तिअब उपन्यास से बाहर निकलकर बंगला भाषा की कहावतों में शामिल हो चुकी है। यह हमारे भारत विभाजन की क्रूरतम एतिहासिक घटना पर एक ग्रामीण किसान की ऐसी टिप्पणी है, जिसका जवाब किसी के भी पास नहीं है। आनंद शंकर राय को यह उपन्यास लिखने में दस वर्ष की लंबी अवधि का समय लगा था।
हमारे देश के दो धर्मों के नाम पर विभाजित होकर दो टुकड़े हो जाने की घटना में यदि सबसे अधिक आश्चर्यजनक कोई बात है तो वह यह कि जो देश लंबे समय तक मुगलों के अधीन रहा, विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों का शिकार हुआ, सन् 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ जिस देश में हिन्दू-मुसलमानों ने मिलकर आजादी की लंबी लड़ाई लड़ी थी, भले ही आपसी संघर्ष हुए हों, जातीय संघर्ष भी हुए हों, फिर भी यह देश नहीं टूटा, एक रहा, अखण्डित, वह अंग्रेजी शासनकाल के आंखरी कुछ सालों में ही धर्म के नाम पर दो टुकड़े हो गया। यह हमारे इतिहास की एक बड़ी त्रासदी थी। भारत विभाजन के इतिहास पर बहुत से उपन्यास हिंदी और उर्दू में भी लिखे गये है। इनमें यशपाल का ‘झूठा सच’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस उपन्यास में इतिहास भी है, और राजनितिक षडयंत्र का शिकार हुआ निरीह मनुष्य भी, परंतु इसमें भारतीय लोकजीवन की उखड़ती हुई जड़ों और सांस्कृतिक पराभव का भी दर्शन भी कर सकते हैं।
इसी प्रकार उर्दू में कुर्तुल एन हैदर का उपन्यास ‘आग का दरिया’ भी ऐसा ही महत्वपूर्ण उपन्यास है, जो सिर्फ भारत विभाजन के रक्तपात और हिंसा की कहानी ही नहीं कहता, बल्कि अनगिनत लोगों की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक त्रासदी को और ढाई हजार साल पुरानी भारतीय सभ्यता को ‘आग के दरिया’ में ढकेले जाने के षडय़ंत्र का भी पर्दाफाश करता है। सन् 1959 में इसके प्रकाशित होने पर भारत और पाकिस्तान के साहित्य जगत में खलबली मच गयी थी।
लोक जीवन के पास गहन अनुभवों की संपदा होती है। इस संपदा से लोक जीवन समृद्ध है। भारतीय उपन्यासों ने इस संपदा का फायदा सबसे अधिक उठाया। लोक और इतिहास की युगलबंदी से भारतीय उपन्यास समृद्ध हुए हंै, किंतु उपन्यास इतिहास से इस अर्थ में अलग है कि वह राजवंशों के स्थान पर जन गाथा कहता है। इतिहास का आदिम चरित्र राजवंशीय है, जबकि उपन्यास अपने पूरे आचरण में लोकतांत्रिक है। ऐतिहासिक युद्ध के मैदानों की जगह उपन्यास में जो युद्ध क्षेत्र है, उसमें जन संघर्ष है, प्रतिकार है, जैसे कथाकार अमरकांत आजादी के आंदोलन में जन जीवन के संघर्ष को चित्रित करते हंै तो वह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के गांव को चुनते हंै और फिर लिखते हैं अपना यादगार उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’। इसे साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला था।
इस उपन्यास में अमरकांत ने लोक जीवन के संघर्ष और आजादी के आंदोलन को जनता की लड़ाई बनते दिखाया है। इसी तरह जब मैं लोक जीवन, लोक संस्कृति और लोक चेतना के विराट आकल्पन को याद करता हूं तो मुझे याद आते हैं बंगाल के प्रसिद्ध कथाकर ताराशंकर बंद्योपाध्याय, जिनके दो उपन्यासों में पहला है ‘हंसली बांक की उपकथा’ और दूसरा है ‘गण देवता’। इसी तरह उपन्यासों में देवेन्द्र सत्यार्थी के दो उपन्यास ‘ब्रम्हपुत्र’ और ‘रथ के पहिए।’ इसी तरह रेणु का उपन्यास ‘मैला आंचल’ या जगदीश चंद्र का उपन्यास ‘धरती धन न अपना’। इसी तरह शिव प्रसाद सिंह का ‘कोहरे में युद्ध’, उर्दू में कृष्ण चंदर का ‘जब खेत जागे’ और प्रेमचंद का अपरिहार्य उपन्यास ‘गोदान’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
ताराशंकर बंद्योपाध्याय का उपन्यास ‘‘हंसल बांक की उपकथा’ लोक जीवन और जन संघर्ष का अद्भुुत आख्यान है। कोपाई नदी के अंचल में बसी कहार जाति के संघर्ष और शोषण से इसकी कथा शुरू होती है। सदियों से पालकी ढोने वाली घोड़ गोत्र की वेदना के साथ-साथ इसमें बंगला के लोकगीत, लोककंठ, चैत संक्रांति का पर्व और पालकी की तरह पुरानी रूढिय़ों को ढोने से इनकार करता नयी विचारधारा का एक युवा पात्र कराली है। बंगाल के वीरभूम क्षेत्र में नियति के आगे समर्पित अन्याय सहते हुए लोगों को लेखक ने देखा था, उसका वह जीवंत चित्रण ही नहीं करता, बल्कि उसके प्रतिकार के प्रति चेतना भी जगाता है। इस उपन्यास में बांस बादी नाम का गांव है, जहां एक बांस वन है। उपन्यास का एक पात्र है पागल बाबा। वह एक गीत गाता है कि जिन बांसों से लाठी बनती है, उन्हीं बांसों से बंासुरी भी बनती है। मजे की बात यह है कि यह बात कहने वाला एक पागल है। लोक के पास अपनी बात कहने का कैसा बारीक और प्रभावशाली ढंग होता है।
हंसली बांक के इस बांसवन में धरती के आदिम युग का अंधेरा डेरा डाले रहता है, जो मौका मिलते ही बांसवन से निकलकर मछेरों की बस्ती में आ जाता है। इस उपन्यास में एक बूढी स्त्री भी है -सुचांद। वह इस हंसली बांक में कई उपकथाएं कहती है, जिसे कोई शुरू से सुनता है, कोई बीच से, कोई आखिर से यानी थोड़ी-थोड़ी सुनते, सुनकर चले जाते। बुढिय़ा अपने तईं कहती रहती। बूढ़ी सूचांद के बहाने बंगाल के एक दूरस्थ पिछड़े गांव से जैसे वह हमारी युगीन संस्कृति ही अपनी दास्तान सुनाती है। कहानी सुनाकर सूचांद कहती है, ‘‘बेटे, मैंने बचपन में सुना है कि जो चीज मन की है, उसे सिर पर अख्खो तो जूं खा जाए (वह ‘र’ की जगह ‘अ’ का उच्चारण करती है। वह रात को आत कहते हुए बोलती है: ‘‘मन की चीज सर पर अख्खो तो जूं खा जाए। माटी पर अख्खो तो चींटी चाटे, हथेली पर अख्खो तो नाखून का निशान लगे, पसीने का दाग लगे। सो, इसे अपने हिया में अख्खा है। बने तो लिख अख्खो आ: । आ:। हंसली बांक भी खतम। मैं भी खतम। आ:। फिर वह रुक जाती, ऊपर देखती, सोचती कि खत्म होता है भला? जब तक सूरज-चांद है, उसके बाद भी तो है। उसके बाद है महाकाल। उपन्यास की भाषा अत्यंत सजीव है।
एक उदाहरण दृष्टव्य है-बूढ़ी आंखों के संबंध में कहा गया है- ‘‘आंखें दप-दप कर रही थीं, जैसे कोयले में पड़ी आग की चिनगी करती है।’’ या मुहावरेदारी देखना हो तो – ‘‘जहां जिसका मन , वही उसका बिन्दरावन।’’
इस लोक कथा में उस बूढ़ी स्त्री को जीवंत किया गया है, जो खुद तो निपूती थी, पर गांव के लिए व्रत रखती थी। गांव के दु:ख से दुखी रहने में ही उसे सुख मिलता था। किसी के दु:ख में रोने का मौका मिलता तो बुढिय़ा पशु-पक्षी तक का दु:ख खोजती फिरती। ऐसे मौके पर बैठकर सोचा करती-‘‘ रोने को जी करता है, रोकर जी नहीं भरता। महावन में रहता है हाथी, चलूं उसी के गले लगकर रो आऊं। हंसली बांक की बूढ़ी सूचांद उसी लोक कथा की बूढ़ी का अवतार है।
भारतीय भाषाओं में विगत दो सौ वर्षों में ऐसे अनेक उपन्यास लिखे गये हैं, जिनमें जन जीवन का इतिहास, उनका संघर्ष, लोक संस्कृति, मेले, झूले, लोक गीतों, कहावतों, मुहावरों और वातार्ओं में सदियों से शोषित किसानों, मजदूरों, मछुवारों, आदिवासियों, नदी के कछारों में किनारे-किनारे बसी जन जातियों, सामंतवादी अत्याचारों, देहाती मनुष्य की जीवटता तथा भोले भाले लोगों के निष्कपट प्रेम के विराट आख्यान रचे गये है।
ऐसे ही उपन्यासों में माणिक बंद्योपाध्याय का एक बड़ा उपन्यास-‘पद्मा नदिर मांझी’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय का उपन्यास ‘पाथेर पांचाली’, महाश्वेता देवी का ‘चोट्टि मुंडा और उसका तीर’, जिसमें मुंडा जनजाति की संघर्ष गाथा है। सभी उपन्यास इतने विराट फलक वाले हैं कि हर उपन्यास पर विस्तार से चर्चा किये बिना उनका महत्व प्रतिपादित नहीं किया जा सकता। ‘पद्मा नदिर मांझी’ पर बनी फिल्म बहुचर्चित रही और ‘पाथेर पांचाली’ पर तो सत्यजीत रे द्वारा बनी फिल्म दुनिया भर में सराही गयी और आस्कर के लिए भी नामित हुई थी।
हिन्दी में प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, जगदीश चंद्र और शिवप्रसाद सिंह जैसे उपन्यासकार हमारे लोक जीवन के महान व्याख्याता हंै, जिनके उपन्यासों में हम उस असली भारत माता के दर्शन कर सकते हंै, जिसके बारे में कहा गया है- ‘भारत माता ग्राम वासिनी’।

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