भारत-ईरान संबंधों पर बढ़ते संकट

ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों की शुरुआत और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दुनिया को इस चेतावनी के बाद कि या तो व्यापार अमेरिका से करो या ईरान से, भारत-ईरान संबंध एक बार फिर दोराहे पर आ गए। अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ कर दिया कि ईरान पर प्रतिबंधों के बावजूद जो देश ईरान के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध रखेंगे, वे अमेरिका के साथ व्यापार नहीं कर पाएंगे। गौरतलब है कि ईरान पर अमेरिका के इन प्रतिबंधों को दुनिया के इतिहास में सबसे कड़े प्रतिबंधों के तौर पर देखा जा रहा है। यह प्रतिबंध दो चरणों में लागू होंगे। प्रतिबंध का पहला चरण 7 अगस्त से शुरू हो गया है। इसके तहत डॉलर को रियाल में और रियाल को डॉलर में नहीं बदला जा सकेगा। दूसरा चरण 5 नवंबर से लागू होगा, जिसके तहत ईरान के कच्चे तेल का निर्यात करने के लिए इस्तेमाल होने वाले अमेरिकी टैंकरों पर पूर्णत: प्रतिबंध लग जाएगा। जब 2015 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कई शक्तिशाली देशों के साथ मिलकर ईरान से परमाणु समझौता किया था तो इस तरह के कड़े प्रतिबंधों से उसे मुक्त कर दिया गया था, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई अन्य संधियों की तरह इस साल मई में इस परमाणु समझौते से भी खुद को अलग कर लिया। हालांकि अब भी कई अन्य राष्ट्र इस समझौते के साथ बने हुए हैं, लेकिन अमेरिका के बिना इसका कोई महत्व नहीं रह जाता। अमेरिका नई शर्तों के साथ ईरान पर नए परमाणु समझौते के लिए दबाव डाल रहा है। इसीलिए उसने ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगा दिये हैं। ईरान पर प्रतिबंध लागू होने की घोषणा करते हुए ट्रंप ने कहा कि विश्व शांति के लिए ऐसा कर रहा हूं। हमें इससे कम कुछ मंजूर नहीं।
यह सच है कि इन अमेरिकी प्रतिबंधों से ईरान के अंदरूनी हालात बिगड़ेंगे, वहां के आम नागरिकों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन अपने पूर्व इतिहास की तरह ईरान प्रतिबंधों के आगे समर्पण करने का दूर-दूर तक इच्छुक नहीं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रतिबंधों के लागू होते ही दुनिया को चेतावनी देते, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी उससे पहले ही उन्हें इस बाबत चेतावनी दे चुके थे। एक अरसा पहले ईरानी राष्ट्रपति ने अपने राजनयिकों के एक सम्मेलन में कहा था कि ईरान शांति चाहता है, लेकिन यदि अमेरिका ने उस पर यु़द्ध थोपने की कोशिश की तो इसके नतीजे उसके लिए बहुत बुरे होंगे। तब रूहानी ने ट्रंप को चेतावनी देते हुए कहा था कि टं्रप महाशय, शेर की पूंछ से न खेलो, तुम इस स्थिति में नहीं कि हमें अपनी सुरक्षा और हितों के खिलाफ चलने के लिए मजबूर कर सको। रूहानी ने यह बयान मीडिया में आई उन खबरों के बाद दिया था, जिनमें कहा गया था कि अमेरिका ईरानी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है।
जाहिर है कि इन प्रतिबंधों का असर भारत-ईरान रिश्तों पर पडऩा तय है। खासतौर पर उस स्थिति में जबकि भारत चीन के बाद ईरान से दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। इसके अलावा ईरान भारत से बड़े पैमाने पर चावल और चाय का आयात करता है। अब आगे ईरान का यह आयात भी इस पर निर्भर करेगा कि भारत उससे कितना तेल आयात करता है। भारत और ईरान इसी तरह की अप्रिय स्थिति का सामना सन् 2015 से पहले भी कर चुके हैं जब अमेरिका ने इसी तरह के प्रतिबंध ईरान पर लगाए थे। शायद यही वजह थी कि भारत को जैसे ही प्रतिबंधों की भनक लगी, भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का यह बयान आ गया कि भारत किसी देश पर लगाए गए सिर्फ संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों को ही मान्यता देता है, अन्य किसी भी देश के प्रतिबंधों को नहीं, लेकिन जैसे ही यह प्रतिबंध लागू हुए भारत के तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री अशोक प्रधान का बयान आया कि भारत अपनी लाभ-हानि के अनुसार तय करेगा कि उसे किस देश से कितना तेल आयात करना है और कितना नहीं। इसके साथ ही भारत का ईरान से प्रतिदिन 7 लाख बैरल तेल आयात करने का आंकड़ा घटकर साढ़े पांच लाख बैरल पर आ गया। गौरतलब है कि यह स्थिति सिर्फ ईरान के लिए ही नहीं, भारत के लिए भी फिक्र की बड़ी वजह है।
जब 2015 से पहले ऐसी अप्रिय स्थिति बनी थी, उसके बाद से भारत और ईरान ने दोस्ती के कई नए आयाम तय किए हैं। हालांकि तब भी भारत ने बैक डोर डिप्लोमेसी के जरिए ईरान को अपनी स्थिति और मजबूरी से अवगत कराया था और उसने उसे समझते हुए द्विपक्षीय व्यापार में भारत को कई सहूलियतें दी थीं। इन्हीं में से एक छूट के अनुसार भारत को तेल की कीमत विदेशी मुद्रा में देने के बजाय रुपये में चुकाने की छूट दी गई थी। उसके बाद प्रतिबंध भी हट गए और भारत-ईरान एक-दूसरे के और करीब आए। ईरान के साथ संबंधों में भारत को एक बड़ी कामयाबी तब मिली जब ईरान ने भारत से अपना चाबहार बंदरगाह विकसित करने का अनुबंध किया। यह भारत की बड़ी कामयाबी थी क्योंकि इससे भारत और काबुल के बीच की दूरी घटकर दिल्ली-मुंबई जितनी रह गई। इसे अफगान-भारत रणनीतिक हितों की सुरक्षा की गारंटी माना गया।
इस स्थिति में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों से भारत का तिलमिलाना स्वाभाविक था। जाहिर है कि इन हालात में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध भारत के लिए कोई छोटी मुसीबत नहीं हैं। हालांकि सन् 2015 से पहले लगे अमेरिकी प्रतिबंधों की तरह ही भारत एक बार फिर ईरान को बैक डोर डिप्लोमेसी के जरिए अपनी मजबूरी समझाने में कामयाब होता दिख रहा है। प्रतिबंध में भारत को शामिल होता देख ईरानी राजदूत ने पहले कहा था कि यदि ऐसा होता है तो भारत को द्विपक्षीय व्यापार में मिलने वाली सारी सहूलियतें खत्म कर दी जाएंगी। उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि भारतीय कंपनियां चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के काम में ढिलाई बरत रही हैं, लेकिन बाद में उनके सुर बदल गए। इस तरह प्रतिबंध लगने पर शुरू में उसने भारत के खिलाफ जो तल्खी दिखाई थी, वह धीरे-धीरे कम हुई है और अब वह कुछ नरम होता दिख रहा है। इसे भारत की बैक डोर डिप्लोमेसी की कामयाबी माना जाना चाहिए। यह सही है कि भारत अमेरिका से अपने संबंधों की अनदेखी नहीं कर सकता। खासतौर पर उस स्थिति में जबकि उसने भारत को हिंद और एशिया प्रशांत में अपना विषेष रणनीतिक और व्यापारिक भागीदार घोषित कर दिया है। दक्षिणी चीन सागर में भी छोटे राष्ट्रों की चिंता के लिए वह भारत की तरफ आशाभरी निगाहों से देखता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस पर होने वाले समारोह में भारत के मुख्य अतिथि बन चुके हैं और उम्मीद की जा रही है कि अगले साल उसी समारोह में डोनाल्ड ट्रंप भारत के मुख्य अतिथि होंगे। जाहिर है कि यह कृपादृष्टि अकारण नहीं है, लेकिन इससे यह तो मानना पड़ेगा कि दिल्ली में नई सरकार आने के बाद से अमेरिका भारत से रिश्तों को कहीं ज्यादा तरजीह देने लगा है। इस स्थिति में भारत को भी इन रिश्तों को तवज्जो देनी ही चाहिए। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि एकध्रुवीय दुनिया में कोई महत्वपूर्ण राष्ट्र अमेरिका जैसी महाशक्ति की अनदेखी कर आगे नहीं बढ़ सकता। भारत काफी समय से कई मोर्चों पर अमेरिकी समर्थन की बाट जोहता रहा है। यह समर्थन अनेक मौकों पर इसी कारण मिला भी है कि अब हम भी उससे अपने रिश्तों को तरजीह देते हैं। जाहिर है कि अन्य राष्ट्रों से दोस्ती अपनी जगह है, लेकिन कोई भी दोस्त अमेरिका की जगह नहीं ले सकता।
जाहिर है मौजूदा परिदृश्य में भारत-ईरान रिश्ते जिस दोराहे पर खड़े हैं, वहां लाख टके का सवाल यही है कि भारत-अमेरिका रिश्ते तो महत्वपूर्ण हैं ही, लेकिन क्या ये रिश्ते किसी तीसरे देश से दोस्ती न रखने की कीमत पर भी निभाए जाने चाहिए? असल में विदेश कूटनीति की मौजूदा दुनिया में हम ही नहीं, अमेरिका जैसी महाशक्ति भी किसी देश से अपने संबंधों को लाभ-हानि की तुला पर ही तौलती है। फिर भी, सभी देशों से कूटनीतिक संबंधों में कोशिश यही रहती है कि कुछ न कुछ रिश्ते हर जगह बने ही रहें। यदि भारत जैसा कोई देश मौजूदा हालात में ईरान के साथ अपने रिश्ते निभा ले जाता है तो इसे ही सफल कूटनीति कहा जाएगा।
उम्मीद करनी चाहिए कि भारत ने जैसे पिछली बार ईरान पर लगे प्रतिबंधों के समय उसे बैक डोर डिप्लोमैसी से समझाने में कामयाबी हासिल की थी, ऐसा ही इस बार भी होगा। बेशक अमेरिका हमारी प्राथमिकता या मजबूरी है, लेकिन इस वजह से हमें ईरान जैसे दोस्त राष्ट्र से अपने संबंधों को बलि देने की जरूरत नहीं पडऩी चाहिए।

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