जब दिल्ली ही कुपोषित हो तो…

हम बात करने तो निकले थे पब्लिक हैल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया और एम्स के दिल्ली स्कूलों में कुपोषण पर किए गए सर्वे की, लेकिन लगे हाथ यदि पूरे देश में कुपोषण से संबंधित चंद तथ्यों पर नजर डाल ली जाए तो हमें वस्तुस्थिति की गंभीरता का ज्यादा अंदाजा हो सकेगा। इस समय भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, फिर भी उसे कुपोषण ने जकड़ रखा है और इस कदर जकड़ रखा है कि इसके विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था होने के जिक्र के बाद तो इस पर यकीन करना ही कठिन है। देश के 90 फीसदी बच्चों को संतुलित और पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता, जिससे उनका मानसिक और शारीरिक विकास बाधित होता है। वे न तो सेहत के लिहाज से ही फिट होते हैं और न ही शिक्षा के मानदंडों पर खरे उतर पाते हैं। यह एक तरह से कुपोषण का दुश्चक्रही है। अमीर के बजाय गरीब घर में पैदा होने वाले बच्चों के कुपोषण का शिकार होने की संभावना 2.8 फीसदी ज्यादा होती है। हालांकि दोनों के अंतर के अनुसार यह आकंड़ा बेहद कम नजर आता है। इसकी वजह यह बताई जाती है कि ये बच्चे अमीर घरों के बच्चों की अपेक्षा ज्यादा बीमार होते हैं और इसलिए हमेशा इनके ईलाज में व्यस्त रहने वाले इनके परिवार वाले इनके पौष्टिक आहार पर अधिक खर्च नहीं कर पाते।
इस समय देश में कुपोषण के कारण उसकी जीडीपी को हर साल चार फीसदी का नुकसान होता है। यदि यह स्थिति यथावत बनी रही तो देश को सन् 2030 तक 46 अरब डॉलर की चपत लग चुकी होगी। वहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था को तो इस दौरान कुपोषण से 125 अरब डॉलर की चपत लगेगी। हमें याद रखना चाहिए कि किसी भी देश में मानव संसाधन ही रीढ़ का काम करते हैं। जिस देश का मानव संसाधन जितना स्वस्थ और प्रशिक्षित होगा, उस देश की जीडीपी भी उतनी ही तेज गति से आगे बढ़ेगी। फिलहाल भारत को इस स्थिति का लाभ तो मिल रहा है, लेकिन जरा कल्पना कीजिए कि यदि इस देश से कुपोषण को मिटा दिया गया होता तो देश की जीडीपी ग्रोथ पर उसका कितना सकारात्मक असर हुआ होता। यह असर कुल मिलाकर इतना असरदार रहा होता कि मानो इस देश का कायापलट ही हो गया होता।
अब बात दिल्ली की। देश की राजधानी में पब्लिक हैल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के साथ मिलकर कुपोषण पर दिल्ली के 19 स्कूलों के 1329 बच्चों पर एक सर्वे किया है। इस सर्वे से पता चला है कि सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे कम-ज्यादा मात्रा में सभी किसी न किसी तरह के कुपोषण के शिकार हैं। दोनों ही तरह के स्कूलों में बच्चे सामान्य से कम या सामान्य से ज्यादा वजन के शिकार हैं। पहले माता-पिता अपने बच्चे को मोटा देखकर उनकी सेहत के बारे में बहुत प्रसन्न हुआ करते थे, लेकिन अब इस सर्वे के बाद यह भी पता चला है कि मोटापा भी एक तरह का कुपोषण हो सकता है। 19 स्कूलों के जिन 1329 बच्चों पर सर्वे किया गया है उसमें पाया गया कि सरकारी स्कूलों में 20.64 बच्चों का वजन सामान्य से कम था जबकि निजी स्कूलों में यह आंकड़ा 6.45 फीसदी बच्चों का था। इसी तरह सरकारी स्कूलों में 3.10 बच्चों का वजन सामान्य से ज्यादा था जबकि निजी स्कूलों में 13.16 बच्चों का वजन सामान्य से अधिक था। यह अध्ययन बताता है कि स्कूली बच्चों को संतुलित और पौष्टिक आहार नहीं मिल रहा या मिल रहा है तो गलत तरीके से मिल रहा है। और वे हर चंद कोशिशों के बावजूद किसी न किसी तरह के कुपोषण के शिकार हैं। दिल्ली में 30 परिवारों पर किए गए एक अन्य सर्वे में भी पाया गया है कि 17 फीसदी बच्चे मोटापे से ग्रस्त थे जबकि 21 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कहीं ज्यादा कम था।
नवजात शिशुओं में कुपोषण को रोकने के लिए जरूरी है कि गर्भवती महिलाओं को उचित पोषण मिले। इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए सरकार ने अनेक तरह की योजनाएं चलाई हैं, लेकिन इस योजनाओं का लाभ आम महिलाओं को मिलने की बात कौन कहे, आम लोगों को तो इन योजनाओं की जानकारी तक नहीं है। जिस योजना की किसी को जानकारी ही नहीं होगी, उसका लाभ वह कैसे उठाएगा। इस तरह ऐसी ज्यादातर योजनाएं कागजी खानापूर्ति तक सिमटकर रह गई हैं। यही वजह है कि जो नवजात शिशु पैदा होते हैं, उनका वजन प्राय: सामान्य से कम होता है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में देश में 3,79,161 बच्चों का जन्म हुआ। इनमें से 1,34,100 बच्चों का वजन दो किलोग्राम तक था, जो सामान्य वजन 2.50 किलोग्राम से काफी कम था। 4929 बच्चों का वजन तो दो किलोग्राम से भी कम था। इन बच्चों में लड़कियों की स्थिति तो और भी बदत्तर थी। नवजात बच्चों के कुपोषित होने पर आप आगे इनके सेहतमंद होने की कामना भला कैसे कर सकते हैं। इस कुपोषण का असर शिशु मृत्युदर में भी देखा जा सकता है जो दिल्ली में 21.35 फीसदी है। हालांकि यह दर अन्य राज्यों से बहुत बेहतर है, लेकिन दिल्ली के राजधानी होने के चलते इसे किसी भी तरह बेहतर नहीं कहा जा सकता और न ही स्वीकार किया जा सकता है। हालात यही हैं तो दिल्ली फिर दिल्ली में हम जिन स्वास्थ्य सेवाओं का ढिंढोरा पीटते हैं, उनकी हकीकत क्या है? फिर यदि दिल्ली का यह हाल है तो बाकी राज्यों का हाल क्या होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है।
दिल्ली सरकार हर साल कुपोषण से पल्ला झाडक़र इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपाती है कि यहां तो प्रति व्यक्ति आय तीन लाख से ज्यादा है। इसके बावजूद यहां आए रोज भुखमरी से होने वाली मौतों की खबरें आती हैं और कुछ दिनों सुर्खियों में रहकर गायब हो जाती हैं और दिल्ली फिर से उसी ढर्रे पर चलने लगती है। दिल्ली में 65-70 लोग हर साल कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। पिछले पांच सालों में ही दिल्ली में कुपोषण से 344 लोगों की मौत हो गई। सरकार ने इस चुनौती से निबटने के लिए ही आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से पूरक पोषाहार, स्कूलों में मिड-डे मील और गरीबों को सस्ती दर पर राशन उपलब्ध कराने जैसी योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन उपरोक्त आंकड़े इन योजनाओं की पोल खोल रहे हैं। इनसे साफतौर पर यही पता चल रहा है कि योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा।
एक समय कुपोषण से बचने का सबसे आसान तरीका यह था कि मोटे अनाज खाओ। यह मोटा अनाज ही जीवन आधार हुआ करता था, लेकिन हरित क्रांति के बाद वह चलन से बाहर हो चुका है। कभी हमारी जीवन रेखा माने जाने वाले मोटे अनाज आज उपेक्षित हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ की अनेक रिपोर्ट में जहां भारत को कुपोषण के प्रति चेताया गया है, वहीं कई रिपोर्ट में इसके प्रति भारत की प्रतिबद्धता और इस दिशा में उसके प्रयासों को सराहा भी गया है। अब देखना यह है कि भारत को कुपोषण के इस दुश्चक्र से बाहर निकलने में और कितना वक्त लगता है।

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