चतुर्वेदी सर ने डूबके लिखा है: संजय जगदाले

मेरे लिए आज इस तरह से बड़ी विषम स्थिति है कि हिंदी समिति, साहित्य और मैं, यह रिश्ता कैसा है। मेरे खयाल से सर (चतुर्वेदीजी) भी समझ गए होंगे, आप लोग भी समझ गए होंगे कि मेरा बहुत दूर तक कोई संबंध नहीं है हिंदी साहित्य से। कह सकता हूं कि 65 साल मेरी उम्र है, 60-65 साल पुराना नाता है, क्योंकि इस रोड के पार हमारा घर था और हिंदी साहित्य समिति की ये बिल्डिंग नहीं थी, पुरानी वाली बिल्डिंग थी और यहां मैदान था, उसमें हमारे पिताजी विकेट बनवाकर हमें क्रिकेट खिलाते थे। वैसे तो साहित्य के लिए थी यह जगह, पर खेलते थे हम। उस जगह पर बाद में गैरेज वगैरह बन गए तो और भी हालत खराब हो गई। दूसरी तरह से यह कि चतुर्वेदी सर का शिष्य हूं। सर की पुस्तक पर बोलना मेरे लिए कठिन है, पर इतना तो मुझे मालूम है कि सर, साहित्य से जुड़े रहे और अंग्रेजी पढ़ाते रहे, मुझे भी पढ़ाया। मुझे मालूम है कि उर्दू शेरो-शायरी में बहुत शौक रखते हैं और हिंदी भी बहुत अच्छी जानते हैं। मैं एक तरह से सेफ हो रहा हूं कि मुझे लैंग्वेज पर बोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं खुद को खेल तक सीमित रखूंगा ‘बाइस गज की दुनिया तक, जो बहुत बड़ी है। मैं सोचता हूं कि ‘बाइस गज की दुनिया में सर ने अपना 50 साल का पूरा अनुभव लिखने में लगा दिया है। पुस्तक पढऩे में मुझे दो दिन लगे। एक बार जब मैंने पुस्तक उठाई तो पूरी पढ़कर ही उठा, लगा कि जैसे खुद की एक मूवी देख रहा हूं, क्योंकि उसमें जो भी पात्र हैं, जितने भी पात्र हैं, ज्यादातर ऐसे हैं, जो इंदौर की मिट्टी से जुड़े रहे। कुछ बाहर भी चले गए, लेकिन इंदौर से जुड़े रहे। ऐसे दो विदेशी खिलाड़ी हंै- फ्रेंक ऑडल और गैरी सोबर्स, जो इंदौर की मिट्टी से नहीं जुड़े रहे। क्रिकेट खिलाड़ी ले लें या प्रशासन ले लें या लिखने वाले ले लें, वे सब इंदौर की मिट्टी से ही जुड़े हैं और किसी न किसी रूप में मैं भी उनसे बचपन से ही जुड़ा रहा। सबसे बड़ी जो रिमार्केबल चीज देखी, उसमें जो मैं समझता हूं भारत में बहुत कम लिखने वाले होंगे, जिनके पास सर जैसा अनुभव है। तीन जनरेशंस, तीन पीढिय़ों को उन्होंने देखा है और उन्होंने जो लिखा, वह पढ़ा हुआ या टीवी पर देखा हुआ नहीं है। उसे उन्होंने खुद महसूस किया, खुद देखा है। आज भारत में खेल पर लिखने वाले बहुत कम व्यक्ति हैं, जिनके पास तीन जनरेशन का अनुभव है। अगर हम सीके नायडू और मुश्ताक अली साहब की जनरेशन ले लें, उसके बाद चंदू बोर्डे और सलीम दुर्रानी साहब को ले लें, उसके बाद तीसरी जनरेशन सुनील गावस्कर और नरेन्द्र हिरवानी को ले लें। सर ने तीनों जनरेशन को बहुत नजदीक से देखा है। उसमें बड़े-बड़े खिलाड़ी हैं, बड़े पत्रकार हैं और बड़े विशेषज्ञ भी, जिसमें ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने इंदौर मेें ही विकास के सोपान तय किए, इंदौर ने ही उनको शेप दिया। राजसिंह डोंगरपुर और हनुमनत सिंह भले ही बंबई में रहे या डोंगरपुर में रहे, किंतु उनका जो ढलना था, वह इंदौर में ही हुआ और मुझे मालूम है कि वे सर के निजी मित्र थे। बाद में बड़ा नाम कमाया उन्होंने, पर उनका जो इंदौर से लगाव था, वह जीवनपर्यंत बना रहा।
एक किस्सा है, जो सर ने अपनी किताब में राजसिंह के लिए लिखा है। भारत और पाकिस्तान का मैच चल रहा था इस्लामाबाद में और महेन्द्रसिंह धोनी बैटिंग कर रहे थे, कसा हुआ मैच था, पांचवा मैच था सीरीज का और वह मैच जो जीतता, वह श्रृंखला जीत रहा था और भारत उस मैच को जीतकर पहली बार पाकिस्तान में कोई श्रृंखला जीतता। धोनी ने एक लेटकट किया। जो क्रिकेट समझने वाले लोग होंगेे, वह समझे होंगे, अलग शॉट होता है। आजकल खेला नहीं जाता, पहले के जमाने में बहुत खेला जाता था। धोनी ने शॉट खेला और राजभाई उस समय भारतीय टीम के मैनेजर थे और मैं चयनकर्ता था। बीच में हमारे चार-पांच प्लेयर्स बैठे थे। हम लोग बॉलकनी के ड्रेसिंग रूम में बैठे हुए थे। राजभाई एक कॉर्नर में बैठे हुए थे और 4-5 प्लेयर्स बीच में। जैसे ही धोनी ने शॉट खेला तो राज भाई एकदम आगे झुके और बोले, ‘संजय सी. के. एट हिज बेस्ट। क्योंकि सी. के. नायडू साहब वह शॉट खेलते थे। तो राज भाई का कमेंट था, सी के एट हिज बेस्ट। 5-6 जो बीच में बैठे थे, बड़े खिलाड़ी, जो आज भी खेलते हैं भारत की तरफ से, उसमें से एक खिलाड़ी मुझसे बोलता है कि सर, ये राजभाई जरा-जरा सी बात में मुश्ताक अली और सी. के. नायडू को क्यों ले आते हैं?
मैंने उनको बताया कि क्या कनेक्शन था वह इंदौर का। तो जो इंदौर में पलकर बड़ा हुआ या जो इंदौर में रह लिया, उसके लिए सी. के. नायडू से लेकर नरेन्द्र हिरवानी तक सब अपने हो गए , हालांकि नरेन्द्र हिरवानी तो गोरखपुर से आए। इस बुक में जो चेप्टर हैं, उसमें सबसे युवा, कम उम्र के नरेन्द्र हिरवानी हंै। सन्1980 में वह गोरखपुर छोड़कर आ गए और गोरखपुर छोड़कर आए तो बोलकर आए घर पर कि अब मैं तभी आऊंगा, जब भारत के लिए खेल लूंगा। अब इसको पागलपन ही कहेंगे कि 100 करोड़ के देश मेें एक लड़का यह बोलकर आ रहा है घर पर कि मैं खेल के आऊंगा और ये उनकी किस्मत भी है और भारत के क्रिकेट की भी किस्मत थी कि वे खेले और उसके बाद ही वह घर गए। तो ये सब अनुभव सर के पास थे। ये फस्र्ट टाइम अनुभव सर के पास हैं। इसके बाद अगर हम देखते हैं, जर्नलिस्ट में प्रभाष जोशी जी ‘जनसत्ता में थे, उसके पहले ‘नई दुनिया में थे और क्रिकेट से उनका कोई विशेष लगाव नहीं था पहले, पर मुझे ध्यान है कि हमारे इसी घर में वे मेरे स्वर्गीय पिताजी के पास आते थे। बैठकर बातें करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने इतना ज्ञान अर्जित कर लिया कि मैं सोचता हूं, हिंदी के सबसे अच्छे खेल-पत्रकार बन गए। उन्होंने क्रिकेट पर जो लिखा और जिस तरह से लिखा, बहुत ही विशेष था यानी दूसरी सभी पत्रकारिता और पत्रकारों से हटकर। आज हम जर्नलिज्म देखें, क्रिकेट का और खासकर अन्य खेलों का। ऑस्कर वाइल्ड से किसी ने पूछा था कि व्हाट इज द डिफ्रेंस बिट्वीन लिट्रेचर एंड जर्नलिज्म? तो ऑस्कर वाइल्ड ने बड़ा खूबसूरत जवाब दिया था, जो आज भी लागू होता है, वह बोले, लिट्रेचर इज नॉट रेड एंड जर्नलिज्म इज नॉट रीडेबल। इतना अच्छा जवाब था और उसका आज मैं एक उदाहरण देता हंू। आप देखें कि निगेटिविटी कितनी आ गई है पत्रकारिता में। आप कमजोरियां दिखाइए। यह सही है, लेकिन सब निगेटिव इसी देश में नहीं हो रहा है, सब चीजें गलत नहीं हैं, इस देश में कई चीजें पॉजिटिव भी हैं। वैसी चीजें क्यों नहीं दिखाई जातीं। अच्छाई क्यों नहीं दिखाई जाती? देश में, हर क्षेत्र में, चाहे साहित्य हो, कला हो, खेल हो, विज्ञान हो, सभी में। आज इस देश में कई चीजें अच्छी होती हैं, कुछ खराब भी होती हैं। सिर्फ हम खराब चीजें क्यों दिखाएं। सर की एक किताब है, जिसे मैंने पढ़ा। बड़ी हटकर है। उसमें नकारात्मकता बिल्कुल नहीं है। उन्होंने कभी किसी खिलाड़ी की कमजोरी भी दिखाई है। एक आदमी में नॉर्मल कमजोरियां जो होती हैं, वे कमजोरियां हैं। वह ऐसा नहीं लग रहा कि जानबूझकर किसी की आलोचना की गई या कमजोरी दिखाई गई है। अपने आपमें कोई भी व्यक्ति परफेक्ट नहीं होता। सर ने अपनी किताब में जो भी कमजोरियां बताई हैं, इंटेशनली नहीं दिख रहीं, ऐसी दिख रही हैं कि उसमें भी वे बचाव करना चाह रहे हैं उस खिलाड़ी का। ये बड़ी अच्छी बात है, जो आज की पत्रकारिता में नहीं दिखती। आज कोई किसी के पीछे पड़ता है तो पूरी तरह पीछे पड़ जाता है। मैं इसको पत्रकारिता नहीं मानता। मुझे विश्वास है कि सर की जो किताब है, उसमें बहुत अच्छी जानकारियां हैं, खासकर इंदौर के लोगों के लिए और मैं समझता हंू कि इंदौर के लिए यह बहुत अच्छी पुस्तक है, जिसको हर खेल प्रेमी को, खासकर इंदौर के लोगों को पढऩा चाहिए, क्योंकि इसमें जानकारियां, इतनी डिटेल में बताई गई हैं। हर पीढ़ी, खासकर जो युवा पीढ़ी है, उनको पता होना चाहिए अपना इतिहास कि पुराने समय में क्या हुआ?
सबसे पहले तो मैं बधाई दंूगा कि आप लोगों ने, शायद क्रिकेट के लोगों ने भी नाम सुना होगा जी.आर. पंडित साहब का, जिन्हें सर ने इन्क्लूड किया है। जी.आर. पंडित साहब एक अनइम्प्रेसिव पर्सनैलिटी के थे। मेरे खयाल से टेबल से ऊपर तक उनकी हाइट थी और दुबले-पतले थे, पर मैं सोचता हूं कि मैंने क्रिकेट की सभ्यता और मेनर्स के बारे में उनसे जितना सीखा, उतना किसी से नहीं सीखा। इंदौर में अगर आज 35 लाख लोग हैं तो मेरे खयाल से 35 लोग भी उन्हें नहीं जानते होंगे, पर उन्होंने इंदौर क्रिकेट की जितनी सेवा की या इंदौर को जितना एनकरेज उन्होंने किया, मैं नहीं सोचता कि और किसी व्यक्ति ने किया है। मैं सर को बधाई दूंगा इसके लिए विशेष रूप से कि उन्होंने जी.आर. पंडित साहब को याद किया और इस किताब में सी.के. नायडू और मुश्ताक अली जैसे लोगों के नाम शामिल किए, क्योंकि पंडितजी का योगदान इंदौर के क्रिकेट में किसी से भी कम नहीं। हालांकि वह खिलाड़ी नहीं थे, पर जिस तरह से उन्होंने खेल को प्रोत्साहित किया इंदौर में, खिलाडिय़ों को प्रोत्साहन दिया, एक जनरेशन को आगे बढ़ाया, मैं नहीं सोचता कि किसी और ने ऐसा किया। ऐसी बहुत सारी जानकारियां हैं, जो सर की किताब में हैं, जो इंदौर के लोगों को या भारत में और क्रिकेट प्रेमियों को जाननी चाहिए, क्योंकि ये फस्र्ट टाइम इंफरमेशन हंै।
मैंने पहले भी कहा कि सर का खुद का अनुभव है, तीन पीढिय़ों का। आज गैरी सोबर्स और फ्रेंक वारेल, मैं समझता हूं, गैरी सोबर्स अभी तक के महानतम खिलाड़ी हैं। अगर हम देखें तो इतना परफेक्ट क्रिकेटर कोई हुआ नहीं और मैं समझता हूं कि कोई होगा भी नहीं। सर ने उनका इंटरव्यू लिया है। जब उनका इंटरव्यू किया, तब मुझे बताया था कि कैसी बातें हुईं और बड़ी मुश्किल से तीन पत्रकार उपस्थित हुए। सर ने जो किताब में लिखा है, मुझे याद है सन् 2007 में वेस्टइंडीज में वल्र्डकप था और मैं भारतीय टीम का मैनेजर था। जेमेकियन प्राइम मिनिस्टर ने पूरे वल्र्ड-कप की सभी टीमों को अपने घर पर इनॉग्रेशन से एक दिन पहले खाने पर बुलाया। हम लोग 8 बजे लॉबी में खड़े थे।
भारतीय टीम होटल की लॉबी में थी और एक कोने में हम लोग खड़े थे। रिसेप्शन के उस कोने से काफी दूर, 100 मीटर से भी ज्यादा दूर, एक व्यक्ति मुझे जाता दिखा, जिसकी पीठ मेरी ओर थी तो मुझे लगा कि ये गैरी सोबर्स की चाल है। मैं अतिशयोक्ति नहीं कर रहा और मैं उनको खड़े होकर देखता रहा कि जब इस आदमी की शक्ल दिखेगी, तब देखूंगा कि ये कौन है। गेट पर जाकर जब वे लॉन मेें उतरने के लिए मुड़े तो मैं कंफर्म हो गया कि ये गैरी सोबर्स हैं,जो चीफ गेस्ट थे। अगले दिन उन्होंने ही उद्घाटन किया और जब वे लॉन से चले गए तो मेरी एक इच्छा हुई कि उनके साथ फोटोग्राफी करूं। वे मेरे हीरो रहे हैं, आज भी हैं। मैं सोचता हूं कि आज तक इतना परफेक्ट क्रिकेटर कोई नहीं हुआ। सर की किताब में मैंने पढ़ा कि उनसे बात करने के लिए तीन पत्रकार थे। जब मैं उनको वहां अंदर ढूंढऩे के लिए गया था तो मैंने देखा कि एक जगह पेड़ के नीचे डेढ़-सौ के आसपास लोग इक_ा थे और उसमें सारे देशों के क्रिकेटर थे। भारतीय क्रिकेटर, दक्षिण अफ्रीका के, वेस्टइंडीज के, सब देशों के और मैं उनको ढूंढ़ रहा था। मेरे साथ एक फोटोग्राफर था, जिसको मैंने बोल रखा था कि मेरी फोटो उनके साथ खींच देना जल्दी से, क्योंकि टाइम ज्यादा नहीं मिलेगा। डेढ़ सौ लोग जहां इक_ा थे, मैंने सोचा, पता नहीं वहां क्या हो रहा है। ऐसे ही एकाएक मेरा ध्यान गया कि उसमें एक व्यक्ति खड़ा है और वह और कोई नहीं, गैरी सोबर्स थे। उस झुंड के बीच जितने क्रिकेटर थे, उन डेढ़ सौ लोगों से वह बात करने के लिए वहां आए थे। जब उनका कोई बचपन का मित्र आया तो उससे बात करने के लिए वह उठकर उस झुंड से बाहर आए और इतनी देर में मैंने अपनी फोटो खिंचवा ली। एक तरफ मैंने ये देखा कि पूरी दुनिया के क्रिकेटर उनसे बात करने आए हंै और दूसरी तरफ जब मैंने सर की किताब पढ़ी तो उसमें लिखा है कि दो या तीन पत्रकार ही थे गैरी सोबर्स से बात करने के लिए। मुझे उनके साथ एक चीज और भी याद आ गई कि वह जब वॉक कर रहे थे तो उनके पीछे-पीछे दो आदमी चल रहे थे। अगले दिन मैंने सोचा कि ये फोटोग्राफ करा लूंगा तो बाइचांस मुझे वह दिख भी गए सुबह-सुबह, लॉन में आते हुए। मैं उनके सामने गया। तो मुझे पता चला कि उनके पीछे जो दो एजेंट थे वे 100 डॉलर लेते थेे उनके ऑटोग्राफ के। अब आप इमेजिन करिए कि क्या वेल्यू रही होगी उनकी। गैरी सोबर्स चल रहे हैं, अगर किसी को ऑटोग्राफ कर रहे हैं तो पीछे उनके जो एजेन्ट थे, उनके प्रमोटर थे, उनके वे 100 डॉलर्स 2007 में ले रहे थे। जब मैं गया तो उन्होंने मुझे जरा-सा देखा और पहचान लिया। शायद कि रात को ये व्यक्ति मेरे साथ फोटोग्राफ लेने आया था और उन्होंने साइन करके मुझे ऑटोग्राफ दे दिया। वह अभी भी मेरे पास है। पैसे नहीं लिये, लेकिन ये मानसिकता है हमारी। मैं स्टोरी बताना चाह रहा था कि इतना बड़ा खिलाड़ी, इतना बड़ा अनुभव। आज हम इंदौर में देखते हैं सी. के. नायडू साहब का 30 अक्टूबर को स्मृति दिवस आता है। और हमेशा उनकी वही एक फोटो छपती है, जो हम स्टेच्यू पर जाकर देखते हैं।
पर लोग भूल गए हैं। मैं सोचता हूं कि बाहर के लोग नहीं भूलते। कहावत है, घर का जोगी जोगना, वह हर क्षेत्र में लागू होती है। आपके साहित्य में भी होती होगी। मेरे ख्याल से, यही बात खेल में भी होती है, संगीत में भी होती होगी। मैं सोचता हूं कि सर ने इस कहावत को झुठलाया है। इंदौर के जितने व्यक्ति खेले हैं और जिन्होंने नाम कमाया है, जो अपने आप में इंस्टीट्यूशन थे, उन लोगों को इन्होंने याद किया है और इतने मन से याद किया दिख रहा है कि सर ने दिल से लिखा है, प्यार से लिखा है।
मुझे विश्वास है कि बड़े इमोशनल हुए होंगे सर, जब लिख रहे होंगे, तब भी इमोशनल हुए होंगे। सर की लिखी मीठी यादों में कहीं नेगेटिविटी नहीं है। मैं सर को बधाई दूँगा, सर की कलम इसी तरह चलती रहे। मैं दिल्ली के राजकमल प्रकाशन के अशोक महेश्वरी को भी बधाई दूंगा, जिन्होंने इतनी अच्छी पुस्तक प्रकाशिन की।

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