भारत रत्न अटल

‘‘भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी अब नहीं हैं, पर अपनी ओजपूर्ण वाणी, प्रखर लेखनी, स्पष्ट चिंतन और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समर्पित यशस्वी जीवन के कारण वे चिरकाल तक कोटि-कोटि भारतीयों के मन-मस्तिष्क में जीवंत रहेंगे। कवि हृदय अटल जी आजीवन अजातशत्रु रहे। इतने लंबे राजनीतिक जीवन में कोई उनका शत्रु नहीं बना। वे अपने सौम्य व्यवहार से सबको अपना बना लेते थे। बातचीत में अक्सर कहते रहे कि हमारे बीच ‘मतभेद’ हो सकते हैं, पर ‘मनभेद’ नहीं होने चाहिए।’’ अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों को पुस्तक रूम में जन-जन तक पहुंचाने वाले उनके प्रिय रहे प्रभात कुमार का यह अभिमत अक्षरश: सच है। आगे वे कहते हैं कि ‘‘मॉरीशस में होने वाले ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन के प्रारंभ से पहले ही अटल जी चले गए, लेकिन छोड़ गए हैं हिंदी की समृद्ध परंपरा और थाती, जिसे सहेजना और संवर्धित करना हर हिंदी प्रेमी का दायित्व है। लंदन में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में उनकी पुस्तक ‘संकल्प काल’ का लोकार्पण हुआ था, जो उनकी संकल्प शक्ति की परिचायक है।’’ अटल जी की कविता की पंक्तियां हैं: ‘ठन गई/ मौत से ठन गई/ जूझने का मेरा कोई इरादा न था/ मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था/ रास्ता रोककर ये खड़ी हो गई/ लगा कि जैसे जिंदगी से बड़ी हो गई।’ उनकी एक और कविता है: ‘मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं/ लौटकर आऊंगा/ कूच से क्यों डरूं।’ वे तो यह भी कहते हैं: ‘आहुति बाकी यज्ञ अधूरा/ अपनों के विघ्नों ने घेरा/ अंतिम जय का वज्र बनाने/ नव दधीचि हड्डियां गलाएं/ आओ फिर से दिया जलाएं।’ वे तो इससे भी बड़ी बात सोचते हैं: ‘छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता/ टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता/ आदमी की पहचान/ उसके धन या आसन से नहीं होती/ उसके मन से होती है/ मन की कसौटी पर/ कुबेर की संपदा भी रोती है।’ अपातकाल के बाद लिखी कविता में कही उनकी बात देखें: ‘कह कैदी कविराय/ न अपना छोटा जी कर/ चीर निशा का वक्ष/ पुन: चमकेगा दिनकर।’ जनप्रिय कवि शिव ओम अंबर उनके बारे में ठीक ही कहते हैं कि ‘वे अपने-आपको पढ़ते ही नहीं रहे, अपने आपसे लड़ते भी रहे: ‘मुझे दूर दिखाई देता है/ मैं दीवार पर लिखा पढ़ सकता हूं/ मगर हाथ की रेखाएं नहीं पढ़ पाता/ सीमा के पार भडक़ते शोले मुझे दिखाई देते हैं/ पर पांवों के इर्द-गिर्द फैली गर्म राख नजर नहीं आती।’ इसे सिर्फ अटल जी का नहीं, हर संवेदनशील हृदय का आत्म कथ्य कह सकते हैं। ऐसे लोग वक्त की दीवार पर लिखे नियतिलेख तो स्पष्ट रूप से पढ़ लेते हैं, किंतु अपने हाथ की रेखाएं पढऩे से चूक जाते हैं। अपने इर्द-गिर्द पड़ी गर्म राख नहीं देख पाते, क्योंकि वे रेखाएं उनके वैयक्तिक सुख-दु:ख से जुड़ती हैं। वह राख उसके दग्ध सपनों की होती है। सामाजिकता की वेदी पर वैयक्तिकता की बलि देने का यह समर्पण मंत्र तब से चारो दिशाओं में अनुगुंजित हो रहा है, जब किसी निर्दोष क्रौंच को बहेलिए के बाण से विद्ध होता देख आदिकवि वाल्मीकि के अंतस् का शोक श्लोक बनकर फूट पड़ा था।’ वेदना-संवेदना के अक्षय हस्ताक्षर अटल बिहारी वाजपेयी का चिंतन-अनुचिंतन देश और दुनिया को देर तक और दूर तक प्रभावित करता रहेगा। भारत के प्रधानमंत्री बनकर वे राजर्षि हो गए। वह न होते तो अवश्य ही देश के बड़े ऋ षि होते या फिर रामधारी सिंह दिनकर की तरह राष्ट्रकवि होते, जिनकी कविताएं सुन और गाकर इस देश के लोग भावविभोर हुआ करते। मध्य और उत्तर भारत भले ही उनके जन्म और कर्मक्षेत्र रहे, पर कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश प्रेम और मनुष्य की रक्षा के लिए वे हमेशा कुरुक्षेत्र में धर्म युद्ध लड़ते रहे। इसीलिए सच्चे अर्थो में वे भारत रत्न हैं। देश सदियों तक उनके विचारों के साथ उन्हें याद करता रहेगा।

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