प्रधानमंत्री की भावना मनभावन

विकास की ऊँची छलांग लगाने के दावों के बीच, आज भी देश में बहुत कुछ ऐसा अनपेक्षित घट रहा है जिसके चलते सभ्य समाज और नागरिकों का एक बड़ा तबका खुद को असुविधाजनक स्थिति में पाता है। उसे सबसे ज्यादा परेशानी आर्थिक मोर्चे पर है। एक तरफ अमीरी की रोज-ब-रोज ऊँची उठती मीनारें हैं तो दूसरी ओर अकल्पनीय दयनीय गरीबी है। आर्थिक असमानता की खाई दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आँकड़ों के अनुसार मु_ी भर घरानों के हाथ अकूत दौलत है और लगभग 80 प्रतिशत आबादी विपन्न है, किंतु अमीरी गरीबी के अंतर से निर्मित स्थिति का सच हाशिये पर है। मिसाल बतौर, खुदरा व्यवसाय और निर्माण क्षेत्र में हालिया शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति चिंताजनक मुद्दा है, लेकिन बीते तीन दशकों में विदेशी पूंजी के खतरे को लेकर शोर मचाने वालों की एफडीआई पर रहस्यमय चुप्पी अपने आपमें एक बड़ा सवाल है। लाखों छोटे छोटे देशी कारोबारियों के रोजगार पर आने वाले संभावित संकट पर प्रमुख समाचार माध्यम भी खामोशी साधे हुए हैं। किसी को वातावरण गर्म होने की प्रतीक्षा है तो किसी को मुखर होने की स्थिति में विज्ञापन कटौती की चिंता सता रही है। जानकारों के अनुसार धनपतियों और धनाढ्य राजनेताओं का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में समाचार माध्यमों के स्वामित्व पर कब्जा भी मौन रहने की एक बड़ी वजह है।
आँकड़े बताते हैं कि जब देश स्वतंत्र हुआ था तब गरीबी अधिक थी, किंतु अमीरी गरीबी के बीच आज जैसा फासला नहीं था। बीते सात दशकों में निर्धनता से निजात पाने के लिए सडक़ से लेकर सदन तक चर्चा होती रही है। तब से आज तक, विपन्नता मुक्त भारत के निर्माण के लिए सैकड़ों कार्य योजनाएं बन चुकी हैं. कुछ पर जमीनी अमल भी हुआ है, लेकिन इसके बावजूद दिनों दिन बढ़ती आर्थिक असमानता चिंता का विषय है। आर्थिक विषमता कितनी गहरी है, इसका अनुमान देश के सबसे अमीर और गरीबी सीमा रेखा के नीचे जीने वालों के बीच आकाश और पाताल जैसी दूरी को देखकर लगाया जा सकता है। देश के सबसे बड़े दौलतमंद मुकेश अंबानी की सकल परिसम्पत्ति 22.7 बिलियन यू एस डॉलर है, जबकि रंगराजन कमेटी ने ग्रामीण क्षेत्र में 32 रुपया और शहरी क्षेत्र में 47 रुपया रोज कमाने वाले को बीपीएल माना है। सन 2005 की सीमा रेखा पर आधारित सन 2011 में की गयी सरकारी गणना के अनुसार देश की 22 प्रतिशत आबादी गरीबी सीमा रेखा के नीचे है। आक्सफाम की एक रपट के अनुसार कुल आबादी की सकल कमाई का 73 प्रतिशत केवल 1 प्रतिशत लोगों के पास है। ‘फोब्र्स’ पत्रिका के अनुसार देश के सबसे अमीर आदमी के पास, दसवें पायदान के धनी, 5 बिलियन डालर के स्वामित्व वाले शशि और रवि रूईया से चार गुना से अधिक सम्पत्ति है। यानी अमीरों के बीच संपातिक अंतर गहरा है। जानकारों के अनुसार 99 प्रतिशत लोगों की सकल मिल्कियत के बराबर सम्पत्ति 1 प्रतिशत लोगों के पास है। सबसे धनाढ्य मुकेश अंबानी की रोज की कमाई को लेकर अलग अलग दावे हैं। मोटे तौर पर माना जाता है कि उनकी रोज की आमदनी करोड़ों रुपये की है। जानकारों के अनुसार अंबानी को अपनी ही कंपनी के सीईओ के रूप में मिलने वाला वेतन 1.3 करोड़ प्रति माह है यानी 4 लाख 10 हजार 9 सौ 50 रुपया प्रतिदिन, विभिन्न प्रकार के भत्ते और सुविधाएँ अलग से। आर्थिक असमानता के साथ वैचारिक गिरावट, राजनैतिक मूल्यों का ह्रास, पैर पसारती संवेदन शून्य भौतिक दृष्टि, प्रशासनिक असंवेदनशीलता, बढ़ता जाति विभेद, मजहबी तनातनी, शत्रु देशों के नापाक इरादे, आतंकी गतिविधियाँ, सीमा पर जवानों की शहादत, रोजगार की कमी, मंहगाई, शिक्षा प्रणाली में नित्य नये बदलाव आदि से उपजी समस्यायें सामने हैं, किंतु नीतियां पूंजी की ओर ज्यादा झुकी हुई हैं। उसका बड़ा हिस्सा बाजारवादी सोच से रंगीन है। सेंसेक्स का उतार गरीबी और संपन्नता का पैमाना बन चुका हैं। अवसरवादी पूंजीपति बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं, विरोध के स्वर को हताश करने के लिए उन्होंने मीडिया की दुखती नब्ज पकड़ ली है और विज्ञापन तथा बख्शीश को अपने मतलब के औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। टीवी पर बिना नागा आने वाली नकारात्मक बहस को देख-सुन कर ऐसा लगता है कि व्यावसायिकता जमीनी मुद्दों को निगल चुकी है। सोशल मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। वहाँ मन माफिक तिलिस्म बुनने के लिए वेतनभोगी बिठाये गये हैं।
अमीरी गरीबी की तरह ही सीमा पर संगीन तनातनी और आतंकवादियों की घुसपैठ की कोशिश बहुत गंभीर मुद्दा है। सरहद पर आये दिनों जवानों की शहादत इसका सबसे दुखद पहलू है। खून के आँसू रुलाने वाले इस संवेदनशील मसले पर भी बहस गंभीर नहीं है। चर्चा शहीदों की कुर्बानी से शुरू होती है, लेकिन कुछ आगे बढ़ते ही बहसबाज एक दूसरे की जायज-नाजायज मीन मेख निकालने लगते हैं। बहस में शामिल होने वाले विभिन्न राजनैतिक दल, सामाजिक संगठन से जुड़े लोग अक्सर तथ्यों के साथ मनमानी तोड़ मरोड़ और अत्यंत निम्न स्तरीय अशालीन भाषा का प्रयोग करने से नहीं चूकते। अपने को ऊँचा और दूसरे को नीचा दिखाने के लिए एक दूसरे को देश द्रोही तक कह डालते हैं। चर्चा के दौरान, मजहबी तडक़ा, तू तड़ाक और सच पर झूठ का मुलम्मा चढ़ाना, बहस को धमाकेदार बनाने के लिए आम हैं। यही हाल लगभग आतंकी हिंसा को लेकर आयोजित बहसों का भी है। सभी पक्ष कहते और मानते हैं कि आतंकवाद समूल खत्म होना चाहिए, तो फिर इस मुद्दे पर एक दूसरे पर आँख तरेरने का औचित्य क्या हो सकता है?
मोटे तौर पर किसी भी बहस के दौरान अपने अपने सत्य के नाम केवल अति पक्षपाती हुड़दंग होता है। सियासी दलों के प्रवक्ताओं या औहदेदारों की रुचि, किसी मसले के हल के लिए कोई सकारात्मक व व्यवहारिक फार्मूला पेश करने में कम और स्वंय को स्थापित करने में अधिक है। फलस्वरूप बात बनने की जगह और बिगड़ जाती है। एक समय था जब किसी मुद्दे को सकारात्मक अंजाम तक ले जाने के लिए सार्वजनिक स्तर पर बहस होती थी, लेकिन आजकल चलन उल्टा है। अब जमीनी मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए बहस होती है। बहसों का आयोजन करने वाले चैनलों की भरमार है और गंभीरता के साथ अपनी बात रखने वाले कम हैं। ऐसे में कुतर्क बहादुरों की ऐसी जमात पैदा हो गयी है, जिनका उद्देश्य केवल अपने सियासी आका को खुश रखना है और इसके लिए, वे किस हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं, इसकी बानगी टीवी पर देखने को मिलती है। 99 प्रतिशत बहसें, अहंकार से भरे, सियासी प्रहसन से भरपूर, शाब्दिक विषबाण से ओत-प्रोत होती हैं। एक दूसरे को पटखनी देने के चक्कर में बहसबाज, मूल बिंदु को दरकिनार कर केवल एक दूसरे की खाल उधेडऩे में लगे रहते हैं। अपने पक्ष को सही दिखाने बताने के लिए वे इतने विश्वसनीय अंदाज में झूठ को भी सामने रखते हैं कि सुनने और देखने वाला गच्चा खा जाये। अपने तर्क को पुष्ट करने के लिए चीख चिल्लाहट से भरी नोंक-झोंक आम है। परिणाम स्वरूप ज्यादातर बहसें बेनतीजा रहती हैं। यह जानते हुए भी नकारात्मक बहसें, कच्चे दिमागों के लिए जहर हैं. कथित होशमंद लोग ऐसा कृत्य करें और खबरिया चैनल विष भरी मसाला बहसों को अधिक से अधिक परोसें तथा इस तरह की नकलों-हरकत को रोक-थाम के लिए जिम्मेदार विभाग हाथ पर हाथ हाथ धरे बैठे रहें तो बिना कहे ही लोगों को बहुत कुछ समझ में आने लगता है।
प्राय: हर मुद्दे पर राजनीति प्रेरित गोलमोल बहसबाजी को देखते हुए लोग ये मानने लगे हैं कि ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए और सियासी तकाजों को पूरा करने के लिए लोगों का भावनात्मक शोषण किया जा रहा है, जिसकी बानगी अक्सर चुनाव-काल, हथियारों के सौदे के पूर्व और पश्चात, जन विरोधी अप्रिय निर्णय के समय की बहस के मुद्दों में देखने को मिलती हैं। चुनाव के निकट आते ही इतिहास से जुड़े कई विवाद खड़े हो जाते हैं जिस पर काफी गरमागरमी होती है जो चुनाव खत्म होने के साथ ठंडे बस्ते की शोभा बन जाते हैं।
बीते साल गुजरात विधान सभा के चुनाव के समय आरोप-प्रत्यारोप से सनी बहसें और आसन्न कर्नाटक विधानसभा चुनाव के पूर्व, सियासी माहौल को गरमाने और मतों के ध्रुवीकरण
की मंशा से मैसूर रियासत के राजा टीपू सुलतान पर छिड़ी ताजा बहस कुछ मिसाल हैं। गुजरात विधान सभा के दौरान छेड़े गए नकारात्मक
मुद्दे चुनाव के बाद ठंडे हो चुके हैं और कर्नाटक विधानसभा के चुनाव की आहट के साथ मुर्दा पड़े मुद्दे गरमाने लगे हैं।
हालिया बहसों में एक तेज बहस, लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर है जिसके पक्ष-विपक्ष में जितनी तिकड़मबाजी हुई है, शायद उतनी किसी अन्य फिल्म को लेकर नहीं हुई। पहली बार एक फिल्म को लेकर कुछ राज्यों ने सबसे बड़ी अदालत के फैसले को लागू करने में सामूहिक आनाकानी की है। यह एक अप्रिय शुरुआत है। इससे फसादी धारा को नया रास्ता मिल गया है, जबकि इसके नकारात्मक असर से वे भी भली भाँति वाकिफ हैं। आज के युवा को भले ही खुदरा और निर्माण क्षेत्र में शतप्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश के भले बुरे का पता न हो, लेकिन भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ से जुड़ी बारीक से बारीक जानकारी उसे है। इसका श्रेय खबरिया चौनलों के खाते में है, जिन्होंने सारे मुद्दों को दरकिनार करके, फिल्म से संबंधित खराब अच्छी खबरों को प्रमुखता से कवरेज दी। कुल मिलाकर इतिहास को लेकर चली बहस से और कुछ हासिल हो या न हो, लीला भंसाली की ‘पद्मावत’, फिल्मी इतिहास का हिस्सा जरूर बन गयी है। फिल्में आयेंगी और चली जायेंगी किन्तु जो दाग लगना था वह लग चुका है। गुरुग्राम में स्कूल बस में तोडफ़ोड़ इसकी नजीर है कि अंकुशविहीन, बेलगाम भीड़तंत्र क्या है? मीडिया ने यहाँ अपनी जिम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभायी, इसमें कोई शक नहीं, किंतु यदि मीडिया शुरू से व्यर्थ की बहसों को गले नहीं लगाता तो शायद वातावरण अधिक सकारात्मक रहता। जानकारों का मानना हैं कि सारा खेल चुनाव से भी जुड़ा हुआ है। एक राज्य के उप चुनाव तक फिल्म का प्रदर्शन रोकने की कोर्ट से की गयी गुजारिश उनके तर्को को संपुष्ट करती है।
इसी से मिलती जुलती बहस सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति के लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर है। गौरतलब है कि सन् 2000 में सर्वोच्च न्यायालय ने लाउडस्पीकर के प्रयोग को लेकर आदेश पारित किया था कि सुबह 6 बजे से लेकर रात्रि 10 बजे तक लाउडस्पीकर का प्रयोग सार्वजनिक जगहों पर नहीं किया जा सकता है। 18 जुलाई, सन् 2005 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश आर.सी. लोहाटी और अशोकभान की पीठ ने संविधान की धारा 141 और 142 में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए निजी आवासों, वाहन व प्रेशर हार्न, लाउडस्पीकर, पटाखों के शोर पर व्यापक दिशा निर्देश दिए। गौरतलब है कि भारत सरकार ने 14 फरवरी 2000 को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत ध्वनि प्रदूषण (विनियम और नियंत्रण) 2000 को अधिनियमित किया। वर्ष 2000 से 2010 के बीच इसमें 5 बार संशोधन किया जा चुका है।
उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रमनाथ एवं अब्दुल मोइन की दो सदस्यीय पीठ ने धार्मिक स्थलों पर बिना अनुमति के लाउडस्पीकर के प्रयोग पर नाखुशी व्यक्त करते हुए उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव और उत्तर प्रदेश प्रदूषण बोर्ड अध्यक्ष से पूछा कि ध्वनि प्रदूषण (रेग्यूलेशन एंड कंट्रोल नियम 2000) का सख्ती से पालन क्यों नहीं कराया गया? अदालत ने जानना चाहा कि धार्मिक स्थलों व अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों में कितने लाउडस्पीकर बिना अनुमति के लगे हैं। बगैर इजाजत लिये कितने चालू लाउडस्पीकर उतारे गए हैं और शोर मचाने वाले जूलूसों के विरुद्ध क्या कार्यवाही की गई है? अदालत ने दोनों अधिकारियों को हल्फनामे के साथ जानकारी 1 फरवरी, 2018 तक देने को कहा था।
उच्च न्यायालय के ध्वनि प्रदूषण के मामले के आदेश के अनुपालन में उत्तर प्रदेश सरकार ने सार्वजनिक जगहों पर बिना इजाजत लाउडस्पीकर के प्रयोग पर रोक लगा दी है। चंूकि अदालत ने शासन को ऐसे स्थानों को चिन्हित करने के लिए कहा है, जहाँ बिना सक्षम अनुमति के लाउड स्पीकर लगे हैं और निर्धारित समय सीमा के भीतर राज्य सरकार से की गयी कार्यवाही से उच्च न्यायालय को अवगत कराने के निर्देश भी दिये हैं तो राज्य शासन का कर्तव्य है कि वह ऐसा कर दिखाये। गौरतलब है कि सार्वजनिक स्थान के दायरे में धार्मिक स्थल भी शामिल हैं। लिहाजा शासन ने ऐसे धर्म स्थलों के सर्वेक्षण के आदेश दिये जहाँ बिना अनुमति के लाउड स्पीकर लगे हुए हैं। कहने को तो जाँच के हुक्म की तामील से सभी पक्ष सहमत हैं, लेकिन खालिस लखनवी अंदाज ‘पहले आप’ वाला तर्क भी साथ चस्पां है। प्रभावित पक्षों को ध्यान रखना चाहिए कि जो मासूमियत की खाल ओढ़ कर अप्रिय दलील ठोंक रहे हैं, उसका समाज पर क्या असर होना है? उस पर तुर्रा यह कि सभी पक्ष यह गाते हुए नहीं अघाते कि वे दिलोजान से माननीय न्यायालय के आदेश का सम्मान करते हैं। जब सबको फैसला शिरोधार्य है तो शुरुआत कौन से समुदाय से हो, इस पर तर्क वितर्क की आवश्यकता ही क्या है? आखिर गणना की शुरुआत कहीं न कहीं से होनी ही है। फिर ढँका छुपा एतराज किस बात का है। यदि अवैध रूप से बजने वाला लाउडस्पीकर बंद करा दिया जायेगा तो कौन-सी आसमानी आफत आ जायेगी। ध्वनि प्रदूषण से लोगों को बचाना किसी की इबादत में खलल डालना नहीं है, क्योंकि इबादत तब भी होती थी, जब ध्वनि प्रसारक यंत्र अस्तित्व में नहीं थे, लेकिन टीवी पर चलने वाली बहसों के रंग न्यारे हैं। इसकी बड़ी खासियत यह भी है कि किसी बहस के दौरान एक दूसरे को राष्ट्रद्रोही का तमगा देने वाले अगली किसी बहस में हँसते मुस्कराते गलबहियाँ करते एक दूसरे को राष्ट्रप्रेमी भी बताते हैं। उनको देशद्रोही और जूता मारूंगा जैसे असम्मानित व अपमानजनक शब्दों का कोई मलाल नहीं है। यही सारी बहसों के चरित्र का सार है। इनको देख-सुन कर बहकना खुद अपने आप को नुकसान पहुंचाना है।
इससे तो अच्छा सियासी चर्चा का विषय बना प्रधानमंत्री का हालिया साक्षात्कार है, जिसमें प्रधानमंत्री ने खुले मन से माना कि देश आज जिस ऊँचे मुकाम पर है, उसमें हर भारतीय का योगदान है। ये अपने आप में बड़ी बात है। इस हिसाब से बुनियादी विकास में सबका हिस्सा बराबर का होना चाहिए, लेकिन देखने में इसके ठीक उलट नजर आता है। इस लिहाज से मुसीबतजदा जनता को ज्यादा से ज्यादा राहत मिल सके इसके लिए बड़े सुधार की जरूरत है। इसके लिए सबसे जरूरी गरीबों के जीवन स्तर सुधार नीति को और अधिक कारगर बनाना है, बहसें की जायें लेकिन नकारात्मक सोच और भाषा वाली अंतहीन निर्णयविहीन बहसें करने वाले और कराने वाले दोनों ही सिर्फ देश और जनता को तकलीफ ही देते हैं, तो ऐसी बहसों में किसका हित है? ये सार्वजनिक रूप से क्यों आयोजित की जाती हैं? इससे हासिल क्या है-यह सत्ता और जन के चिंतन का विषय होना चाहिए।

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