फिर बजे चुनावी बाजे

राजस्थान में चुनावी घमासान शुरू हो चुका है। रैलियां निकाली जा रही हैं, सभाएं हो रही हैं। भाजपा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ‘सुराज गौरव यात्रा पर हैं तो कांग्रेस इसके जवाब से जगह-जगह ‘संकल्प रैली’ कर अपना चुनावी रथ दौड़ा रही है। चुनाव की इस रेलम-पेल के बीच ही राजनीतिक अटकलें शुरू हो गई हैं। कयास लगाया जा रहा है कि किस पार्टी की बनेगी सरकार और कौन होगा मुख्यमंत्री। यही आजकल चर्चा का विषय है।
राजस्थान के पिछले चुनावी इतिहास के पन्ने पलटें तो कई दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। एक तो यही कि पिछले पच्चीस सालों से कांग्रेस और भाजपा की ही एक के बाद एक सरकारें बनती रही हंै। इसमें भी पिछले बीस सालों में हुए चार चुनावों में अशोक गहलोत (कांग्रेस) और वसुन्धरा राजे (भाजपा) बारी-बारी से मुख्यमंत्री बने हैं। सन् 1993 में भाजपा की भैरोसिंह शेखावत सरकार के बाद सन् 1998 में अशोक गहलोत, सन् 2003 में वसुंधरा राजे, सन् 2008 में अशोक गहलोत और सन् 2013 में फिर वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनीं। इसलिए लोगों के बीच दिलचस्प सवाल घूम रहा है कि क्या इस बार सन् 2018 के चुनाव में कांग्रेस और अशोक गहलोत की बारी है?
हालांकि कांग्रेस में इस बार मुख्यमंत्री का सवाल काफी विकट बन चुका है। एक तरफ जहां अशोक गहलोत को राजस्थान में कांग्रेस का चेहरा बताया जा रहा है, वहीं दूसरी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार बताया जा रहा है। गहलोत समर्थक मजबूती से यह पक्ष रख रहे हैं कि सचिन पायलट प्रदेश में पार्टी का नेतृत्व करने के बावजूद कोई करिश्मा पैदा नहीं कर पाए हैं, जबकि सचिन पायलट के समर्थकों का कहना है कि इनके नेतृत्व में ही पार्टी ने राजस्थान में पिछले दिनों हुए उप चुनाव में भाजपा से तीन सीटें छीनी हैं-दो लोकसभा की और एक विधानसभा की।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अशोक गहलोत ने लोगों के बीच अपनी अच्छी छवि बनाई है और पार्टी में भी वे बहुत लोकप्रिय हैं। एक लंबे राजनीतिक जीवन में उन पर कोई दाग नहीं है। सन् 1974 में वे पहली बार एनएसयूआई के अध्यक्ष बने। केंद्र में मंत्री रहने के बाद सन् 1985 में राजस्थान के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनकर आए तो उन्होंने युवाओं में एक नया जोश फंूका। पूरे प्रदेश में युवाओं की एक नई फौज तैयार हो गई। अपने गांधीवादी व्यवहार और साफ सुथरी छवि के चलते वे आज भी लोगोंं और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं।
कांग्रेस पार्टी पूरे देश में जब संकट के दौर से गुजर रही थी, तब अशोक गहलोत पार्टी के लिए एक बड़ा संबल बन कर आए। पंजाब चुनाव में उन्हें प्रभारी बनाया, जहां कांग्रेस ने अच्छी जीत हासिल की। गुजरात तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राज्य है, जो कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन गुजरात चुनाव में पार्टी प्रभारी के रूप में अशोक गहलोत ने जो भूमिका निभाई, उससे उनका आभा मंडल और चमक गया। कर्नाटक में तो बाजी पलटने का श्रेय ही अशोक गहलोत को मिला। इन सबके चलते पार्टी ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय महामंत्री पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। अशोक गहलोत मानो कोई जादूगर हैं, वर्तमान राजनीतिक दौर की कांग्रेस में जिनका जादू चल रहा है। इसलिए उन्हें कम करके नहीं आंका जा सकता।
उधर, सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट का राजस्थान की राजनीति में बड़ा दबदबा था। सचिन ने भी कम उम्र में ही बड़ी सफलताएं देख ली हैं। केंद्र में मंत्री रह ही चुके हैं और अब राजस्थान में पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। यह सही है कि राजस्थान में राजेश पायलट ने लोकप्रियता की जिन बुलंदियों को छुआ, वहां तक अभी सचिन पायलट को पहुंचना है, लेकिन उन्होंने राजस्थान में पार्टी को एक नया आधार तो दिया ही है। प्रदेश में उन्होंने जब पार्टी की कमान संभाली, तब हालात बहुत खराब थे। आज स्थिति में काफी सुधार हुआ है और कांग्रेस तेजी से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।
वैसे मुख्यमंत्री के सवाल पर अशोक गहलोत कह चुके हैं कि ‘यह फैसला विधायकों और कार्यकर्ताओं की राय पर आलाकमान करता है। हमारी पहली प्राथमिकता पार्टी को फिर से मजबूत करना है। मुख्यमंत्री का मुददा इसके बाद आता है।’ चुनाव में जहां भाजपा अपने विकास को एजेंडा बनाकर मैदान में उतर रही है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि सरकार ने पांच साल में कुछ भी नहीं किया और वह जनता से किए गए वादों पर खरी नहीं उतरी। अशोक गहलोत तो एक रैली में कह चुके हैं कि भाजपा को अपनी सीटें अंगुलियों पर गिननी पड़ेंगी।
कांग्रेस की संकल्प रैली में जिस तरह भीड़ उमड़ रही है, उससे राजस्थान की तस्वीर इस बार बदलती हुई दिख रही है। जुलाई में करौली में हुई संकल्प रैली में हालत यह हुई कि सडक़ों पर तीस किलोमीटर तक जाम लग गया। अशोक गहलोत और सचिन पायलट को मोटरसाइकिल पर बैठ कर निकलना पड़ा। सचिन पायलट बाइक चला रहे थे और अशोक गहलोत पीछे बैठे थे। इस पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की प्रतिक्रिया थी-‘बाइक पर दोनों की तस्वीर देखकर ही मुझे लग गया कि हमने राजस्थान जीत लिया है।’ नतीजा जो भी हो, लेकिन राजस्थान में कांग्रेस का जोश इस बार देखते ही बन रहा है।

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