टंडन जी मेरे लिए पिता समान थे: रमन सिंह

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल बलराम दास टंडन को दिल का दौरा पडऩे के बाद बीते 13 अगस्त को उपचार के लिए रायपुर के भीमराव आंबेडकर अस्पताल में भर्ती किया गया था, जहां 14 अगस्त को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका जाना छत्तीसगढ़ सहित पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के लोगों को व्यथित कर गया।
स्व. टंडन छत्तीसगढ़ के राज्यपाल थे, लेकिन उनका राजनीतिक कार्य क्षेत्र अविभाजित पंजाब रहा। वे मूलत: अमृतसर के रहने वाले थे। शुरुआती दौर से ही आरएसएस से जुड़े और फिर यह नाता जीवनपर्यन्त बना रहा। वे आरएसएस के स्थापित प्रचारक थे। बतौर सियासतदां उन्होंने राजनीतिक पारी सन् 1951 में जनसंघ से शुरू की और खराब और अच्छे दिनों में पार्टी के साथ चले। अविभाजित पंजाब में जनसंघ और बाद में भाजपा की मजबूती में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। सन् 1953 में अमृतसर से पार्षद चुने जाने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुडक़र नहीं देखा। अपने राजनीतिक जीवन में वे सन् 1957, 1962, 1967, 1969 और 1977 में अमृतसर सेंट्रल और सन् 1997 में राजपुर विधानसभा से चुने गए। वे पंजाब में जस्टिस गुरुनाम सिंह के मुख्यमंत्रित्व में बनी पहली गैर कांग्रेसी अकाली और जनसंघ सरकार में स्थानीय निकाय मंत्री बने और फिर सन् 1977-79 एवं सन् 1997-2002 में अकाली-भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। उन्होंने किसी दबाव के आगे कभी घुटने नहीं टेके। आपातकाल में सन् 1975 से 77 तक पूरे समय जेल काटी। जेल से छूटने के बाद विपरीत स्थितियों में चुनाव लड़ा और शानदार जीत हासिल की।
उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शोक संदेश में कहा कि हमने एक सामाजिक जनसेवक खो दिया। अपनी समाजसेवा के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा। प्रधानमंत्री के ये उद्गार स्वर्गीय बलराम दास टंडन के व्यक्तित्व को रेखांकित करते हंै। उनके जैसे समाजसेवी राजनेता कम ही हुए हंै। भारत-पाक बंटवारे के समय उन्होने लंगर चलाया और बाद में भी गरीबों को मुफ्त दवाएं और खाना बांटते रहे। यह उनकी सेवाओं का ही फल था कि जिस काल में जनसंघ के इक्का-दक्का लोग ही जीत पाते थे, उस समय भी वे लगातार चुनाव जीतते रहे। स्व. टंडन जितने सिद्धांतवादी थे, उतने ही सहज-सरल भी। उनकी सादगी का एक उदाहरण उनके राज्यपाल कार्यकाल के दौरान देखने को मिला, जब उन्होंने खुद कहा कि सफर के दौरान उनकी वजह से ट्रैफिक नहीं रुकना चाहिए। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में नक्सली हलचलों के मद्देनजर महत्वपूर्ण लोगों को मजबूत रक्षा कवच दिया जाता है, लेकिन टंडन जी को इसकी लेशमात्र चिंता नहीं रही कि भीड़-भाड़ में उनकी सुरक्षा को खतरा है जबकि सन् 1991 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान उन पर आतंकी हमला हो चुका था। उनका एक और गुण उन्हेें समकालीन राज्यपालों से अलग करता है कि वे एक राजनीतिक दल के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता और नेता थे, लेकिन बतौर राज्यपाल कार्यकाल के दौरान उन पर कभी भी पक्षपाती होने का आरोप नहीं लगा। उन्होंने प्रदेश के विकास के लिए रचनात्मक भूमिका निभायी। इक्के-दुक्के विवादित प्रसंगों में भी उनकी निष्पक्षता पर कोई आंच नहीं आयी। बतौर मिसाल बिलासपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति के चयन के दौरान उन्होंने कोई दखल नहीं दिया, लेकिन जब कुछ अनिमितताएं सामने आयीं तो कड़े से कड़ा कदम उठाने से परहेज नहीं किया। इसी तरह छत्तीसगढ़ सरकार की कैबिनेट जब विकास के नाम पर आदिवासी भूविधि में सुधार का प्रस्ताव लाई तो वे निर्विकार बने रहे, लेकिन जब आदिवासी समुदाय ने पांचवी अनसूची के हवाले से नाराजगी जताई तो उन्होंने राजधर्म का निर्वाह किया। बाद में कैबिनेट ने प्रस्ताव स्थगित कर दिया और मामला शांत हो गया। उन्होंने राज्यपाल का बढ़ा वेतन और बकाया लेने से मना किया तो सभी ने उन्हें सराहा था।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने उन्हें याद करते हुए कहा कि उनका निधन मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। वे मेरे लिए पिता तुल्य थे। स्व. टंडन छत्तीसगढ़ के विकास के प्रति हमेशा सजग रहे और प्रदेशवासियों की बेहतरी से जुड़े विषयों पर हमेशा मार्गदर्शन करते रहे। प्रदेश की बहुमूल्य सेवाओं के लिए उन्हें सदा याद किया जाएगा। छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी मृत्यु के उपरांत शासकीय शोक घोषित करते हुए स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित होने वाले सभी सांस्कृतिक और अवार्ड समारोह स्थगित कर दिए। राज भवन में उनका पार्थिव शरीर जन दर्शन के लिए रखा गया और बाद में विशेष विमान से पंजाब ले जाया गया और भाजपा कार्यालय में दर्शनार्थ रखा गया। चंडीगढ़ के सेक्टर-25 के श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ। पुत्र चंडीगढ़ भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन ने मुखाग्नि दी।
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, पंजाब के राज्यपाल वी. पी. सिंह, हरियाणा के राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी, हिमाचल के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, चंडीगढ़ की सांसद किरण खेर, सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश महेश ग्रोवर, पूर्व सांसद पवन बंसल, पूर्व मंत्री मनोरंजन कालिया, पंजाब के कैबिनेट मंत्री बलराम सिंह रिंकू और पीजीआई डायरेक्टर जगतराम ने श्रद्धांजलि अर्पित की। राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने परिजनों को फोन पर सांत्वना दी।

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