बजट रंगीन, किसान गमगीन

केंद्रीय बजट 2018 गांव, खेत और खेतिहर के लिए काफी रंगीन है। इसमें कृषि और कृषक के लिए एक से बढक़र एक प्रावधान हैं। उपज लागत से डेढ़ गुना मूल्य, फसल बीमा, कृषि हाट, सिंचाई, 24 घंटे बिजली आदि एक से बढक़र एक बढक़र योजनाएं हैं। इन्हें देख-सुनकर लगता है कि गांवों और किसानों का सोया हुआ भाग्य वास्तव में जाग गया है, लेकिन लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार, योजनाओं की कछुआ चाल आदि कारणों के चलते सारी नेक नीयती कागजों तक ही है। परिणामस्वरूप भारी असमानता है। एक ओर रिकार्ड तोड़ बंपर उत्पादन है तो दूसरी ओर गरीबी सीमा रेखा के नीचे के आंकड़े हंै। भूमिहीन खेतिहर मजदूर की बात तो दूर छोटे-मझोले किसान गले तक कर्ज में डूबे हुए हैं। अधिकांश किसान आत्महत्याओं के पीछे आर्थिक परेशानी बड़ा सबब है। भले ही हाकिम और जिम्मेदार अमला इसे वजह मानने से इंकार करें, लेकिन असली कहानी योजनाओं की जबानी ही बयान होती है कि जब सब कुछ ठीक-ठाक है तो अरबों-करोड़ों की किसान योजनाएं किसके लिए हंै? बीच-बीच में किसानों के दर्द को कम करने के लिए कर्ज या ब्याज माफी या अगले आदेश तक वसूली स्थगित करने की नौबत क्यों बार-बार आती है? किसान हित में केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से आए दिन रूपहली घोषणाएं तब फीकी नजर आती हैं जब किसान सडक़ों पर कर्ज माफी की गुहार लगाता हुआ नजर आता है। निर्वाचित जन प्रतिनिधि अक्सर लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधानपरिषद में किसानों की दुर्दशा का रोना रोते रहते हंै। कभी इस बात को लेकर सवाल उठता है कि योजनाओं पर अमल कब होगा तो कभी खेतिहरों की अनदेखी को लेकर बवाल मचता है। सवाल और बवाल भी बाढ़ और सूखा की तरह जुड़वा और स्थायी हैं। हर मौसम में कुछ न कुछ पेंच फंसा ही रहता है। मौसम बदलते हंै, लेकिन प्रश्न की जमीन जस की तस रहती है। कृषि की दुर्दशा का दर्द झलकता ही रहता है। हरित क्रांति के पहले की पीड़ा और उसके बाद के गम में फर्क सिर्फ इतना है कि बस पीढिय़ां ही बदली हैं, क्योंकि आज भी किसानों की पतली हालत को लेकर वही सब मुखर है, जो पहले था। जाहिर है कि कहीं कुछ कमी है जिसके चलते बजट रंगीन होने के बाद भी किसान की माली हालत इतनी संगीन है। इसमें कोई शक नहीं कि सरकारों की मंशा रही है और है भी कि किसानों का उद्दार हो, उनकी आर्थिक स्थिति में बदलाव आए और वे सर उठाकर जी सकंे, लेकिन इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि किसानों को कर्ज से मुक्ति दिलाने वाले उपायों के साथ ऐसी योजनाओं पर तेजी से काम किया जाये, जिनसे किसानों को वास्तविक फायदा हो सके। जब सरकार बाजारी अभिशाप से मुक्ति के लिए 22 हजार ग्रामीण बाजारों को कृषि हाट बनाने का लक्ष्य पूरा करने के लिए दो हजार करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान करती है तो उम्मीद बनना स्वाभाविक है कि देर से ही सही, रात कटेगी और सवेरा होगा, किंतु जब दिन के उजाले में बिचौलिया, रिश्वतशाह और लूटखोर साफ दिखते हैं तो लगता है कि अभी दिल्ली दूर है। फसल बीमा योजना कहने-सुनने में जितनी अच्छी लगती है, गुनने में उतनी नहीं है। जब अकाल, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के तांडव के विरुद्ध क्षतिपूर्ति 13 रुपए सुर्खी बनती है तो सब्र का बांध टूटने लगता है। माटी का स्वास्थ्य बेहतर रखने के लिए योजना तब सिसकते हुए नजर आती है जब कृषि दवा बाजार में कुल बिक्री का 62 फीसदी हिस्सा कीटनाशी औषध खरीदने के लिए खर्च होने का आंकड़ा सामने आता है। देश में मोटे तौर पर 139000 मेट्रिक टन कीटनाशक दवा का उत्पादन प्रति वर्ष होता है। बाजार में 4000 प्रकार की कीटनाशी दवाएं मिलती हंै। इनकी खपत का आकड़ा 41 हजार 8 सौ 33 मीट्रिक टन है। ऐसी दवाओं का भारी उत्पादन और खपत यह बताने के लिए काफी है कि खेत की मिट्टी कितनी बीमार है। खेत, दवा और खेतिहर, दया पर जिंदा हों तो स्पष्ट है कि कृषकों का भाग्योदय मात्र किसान सौभाग्य योजना की घोषणा से नहीं हो सकता है, बल्कि अमलीकरण को निर्दोष बनाने से होना है, क्योंकि इसी वजह से किसानों के लिए बजट रंगीन होने के बावजूद किसानों की हालत संगीन है और खेतिहर गमगीन हैं।

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