महानगर का बदल गया चेहरा लोगों के चरित्र भी बदले

पिछले दो दशकों में और विशेष तौर पर पिछले एक दशक में दिल्ली महानगर में जो कुछ बदला है या बदल रहा है, उसके बारे में हम बहुदा सोचने की जरूरत ही नहीं समझते या यूं कह सकते हैं कि इस बारे में सोचने के लिए हमारे पास समय ही नहीं होता। हालांकि इसका एक पहलू यह भी है कि जब हमने इस बदलाव के साथ जीने की आदत डाल ली है तो फिर उसके बारे में सोचने की गुंजाइश ही कहां बचती है। इनमें बहुत से बदलाव सकारात्मक हैं तो उससे कहीं ज्यादा नकारात्मक भी। इस बारे में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि ये बदलाव आखिर आए कहां से या निकले कहां से हैं? इस विषय पर यदि हम सोचें तो शायद हम अपनी उस पिछली पीढ़ी के बारे में भी सोचने का वक्त निकाल पाएं जो इन बदलावों से पहले की पीढ़ी है और इन बदलावों के साथ खुद को बेहद असहज महसूस करती है या पाती है। यह संभवत: इन बदलावों से जुड़ा सबसे मानवीय और संवेदनापूर्ण पहलू है।
ये सारे के सारे बदलाव कोई रातोंरात प्रकट नहीं हो गए। इनकी पृष्ठभूमि पहले से तैयार थी। हालांकि किसी सर्प की भांति रेंगते हुए ये सभी इतने हौले-हौले आए कि हमें उनका अहसास तक नहीं हुआ। हम तो हर विकास या बदलाव को देखकर बस खुश होते रहे और यह कभी सोचा तक नहीं कि इसके और क्या परिणाम होंगे। ये बदलाव आए हैं, विकास की आंधी से, निरंतर बढ़ती सुविधाओं से और उनके साथ आम आदमी की आसमान छूती आकांक्षाओं से। ये बदलाव आए हैं, बदलती प्राथमिकताओं से, शिक्षा के प्रसार से और आज भी बहुत तेज रफ्तार से बढ़ती महानगर की आबादी से। निस्वार्थ सेवा, बड़ों के सम्मान और परिवार व समाज के तौर पर एकजुट रहने जैसे मूल्यों और भावनाओं को तिलांजलि दे दिए जाने से।
इस समूचे बदलाव को पहली नजर में देखकर लगता है कि हम तो कुछ ही समय पहले बहुत मामूली थे, आज कितना आगे बढ़ आए हैं और कभी लगता है कि अपने जिन मूल्यों और आदर्शों को लेकर हम फूले नहीं समाते थे, वे या तो रहे नहीं या फिर किसी काम के नहीं रह गए। इन बदलावों को हम महसूस कर सकते हैं, अपने घर-आंगन से लेकर सियासत के गलियारों तक, अपने ऑफिस से लेकर उन वाहनों तक में, जिनमें हम रोज सफर करते हैं। महज दशक या डेढ़ दशक भर पहले के अपने आसपास पर निगाह डालें तो हमें महसूस होगा कि कितना कुछ बदल गया है हमारे आसपास और आगे भी बदल ही रहा है। बदलते समय ने शायद हम पर सबसे गहरा वार यह किया है कि उसने हमसे समय को ही छीन लिया। अब हमारे पास किसी के लिए भी समय नहीं बचा। न अपने माता-पिता के लिए और न ही अपने बच्चों के लिए।
यह यंू ही नहीं सुनाई देता कि बहुत से वृद्ध वृद्धाश्रमों में दिन काट रहे हैं और बच्चे अनाथों की तरह पल रहे हैं। यही नहीं, बदलाव ने हमें जो भी सुविधाएं दीं, उन्हें हम आज तौलते भी वक्त की इसी तुला पर हैं। यदि कोई सुविधा और सेवा समय बचा सकती है तो फिर उससे बेहतर हमारे लिए कुछ भी नहीं। चाहे फिर उसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। स्थिति यह हो गई है कि खुद अपने लिए भी हमारे पास वक्त नहीं रहा। आखिर यह बदलाव आम आदमी को कहां ले जाएगा? महज एक-डेढ़ दशक पहले तक गली-गली में यूं ही एटीएम नहीं थे कि किसी में भी घुसे और कार्ड निकालकर जेब नोटों से भर ली। तब हवाई यात्रा करवाने वाली मेट्रो टे्रेन नहीं थी, जो दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने का वही सफर महज एक घंटे में करवा देती है, जिसमें बस कम से कम ढाई-तीन घंटे खा लेती थी। जब इस देश में कंप्यूटर और मोबाइल आए थे, तब कोई भी यह नहीं जानता था कि ये इतनी बड़ी क्रांति का सूत्रपात करेंगे। हर बदलाव अपने साथ कई दूसरे बदलाव और जरूरतें लेकर आता है।
मसलन, मेट्रो सरीखी हवाई सेवा मिली, जिसके स्तर की विदेशों में भी तारीफ हुई, लेकिन उसके साथ कुछ नए फैशन भी तो आए। मसलन, युवाओं को लगा कि इसमें स्लीपर पहनकर सफर करना ज्यादा सुखद होगा। फिर युवाओं को यह महसूस हुआ कि यदि जोड़े के तौर पर सफर करना है तो वह कम से कम मेट्रो टे्रन में तो यह बांह में बांह डालकर ही होना चाहिए। नतीजा यह हुआ कि युवतियां नहीं, प्राय: किशारियों-किशोर विभिन्न मेट्रो स्टेशनों के द्वारों पर अपने साथी का इंतजार करते दिखाई देने लगे। इस तरह पलने और आगे बढऩे वाले युवक-युवतियां आने वाले समय में अपने बुजुर्गों और बच्चाों के लिए कितना वक्त निकाल पाएंगे, इसका अनुमान लगाने के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं हैं। इसके साथ एक पहलू यह भी जुड़ा है कि पहले नौकरियां बच्चे पालने के लिए की जाती थीं, आज मध्यम वर्ग के एजेंडे में भी अपना घर और गाड़ी शामिल हो चुके हैं। ऐसी आकांक्षाओं के साथ आज हर व्यक्ति अपने सिर पर कितना बोझ लिए घूम रहा है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
जब घर और गाड़ी आम आदमी की आकांक्षाओं में शामिल हो गए तो इससे और बदलाव भी आने ही थे। मसलन, आज घर की जगह मल्टी स्टोरी फ्लैटों ने ले ली है और लगातार बन रही आसमान छूती इमारतों के साथ भू-वैज्ञानिक इस विषय पर शोध कर रहे हैं कि दिल्ली की जमीन कितना बोझ उठा सकती है और भूकंप के लिए खतरनाक ‘जोन चारÓ में होते हुए यहां कोई विनाशकारी भूकंप अगले 70 सालों में कभी भी, किसी भी समय, कितनी तबाही मचा सकता है। आज बहुत थोड़े घर ऐसे बचे होंगे, जहां एसी नाम का जादू न हो, लेकिन यही जादू भीतर को ठंडा करके बाहर के तापमान और पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा रहा है, इसकी कल्पना कोई नहीं करता। बदलती प्राथमिकताओं को देखना है तो सुबह अपने घर के पास यदि
कोई अखाड़ा है तो उसमें पहुंचे दो-चार
पहलवानों की तुलना रोज जिम पहुंच रहे सैंकड़ों लोगों से करके देखिए। उन्हें सेहत बनाने के लिए दूध-घी की उतनी जरूरत नहीं होती, जितनी एंडयूरा की स्पेशल डाइट की। इसकी चिंता कम ही लोग करते हैं कि ये डाइट और जिम छूटने के बाद क्या होगा।
किसी भी समाज में किसी बुनियादी बदलाव में शिक्षा के प्रसार और वहां आबादी किस तादाद में बढ़ रही है, उसका अहम रोल होता है। शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ है, यह सत्य है, लेकिन इस बारे में सोचते हुए हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि आखिर प्रसार हुआ किस शिक्षा का है। सामाजिक, राजनीतिक या समाज से जुड़े दूसरे विषय अनुत्पादक मान लिए गये हैं, जिनका कुछ न कुछ सरोकार नैतिक और सामाजिक मूल्यों से भी होता है, इसलिए वे अब दरकिनार कर दिए गये हैं। आज प्राय: पढ़ाए जा रहे हैं, विज्ञान, इंजीनियरिंग और कॉमर्स से संबंधित विषय। ऐसे समाज में मानवीय और संवेदनात्मक मूल्यों का हस तो होगा ही। इस तरह की शिक्षा व्यक्ति को सिर्फ और सिर्फ अपने कैरियर पर केंद्रित कर देती है और उसके पास सोचने के लिए कुछ बाकी नहीं रह जाता। दिलचस्प बात यह है इसके साथ यह ख्वाब भी जुड़ा है कि यह शिक्षा भी यदि विदेश में हो तो और बेहतर। मैं एक ऐसे परिवार को जानता हूं, जो आज अपना सबकुछ बेच-बाचकर अपने दो बच्चों की पढ़ाई के लिए अमेरिका में बैठा है। हालांकि परिवार का मुखिया दिल्ली में अपनी सरकारी नौकरी बचाए हुए है और जब अमेरिका में बच्चों के पास जाता है तो वहां कोई प्राइवेट नौकरी कर लेता है। मैं एक ऐसे परिवार को जानता हंू, जिसने अपना घर चलाने के लिए बच्चों के नाम पर लिए एजुकेशन लोन का इस्तेमाल किया। इस तरह की शिक्षा ने हमें न बच्चों का रहने दिया और न बुजुर्गों का। आज दिल्ली में जितने वृद्धाश्रम हैं, दशक भर पहले इसकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था।
दिल्ली में आबादी का तेज गति से होता विस्तार कई तरह के नए खतरों की और संकेेत करता है। कुछ समय पहले हम दिल्ली की आबादी सवा करोड़ आंकते थे, फिर डेढ़ करोड़ और आज पौने दो करोड़। यह फर्क कुछ ही समय में आ गया है। इसका साफ मतलब है कि दिल्ली में बाहर से तीव्र गति लोगों का आगमन हो रहा है। अपने संवैधानिक प्रतिबद्धताओं के चलते हम किसी को राजधानी में आकर बसने से रोक नहीं सकते। तो फिर इसका हल क्या है? यदि इसी रफ्तार से आबादी बढ़ती रही तो कल को एक मेट्रो टे्रन के ऊपर एक और मेट्रो टे्रन चलाने की नौबत आ जाएगी। जिन फुटपाथों पर आज भी पैदल चलने वालों को चलने का रास्ता नहीं मिलता तो क्या उनके ऊपर उनके चलने के लिए हर जगह पुल बनाए जाएंगे?
दिल्ली का यह सीमाहीन विस्तार क्या गुल खिलाएगा, यह गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि ऐसी चर्चा सुनते ही हर आदमी के कान इसलिए खड़े हो जाते हैं कि कहीं यह हमारी बात तो नहीं हो रही। आज बात हो या न हो, लेकिन यदि ऑड-ईवन लाना पड़ सकता है तो भविष्य में इस विषय पर भी विचार की जरूरत महसूस की जा सकती है। वजह यह है कि दिल्ली पर इस समय आबादी का इतना ज्यादा बोझ है कि वह पहले से ही उसके नीचे दबी जा रही है। इससे ज्यादा झेलने की क्षमता उसमें नहीं है। यह इस बेहिसाब आबादी का ही परिणाम है कि पिछले कई दशकों में तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद न तो यहां सरकारी शिक्षा की हालत में कोई सुधार आ सका और न ही स्वास्थ्य सुविधाओं में।
हालांकि विकास की आंधी और बढ़ती सुविधााओं के बीच दिल्ली का जो चेहरा और चरित्र बदल रहा है, उसमें सब कुछ नकारात्मक ही नहीं है। बहुत कुछ ऐसा भी है, जो अवश्यंभावी था। खासतौर पर दुनिया के कदम से कदम मिलाने के लिए। यह सच है कि निस्वार्थ सेवा, सबसे प्रेम और त्याग जैसे शब्द आज इस महानगर क्या, देश में भी बेमानी होकर रह गए हैं। आप खुद बेशक देश या समाज की कितनी भी निस्वार्थ सेवा कर लें, लेकिन दूसरे से इसकी अपेक्षा भूलकर भी मत कीजिए। याद रखिए, आप दूसरों से अलग रास्ता चुन सकते हैं, लेकिन दूसरों को उसके लिए बाध्य नहीं कर सकते।
जब कोई असाधारण अपराध हो जाता है तो भले ही तमाम लोग विदेशी तर्ज पर कैंडल मार्च लेकर निकल पड़ते हैं, लेकिन सड़क पर किसी असहाय की मदद को लेकर की जाने वाली तमाम अपीलों का क्या हश्र होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। इसलिए मानवीय संवेदनाओं का मसला अब एक व्यक्तिगत विषय बनकर रह गया है। फिर भी इस बदलाव में बहुत कुछ सार्थक है, जिसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। हमें याद रखना होगा कि सब कुछ ऐसा ही नहीं है, जो सिर्फ नकारात्मक ही हो। भले ही कुछ लोग मेट्रो टे्रन का माहौल बिगाड़ते हों, लेकिन यदि यह ट्रेन न होती तो आज हजारों लोग रोज नौकरी के लिए नोएडा-गुडग़ांव नहीं पहुंच पाते। दिल्ली के हजारों लोग आज इसलिए नौकरी कर पा रहे हंै, क्योंकि उनकी फर्राटा बाइक दिल्ली की सड़कों पर सरपट दौड़ पा रही हैं। एटीएम के बिना तो आज हम अपने जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकते। एटीएम ने बैंकों का काम कितना घटाया है, यह भी सोचने का विषय है।
आज के हाइटेक युग की तुलना जरा आप उस समय से कीजिए जब रामलीला में राम बनवास को चले जाते हैं और पीछे से घर लौटा भरत अपने भ्राता राम को घर न पाकर ‘बोलो ए जमीं, बोलो आसमां, कहां गए मेरे भगवानÓ गाने के साथ विलाप किया करता था। उन दृश्यों को देखकर भी हम अभिभूत हो उठते थे, लेकिन आज के हाइटेक युग में हम टीवी चैनलों पर क्या देख रहे हैं कि कर्ण और अर्जुन तो महज अपना धनुष ही उठाते हैं, उस धनुष पर उन्हें तीर खुद नहीं लगाना पड़ता, वह तो संधान मात्र से अपने आप प्रकट हो जाता है। आज जब सारी दुनिया नित्य नया खोजने के सिद्धांत पर अमल कर रही है, उसके साथ हमारा भी हाइटेक होना एक जरूरत है और मजबूरी भी। यदि ऐसा नहीं होगा तो हम पिछड़े हुए कहे जाएंगे और यह ऐसा युग है कि जो एक बार पिछड़ गया, उसका फिर बराबरी कर पाना किसी तरह आसान नहीं होगा। दिल्ली दूसरों की अपेक्षा शिक्षित है और ज्यादा गंभीर सोच वाली भी, यह कई मौकों पर साबित हो चुका है।
मसलन, इसी दिल्ली ने लोकसभा चुनाव में सातों सीटें भाजपा को सौंप दी, लेकिन विधानसभा के अगले चुनाव में 70 में से 67 सीटें अकेले आम आदमी पार्टी की झोली में डाल दीं। यह दिल्ली की जनता के जागरूक होने का ही परिणाम है कि उसने दो अलग-अलग चुनावों में अपने फैसले को करीब-करीब उलटकर दिखा दिया। कहा जा सकता है कि इस बार नेताओं ने नहीं, दिल्ली की जनता ने एक नया राजनीतिक प्रयोग किया। नतीजे में आज इसी दिल्ली की जनता का बिजली का बिल आधा हो गया है और हर घर को प्रति माह बीस हजार लीटर पानी मुफ्त मिल रहा है।
ऑड-ईवन जैसे फार्मूले को इसी सरकार ने सफलतापूर्वक लागू किया है। शिक्षा का बजट बढ़ाकर दोगुना कर दिया गया है। काम और भी हुए हैं और आगे भी होने हंै। ये सारे लाभ दिल्ली की जनता की इसी समझदारी का नतीजा हैं कि उसने नेताओं को बता दिया कि अब खोखले राजनीतिक नारों से वे जरा प्रभावित नहीं होते। यह संदेश इस संकेत में भी देखा जा सकता है कि जब तक दिल्ली में होने वाले चुनाव परिणाम के पूरे नतीजे सामने नहीं आ जाते तब तक अंतिम परिणाम के बारे में कोई कुछ दावा नहीं कर सकता। किरण बेदी ने जो हार देखी उसकी उम्मीद किसने की थी। इस तरह दिल्ली शिक्षित है, सुविधााओं से युक्त है और जागरूक भी। समाज के हर तबके में यह बदलाव महसूस किया जा सकता है।
जो समुदाय अब तक भी इस बदलाव से अछूते हैं या उसमें कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं, यह तय है कि वक्त के साथ उन्हें भी बदलना होगा। इसकी बानगी आठ मार्च को महिला दिवस के मौके पर तब दिखाई दी, जब मुस्लिम समाज में तीन बार तलाक कहने और चार बीवियों की प्रथा के खिलाफ खड़ी तीन आला मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें एक बड़े अखबार के पहले पन्ने पर छपीं। इनमें पहली थीं, आल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर। दूसरी, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक जकिया सोमन और तीसरी थीं, इसी आंदोलन की सहसंस्थापक नूरजहां शफिया नियाज।
अखबार ने इन तीनों के विचारों के साथ उनकी तस्वीरें भी पहले पन्ने पर छापीं। इससे यह विश्वास पक्का होता है कि हर तबके और समुदाय में सकारात्मक बदलाव आ रहा है और इसमें अड़ंगा लगाने वाले ताकतें इसे बहुत समय तक नहीं रोक पाएंगी। इसी तरह इस समाज का चेहरा और चरित्र बदल रहा है। जरूरत इस बात की है कि सकारात्मक और प्रगतिगामी बदलावों पर उनके नकारात्मक बदलावों को हावी न होने दिया जाए। बदलाव के इसी रुख में हमारी जीत छिपी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *