चीन से दोस्ती जरूर करें लेकिन थोड़ा संभलकर

चीनी सेनाओं के साथ डोकलाम पठार पर 73 दिनों तक गतिरोध बने रहने के दौरान और बाद में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और विदेश सचिव लगातार चीन दौरे करते रहे। फिर भी चीन ने बहुत थोड़ा हिस्सा छोड़कर लगभग पूरे पठार पर कब्जा कर लिया। इसके बावजूद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुचर्चित और अद्भुत चीन यात्रा की जमीन तैयार करने भेजा गया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन यात्रा पर वुहान रवाना हुए, जहां उन्हें चीनी राष्ट्र्रपति शी जिनपिंग से कई दौर की अनौपचारिक वार्ता करनी थी। इसमें से कई वार्ताएं तो बिना किसी सहायक की मौजूदगी के तय थीं। प्रधानमंत्री ने यह यात्रा इसके बावजूद की कि उन्हें अगले ही महीने फिर चीन जाना था। सही है कि इस वार्ता और जिस माहौल में यह हुई, उसे कम करके नहीं आंका जा सकता, लेकिन इससे हासिल क्या हुआ? इसी बातचीत में तय हुआ कि दोनों राष्ट्र प्रमुख अपनी सेनाओं को सीमा पर माहौल बेहतर बनाने के लिए जरूरी दिशानिर्देश देंगे, लेकिन यह बात बातचीत के बाद जारी चीनी वक्तव्य का हिस्सा नहीं बनी। इसी तरह व्यापार संतुलन को साधने की जिस कवायद पर सहमति बनी, वह भी चीनी बयान में शामिल नहीं थी। प्रधानमंत्री की चीन यात्रा के बाद जो दो सुखद खबरें आयीं, वे थीं कि भारत और चीन की सेनाओं ने बेहतर तालमेल के लिए हॉटलाइन जैसे सिस्टम से जुडऩे का फैसला किया और चीन ने भारत की कुछ दवाओं के लिए अपना बाजार खोल दिया है। इस बारे में कहा गया कि इससे भारत के कुछ कैंसर दवा निर्माताओं को लाभ होगा। जाहिर है कि यह व्यापार असंतुलन को कम करने के लिहाज से कोई बड़ा कदम नहीं है यानी हालात आज भी जस के तस हैं। यदि चीन यात्रा से वाकई बहुत कुछ हासिल हो गया था तो फिर इस यात्रा के तत्काल बाद प्रधानमंत्री को उस नेपाल की यात्रा पर जाने की क्या जरूरत थी, जिसे ये दोनों बड़े देश अपने पाले में देखना चाहते हैं।
प्रधानमंत्री के चीन दौरे के बाद बहुत से समीक्षकों ने यहां तक लिख दिया कि चीन भारत की अहमियत समझने लगा है। हालांकि चीन जैसे विस्तारवादी राष्ट्र को लेकर इस तरह की धारणा पालना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के सिवा कुछ नहीं। जो कुछ हासिल करने के लिए हमारे प्रधानमंत्री चीन गए थे, वे हासिल नहीं कर पाए। विस्तारवादी और आक्रामक चीन यही दिखाना चाहता रहा कि हमें आपकी नहीं, आपको हमारी जरूरत है। चीन को लेकर हम जितनी चिंताओं से घिरे हुए हैं, उसके मुकाबले हमें लेकर चीन की चिंताएं बहुत थोड़ी हैं। उसे बस थोड़ी-सी यह चिंता सताती है कि उसके पड़ोसी राष्ट्रों में यदि कोई उसका सैन्य प्रतिरोध कर सकता है तो वह भारत ही है, जबकि उसके विस्तारवादी और आक्रामक रवैये को लेकर हम सदैव आशंकित रहते हैं। मोदी सरकार के आने और हमारे अमेरिकी खेमे की तरफ खिसकते चले जाने के बाद से चीन रूस के और करीब आ गया है, जो हमारे लिए खतरे की घंटी है। भारत जिन भी मसलों पर पड़ोसी पाकिस्तान को घेरता है, चीन उनमें से ज्यादातर जगहों पर उसका खुला बचाव करता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी शी जिनपिंग से 14 बार मिल चुके हैं, लेकिन मतभेदों में कोई अंतर नहीं आया है। वार्ताओं के दौर लगातार चलने के बावजूद करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी सीमा अभी भी विवादास्पद है। इस तरह के विवादों ने ही ऐसा माहौल बनाया कि हम दोनों ही पड़ोसियों को अपने पाले में करने की कवायद में जुटे हैं। चीन कितना घाघ, आक्रामक और विस्तारवादी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात में शी जिनपिंग का भव्य स्वागत कर रहे थे, ठीक तभी उनकी सेनाएं सीमा पर घुसपैठ कर रही थीं।
हकीकत यह है कि आज चीन की अर्थव्यवस्था भारत से पांच गुना बड़ी है और उसकी सैन्य ताकत भी भारत से कहीं ज्यादा है। फिर भी क्षेत्र की दूसरी बड़ी ताकत की तरह उसके सामने खड़े रहना भारत की रणनीतिक मजबूरी है। हमारे पास-पड़ोस के छोटे देश भी भारत को इसी भूमिका में देखना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि एशिया प्रशांत में यदि चीन को कोई चुनौती दे सकता है तो वह भारत ही है। पिछले कुछ समय में भारत और वियतनाम की दोस्ती इसकी मिसाल है। दोनों देश आपस में मित्रता की चाहे कितनी ही पींगे बढ़ा लें, लेकिन दोनों ही पड़ोसी छोटे राष्ट्रों को अपनी ओर खींचने का कोई मौका नहीं चूकते। चीन यदि कहता है कि हिंद महासागर भारत की बपौती नहीं है तो भारत का भी कहना है कि दक्षिण चीन सागर पर चीन का कोई दावा उसे मंजूर नहीं। चीनी विस्तारवाद और आक्रामकता की हकीकत यह भी है कि उसकी कोई बात सिर्फ कहे जाने तक सीमित नहीं रहती। इसका प्रमाण यह है कि वह नकली द्वीप तैयार करके वहां भी हथियार तैनात कर रहा है। इस संबंध में उस पर अमेरिकी चेतावनियों का भी कोई असर नहीं हुआ।
सच यही है कि इस समय चीन और भारत अपने आसपास के छोटे पड़ोसी राष्ट्रों को अपने-अपने पाले में लाने की कवायद में जुटे हैं। चीन के छोटे समुद्री पड़ोसी और एशिया प्रशांत के जमीनी पड़ोसी अंदर ही अंदर उसके विस्तारवाद और आक्रामकता को लेकर सशंकित रहते हैं और अपनी रक्षा के लिए वे भारत और अमेरिका की तरफ देखते हैं। फिर भी चीन की ताकत का हौवा इतना बड़ा है कि वे पूरी तरह उसकी उपेक्षा की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। यही वजह है कि आज कभी चीन की नौसैनिक पनडुब्बियां श्रीलंका के तटों पर नजर आती हैं तो कभी चीन मालदीव में दबदबा कायम करके वहां भारत को बेअसर कर देता है। चीन जिस वन बेल्ट वन रोड पर अरबों डॉलर खर्च करने जा रहा है, वह उसकी इन्हीं महत्वाकांक्षाओं का नतीजा है। इस रोड के जरिए वह अपने पड़ोस के तमाम राष्ट्रों को सड़क मार्ग से जोडऩे जा रहा है। वह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है। यदि सब कुछ उसकी योजनाओं के अनुसार हुआ तो कुछ ही समय में वह पाकिस्तान और नेपाल को चीन से सड़क मार्ग से जोड़ चुका होगा। जाहिर है कि यदि उसकी ये योजनाएं परवान चढ़ती हैं तो यह भारत ही नहीं, अमेरिका जैसी महाशक्ति का भी घेराव होगा। भारत को छोड़कर वह रूस जैसी बड़ी ताकतों तक को भी यह समझाने में कामयाब रहा है कि उसकी वन बेल्ट वन रोड योजना किसी के भी खिलाफ नहीं है और इससे सभी देशों को लाभ ही लाभ है। पड़ोसी देशों में अकेला भारत ही ऐसा है, जिसने सामरिक दृष्टि से परियोजना पर आपत्ति करते हुए उसमें शामिल होने से मना कर दिया।
बेशक भारत ने चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए वह सब प्रयास किए हैं, जो किए जा सकते थे, लेकिन उनका नतीजा बहुत मामूली रहा है। इसे देखते हुए यदि भारत चीन पर आंखें मूंदकर भरोसा कायम करना भी शुरू कर दे तो आने वाले समय में यह एक आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। डोकलाम विवाद पर पैदा हुए तनाव के बाद तो भारत ने अपनी तरफ से चीन से रिश्ते सुधारने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। फिर भी, आने वाला समय तो भारत के लिए इन द्विपक्षीय संबंधों में और चुनौती भरा साबित होने वाला है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि अमेरिका में राष्ट्र्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अभ्युदय ने भारत के लिए कई नई मुसीबतें खड़ी कर दी हैं। इनमें से कुछ चीन के साथ भारत के संबंधों पर भी असर डालेंगी। अमेरिका की वीजा पॉलिसी पर राष्ट्रपति टं्रप की टेढ़ी नजर के चलते वहां काम कर रहे हजारों भारतीय आईटी पेशेवरों की नौकरी पर तो तलवार लटक ही रही है, अब टं्रप के ईरान से परमाणु समझौता रद्द कर देने से भारत के लिए नई मुसीबत खड़ी हो गई है। हालांकि बाकी जिन देशों ने इस समझौते पर दस्तखत किए थे, वे उस पर अब भी कायम हैं, लेकिन यदि अमेरिका ने इस समझौते को रद्द करने के बाद फिर से ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए तो मध्य एशिया का यह महत्वपूर्ण दोस्त भारत से छिन सकता है।
इसका असर भारत पर भी पड़ेगा, क्योंकि वहां से बड़े पैमाने पर हम कच्चा तेल आयात करते हैं। ईरान भारत के लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह भारत के लिए उस अफगानिस्तान तक पहुंचने का रास्ता बनाता है, जहां चीन और पाकिस्तान ने अपना बहुत कुछ दांव पर लगा रखा है। चीन बड़ी होशियारी से अफगानिस्तान में कोई सैन्य हस्तक्षेप तो नहीं करता, लेकिन उसने वहां काफी बड़ा आर्थिक निवेश कर रखा है। भारत सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण ईरानी चाबहार बंदरगाह बना रहा है। यदि फिर से ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत की यह कोशिशें प्रभावित हुईं तो यकीनन चीन के समक्ष भारत की स्थिति कमजोर होगी।
ऐसा ही एक अन्य मसला रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों का है। अमेरिका ने रूस पर कई वजहों से कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। हाल ही में वह इन प्रतिबंधों को और बढ़ाने की बात करने लगा है। अमेरिका ने यह भी साफ कर दिया है कि यदि उसने रूस पर नए प्रतिबंध लगाए तो उनका असर भारत पर भी पड़ेगा यानी भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय लेन-देन प्रभावित होगा। जब से मोदी सरकार आयी है, भारत की रूस पर सैन्य सामान खरीदने की निर्भरता कम हुई है, लेकिन अब भी भारत अपना 60 फीसदी सैन्य सामान रूस से ही खरीदता है।
यदि भारत और रूस के बीच अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण यह सैन्य समीकरण बिगड़ा तो पहले से ही अमेरिकी विरोध के चलते चीनी पाले में खड़ा रूस भारतीय हितों के खिलाफ चीन के साथ खड़ा दिखाई देगा। इन हालात में भारत और चीन संबंधों की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन दोनों इतनी बड़ी पड़ोसी ताकतें हैं कि चाहते हुए भी एक दूसरे की अनदेखी नहीं कर सकते। फिर भी द्विपक्षीय संबंधों में सारा पलड़ा चीन की तरफ ही झुका दिखाई देता है, जिसे भारत ज्यादा समय तक यों ही नहीं देख सकता। दबाव के इसी माहौल में सीमा पर चीनी सेना की घुसपैठ की खबरें आती रहती हैं और हमारी सरकार ने तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के कार्यक्रमों से भी दूरी बनानी शुरू कर दी है। यदि हम चीन के समक्ष इसी तरह झुकते रहे तो चीन की तरफ से पैदा की जाने वाली चुनौतियां और भी बढ़ती जाएंगी।
मोदी सरकार के आने से पहले तक तो महसूस होता था कि जैसे भारतीय विदेश नीति की रीढ़ की हड्डी ही नहीं है। मोदी सरकार के आने के बाद से भारत ने भी पड़ोसी ताकतों से आंखें मिलाकर बात करना शुरू कर दिया, जिसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी देखे गए हैं। भारत और चीन दोनों ही बड़ी ताकतें हैं और इनमें से चीन चाहे कितनी ही बड़ी ताकत क्यों न हो, भारत को अपनी विश्वव्यापी कूटनीति के सहारे उसे यह अहसास कराना ही होगा कि वह जिस तरह भारत के बाजार का मनमाना इस्तेमाल कर रहा है, आगे हर मामले में उसकी ऐसी ही मनमानी नहीं चलेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *