त्रिलोक की कविता में जीवन का परिमल

प्रतिष्ठित कथाकार और मीडियाकर्मी शशांक की अध्यक्षता में संपन्न हुए प्रख्यात कवि और प्रशासक त्रिलोक महावर के कविता संग्रह ‘शब्दों से परे के लोकार्पण समारोह में शशांक ने कहा कि त्रिलोक महावर भाषा की सादगी से जटिल समस्या की सशक्त अभिव्यक्ति करते हैं। इस अवसर पर कथाकार तेजिंदर, कवि और ‘दुनिया इन दिनों के प्रधान संपादक सुधीर सक्सेना, कथाकार भालचंद्र जोशी और रामकुमार तिवारी जैसे सिद्ध-प्रसिद्ध सर्जक उपस्थित थे। समारोह में त्रिलोक महावर ने अपनी कविताओं का पाठ भी किया।
कथाकार भालचंद्र जोशी ने कहा कि महावर की कविताओं की सादगी पाठक को अलौकिकता के भ्रम से बचाती है। रामकुमार तिवारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि भाव की अनुभूति और सोच को अभिव्यक्त करती कविता पाठक से सीधे और भावात्मक रिश्ता बनाती है। महावर की सजगता उनकी कविताओं को बाहरी बाधाओं से मुक्त करती है। यह बड़ी बात है।
‘शब्दों से परे कविता संग्रह पर टिप्पणी करते हुए जनकवि सुधीर सक्सेना ने कहा कि त्रिलोक की कविताएं जीवन के साहचर्य और यथार्थ से मुठभेड़ की कविताएं हैं, जिनमें विविध छवियां, मिट्टी की गंध और जीवन का परिमल व्याप्त है। आम आदमी की जद्दोजहद में उनकी कविताएं उसके साथ खड़ी दिखती हैं।

तेजिंदर ने कहा कि महावर की दृष्टि मौन है और त्रासद स्थितियों के बीच यथार्थ की गहराई को उकेरती है। उनकी कविताओं में संयम है और वे इसके लिए सीधे और सरल शब्दों का प्रयोग करते हैं।
अध्यक्षीय वक्तव्य में शशांक ने महावर की कविताओं की चर्चा करते हुए कहा कि ये उनकी कविताएं छत्तीसगढ़ के आदिम अंचल की छवियों को लेकर आती हंै। उनकी छोटी कविताएं आज के समय को संपूर्णता देती हैं।
समारोह के दूसरे सत्र में कवियों ने भाग लिया, जिनमें सुधीर सक्सेना (दिल्ली), महेंद्र गगन (भोपाल), तेजिंदर, संजीव बख्शी, डॉ. संजय अलंग (रायपुर), सतीश जायसवाल, रामकुमार तिवारी, नथमल शर्मा (बिलासपुर), विजय गुप्त(अम्बिकापुर), विजय सिंह (जगदलपुर), सतीश सिंह, विजय राठौर (जांजगीर) और बिलासपुर से रफीक खान, शाकिर अली, भास्कर चौधरी तथा विश्वेश ठाकरे ने अपनी कविताओं में आज की ज्वलंत समस्याओं और संवेदना को अभिव्यक्त किया।
प्रार्थना भवन, जल संसाधन परिसर, बिलासपुर में कविता विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें भालचंद्र जोशी (खरगौन), कैलाश मंडलेकर (खण्डवा), रमेश अनुपम (रायपुर), महेंद्र गगन (भोपाल) और हरिनारायण (दिल्ली) आदि ने भाग लिया।
दो दिवसीय साहित्यिक आयोजन के अगले दिन ‘आज के समय में कविता विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी। परिचर्चा में समकालीन कविता की पड़ताल करते हुए कैलाश मण्डलेकर ने अपनी बेबाक टिप्पणी देते हुए कहा कि कविता जीवन से सीधे जुडऩे का नाम है। बात को आगे बढ़ाते हुए ‘सूत्र पत्रिका के संपादक विजय सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ के संदर्भ में आज के समय की कविता ही सही मायने में कविता है और त्रिलोक महावर की रचनाएं इस बात का प्रमाण हैं।
नथमल शर्मा ने कहा कि कविता को समय के अनुकूल होना चाहिए,जो सीधी-सीधी चोट करे, जबकि रमेश अनुपम ने अपने संबोधन में कहा कि कविता में केवल शब्द ही शब्द नहीं होने चाहिए, कविता की बनावट को लेकर सजगता भी जरूरी है। ‘पहले पहल के संपादक महेन्द्र गगन ने अपनी बात रखते हुए कहा कि नैतिक एवं बौद्धिक जीवंतता का उदाहरण कविता है। ‘साम्य पत्रिका के संपादक विजय गुप्त ने हस्तक्षेप करते हुए कविता पर अपनी राय दी कि कविता बचेगी तो मनुष्यता बची रहेगी। त्रिलोक महावर ने कहा कि कविता जीवन की प्रयोगशाला में परखी जाती है। जैसे शरीर की रगों में खून का संचार होता है, वैसे ही समाज और जीवन में कविता महत्वपूर्ण है। रामकुमार तिवारी ने कविता पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि कविता के क्षेत्र में ज्यादा काम करने की आवश्यकता है। संजीव बख्शी ने कहा कि कविता के बारे में पाठक को ही तय करना होगा कि वह किसे पढ़े।
वरिष्ठ कथाकार सतीश जायसवाल ने श्रीकांत वर्मा को याद करते हुए कहा कि हमारे आसपास अच्छी कविताओं का समावेश होना चाहिए। त्रिलोक महावर सरल शब्दों में बड़ी बात कह जाते हैं। उमेश नेमा(भोपाल) ने कविता में संवेदनशीलता की जरूरत बताई, जबकि सुधीर सक्सेना ने कहा कि मनुष्य के लिए कविता की जरूरत बनी रहेगी। एक अच्छा पाठक कविता की बहुत अच्छी पहचान कर लेता है। अध्यक्षीय आसंदी से प्रसिद्ध कथाकार शशांक ने विचार व्यक्त किया कि हमारे जीवन की कविता वही होगी, जो हमारे अंदर समाहित हो सके। आज की कविता कथ्य और शिल्प के साथ मानवीय संवेदना को समाज से जोडऩे का आख्यान रचती है। परिचर्चा का संचालन प्रसिद्ध कथाकार तेजिंदर ने किया।
पहले पहल प्रकाशन, भोपाल एवं ‘कथादेश (दिल्ली) द्वारा आयोजित कार्यक्रम के दूसरे दिन भालचंद्र जोशी और हरिनारायण सहित देश भर के जाने-माने साहित्यकारों के अलावा छत्तीसगढ़ अंचल के बिलासपुर, जगदलपुर, रायपुर, कोरबा, मुंगेली, जांजगीर और अंबिकापुर के रचनाकारों ने अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई। दिल्ली, भोपाल, खरगौन और खण्डवा आदि के वरिष्ठ साहित्यकारों की उपस्थिति के चलते आयोजन की गरिमा विशेष रूप से बढ़ गई।

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