जानसंख्या की भयावाह यह बाढ़

सोचते-सोचते यों ही ख्याल आया कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में तो बहुत पहले से ‘यह नगरी मराठों की है यह नारे लग रहे हैं। इसी तरह कोलकाता में बंग समाज की चर्चा आम है, लेकिन दिल्ली को लेकर अभी तक किसी राजनीतिक दल या संगठन ने यह मुद्दा नहीं उठाया कि दिल्ली में कौन लोग रहेंगे या यहां बाहर से लगातार आ रहे लोगों पर लगाम कब कसी जाएगी।

राजनीतिक दलों के लिए इस दिशा में आवाज उठाना तो वोटों के लिहाज से घाटे का सौदा है ही, यदि कोई सामाजिक संगठन भी यह सवाल खड़ा करे तो उसे भी पुरजोर विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इसकी एक वजह यह है कि जिस समुदाय या वर्ग को लेकर वह अपना विरोध दर्ज कराएगा, कम से कम वह तो उसे अपना दुश्मन मानेगा ही। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि जिस तरह मुंबई में मराठे या कोलकाता में बंग समाज अपनी अलग पहचान रखता है, उस तरह से दिल्ली का अपना कोई स्थाई कल्चर है ही नहीं, जिसकी सुरक्षा का मुद्दा हवा में परचम की तरह लहराने लगे। वोटों की राजनीति और उसके लिए अलग-अलग समुदायों की राजनीति ने दिल्ली को जनसंख्या विस्फोट के कगार पर पहुंचा दिया है।

बढ़ते-बढ़ते दिल्ली की आबादी एक करोड़ 90 लाख तक पहुंच गई। इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते जब दिल्ली की आबादी एक करोड़, सवा करोड़ और उसके बाद डेढ़ करोड़ हुआ करती थी, लेकिन आज यह दो करोड़ से महज दस लाख कम है।

फिर भी बाहर से दिल्ली में लगातार लोगों का आगमन जारी है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक आज से दस साल बाद यानी 2028 तक दिल्ली में भयावह जनसंख्या विस्फोट हो चुका होगा। तब तक दिल्ली की आबादी तीन करोड़ 72 लाख तक पहुंच चुकी होगी और यही उस समय दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर होगा। इस समय तीन करोड़ 70 लाख की आबादी के साथ टोक्यो दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है।

इसका मतलब यह हुआ कि सन् 2028 तक दिल्ली की आबादी आज की आबादी से करीब-करीब दोगुनी होगी। सवाल यह है कि क्या दिल्ली जैसा महानगर इस जनसंख्या विस्फोट को सहने के लिए तैयार है? क्या दिल्ली की इतनी बड़ी आबादी को तब पानी, बिजली और आवास जैसी वे तमाम मूलभूत सुविधाएं मिल पाएंगी, जिनके लिए उस समय दिल्ली के लोग भयावह संघर्ष कर रहे हैं?

आज जब दिल्ली की आबादी एक करोड़ 90 लाख है, तब जरा दिल्ली की जिंदगी पर गौर फरमाइए। तमाम सुविधाओं और प्रशासन की भारी मुस्तैदी के बावजूद आज भी दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है, जो गर्मियों में पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा है। बिजली यदि 24 घंटे मिल रही है तो वह भी इनवर्टर की मदद से। दिल्ली के तमाम सरकारी अस्पताल बड़ी आबादी का बोझ इस कदर झेल रहे हैं कि किसी गरीब आदमी के लिए वहां किसी इलाज की उम्मीद करना मूर्खता से कम नहीं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब यह मुद्दा उठा था कि राजधानी होने के बावजूद अभी तक दिल्ली के पास एक ही एम्स अस्पताल ह,ै जो आधुनिकतम सुविधाओं से लैस है, लेकिन वहां बाहर से आए मरीजों का इतना दबाव रहता है कि स्थानीय लोग उसकी सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते। अब सोचिए कि जब अभी यह हाल है तो एक दशक बाद क्या होगा, जब दिल्ली की आबादी पौने चार करोड़ होगी?

दिल्ली के मौजूदा हालात में अभी हमने प्रदूषण को शामिल नहीं किया है। दिल्ली को पहले से ही दुनिया के 280 शहरों में सबसे प्रदूषित शहर का दर्जा मिल चुका है। यह प्रदूषण इस हद तक फैला है कि शहर बच्चों और बुजुर्गों के लिए तो कतई सुरक्षित नहीं रह गया है। प्रदूषण इतना है कि हर साल दस हजार लोग इसी कारण अपनी जान गंवाते हैं। दिल्ली के सबसे ज्यादा प्रदूषित होने के लिए यहां बड़ी तादाद में चलने वाले वाहन और औद्योगिक इकाइयां जिम्मेदार हैं।

दिल्ली में हर रोज 1400 नई कारें सड़कों पर उतर आती हैं। करीब तीन साल पहले ही दिल्ली की सड़कों पर 8 लाख 84 हजार कारें थीं। पिछले कुछ समय में एनजीटी ने इस विषय में सख्ती दिखाई है। उसके इस आदेश के बाद कि दिल्ली की सड़कों पर दस से पंद्रह साल पुराने वाहन नहीं चलेंगे, लाखों ऐसे वाहन दिल्ली की सड़कों से हट चुके हैं।

अब जरा अनुमान लगाइए कि जब आज यह हाल है तो दस साल बाद क्या होगा, जब दिल्ली में जनसंख्या विस्फोट हो चुका होगा और दिल्ली की आबादी एक करोड़ 90 लाख से बढ़कर पौने चार करोड़ यानी लगभग दोगुनी हो चुकी होगी। राजधानी में जनसंख्या विस्फोट हो या उससे पैदा हो रहे प्रदूषण और पेयजल की समस्या जैसे मसले, ये कितने अहम हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले कुछ समय में कई मामलों में न सिर्फ स्वयं संज्ञान लिया, बल्कि कई मामलों में तल्ख टिप्पणियां भी कीं। सुप्रीम कोर्ट ने ही बार-बार इस संबंध में एनजीटी को अपने कर्तव्यों और मसलों की गंभीरता का बोध कराया।

यदि अभी स्थिति इतनी गंभीर है तो एक दशक बाद यानी 2028 में यह कितनी गंभीर हो चुकी होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। निश्चित ही यह वह समय होगा, जब हम स्थाई तौर पर मास्क लगाकर जीना सीख चुके होंगे। जैसा अब भी इसी दिल्ली के कई क्षेत्रों में होता है, हम दूध पर जितना पैसा खर्च करते हैं, उससे ज्यादा पानी पर खर्च करना होगा। और यह सब सिर्फ इसलिए होगा कि जनसंख्या विस्फोट के बाद दिल्ली की आबादी लगभग दोगुनी हो जाएगी और उसी के अनुपात में मुश्किलों का पिटारा भी भरता जाएगा। दिल्ली के लिए जो मास्टर प्लान बनाया गया है, वह एक दशक बाद बेमतलब हो चुका होगा और वह तात्कालिक दिल्ली की जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से नाकाफी होगा।

दिल्ली में बढ़ती आबादी और उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए सुविधाओं का जो जाल फैलाया जा रहा है, वह कितना खतरनाक है, समय रहते इस पर भी गौर कर लेना चाहिए। हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि अभी तो हमें इस काम के लिए जगह और पैसा उपलब्ध है, लेकिन एक समय ऐसा भी आ सकता है, जब हमारे पास पैसा तो बेशक हो, लेकिन अपनी योजनाओं को कार्यरूप देने के लिए शायद जगह ही न बचे। गौर कीजिए कि दिल्ली में मेट्रो टे्रन का जाल बिछाने के लिए हमें कितने पेड़ काटने पड़े हैं और जमीन की कितनी खुदाई करनी पड़ी है। इस खुदाई ने दिल्ली को नीचे से कितना खोखला किया होगा?

खुदा न करे दिल्ली पर भीषण भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा आ जाए तो यह शहर उसे झेलने में कितना सक्षम होगा? इसके साथ ही हमें यह भी सोच लेना चाहिए कि दिल्ली की बढ़ती आबादी के लिहाज से हमने मेट्रो का जाल तो बिछा दिया, लेकिन यदि दिल्ली की आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो जब दोगुनी हो जाएगी तो क्या इस मेट्रो के ऊपर एक और मेट्रो चला पाएंगे? शायद तब हम ऐसा न कर पाएं और हमें वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचना पड़े।

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