चीन ने भी माना अब भारत दबंग

कश्मीर में भले ही भारत अभी पत्थरबाजों से पार न पा रहा हो और फिदायीनों के खिलाफ उसे अपने टैंक उतारने पड़ रहे हों, लेकिन अपने नोबेल पुरस्कार प्राप्त विद्वानों तक को जेल में पटकने से गुरेज न करने वाला चीन जैसा आक्रामक देश यदि रक्षा मोर्चे पर भारत जैसे प्रतिद्वंद्वी की तारीफ करता नजर आए तो भला किसे हैरत नहीं होगी। कुछ ही समय पूर्वं डोकलाम में 70 दिनों तक दोनों ओर की सेनाएं आंखों से आंखें भिड़ाए खड़ी रहीं और उसके बाद जनरल विपिन रावत के मुख से खरी-खरी सुनने के बाद तो यह काम और भी हैरत में डालने वाला है। जनरल रावत ने कहा था कि यह ठीक है कि चीन एक मजबूत देश है, लेकिन इसका मतलब यह कभी नहीं निकाला जाना चाहिए कि भारत एक कमजोर देश है। तब जनरल रावत के इस बयान को चीन ने तनाव बढाने वाला बताया था। फिर चीन को एकाएक भारत की तारीफ की बात कैसे सूझी?
चीन के एक प्रमुख सरकारी थिंक टैंक ने माना कि मोदी के नेतूत्व में भारत की विदेश नीति अत्यंत मुखर और आक्रामक हो गई है। उसमें जोखिम लेने की क्षमता बढ़ी है। चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के वाइस प्रेसीडेंट रोंग यिंग ने कहा कि पिछले तीन सालों में मोदी सरकार ने विदेश मामलों में एक नई कूटनीति विकसित की है, जिसे उन्होंने मोदी डॉक्ट्रिन का नाम दिया है। इसे उन्होंने भारत के एक मजबूत राष्ट्र के तौर पर उभरने की रणनीति के तौर पर पेश किया। सीआईआईएस चीन के विदेश मंत्रालय से जुड़ा संस्थान है। इसलिए इस तारीफ को यूं ही नहीं लेना चाहिए। भारत में एक राजनयिक के तौर पर काम कर चुके रोंग के एक पत्रिका में लिखे लेख में भारत के चीन, दक्षिण पूर्व एशिया, अमेरिका और जापान के साथ संबंधों को आधार बनाया गया है।
रोंग ने लिखा है कि भारत की विदेश नीति तेजी से मुखर हो रही है और आपसी फायदे भी पेश कर रही है। पिछले तीन सालों में चीन के साथ उसके रिश्ते स्थिर रहे हैं। हालंकि उन्होंने माना कि डोकलाम विवाद न सिर्फ दोनों के बीच तनाव पैदा करने वाला बल्कि सीमा विवाद को उभारकर सामने लाना वाला मसला रहा है। गौरतलब है कि चीन पूरे डोकलाम क्षेत्र को तो कब्जे में नहीं ले सका, लेकिन कुछ उपग्रह तस्वीरों से यह साफ होता है कि उसकी सेना और निर्माण कार्य से संबंधित साजो-सामान अब तक उस क्षेत्र में मौजूद है। फिर भी दोनों देशों ने समय-समय पर वहां सेना कम करने की बात मानी है। हालांकि चीन आज भी इस हठधर्मिता पर कायम है कि उसने जो भी किया या करना चाहा, वह सही है, क्योंकि वह उसका अपना भू-भाग है। रोंग का कहना है कि चीन भारत के रास्ते की बाधा नहीं है, बल्कि उसके लिए एक बड़ा अवसर है। चीन भारत के उदय को नहीं रोक सकता। चीन के लिए भारत एक अहम देश है। रोंग का यह लेख तब सामने आया है जब उसके विदेश मंत्री वांग यी ने नए साल पर विदेशी राजनयिकों से बातचीत करते हुए कहा था कि वह पड़ोसी और छोटे राष्ट्रों के साथ अपने विवादों को शांतिपूर्ण तरीके और बातचीन से हल करेगा। पड़ोसी छोटे राष्ट्र पूरे दक्षिण चीन सागर पर चीनी दावे का विरोध कर रहे हैं। चीन पूरे दक्षिण चीन सागर को अपना बताता है, जबकि फिलीपींस, मलेशिया, बु्रनेई और वियतनाम इसका मुखर विरोध करते हैं।
पिछले तीन सालों में भारत की विदेश नीति के मुखर और आक्रामक होने के संबंध में रोंग ने अपने लेख में कुछ उदाहरण भी पेश किए हैं। उनका मानना है कि भारतीय सेना ने म्यांमार के जंगलों में घुसकर आतंकियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की। इसी तरह भारत अब सीमा पार कर पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दे रहा है। इन मामलों में भारत ने जो हौसला दिखाया है, वह पहले या तो 1971 में दिखाई दिया था या मालदीव में हस्तक्षेप के समय। अब आगे भी उससे इसी दमखम की उम्मीद की जा सकती है। वैसे रोंग के इस कथन को हमें चीनी विदेश नीति में किसी प्रकार के बदलाव का संकेत मानने के बजाय अपने देश को सचेत करने वाला ही मानना चाहिए। इसकी वजह यह है कि चीनी सेना का सारा कम्युनिस्ट इतिहास ही हिंसा और आक्रामकता से भरा है।
चीन हमेशा से कहता कुछ और करता कुछ और रहा है। आज भले ही उसको भारत की विदेश नीति मुखर और आक्रामक दिख रही हो, लेकिन उसका रवैया तो हमेशा से ही इससे कई गुणा ज्यादा आक्रामक और हिंसक रहा है। इसका प्रमाण यह है कि अपने साथ लगने वाली चार हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी सीमा को वह आज भी विवादास्पद बनाए हुए है। नेहरू युग में वह भारत के अक्साई चिन क्षेत्र पर दावा रखता था, लेकिन उसके बदले वह अरुणाचल प्रदेश पर दावा छोडऩे को तैयार था। फिर 1962 के युद्ध में उसने अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया और अरुणाचल पर भी उसका दावा पूर्ववत बना रहा। किसी भी देश के साथ विवादित क्षेत्र को लेकर उसकी रणनीति यही रही है। पहले आक्रामकता के साथ उस देश पर दबाव बनाओ और अंतत: उस पर कब्जा कर लो। जापान और अन्य कई पड़ोसी देशों के साथ समुद्री द्वीपों को लेकर चल रहा उसका विवाद भी कुछ इसी तरह का है। यही नहीं, वह पड़ोसी देशों की चिंताओं को दरकिनार कर अपनी सुरक्षा को और पुख्ता करने के लिए कृत्रिम द्वीप भी विकसित कर रहा है।
चीन की ओर से भारत को अब ज्यादा मुखर और आक्रामक मानने वाला बयान ऐसे समय में आया जब मालदीव में पैदा हुए राजनीतिक संकट के चलते दोनों देश एक बार फिर आमने-सामने आ सकते थे। वहां हाल ही में राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने पूर्व राष्ट्रपति ममून अब्दुल गयूम और मुख्य न्यायाधीश समेत दो जजों को जेल में डाल दिया। साथ ही आपातकाल भी लगा दिया गया। भले ही यह मालदीव का निजी मसला हो, लेकिन वहां आपातकाल लगना भारत के लिए चिंता का कारण है। सन् 1988 में जब एक बार वहां तख्तापलट की कोशिश हुई थी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने वहां के राष्ट्रपति की मांग पर सैन्य हस्तक्षेप करके मालदीव की रक्षा की थी। आज भले ही एक पूर्व राष्ट्रपति नाशीद ने भारत से सैन्य हस्तक्षेप की मांग की है, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। चीन ने श्रीलंका की तरह मालदीव से भी बड़े समझौते करके उसे अपने पाले में कर रखा है। इसलिए उसके दूतों ने चीन को तो इन हालात की सूचना दी, लेकिन भारत को नहीं। हालांकि इस मसले पर प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच भी फोन पर चर्चा हुई। दोनों ने वहां के हालात पर चिंता जाहिर की, लेकिन मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए भारत ने उसमें हस्तक्षेप न करना ही बेहतर समझा। यदि भारत यहां भी मैदान में उतर जाता तो भारत को एक बार फिर से ज्यादा मुखर और आक्रामक करार दिया जाता। मसले की संवेदनशीलता को समझते हुए भारत और अमेरिका दोनों ने राजनीतिक संकट पर चिंता जाहिर करके काम चलाया। उधर चीन ने जहां अपने नागरिकों को मालदीव न जाने की सलाह दी, वहीं एक तरह से भारत को चेताते हुए यह भी कह दिया कि हर हाल में किसी भी देश की संप्रभुता का सम्मान किया जाना चाहिए।
बहरहाल, इस सच्चाई पर कोई चीनी थिंक टैंक मुहर लगाए या नहीं, यह सच है कि मौजूदा मोदी सरकार के समय में भारत अब तक की अन्य सरकारों की तुलना में कहीं ज्यादा मुखर और आक्रामक है। भारत अपने जवानों पर भरोसा करते हुए पाक आतंकवाद के खिलाफ कश्मीर में तो एक छद्म युद्ध के विरुद्ध लड़
ही रहा है, वहीं भारतीय सेना और अद्र्धसैनिक बल नक्सलवाद की समस्या के खिलाफ भी
पूरी मुस्तैदी और जोश से लड़ रहे हैं। मोदी सरकार किसी भी तरह के आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का पालन कर रही है, इसे नकारा नहीं जाना चाहिए। मौजूदा भारत सरकार कश्मीर में भी मौजूद आतंकी तत्वों के खिलाफ पहले के मुकाबले कहीं
ज्यादा सख्त है। बेशक भारत को इसके लिए अपने जवानों का बेशकीमती लहू क्यों न बहाना पड़ रहा हो।

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