चतुर्वेदी सर जैसा कोई नहीं: सुशील दोशी

आदरणीय चतुर्वेदी साहब, आदरणीय कहकर मैं यह साबित नहीं करना चाहता कि मैं उम्र में बहुत छोटा हूं और ये बड़े हैं, लेकिन वह जो काम कर रहे हैं, उसके लिए मैं उन्हेें आदरणीय कहना चाहता हूं। संजय जगदाले जी से मेरी मित्रता तो है, लेकिन नाराजगी भी है, लेकिन इनसे आज वादा कराइए आप लोग कि ये भी संस्मरणों की किताब लिखें, क्योंकि जब ये बोलते हैं, तब बाकी लोगों के पास कोई चारा नहीं रहता, सिवाय इनकी बातें सुनने के और लगता है कि घंटों इनकी बातें सुनते रहिए। मैं हमेशा शिकायत करता रहता हूं कि एक किताब इनको जरूर लिखनी चाहिए। अपनी नुमाइश की, अपने संस्मरणों की। चतुर्वेदीजी को मैं बधाई देता हूँ। औपचारिक नहीं, ये दिल से बधाई है, क्योंकि एक तो हिंदी में काम होता नहीं है, हिंदी में कोई छापता नहीं है और जब वे लिखते भी हैं तो लोग उसे खरीदते नहीं हैं। किताबें आस-पड़ोस से मांगकर ले आते हैं।
हिंदी का इतना बड़ा महत्व है, इतने लोग हंै हिन्दुस्तान में। कितने सारे लोग, लेकिन आप किसी ट्रेन में जाइए, अखबार कोई एक खरीदेगा तो वह सारी ट्रेन के डिब्बे में घूम जाता है। लोग पान खाकर थूक देंगे, लेकिन अखबार अलग से नहीं खरीदेंगे। पत्रिकाएं नहीं खरीदते। ऐसे समय में हिंदी के लिए इतनी सारी किताबें आपने लिखीं और हम सबका ज्ञानवर्धन हुआ। एक ऐसा क्षेत्र, जो पूरी तरह से अछूता है, जिसके बारे में लिखा नहीं गया और संजय भाई ने बिल्कुल ठीक कहा कि इन्होंने जो कुछ लिखा, दिमाग से ही नहीं, दिल से लिखा। दिमाग तो बहुत लोग लगाते हैं और बड़ी चालाकी से लिखते हैं। संस्मरण जब आप लिखते हैं तो वह बहुत मुश्किल काम है, क्योंकि संस्मरण जब आप लिखते हैं तो आप अपने आपको कैसे रोक पाएंगे कि आप एक पेडस्टल पर हैं, और दूसरे लोग आपकी बातों पर ध्यान दे रहे हैं।
साधारणतया मैंने देखा है कि जब आप इस तरह के संस्मरण लिखते हैं तो लोग अपने आपको काफी ऊंचे पेडस्टल पर रख देते हैं। नम्रता भूल जाते हैं। जैसे मुझे याद है कि एक बार टाइगर पटौदी कमेंट्री कर रहे थे, मैं भी साथ में था और हमारे एक और कमेंटेटर साथ थे। उन्होंने सोचा शरीफ आदमी हैं, मैं जो कहूंगा, प्रतिवाद नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि टाइगर ‘यू रिमेंबर व्हेन वी यूज्ड टु प्ले टूगेदर एट फिरोजशाह कोटला, फिरोजशाह कोटला नेवर द सेम। एज इट इज नॉउ। तो उन्होंने तुरंत हाथ हटाकर कहा कि ‘एज फार रिमेंबर वी नेवर प्लेड टुगेदर एट कोटला, बिकाज यू प्ले ऐट अ डिफ्रेंट लेवल। एक ऊंचे पेडस्टल पर रखकर देखने की बात होती है, जो संस्मरण लिखता है। मैंने संस्मरणों की कई किताबें पढ़ी हैं, जहां ऊंचे मुकाम पर खड़े होकर आदमी बात करता है। ऐसा लगता है कि जैसे लोग केवल सुन रहे हैं।
चतुर्वेदी साहब को मैं इस मामले में बधाई देना चाहता हूं। इन्होंने अत्यन्त विनम्रता के साथ अपने आपको नीचे पेडस्टल पर रखकर और ऊपर देखकर बात की है। ये एक बहुत बड़ा बोझ है, क्योंकि जब आप संस्मरण लिख रहे हों तो आप जब तक अपने आप को इस पेडस्टल पर रखकर ऊपर नहीं देखेंगे, तब तक आप उस व्यक्ति के प्रति न्याय नहीं कर सकते। दूसरी बात, जो इन संस्मरणों के जरिये सामने आयी है, वह यह है कि क्रिकेट के बारे में बहुत लोग लिखते हैं, कितनी ही किताबें हैं, कितने ही कीर्तिमान हैं। क्रिकेट है ही कीर्तिमानों का खेल और कीर्तिमानों को लोग इक_ा भी करते रहते हैं, लेकिन उनकी व्यक्तिगत जिंदगी को जिस नजदीकी से अनुभव करके चतुर्वेदी जी ने लिखा है, वो काबिले तारीफ है। संजय भाई ने पंडित साहब का नाम लिया। एक ऐसा आदमी, जो एक आम आदमी था। क्रिकेट का शौक, क्रिकेट का जुनून, जो क्रिकेटर्स को आगे बढ़ाने में लगातार लगे रहे, प्रेरित करते रहे और कोशिश करते रहे कि यंग क्रिकेटर्स को वे सभी चीजें मिलती रहें।
मुझे मालूम है कि गोराकुंड की तरफ रहते थे वह, छीपाबाखल के पीछे की तरफ। साइकिल से जाते, साइकिल से आते। संजय भाई को बहुत लोग जानते हैं। मैं भी जानता था, मैं इतवरिया बाजार में रहता था तो मुझे मालूम था कि ये शख्स हैं, जो क्रिकेट के पूरी तरह से मुरीद हैं और क्रिकेट के प्रति अपना घर-बार सब बेचने को तैयार रहते हैं, ऐसे व्यक्ति हैं वे। उनके प्रति मेरे ख्याल से आपने आदरांजलि दी। इस किताब में पूरा एक चेप्टर, एक पूरा अध्याय उनके लिए लिखा। सलीम दुर्रानी के लिए लिखा, चंदू बोर्डे के लिए लिखा।
क्रिकेट की किताब में बहुत पैसा नहीं मिलता। ये जुनून की बात है, प्रेम की बात रहती है, मोहब्बत की बात रहती है, हिंदी भाषा से आप प्यार करते हैं, इसको आगे बढ़ाना है, ये मन में इच्छा रहती है। इसी कारण आप इतना काम कर पाते हैं, ऐसे यह संभव नहीं है। मुझे याद है कि पहली किताब जब मैंने लिखी थी, तब मैंने कहा था भई, मारवाड़ी आदमी हैं हम तो, रोकड़ा कितना दोगे। लिखने को तो हम तैयार हैं। तब उन्होंने कहा था कि ”वेरी हेंडसम पेमेंट फॉर यू डॉन्ट वरी तो मैंने 3-4 हजार रुपए उसकी टाइपिंग वगैरह में खर्च किए और आखिरकार किताब छपी। एंड देन हेंडसम पेमेंट-इट वाज वन थाउजंड फाइव हंड्रेड रुपये ओनली। कहने का मतलब ये कि ऐसी विधा से आपको इश्क न हो, मोहब्बत न हो, प्यार न हो, लगन न हो और इच्छाएं बलबती न हों मन में, तो इसमें आप घुस ही नहीं सकते, इसमें काम कर ही नहीं सकते। ये अच्छी बात है कि आज जमाना थोड़ा बदल गया है मतलब टेलीविजन आया है तो लोग टेलीविजन ज्यादा देखते हैं, पढ़ते कम हंै, लेकिन फिर भी अच्छा साहित्य पढ़ते हैं। क्रिकेट का साहित्य तो बहुत पढ़ते हैं। अच्छे उपन्यास को आप देख रहे हैं, आपको मालूम है कि यहां तक कि आई-टी सेक्टर के लोग इसको बेचने लगे हैं। एप्पल पर और सब जगह मतलब डाट कॉम्स पर ऐसी पुस्तकें काफी बिकती हैं। फ्लिप कार्ट पर काफी किताबें बिक रही हंै और लाखों किताबें बिक रही हैं। तो हिंदी में भी अब बड़ी संख्या में किताबें बिकने लगी हैं और अच्छी किताबें अगर आपने लिखीं जैसे क्रिकेट में आपकी प्रतिभा है तो भले ही आप किसी छोटे गांव में रह रहे हैं। प्रतिभा आप में है तो लोग ढूंढ.निकालते हैं।
आज का जमाना तेज हो गया है। लोगों के पास खबरें इतनी जल्दी पहुंचती हैं कि आपकी प्रतिभा को मान ही लिया जाता है। उसी तरह अगर आपने अच्छी किताब लिखी तो अंग्रेजी वाले भी ध्यान से उसे देखते रहते हैं और फिर उस किताब को अनुवाद करके अंग्रेजी भाषा में भी ले आते हैं। कई बातें आपने देखीं, कई बड़े-बड़े खिलाडिय़ों के लिए लिखा और इतने अंतरंग ढंग से लिखा कि तबीयत खुश हो गई। मुश्ताक अली साहब के बारे में आपने इतनी गहराई से लिखा है और मुश्ताक साहब को सब जानते हैं, दुनिया के ऐसे व्यक्ति, जिन्होंने भारत की तरफ से इंग्लैंड में जाकर पहली टेस्ट सेंचुरी बनाई और केवल कीर्तिमानों की बात नहीं, यह महत्वपूर्ण है कि किस तरह से वे खेलते थे। मुझे याद है कि कलकत्ता ईडंस गार्डन पर जब जाते थे तो लोग पूछते थे कि साहब ये तो शहर की पहचान बन गए थे। ऑस्ट्रेलिया में तो किथविलर पूछते ही थे कि आप कौन से शहर से हैं?
मैं पहले भी सुना चुका हूं ये किस्सा। कौन से शहर से आप आए हैं? तो मैं तो मेरा मूल कमजोर था, तो बता ही नहीं पाया कि मैं कहां से आया हूं, बंबई से या किस तरफ से? तो मैं कह ही नहीं पाया कि नार्थ से हूं कि दक्षिण से कि पूर्व से। फिर आखिर मुझे खयाल आया कि सर कैप्टन मुश्ताक अली, ही प्ले विद मी। बोले, अरे आप उस शहर से आए हैं, जहां मुश्ताक साहब रहते हैं। ऐसा जब सुनने को मिलता है तो गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है और संजय भाई ने बिल्कुल सही कहा कि घर का जोगी जोगड़ा। बाहर के गांव का मामूली व्यक्ति भी आता है तो बड़े-बड़े इंटरव्यूज छपते रहते हैं, लेकिन यहां का आदमी बड़े-बड़े काम भी करता है तो भी उसकी उपलब्धि को छोटा बताया जाता है। ये होता ही है और ये अपने शहर की ही बात नहीं है, हर शहर में ऐसा ही होता है। शहर में जिसे कहते हैं न कि जान-पहचान ईष्र्या का कारण बनती है। इसलिए चतुर्वेदी जी का जो प्रयास है, दूसरे शहरों में बहुत सराहा जा रहा है। खिलाडिय़ों के बारे में जिस अंतरंगता से इन्होंने लिखा है और केवल व्यक्तिगत बातें ही नहीं लिखीं, उनके रेकॉर्ड्स भी बहुत दिलचस्प तरीके से लिखे हैं।
इन्हें बहुत बधाई देते हुए चाहता हूं कि ये काम जारी रखें, ये काम दूसरे नहीं कर पाते। दूसरे नहीं कर रहे हैं। इतनी मेहनत कोई नहीं करता और संस्मरणों वाली किताबों में तो खासतौर पर। मैं समझता हंू कि बहुत सेंसिटिव इश्यू है, क्योंकि इन्होंने बड़ी विनम्रता के साथ जिस तरह से सारी बातें रखीं और जिस तरह से लोग इसे सराह रहे हैं और हिंदी में क्रिकेट की किताबों की जो कमी है, उसे इन्होंने पूरा किया है। उसके लिए हिंदी का क्रिकेट जगत इन पर मोहित होते हुए कृतज्ञता व्यक्त कर रहा है, लेकिन हिंदी साहित्य इनका हमेशा ऋणी रहेगा। आपने शुरू में ही लिखा है, जैसे हमने शुरू में कमेंट्री की, इसलिए लोग आज याद रखते हैं कि भई, कैसी भी की, शुरू तो की। मुझे याद है, तब मैं 18 साल का लड़का था, जब पहली बार कमेंट्री की। तब जगदाले साहब आकर बोले कि तुम इसे गंभीरता से नहीं ले रहे, तुम्हें शायद मालूम नहीं कि आगे चलकर हिंदी का एक बड़ा वर्ग तैयार होगा। हिंदी कमेंट्री बड़े स्केल पर हुआ करेगी। आप इस बात को सोच ही नहीं रहे। तुम इसे गंभीरता से लो। हंसी-मजाक में वक्त बर्बाद मत करो। मन में ऐसे सोचो कि जैसे संजय भाई को भी नहीं मालूम ये बात। जगदालेजी ने मुझे एक मैच में पास बिठाते हुए कहा कि तुम अंग्रेजी में मत सोचो। ये उनकी बात बता रहा हूं, जो आज नहीं हैं, लेकिन उनकी आत्मा सुन रही होगी। उन्होंने कहा था कि जैसे स्क्वेयर कट किया तो अब इसके बारे में हिंदी में सोचो, अंग्रेजी में मत सोचो।
उन्होंने कहा कि आप देखिए कि ये बल्लेबाज गेंद की लाइन से अपने आपको अलग कर रहा है, स्टॉप के लिए जगह बना रहा है और स्क्वेयर कट कर रहा है, चार रन। बड़ी सिंपल बात थी यह तो। फिर मैंने क्रिकेट में इस तरह से सोचना शुरू किया। हिंदी को काफी शब्द मैंने तब दिए थे, जब कोई और हिंदी कमेंटेटर नहीं था।
कर्नल सी. के. नायडू साहब-मुझे याद है कि उनका आखिरी इंटरव्यू मैंने ही किया था, जो सन् 1966 मे ‘स्पोट्र्स ऑफ पास्ट टाइम में छपा था। उस समय वे बड़ी विपदा में थे, उनकी ऐसी आंखें कि आप उनके सामने देख ही नहीं सकते थे, जलती हुई आंखें, मतलब ऐसा लगता था कि जैसे बल्ब जल रहे हैं। वे बोलते तो लगता कि सिवाय उनको सुनने और प्रभावित होने के आपके पास कोई चारा ही नहीं बचा है। वे बेटों से कहते कि कार को घिस कर साफ करो तो वे पूछते कि ऐसा क्यों करें तो वे उन्हें बताते थे कि ऐसा इसलिए किया करो, क्योंकि इससे कलाइयां मजबूत होती हैं। जब आप कपड़े से कार साफ करते हैं तो जितनी ज्यादा साफ करते हैं, कलाइयां उतनी ही मजबूत होती हैं।
आज लोग कितनी तरह की कसरतें करते हैं और कितनी तरह के फिजियोग्राफिक्स उपलब्ध हैं और कितनी तरह के फिजियोज रखे जाते हैं। वे आपको एक ट्रेनिंग देते है और फिर दूसरी ट्रेनिंग देते हैं। फिर भी हमारे आज के खिलाड़ी थोड़े दिनों में ही घायल हो जाते है, गेंदबाज तो घायल ही पड़े रहते हैं। ये भी सोचने की बात है कि उनके लिए एक सहज कॉमन सेंस की तमाम बातें चतुर्वेदीजी ने अपनी किताब में बेहतर तरीके से लिखी हैं। उनके व्यक्तित्व और क्रिकेट के बारे में उन्होंने साफ-साफ लिखा है, जिसका अच्छा प्रभाव आम जनता पर पड़ा। ये बातें संजय ने बिल्कुल सही कही हैं कि सोबर्स जैसे बड़े खिलाड़ी को इंटरव्यू करने भारत से तीन पत्रकार जा रहे हैं, कितनी शर्मिंदगी की बात है। मैंने कहा कि जो देश अपने कलाकारों, अपने लेखकों या अपने खिलाडिय़ों का सम्मान नहीं करता, वह देश धनिक नहीं है। वह आगे नहीं बढ़ सकता।
कोई व्यक्ति धनवान शेयर मार्केट में ऊंचा जाने से नहीं होता है, कोई देश धनवान ऐसे होता है कि आप अपने कलाकारों का, अपने प्रतिभावान नागरिकों का सम्मान किस तरह से करें। मैंने खुद देखा था कि एक बार सुनील गावस्कर और उनके साथ में डेविड गॉवर आ रहे थे। सुनील गावस्कर की तरफ देखकर एक बड़े सितारे, जिसके पास मैं खड़ा था, मैं कमेंट्री करने के लिए गया था, सुनील गावस्कर उधर दूर से आ रहे थे। कमेंट्री बॉक्स से काफी दूर थे, लेकिन उन्होंने नहीं सुना। वह कह रहे थे कि देखिए, वे आ रहे हैं उधर से, बच के रहना, ज्ञान बांटकर जाएंगे। ये सम्मान है बड़े क्रिकेट खिलाडिय़ों के लिए आजकल। ये बड़े दु:ख की बात है। कुछ लोग करते भी हैं, जैसे सचिन तेंदुलकर, मुझे याद है कि जब वह आउट हो जाते थे तो सुनील गावस्कर ऐसे नाराज हो जाते थे, जैसे वे खुद आउट हो गए हों। उनको बुलाकर वह स्टेप को बार-बार बताते। सचिन तेंदुलकर का एक उदाहरण बताता हूं, दक्षिण अफ्रीका में सन् 1996-97 में वे एक शॉट खेलकर आउट होने लगे थे बार-बार, तब मदनलाल मैनेजर थे। मदनलाल आए। उन्होंने कहा कि भई, सचिन परेशान है, बार-बार शॉट विकेट करके छोड़ जाता है। तो क्या कारण है? लाला प्रसाद की तरह ही बोले कि नहीं, आपको नहीं बताऊंगा, मुझे मालूम है कि वह क्यों आउट हुए, लेकिन अगर वह मुझसे पूछेंगे तो मैं उन्हें ही बताऊंगा।
अगले दिन मैंने देखा कि सचिन स्वयं उनके पास आए और उन्होंने ग्राउंड पर जाकर बताया कि तुम स्टम्प के आगे, पहले से बाहर निकल रहे हो। नेक्स्ट टाइम जब स्टंप पर गेंद आती है तो हेड ओवर जो बॉल होना चाहिए, वह स्लिप कर जाती है। आपका सिर उधर रह जाता है और पैर इधर तो गेंद ऊंची ही जाएगी। आप इसे ठीक करो। और अगले ही मैच में सचिन ने सेंचुरी मारी। तो ऐसे-ऐसे महान खिलाड़ी भी होते हैं, जो सीखते हैं और इसीलिए सचिन महान हैं तो उसका कारण यही है कि सीखने की तमन्ना उनको आखिरी दम तक रही, जब तक वे खेलते रहे। ऐसी कई तरह की बातें चतुर्वेदी साहब ने अपनी किताब में लिखी हैं। शुक्रगुजार हूं कि एक बार में ही पूरी किताब पढ़ गया, पहली लाइन से आखिरी लाइन तक और वह भी एक सिटिंग में। किताब मुझे दिलचस्प और रोचक लगी और ऐसी जानकारियां भी मिलीं, जो मुझे ज्ञात न थीं। इस तरह के किस्से जब मैं बाहर सुनाऊंगा मित्रों को तो उन्हें प्रभावित कर पाऊंगा, यह सोचकर मैं खुश हूं।
इस तरह की जितनी ज्यादा किताबें हम पढ़ें, उतना अच्छा है। मैं तो क्रिकेटर्स से भी कहता हूं कि हिंदी साहित्य पढ़ो। चुटकुले ज्यादा सुनाने वाले एक कमेंटेटर ने यह भी कहा कि फिरोजशाह की मैदानगी जो पीछे है, वह किसी बूढ़ी नानी की झुर्रियों की तरह दिखाई देती है। अब इसकी कोई तुलना होगी क्या? मतलब इस तरह की बातें भी होती हैं तो मैं उनको यही कहता हूं कि चतुर्वेदी साहब की किताबें पढ़ेंगे तो फायदा होगा। मुझे आज की अच्छी बात यह भी लगी कि हमारी आदरणीया भाभी (प्रभा चतुर्वेदी) का सम्मान किया गया। मैं ये हमेशा कहता हूं कि किसी भी व्यक्ति की सफलता के लिए नारी का सहभागी होना अनिवार्य होता है। उन्हें भी बधाई और चतुर्वेदी साहब को भी।

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