पुस्तक मेले में साहित्यकारों के रंग

पिछले कुछ दिनोंं से वे मुँह छिपाते फिर रहे हैं। सामने कोई बुद्धिजीवी या लेखक-मित्र आता दिखाई दे जाता है तो फौरन रास्ता बदल लेते
हैं। डर है कि पकड़े गए तो फिर उन्हें कठघरे
में खड़ा कर दिया जाएगा। शर्मसार होना पड़ेगा। पकड़े जाने से अधिक भय उन्हें शर्मिंदा होने
का है। चोर पकड़े जाने से ज्यादा बुरा शर्मिंदा
होने का मानता है। शर्मिंदगी इस बात की कि वह पकड़ा गया। वह चोर ही क्या जो पकड़ा जाए! जेल में सड़ रहे संत-नेता अदालत ले जाते वक्त हाथ हिलाकर मुस्कराते हैं तो इसकी वजह चरबी चढ़ी उनकी देह है। शर्म रिबाउंड हो जाती है। बेशर्मी तेरा आसरा।
बहरहाल, मुद्दा यह है कि पुस्तक मेला लगे एक हफ्ते से अधिक हो गया और उन्होंने अभी तक उस ओर का रुख नहीं किया है। सोचते हैं जैसे ये दिन कटे, शेष भी कट जाएंगे। वे तो यही दुआ मांगते है कि- ‘बजरंगबली मेरी नाव चली, जरा बल्ली कृपा की लगा देना’। तब तक प्रदर्शनी के डेरे-तंबू भी उखड़ जाएंगे, पर किस्मत की लिखी को कौन ‘मेट’ सकता है। नगर में बने मेला-माहौल ने उनका जीना हराम कर दिया है। जो भी मिलता, सीधा सवाल दागता-‘पुस्तक प्रदर्शनी में हो आए?’ ‘ना’ कहने पर चकित हो नसीहतों की झड़ी लगा देता-‘भाई साहब!’ आप जैसे प्रबुद्धजन का जाना तो बनता है। एक से एक बढिय़ा किताबें उपलब्ध हैं। वह एक अलग ही दुनिया है। ज्ञान का अकूत कोश। ऐसा न हो
कि खजाना खाली हो जाए और आप हाथ मलते रह जाएँ।’ दूसरा जले पर नमक छिडक़ता, ‘मैंने कल ही प्रदर्शनी में साढ़े सात सौ की किताबें खरीदीं। जनता टूटी पड़ रही है। क्लासिक्स की बड़ी मांग है। कारपेंटर सालिगराम तक पुस्तक-प्रदर्शनी में हो आया।’
चार बुद्धिजीवी जुटते और किसी नई आयी किताब पर चर्चा करते तो उन्हें ‘कामहीन पुरुष’ की भांति गर्दन झुका लेनी पड़ती। चोर की मां और कोठी में मुँह। वे कहना चाहते-‘उनकी रुचि पढऩे से अधिक लिखने में है। लिखने से फुरसत मिले तभी तो पढ़ेंगे और पढ़ा हुआ किसे दिखता है, लिखा हुआ तो सबको दिखता है।’ यह उनकी बुद्धि के बाहर था कि लिखे हुए में लेखक का पढ़ा हुआ साफ नजर आ जाता है। उनका मानना है कि दूसरों का लिखा पढऩे से उनकी मौलिकता नष्ट होती है। गुट-गिरोह वाले साहित्य जगत में वे अपनी मौलिक दृष्टि, मूल्य चेतना और स्वतंत्र विचारधारा के बलबूते पर ही तो जिंदा हैं’। आज तक कभी मुझ पर नकल का आरोप नहीं लगा तो महज यह मेरी ईमानदारी की वजह से। आप तो जानते हैं कि नकल को लेकर कितना कलह मचता रहा है साहित्य जगत में।
चर्चाओं और प्रश्नों की लगातार बौछारों ने उन्हें अपराध-बोध से भर दिया। पुस्तक मेले में जाना लेखकीय और सामाजिक प्रतिष्ठा का मुद्दा बन चुका था। एक किस्म की इंटेलेक्चुअल मजबूरी। सालिगराम हो आया और वे अब तक निठल्ले बैठे हैं। दो कौड़ी का सालिगराम उन्हें काँटो की तरह चुभ रहा था। बाहरी दबावों को तो वे जैसे-तैसे झेल रहे थे, पर अब बीवी-बच्चों ने भी देखा-देखी मेले में जाने की जिद पकड़ ली। श्रीमतीजी की अनेक सहेलियाँ जिनका ज्यादातर वक्त तंबोला खेलने, ताश पीटने, किटी पार्टी में जाने और सास-बहू के सीरियल देखने में बीतता है, वे भी सज-धजकर प्रदर्शनी का एक राउंड मार आयी थीं। यह दीगर बात है कि वहां उनका अधिकांश समय फूड जोन में बीता था।
झक मारकर उन्हें बीवी-बच्चों के साथ मेले में जाना पड़ा। इससे एक तीर से दो शिकार हो रहे थे। द्वार पर खड़े पुस्तक मेले के परिचित आयोजक-संयोजक ने बुद्धिजीवी की उनकी छवि का मान रखते हुए प्रसन्नता व्यक्त की कि उनके आगमन से प्रदर्शनी हरिद्वार हो गई। आयोजक ने चाय वगैरह लेने का आग्रह किया तो उन्होंने पत्नी की ओर देखा, जिसका आशय था, देखी मेरी हैसियत। तुम फिजूल में समय बर्बाद करने और कागज काला करने का आरोप लगाती हो। पहले तो एक राउंड मारकर जायजा लिया जैसे कि शादी की पार्टियों में देख लिया जाता है कि कहां चाट है, कहां गोलगप्पे, कहां मिठाइयां और कहां मेनकोर्स? खैर, बच्चों ने पंचतंत्र और हितोपदेश की कथाओं और महापुरुषों की जीवनियों के बजाय क्रिकेट, कॉमिक्स, कम्प्यूटर और परीकथाओं की ढेर सारी किताबें खरीदकर उनकी जेब ढीली कर दी। पत्नी ने भी ‘पति के घर लौटने पर’ तथा ‘पति के दफ्तर जाने के बाद’ जैसी किताबें क्रय कर उनकी जेब पर डाका डाला। ‘टेढ़ी खीर’ बनाने की रेसीपी वाली पुस्तक तो वह ढूंढ़ती ही रह गई। वह जानना चाहती थी कि खीर टेढ़ी कहां से होती है और उसे बनाया कैसे जाता है। श्रीमतीजी ने कहीं पढ़ा था कि मानसरोवर जाने वाले दुर्गम मार्ग पर चलना टेढ़ी खीर है। उसने टेढ़ी खीर की रेसीपी वाली पुस्तिका की बहुत तलाश की, पर वह किसी भी स्टॉल पर नहीं मिली। अलबत्ता एक स्टॉल वाले ने यह जरूर कहा कि बहनजी, ऐसी किसी किताब का मिलना टेढ़ी खीर है। सहसा ध्यान आया कि बिल का भुगतान करते समय यदि यह सवाल खड़ा कर दिया गया कि ‘सर! आपने अपने लिए तो कुछ लिया नहीं?’ तो क्या जवाब देंगे। खाली हाथ लौटना वैसा ही होगा जैसा प्रयाग जाकर संगम-स्नान किये बगैर लौटना। शर्माशर्मी उन्होंने सस्ता साहित्य मंडल की पेपर बैक वाली दो-तीन पुस्तकें हाथ में रखीं और डेढ़ इंची मुस्कान के साथ काउंटर पर आ धमके।

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