पूर्वोत्तर में भाजपा की बल्ले-बल्ले

पूर्वोत्तर में भाजपा की बल्ले-बल्ले

इस बार होली भारतीय जनता पार्टी के लिए ढेर सारी खुशियां लेकर आयी। पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड के विधानसभा चुनावों में वामपंथी मोर्चा और यूपीए को तगड़ी मात देने वाली भाजपा ने मेघालय में तो महज दो सीटें जीतने के बावजूद एएनपीपी के पक्ष में विजयी अन्य गैर कांग्रेसी दलों को सरकार बनाने के लिए गोलबंद कर उसे बड़ा झटका दे दिया। 60 सदस्यीय मेघालय विधानसभा की 59 सीटों पर चुनाव हुआ था, जिसमें से 21 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के नाते कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और मणिपुर के अनुभव को ध्यान में रखते हुए अपने दो दिग्गज नेताओं-पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ और अहमद पटेल को मेघालय भेजा, लेकिन भाजपा के आगे उनकी एक न चली। भाजपा ने जनादेश को कांग्रेस के खिलाफ बताते हुए एनपीपी के कोनराड संगमा को मुख्यमंत्री के रूप में सामने कर कांग्रेस की सरकार बनाने की जुगत पर विराम लगा दिया। विधानसभा चुनाव में 19 सीटों पर विजयी रही एनपीपी को भाजपा के दो विधायकों सहित कुल 34 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, जिनमें से यूडीपी के छह, एपीडीएफ  के चार, एएनएसपीपीडीपी के दो और एक निर्दलीय शामिल हैं। मेघालय में सबसे ज्यादा सीट जीतकर कांग्रेस ने अपना सम्मान तो बचा लिया, लेकिन मेघालय में फिर सरकार बनाने की उसकी उम्मीद पर भाजपा ने पानी फेर दिया। मेघालय में गैर कांग्रेसी सरकार बनाने से पूर्वोत्तर के छह राज्यों असम, अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा से कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और अब मिजोरम में उनकी सिर्फ लालथानवाला सरकार बची है।

नगालैंड में जीत के लिए भाजपा ने बड़ा दांव खेलते हुए इस बार एनपीपी के साथ चुनावी गठबंधन किया था। यहां तक कि अपनी डगर से हटकर एक समुदाय विशेष के लोगों को मुफ्त येरुशलम यात्रा कराने जैसा लुभावना वादा भी किया, लेकिन उसे अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली। केंद्र में एनडीए के सहयोगी दल  एनडीपीपी ने अपने बलबूते पर चुनाव लड़ा था और सबसे अधिक 18 सीटों पर जीत दर्ज की, किंतु सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत उसके पास नहीं था। भाजपा को 12 क्षेत्रों मे सफलता तो मिली, लेकिन उसकी हालत भी एनडीपीपी जैसी ही थी। खंडित जनादेश के कारण दोनों दलों को बहुमत के लिए एक दूसरे की जरूरत थी। अत: दोनों ने मिलकर सरकार बनाने का फैसला कर लिया। इस सरकार को एनपीपी के दो, जदयू के एक और एक निर्दलीय विधायक का समर्थन प्राप्त है। नगालैंड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस खुद को पहले से ही सत्ता से बाहर मानकर चल रही थी। उसने  कुल आठ उम्मीदवार खड़े किए थे। आठों को हार का मुंह देखना पड़ा, लेकिन कम उम्मीदवार खड़ा करने के बावजूद ऐसे परिणाम की उम्मीद उसे न थी कि उसका खाता तक नहीं खुलेगा। नतीजे आने के बाद कांग्रेस खेमे की चिंता बढ़ गई। सूत्रों के अनुसार अच्छे प्रदर्शन के लिए कांग्रेस को बड़ी जद्दोजहद करनी होगी।

वामपंथी धारा के मजबूत गढ़ के नाम से मशहूर त्रिपुरा का विधानसभा चुनाव परिणाम वामपंथी दलों पर बहुत भारी रहा। वामपंथी खेमे को उम्मीद थी कि पश्चिम बंगाल सरकार को गंवाने से हुई किरकिरी की भरपाई त्रिपुरा से हो जायेगी। बेदाग छवि वाले माणिक सरकार फिर से सरकार बनाने में सफल रहेंगे। माणिक सरकार तो धनपुर विधानसभा से जीत गए, लेकिन त्रिपुरा में भी बंगाल की तरह वामपंथी मोर्चे को मुंह की खानी पड़ी। उसका पच्चीस साल पुराना किला ढह गया। यहां जो घटा उसकी कल्पना भी किसी ने न की थी। सन् 2013 के विधानसभा चुनाव में कुल वोट  का महज 1.87 वोट पाने वाली भाजपा को त्रिपुरा  विधानसभा के चुनाव में शानदार जीत मिली।। भाजपा और आईपीएफटी गठबंधन को 43 सीटें मिलीं, जिनमें अकेले भाजपा के 35 उम्मीदवार जीते। इसका मतलब यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पचास उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन सभी नाकाम रहे थे। तब भाजपा का खाता तक नहीं खुला था। तब वामपंथी दलों को 42.7 फीसदी वोट मिले थे। कांग्रेस के लिए तो त्रिपुरा विधानसभा चुनाव किसी दुस्वप्न जैसा रहा, जहां भी उसका खाता तक नहीं खुल सका।

त्रिपुरा में लगातार पच्चीस वर्षों तक सरकार बनाने वाली सीपीएम का मानना है कि इस बार चुनाव कठिन था। चुनाव के पहले टीएमसी और कांग्रेस के कई प्रभावी नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए थे, जिससे भाजपा को आधार मिला और वह अन्य दलों को पछाडऩे में  सफल रही। त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड में एनडीए गठबंधन की सरकार बनने से जहां भाजपाई खेमे की बल्ले-बल्ले है, वहीं कांग्रेस और वामपंथी खेमे में मायूसी। कांग्रेस को मेघालय खोने और वामपंथी मोर्चे को पश्चिम बंग की तरह त्रिपुरा भी हाथ से निकल जाने का गम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिली कामयाबी पर खुशी का इजहार करते हुए दिल्ली में पार्टी दफ्तर में आयोजित कार्यक्रम में कहा था कि वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तरपूर्व ठीक तो सब ठीक। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा को उत्तरपूर्व में मिली जीत बहुत मायने रखती है। एक के बाद एक मिल रही सफलताओं से भाजपा का कद बढ़ रहा है। भाजपा गठबंधन 22 राज्यों तक फैल गया और कांग्रेस सिकुड़ती चली गई। कांग्रेस शासित राज्यों की संख्या घटकर चार रह गयी है। इनमें पुड्डुचेरी और मिजोरम जैसे छोटे राज्य भी शामिल हैं। भाजपा को भरोसा था कि दक्षिण में कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में भी त्रिपुरा, नगालैंड और मिजोरम की कामयाबी का जादू सिर चढ़कर बोलेगा, लेकिन वहां कांग्रेस ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के बेटे को समर्थन देते हुए जनता दल की सरकार बनवाकर भाजपा को उसी के हथियार  से मात दे दी।

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