मेरी आभा में शिव की भी आभा

शिवनारायण एक ऐसे कठिन समय के हमारे मित्र हैं, जिसमें बहुत कठिन होता है किसी से मित्रता होना। दूध में पानी की तरह बाकी चीजों के साथ मित्रता भी बाजार में इस तरह घुलमिल गई है कि बाजार से जोड़कर ही अब हर चीज को देखा जाने लगा है। ऐसे में जो व्यक्ति हमारे संबंधों को नहीं जानता, वह इसी नजरिए से हमारी मित्रता को भी देखता-परखता होगा। इसका एक कारण यह भी है कि शिवनारायण के पास लुभाने के लिए अब बहुत कुछ है। इसके बावजूद इस कठिन समय में भी हमने अपनी मित्रता बचा ली है, क्योंकि यह मित्रता तब की है, जब हम दोनों के पास लुभाने के लिए कुछ भी न था। फिर भी कुछ था, जिसके आकर्षण में हम दोनों बंध गए।
शिवनारायण से मेरी पहली मुलाकात कब हुई, इसका ठीक-ठीक अंदाजा तो नहीं है, लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि तब हम नए-नए मैट्रिक पास कर कॉलेज में गए थे। मेेरे एक मित्र हैं अनिलकुमार कर्ण। वे इन दिनों कटिहार में रेलवे के मालबाबू हैं। उन्होंने माल कितना कमाया है, यह तो मुझे नहीं पता, लेकिन प्रेम और अपनेपन का माल उनके पास भरपूर है, जिसका लोभ मुझे उनकी ओर बार-बार खींचता है। कटिहार से मेरा जुड़ाव भावात्मक है। भौतिक रूप से वहां मेरा कुछ भी नहीं रह गया, इसलिए दो-चार बरस में जब भी वहां जाता हूं तो लगता है कि यह कटिहार की मेरी अंतिम यात्रा है। आते समय मैं इसी नजरिए से सबको देखता हंू और गाड़ी खुलने के बाद स्मृतियों की ऐसी अंधेरी सुरंग में खो जाता हूं, जिसका कोई ओर-छोर दिखाई नहीं देता। उन्हीं अनिल जी ने शिवनारायण से परिचय कराया था। तब शिवनारायण साइकिल से चला करते थे। वह साइकिल हर समय चमकती रहती थी। उसकी चमक आज भी महसूस करता हूं। मैंने शिवनारायण से ही जाना कि कैसे एक साधारण चीज में भी चमक पैदा की जा सकती है। साइकिल के आगे हैंडल पर एक कैरियर हुआ करता था, जिसमें सुंदर कवर की किताब हुआ करती थी। अपने पसंदीदा लेखकों की नई से नई किताबें वे खरीदकर पढ़ते और करीने से सजाकर रखते थे। जो किताबें उन्हें अच्छी लगतींं, उन्हें मित्रों को भी पढऩे को देते। उन दिनों प्रेमचंद, गोर्की, लूशुन, मायकोव्स्की, चेखव, शरतचंद्र, दोस्तोयवस्की, निराला आदि उनके पसंदीदा लेखक थे। तब भी लगता था कि शिवनारायण अति व्यस्त व्यक्ति हैं, लेकिन उनकी व्यस्तता दूसरों के लिए चाहे जितनी रही, मेरे लिए वह पर्याप्त समय रखते थे। उनका मिलनसार और हर स्थिति में खुश रहने वाला व्यक्तित्व मुझे आकर्षित करता था।

मैं उन दिनों कटिहार के गोशाला मोहल्ले में रहता था। तब अक्सर शिवनारायण मेरे निवास पर आ जाया करते थे। कभी-कभी उनके साथ कुमार अशोक या संदीप सेनगुप्ता भी होते थे। कुमार अशोक तेजस्वी आभा के स्वामी थे, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। शिवनारायण जब भी मिलते तो उनसे ढेर सारी जानकारियां मिलती। वे मेेरे लिए सूचना के स्रोत भी थे, लेकिन ये सारी जानकारियां साहित्य और साहित्यकारों से संबंधित ही होतीं। कटिहार तब जिले का दर्जा प्राप्त कर चुका था, पर वह शहर कस्बानुमा ही था। उन दिनों वहां के वरिष्ठ लेखकों में कवि सौरभ, जोगेश्वर जख्मी, श्यामल, खेदन प्रसाद चंचल आदि की चर्चा थी, जिनसे शिवनारायण के संबंध बेहद मधुर थे। उस छोटे से शहर को हम लोग लगभग रोज किसी न किसी बहाने लांघ लेते थे। कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन शिवनारायण पटना में रहेंगे और मुझे दिल्ली जाना पड़ेगा। सन् 1978 के आसपास के हम कटिहार के कस्बाई माहौल में उसके समय-परिवेश को जीते हुए अलमस्त भाव में रहते थे। मेरी स्कूली पढ़ाई बीबीसी की धीमी गति वाले समाचार जैसी थी। मेरी यह दशा देखकर बड़े भैया सुरेश तिवारी ने तो भविष्यवाणी तक कर दी थी कि मैं कभी भी मैट्रिक पास नहीं कर सकूंगा। मैंने कई ऐसे बीमारों को देखा है, जिन्हें देखकर लगा कि वेकुछ ही घंटे के मेहमान है, लेकिन तमाम बीमारियों के बावजूद अनेक स्वस्थ लोगों को पछाड़ते हुए वे 80-90 वर्ष तक जीवन की गाड़ी खींच ले जाते। एम.ए. तक की पढ़ाई मैंने कुछ उसी बीमार आदमी की तरह गिरते-पड़ते कर ली, जबकि मेरे साथ पढऩे वाले कई ऐसे लड़के भी थे, जो पढऩे में अच्छे थे, फिर भी किसी ने सातवीं करके पढ़ाई छोड़ दी तो किसी ने मैट्रिक करके। उनकी आर्थिक स्थिति आगे पढऩे की नहीं थी। पता नही,ं मेरे वे मित्र अब कहां और किस हाल में हैं? पढऩे वाले तेज छात्रों में मेरी गिनती कभी नहीं रही। मेरे बारे में संस्कृत शिक्षक गणेश झा ने एक बार कहा था कि मैं विद्या की अर्थी बनाकर ढोने वाला विद्यार्थी हूं। वे वहां मारवाड़ी पाठशाला में पढ़ाते थे और मारवाडिय़ों के बच्चों को घर जाकर ट्यूशन देते थे। स्कूल भी मारवाडिय़ों का ही था। वे उनके बच्चों को बड़े स्नेह से बुलाते और बताते। बाकी विद्यार्थियों के प्रति उनका व्यवहार ठीक न था। एक बार किसी बात पर उन्होंने मुुझे धूप में खड़ा रहने को कहा।
प्रचंड गर्मी के दिन थे। मैंने जब इसका प्रतिवाद किया तो गुस्से में उन्होंने मुझे दो बेंत मारे। वे क्लास में बेंत लेकर ही आते थे। इसका खामियाजा उन्हें थाने में जाकर भुगतना पड़ा। जीवन में शायद पहली बार उन्हें पुलिस के सामने आरोपी के रूप में हाजिर होना पड़ा था। उस समय हमारे घर महेश चतुर्वेदी रहा करते थे। खून का कोई रिश्ता न होने पर भी वे घर के वरिष्ठ सदस्य जैसे थे। वे स्वतंत्रता सेनानी थे, लेकिन सरकार से पेंशन लेना उन्होंने स्वीकार नहीं किया। उनका अपना न तो कोई घर था , न ही परिवार। किसी बात को लेकर मेरे पिता से भी झगड़ जाया करते, लेकिन उस झगड़े में भी आत्मीय भाव हुआ करता था। मुझे पुत्रवत स्नेह करते। घोर लोहियावादी थे। कहते हैं कि बिहार के तत्कालीन पुलिसमंत्री रामानंद तिवारी उनके पांव छूते थे। वे एक पत्र भी निकालते थे, जिसका नाम था ‘संघर्ष पथÓ। कलम के धनी तो थे ही, क्रोधी भी बहुत थे। अन्हें अनुशासनहीनता एक क्षण के लिए भी सह्य न थी। चुनाव न लडऩे का उन्होंने संकल्प ले रखा था। शहर के सभी लोग उन्हें बाबा कहते और मेरे तो वे बाबा थे ही। जब मैंने उन्हें स्कूल की घटना बताई तो गुस्से मेंं लाल हो गए। उन्हीं के कहने पर मैंने गणेश झा की शिकायत सीधे सिविल एसडीओ से कर दी। तब कटिहार जिला नहीं बना था और टीनन कुमार वहां एसडीओ हुआ करते थे। उसके बाद से गुरु जी ने छात्रों को मारना छोड़ दिया, बाकी शिक्षक भी मुझे कुछ अलग नजर से देखने लगे थे।

उसके कुछ समय बाद मैंने वह स्कूल छोड़ दिया और प्राइवेट छात्र के रूप में कटिहार हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा दी। शिवनारायण उसी स्कूल के छात्र थे, जिन्हें शिक्षकों का भरपूर स्नेह मिलता था। हिंदी शिक्षकों का कुछ ज्यादा ही। वे स्नेह के पात्र थे भी। मेरे अनन्य मित्र अनिल कुमार कर्ण भी उसी स्कूल में विज्ञान के छात्र थे, शिवनारायण भी। इन दोनों से मित्रता का एक कारण यह भी था कि वे स्कूल के तेज छात्रों में गिने जाते थे और प्राय: सभी शिक्षकों की जुबान पर उनका नाम होता था। गुरुओं की उन पर विशेष कृपा रहती थी। न चाहते हुए भी मैं गुरुद्रोही के रूप में कुख्यात था, जिसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा। हिंदी से एम. ए. करना चाहता था, लेकिन ये हिंदी के शिक्षक इतने खुर्राट होते हैं कि उन लोगों ने हिंदी में कभी अच्छे अंक नहीं दिए। वे भी क्या करते। शायद मेरा लिखा वे पढ़ नहीं पाते होंगे। मुझे पास कर दिया करते थे, यही उनकी बड़ी कृपा थी। इंटर में मुझे हिंदी में इतने भी अंक नहीं मिले कि मैं बी.ए. में हिंदी ऑनर्स ले सकूं। हारकर मुझे राजनीति शास्त्र में बीए ऑनर्स के बाद एमए करना पड़ा। राजनीति भी मुझे कभी आयी नहीं और दिल्ली आकर भी साहित्य की राजनीति से अपने को दूर ही रखता रहा। शिवनारायण इस मामले में मुझसे बहुत भिन्न रहे। उनकी लिखावट देखकर मुझे रश्क होता था, काश, मेरी भी लिखावट इतनी सुंदर होती। मैं देखता था कि उनकी फास्ट राइटिंग भी इतनी सुंदर होती कि मैं बहुत संभालकर लिखूं तो भी वैसी नहीं लिख पाता। उन्होंने साइंस के साथ मैट्रिक और इंटर किया और बीएस-सी फिजिक्स ऑनर्स में एडमिशन लिया, लेकिन बीच में ही साइंस छोड़ हिन्दी ऑनर्स में नाम लिखवा लिया। पढ़ते साइंस थे और लिखते कविता-कहानी। डीएस कॉलेज, कटिहार के सभी हिंदी प्रोफेसर उनकी प्रशंसा करते। शिवनारायण को चाहने वालों को लगता कि उन्होंने कैरियर के मामले में अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है, लेकिन जब उन्होंने बीए हिंदी ऑनर्स में यूनिवर्सिटी टॉप किया तो उन्हें जानने वाले दांतों तले उंगलियां दबाने लगे। बहरहाल, उनसे मेरे जुड़ाव का मुख्य कारण उनका साहित्य प्रेम ही था।
मेरी कविताएं उन्हें पसंद थीं। मैंने जो थोड़ा-बहुत लिखा, उसमें उनका प्रोत्साहन भी शामिल है। उन्होंने हमेशा मुझे मान दिया। बीए के अपने छात्र जीवन में ही वे कटिहार के साप्ताहिक पत्र ‘अभिनव पथ में संपादक हो गए। वह पत्र कटिहार के तत्कालीन एमएलए सीताराम निकालते थे। ‘अभिनव पथ से पहले ‘जिला ज्योति मासिक पत्रिका का संपादन शिवनारायण कर चुके थे। जिला केन्द्रीय सार्वजनिक पुस्तकालय के सहसचिव भी थे, जो उन दिनों बौद्धिक गतिविधियों का केन्द्र हुआ करता था। अनेक साहित्यिक आयोजनों में वे भाग लेने लगे। साहित्यिक-सामाजिक गति विधियों में उनकी सक्रियता देखते ही बनती थी। अपनी कठिन जीवन स्थितियों से जूझते हुए शिवनारायण ने जो जीवन यात्रा की, वह कम उपलब्धियों भरी नहीं है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनके पास जो कुछ है, सब का सब उनका अर्जित किया हुआ है। वे खुद ही नाव रहे और खुद ही पतवार। तीन बहनों के बाद उनका जन्म हुआ था। जन्म के कुछ ही माह बाद उनकी मां महामारी में चल बसीं। तीनों बहनें भी। उनके पिता कृषक थे। गाँव से शहर आकर रहने लगे। छोटा-मोटा व्यवसाय करते रहे। इस दृष्टि से भी शिवनारायण मेरे समानधर्मा हैं। उनमें संघर्ष शक्ति के साथ-साथ व्यवहार कुशलता भी रही। कभी-कभी सोचता हूं कि उनके परिवार में तो दूर-दूर तक साहित्य और शिक्षा का कोई परिवेश न था, फिर भी वे अपने को लेखन से कैसे जोड़ पाए! उनके चेहरे की मुस्कान कभी उनके अंदर के संघर्ष को उजागर होने नहीं देती, लेकिन जानने वाले जानते हैं कि उन्होंने अपने को मुसलसल संघर्ष की भट्टी में तिल-तिल तपाया है। अपने कैरियर के प्रति भी वे बेहद सजग रहे। उन्होंने अपने आसपास एक ऐसा परिवेश सृजित किया, जिसका लाभ भी उन्हेें मिला। सृजनात्मक यात्रा के साथ-साथ जीवन के दूसरे पक्षों को भी उन्होंने संवारा। आज भी वे संघर्षशील लोगों को पसंद करते हुए हर तरह से उनकी मदद करते हैं।
उनके संघर्ष को मुझे बहुत करीब से देखने-समझने का अवसर मिला है। जाने क्यों अपने पिता से उनकी कभी बनी नहीं। वे जितना ही अपने रोजगार में उन्हें झोंकना चाहते, उतना ही वे साहित्य की ओर फिसलते गए। मित्रों से उन्हें घर-परिवार की बातें करते कभी नहीं सुना। एकाकी जीवन की यात्रा में कभी किसी को उन्होंने साथ नहीं लिया। स्कूल से कॉलेज तक उनके गिने-चुने मित्र ही रहे, लेकिन जो भी उनके मित्र रहे, वह हर स्थिति में उनसे गहरे प्यार करने वाले रहे। उनके मित्रों में कुमार अशोक, कामेश्वर, पंकज, संदीप सेनगुप्त, शैलेन्द्र सिंह और अरुण सिंह आदि की याद आती है। कुमार अशोक और संदीप सेनगुप्ता तो उनसे छाया की तरह लगे रहते, जबकि दोनों उनसे सीनियर थे। कुमार अशोक के पिता डीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर थे। नाम था महेश्वरप्रसाद सिंह। साहित्य में गहरी दिलचस्पी थी। उनकी कई किताबें छप चुकी थीं। उन्होंने बुढ़ापे में दूसरी शादी की। मुझे कई बार लगता है कि व्यक्ति में अगर जीवन मूल्यों के प्रति आस्था नहीं है तो दुनिया का कोई भी संत उसे सुधार नहीं सकता। कुमार अशोक उनकी पहली पत्नी की संतान थे। अपने एकमात्र पुत्र को भी वे समझ नहीं पाए। यों वे शिवनारायण को पुत्रवत मानते थे। कुमार अशोक ने बीएस-सी किया, लेकिन लिखते कविता रहे। कालान्तर में पिता-पुत्र नहीं रहे।
शिवनारायण मुझसे पहले ही कटिहार छोड़ गए। कटिहार में एमए नहीं होता था। बीए हिंदी ऑनर्स में टॉप करने के बाद वे पटना विश्वविद्यालय में उनका दाखिला हो गया। पटना जाने के बाद भी उनसे मेरा जुड़ाव बना रहा। हफ्ते-दस दिनों में उनका पोस्टकार्ड जरूर मिल जाता था। उनके पत्र का मैं इंतजार करता था। कुछ बरस बाद मुझे भी कटिहार छोडकर दिल्ली आ जाना पड़ा। काफी दिनों तक जहां-तहां भटता रहा। कोई व्यवस्थित जीवन न होने के कारण कभी यहां तो कभी वहां। अनेक बरस तक हमारा संपर्क टूटा रहा और हम अपनी-अपनी दुनिया के संघर्ष को अकेले जीते हुए आगे बढ़ते रहे। दोस्तों और रिश्तों से दूर कटा तन्हाई का जीवन संघर्षों में खुलता-खिलता बढ़ता रहा। कहते हैं कि दिल्ली सबको दिल नहीं देती, लेकिन मुझे उसके दिल में जगह मिली। इसी तरह पटना ने शिवनारायण को आत्मसात कर लिया। गंगा और यमुना के तट पर हम दोनों अपने-अपने हिस्से की जिंदगी जीते रहे, एक-दूसरे से अलग-अनजान! लेकिन कब तक? आखिरकार ढूंढ़ते-ढूंढते शिवनारायण ने दिल्ली के बीहड़ में मुझे ढूंढ़ ही लिया! और अब तो दिल्ली-पटना की दूरी भी उन्होंने पाट दी है। बढ़ती उम्र के साथ उनकी आभा बढ़ रही है। उनकी आभा में मैं अपनी भी आभा महसूस करता हूं। वे जहां और जिस हाल में भी रहे, मुझे अपने से उन्होंने जोड़े रखा। मित्रों को जोड़े रखने की कला कोई उनसे सीखे!
रिश्तों में वे हिसाबी-किताबी नहीं हैं। अब भी मेरे लिए यदि वे कटिहार के वही शिवनारायण हैं, जो तीस पहले होते थे तो इसलिए कि आज की बाजारवादी व्यवस्था में भी उन्होंने अपनी सहजता और संवेदना बचाए रखी है। बेकन ने मित्रता के संबंध में लिखा है कि सच्चा मित्र आनन्द को दोगुना और दुख को आधा कर देता है। लेकिन अपने अनुभवों से मैने जाना है कि सच्चे मित्र के मिलने के बाद दु:ख रह ही नहीं जाता। तब सिर्फ आनन्द ही आनन्द होता है। जहां ऐसा भाव पैदा न हो, वैसी मित्रता पर संदेह करना चाहिए। सांसारिक आपाधापी के बीच शिवनारायण ने जो सुख और अपनापन दिया, वह मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। वे दिल्ली बराबर आते रहते हैं। भ्रमणशील हैं। अनेक करणों से यात्राएं करते रहते हैं। मुझे भी उनके साथ कई बार यात्राएं करने के अवसर मिले हैं। कभी दक्षिन अफ्रीका, कभी, रांची, कभी भोपाल-इंदौर तो कभी मथुरा-आगरा आदि जाने कहां-कहां?
‘नई धारा हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका है, जो पैंसठ बरस से निरन्तर प्रकाशित हो रही है। राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह और आचार्य शिवपूजन सहाय द्वारा संस्थापित ‘नई धारा से रामवृक्ष बेनी पुरी, कमलेश्वर, विजयमोहन सिंह आदि जुड़े रहे। सन्1993 से शिवनारायण’नई धाराका संपादन कर रहे हैं, जिसमें अक्सर हमसे लिखवा कर छापते और सराहते रहते हैं तो उनके कटिहार प्रवास की वह साधारण साइकिल याद आती है। अपने साधारण से साधारण मित्रों के प्रति भी उनका आत्मीय भाव बना रहता है। नये और उत्साही लेखकों को छापते हुए उनकी रचनाओं में चमक लाने में उन्हें काफी श्रम करना पड़ता है , जिससे उनके अपने रचनाकर्म को बहुत क्षति उठानी पड़ती है। वे स्वयं बहुत अच्छे कवि और समालोचक हैं, पर संपादन कर्म के चलते उनका रचनाकार पूरी तरह सक्रिय नहीं रह पाता। रचनाओं के संपादन में उन्हें कभी किसी गुट को प्रश्रय देते नहीं देखा। हिन्दी में उनके जैसे संपादक विरल हैं, जो अपने बाड़े से निकलकर नए लेखकों की तलाश करते हों। आमतौर पर लोग साहित्य की पत्रिकाएं इसलिए निकालते हैं कि उनकी अपनी दुकानदारी चलती रहे। उनका उद्देश्य साहित्य न होकर कुछ और होता है। इसलिए वे पत्रिकाएं कुछ दिनों के बाद स्वत: काल-कवलित हो जाती हैं। मैंने उन्हें कभी अपने विरोधियों के प्रति सक्रिय होते नहीं देखा। ‘नई धारा में कई बार उनके विरोधियों को ससम्मान छपते मैंने देखा है। यहां दिल्ली में ही उनके असंख्य प्रशंसक हैं। उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलू हैं। वे मगध विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं, ‘नई धारा के संपादक तो हैं ही, अनेक संस्थाओं से जुड़कर समाजसेवा भी करते रहते हैं। कवि-आलोचक हैं, भारत सरकार के पारिभाषिक शब्दावली आयोग से भी जुड़े रहकर और भी न जाने क्या-क्या करते रहते हैं, लेकिन सहृदय मनुष्य, विद्वान लेखक, दृष्टिसम्पन्न संपादक, अच्छे शिक्षक, सक्रिय समाजसेवी और अच्छे मित्र के रूप में उनका कोई सानी नहीं है।

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