बहुत कह लिया, अब अलविदा

आज एक लेखक के रूप में जाना जा रहा हूं, वह भी हिंदी का लेखक, और यह पहचान मैं करीब चालीस साल से जी रहा हूं…लेकिन सवाल यह है कि इस पहचान का अंकुरण मेरे भीतर कैसे हुआ, जबकि मैं बखूबी जानता हूं कि शुरुआती परिस्थितियां इस नतीजे के अनुकूल बिल्कुल न थीं। चलिए, मैं अपनी जि़न्दगी खंगालता हूं ताकि उस आदि बिंदु तक पहुंच पाऊं, जिसने मेरे लेखक बनने की राह खोली।
देश के आजाद होने के साथ ही आंख खोली (सन् 1946 )। पहला व्यवधान यह कि अंग्रेजी स्कूल, वुडलैंड मसूरी से पढ़ाई की शुरुआत हुई और दूर तक जहां भी पढ़ा, अंग्रेजी के माहौल में ही पढ़ा। मोंटेसरी स्कूल, सीतापुर और आगे की शिक्षा बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में और वहां पढ़ा भी क्या? विज्ञान और गणित, जिसके लिए अंग्रेजी माध्यम अनिवार्य रूप से अनुकूल माना गया। इस पढ़ाई का रास्ता खुला इंजीनियरिंग की ओर। इसके लिए रक्षा उत्पादन की इकाई इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी की चार साल की इंजीनियरिंग अप्रेंटिसशिप में स्थान जुटाया, बाकायदा अखिल भारतीय प्रतियोगी परीक्षा पास करके। यहां भी माहौल अंग्रेजी का ही रहा। करेला नीम चढ़ा, जो कैरियर के अंतिम तीस बरस अमेरिकन संस्कृति की भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी में बिताए, जहां लिखना शत-प्रतिशत अंग्रेजी में था, बोलचाल में भी हिंदी का प्रयोग बस छौंक भर होता था। इसके बावजूद अशोक गुप्ता नाम का प्राणी हिंदी का लेखक बन बैठा। चर्चा इसी की है कि यह हुआ कैसे?
मां की पृष्ठभूमि हिंदी की थी। वह प्रयाग महिला विद्यापीठ में महादेवी वर्मा की छात्रा रही थीं। पिता काशी विद्यापीठ, बनारस से शास्त्री की डिग्री पा गए थे। घर में हिंदी और अंग्रेजी की किताबों का अंबार था तो थियोसोफिकल मौंटेसरी स्कूल, सीतापुर की बच्चों की लाइब्रेरी हिंदी-अंग्रेजी की किताबों का भंडार। तो बंधु, थोड़ा-सा कह सकता हूं कि मेरे भीतर लेखन के बीज बहीं किताबों से आए, जो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में गायकवाड़ लाइब्रेरी तक पहुंचकर मेरे भीतर हलचल रचने लगे।
कुछ-कुछ कविताएं, यों ही कहानियां सन् 64 में ही लिखी जाने लगीं। दैनिक ‘आज’ और लघुपत्रिका ‘मराल’ में जब वे छपीं तो बनारस में था। सन् 1966 में कानपुर पहुंचा इंजीनियरिंग अपरेंटिस बनकर, जहां बचकाना ठहर गया मेरा लेखन तो पढऩे का दौर और गहराया। राजनीतिक सामग्री का पठन-पाठन यहीं हुआ, हालांकि यह मुझे बहुत पकड़ नहीं पाया, लेकिन वामपंथी रंग मुझे अपना-सा लगने लगा। सन् 1973 में लखनऊ आना हुआ। यहीं यशपाल और भगवतीचरण वर्मा से भेंट होने लगी। एकाध बार अमृतलाल नागर से भी मिलना हुआ और सबका सन्देश यही था कि खूब पढ़ो और लेखन के भीतर से फूटने का ईमानदारी से इंतजार करो। आये तो उसका स्वागत करो, अन्यथा चिंता मत करो। सो, इस बीच छिटपुट लिखना तो होता रहा, लेकिन लिखा हुआ कुछ संजोकर रखना नहीं हुआ। इसी बीच एक और सीख मिली कि ‘पहले तुम खुद को लेखक मानोगे, तभी कालांतर में यह संभावना बनेगी कि तुम लेखक कहे जाओ।’ इस प्रज्ञा के तहत मैंने खुद को लेखक मानना शुरू कर दिया। लेखक को खूब पढऩा चाहिए, इस नाते पढऩे पर ज्यादा जोर देता रहा। ‘सारिका’ की लत यहीं से लगी। और मैं ऐसा लेखक बन गया, जिसकी कोई भी रचना कहीं छपी न थी। भले ही इधर-उधर पर्चियों-पन्नों में लिखा हुआ बहुत कुछ था, जो न तो संजोया हुआ कहा जा सकता था, न ही फेंका हुआ। एक समुदाय विशेष की पत्रिका ने मेरी लघुकथाएं खूब छापीं, जिसका सर्कुलेशन सीमित था। सो, मामला ‘जंगल में मोर नाचा’ जैसा बना रहा।
सन् 1976 में फरीदाबाद आना हुआ और पीछे ‘सारिका’ दिल्ली आ गई। इसी दौर में वरिष्ठ कथाकार बल्लभ डोभाल द्वारा जैनेन्द्र जी के एक आयोजन में पहुंच गया, जहां एक किताब पर चर्चा होनी थी और बल्लभ के सौजन्य से वह किताब मैंने पढ़ी। सब बोले तो अंत में मैंने भी हाथ उठाया और बोला। मेरे बोलने में बहुत से वक्ताओं के प्रति असहमति का भाव था और मुझे नहीं मालूम था कि उनमें शहर के कुछ तोप लोग भी शामिल हैं। गजब कि जैनेन्द्र के सुपुत्र प्रदीप ने कहा कि अपनी बातों को आलेख के रूप में लिख दूं। मैंने लिखकर उन्हें सौंपा तो कुछ दिन के बाद वह ‘नवभारत टाइम्स’ में छप गया। इसी दौर में जैनेन्द्र और भवानी भाई का सानिध्य मिला।
‘सारिका’ के दिल्ली आने पर मैं बौखल की तरह टटोलते हुए 10 दरियागंज पहुंचा और वहां कन्हैयालाल नंदन द्वारा थाम लिया गया। पता चला कि वही दिल्ली में ‘सारिका’ के संपादक हैं और उस दिन जैनेन्द्र की गोष्ठी में उन्होंने मेरी गदहा पचीसी देखी थी। उनके पीठ थपथपाने ने हौसला बढ़ाया और मैंने ‘सारिका’ को कहानी भेज दी और उस पहली कहानी से ही ब्रांडेड कहानीकार हो गया। फिर तो लघुपत्रिकाओं में भी कहानी-कविताएं भेजना शुरू कर दिया। ‘लहर’ और ‘संबोधन’ से नाता जुड़ा। कोलकाता से अशोक जोशी के संपादन में प्रकाशित ‘आने वाला कल’ ने निरंतर कविताएं छापीं और ‘सारिका’ एवं ‘हंस’ में कहानिया भी ंलगातार छपती रहीं। राजेन्द्र यादव ने अपना प्रिय कथाकार कहना शुरू कर दिया, जिसने मुझे कथाकारके रूप में स्थापित कर दिया।
एक ओर कॉर्पोरेट में नौकरी थी, जहां इस बात का अवसर नहीं था कि गोष्ठियों में पहुंचकर मेल-जोल बढ़ाया जा सके। संभव बस इतना था कि लिखो, डाक से भेजो और इंतजार करो कि ऊंट किस करवट बैठता है। मेरा सौभाग्य कि कहानियां भेजना सार्थक रहा। लगभग हर पत्रिका और अखबार में छपने का अवसर मिला। इस तरह कोई भी संग्रह आने से पहले मेरी चालीस कहानियां प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी थीं।
मेरा अपना निर्णय था कि कॉर्पोरेट से मुक्त होकर मन का काम करूंगा। इस क्रम में कई प्रकाशन संस्थानों से जुडक़र संपादन करने का अवसर मिला। यहीं राजपाल एंड संस में विश्वनाथ जी का सानिध्य मिला। उन्होंने मुझे पहचाना और बिना किसी पूर्व अनुभव के अनुवाद का काम सौंपा। मेरा पहला अनुवाद था बेनजीर भट्टो की जीवनी ‘डॉटर ऑफ द ईस्ट’, जो हिंदी में ‘मेरी आप बीती’ शीर्षक से छपा। राजपाल एंड संस से कलाम साहब की किताब ‘टर्निंग प्वाइंट’ का अनुवाद भी छप गया तो अनुवादकों की जमात में भी शमिल होकर बाकायदा वह भी बन लिया। ‘सारिका’ की ‘सर्वभाषा कहानी प्रतियोगिता : 1982’ में ‘इतिहास का रास्ता’ पुरस्कृत हुई। ‘सारिका’ में ही ‘कथा पीढ़ी विशेषांक’ में अपनी पीढ़ी के चयन में मेरी कहानी ‘इसलिए’ आयी। रहस्य और अपराध की कहानी प्रतियोगिता ‘कथादेश’ और सनुर्नो ने आयोजित की, जिसमें ‘पार्क स्ट्रीट : पटाक्षेप’ चुनी गयी। 21 हजार रुपये के पुरस्कार के साथ इस कहानी का अंग्रेजी और फ्रेंच में अनुवाद का कॉन्ट्रेक्ट भी हुआ। पांच कहानी संग्रह, दो उपन्यास और कुछ विविध विषयक किताबें भी मेरे नाम हैं। छठा संग्रह और तीसरा उपन्यास मेज पर है।
प्रिय पुस्तकों में ‘शेखर : एक जीवनी’ का नाम सबसे पहले आता है। जितनी बार पन्ने पलटता हूं, उतनी बार मेरे लेखक और व्यक्ति को नया प्रकाश मिल जाता है। पसंदीदा लेखकों में मोहन राकेश हैं। उनकी रचनाओं से अधिक उनकी डायरी में जीवन है। उदय प्रकाश पसंद हैं। कमलेश्वर का ‘कितने पाकिस्तान’ पढ़ा। नए शिल्प में बड़े फलक का उपन्यास है। मार्केस के ‘एकांत के सौ वर्ष’ और कोहिलो के‘एल्केमिस्ट’ ने प्रभावित किया। ऊर्जा का स्रोत तो मेरा परिवार ही है। मित्र मंडली और ‘ककहरा’, जिसे हमने सन् 2011 में शुरू किया था। उसके साथ मित्र के रूप में प्रोस्टेट कैंसर है। उसका साथ भी चल रहा है…

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