कभी तो होगी इस रात की सुबह

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन की महबूबा सरकार गिरने के साथ ही वहां एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की शुरुआत हो चुकी है। यह एक ऐसी राजनीतिक रात्रि की शुरुआत है जिसका सवेरा कब होगा, कोई नहीं जानता। महबूबा सरकार इसलिए गिरी, क्योंकि भाजपा ने इस गठबंधन सरकार से हाथ खींचने का फैसला कर लिया। वैसे तो मुफ्ती मोहम्मद के निधन के बाद से ही ऐसा तय लग रहा था, लेकिन अंतिम समय तक भाजपा पीडीपी और उसकी नेता महबूबा की मार्फत राज्य में कुछ ऐसा सकारात्मक हासिल करने की उम्मीद करती रही जो असल में उनसे हासिल हो ही नहीं सकता था। इसलिए रमजान में सेना के हाथ बांधने के बाद जब बेगुनाहों को जान से हाथ धोना पड़ा तो समर्थन वापसी का अंतिम फैसला ले लिया गया। समर्थन वापसी के बाद महबूबा का पहला बड़ा बयान यह आया कि यदि राज्य में उनकी पार्टी को तोडऩे की कोशिश हुई तो वहां फिर सन् 1990 वाले हालात पैदा हो जाएंगे। इस बयान के बाद यह कयास लगाना गलत नहीं होगा कि क्या उन्होंने वाकई घाटी को 1990 वाले हालात के करीब ले जाकर ही सीएम ऑफिस छोड़ा? इसका सुबूत यह है कि महबूबा सरकार गिरने के बाद नेशनल कान्फ्रेंस समेत किसी भी दल ने सरकार बनाने की इच्छा नहीं जताई। और यदि यह सच है तो मुख्यमंत्री के तौर पर वह इतने दिन क्या करती रहीं? उन्होंने देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले हजारों पत्थरबाजों के मुकदमे वापस लिए, कई भारतीय सैन्य अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाईं और जब इससे भी मन नहीं भरा तो उन्होंने अपने जोर का इस्तेमाल करते हुए रमजान के महीने में सेना के ऑपरेशन रुकवाए। इस दौरान नामचीन हस्तियों की हत्याएं तो हुई हीं, सिपाही और सैनिक तक अगवा कर मारे जाने लगे। इसी के तुरंत बाद भाजपा ने हाथ खड़े कर दिए और महबूबा मुफ्ती भी शायद इतना सब करवाने के बाद जैसे घर लौटने का ही इंतजार कर रही थीं।
एक अरसा हुआ जब हिंदी की एक फिल्म रिलीज हुई थी-हैदर। जम्मू-कश्मीर के हालात पर बनी इस फिल्म के रिलीज होने पर आम्र्ड फोर्सेज को ऐतराज था, क्योंकि इससे उनकी और देश की छवि खराब होना तय था। कायदे से ऐसी फिल्म रिलीज होनी ही नहीं चाहिए थी। असल में भारत जैसे देश में लोकतंत्र के नाम पर ऐसा बहुत कुछ होता है, जो कायदे से होना ही नहीं चाहिए। इस फिल्म के एक दृश्य में दिखाया गया है कि सेना ने एक घर में छिपे आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन शुरू कर रखा है और वह बार-बार माइक पर उन आतंकियों से बाहर आकर सरेंडर करने को कह रही है। लेकिन ऐसा नहीं होता और दोनों ओर से गोलीबारी चलती रहती है। तभी सेना की कमान संभाल रहे सैन्य अधिकारी के सामने अपने एक सैनिक का शव आता है और वह उस शव को देखते ही आतंकियों का ठिकाना बने उस घर को नेस्तनाबूत करने का हुक्म दे देता है।
फिल्म के इस दृश्य को ही नहीं, कई अन्य दृश्यों को भी भुलाना आसान नहीं है और वे निश्चय ही देश और सेना की छवि को दागदार करने वाले हैं। कश्मीर में आज सेना ऐसी ही लड़ाई लड़ रही है। इसमें हर समय भारी जोखिम तो है ही, इस देश के लोग उपद्रवियों के सामने सेना के जवानों को गंभीर रूप से अपमानित होते भी देख चुके हैं। कहा जा सकता है कि सैनिकों के धैर्य और सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है और यह सब लोकतंत्र के नाम पर ही हो रहा है। कश्मीर में सेना पर पत्थरबाजी करने वाले हजारों उपद्रवियों से केस वापस ले लिए जाते हैं और मेजर गोगोई जैसे सैन्य अफसरों के जरा-सी आजादी बरतने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो जाती हैं!
कश्मीर घाटी में लोकतंत्र के नाम पर ही आज भी आतंक की भाषा बोलने वाले हजारों चरमपंथी और अलगाववादी छुट्टे घूम रहे हैं। जिन अलगाववादियों के बच्चे विदेशों में पूरे सुकून-चैन से पढ़ रहे हैं, वे कश्मीर के हजारों बच्चों को पत्थरबाजी के गुर सिखा रहे हैं। यदि चरमपंथियों को छोड़ भी दिया जाए तो दिल्ली में बैठकर मुख्यधारा के नेता कहे जाने वाले फारूक अब्दुल्ला और उनके सपूत उमर अब्दुल्ला भारत के खिलाफ और पाकिस्तान के पक्ष में जैसा विष-वमन करते हैं, क्या वे पाकिस्तान में रहकर उसके खिलाफ ऐसा कर सकते थे? यदि वहां कोई इस तरह का बरताव करता तो उसका कब का जनाजा उठ गया होता। जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश रखने वाले उनके पूर्वज शेख अब्दुल्ला तो कब के चल बसे, लेकिन जम्मू-कश्मीर को रियासत कहने की उनकी आदत अब तक नहीं छूटी है। वे कश्मीर को तो रियासत कहते हैं, मगर यह भूल जाते हैं कि जम्मू और लेह-लद्दाख का भाग्य भी उसी से जुड़ा है।
कश्मीर को भारत का एक अभिन्न अंग मानने और उसे बनाए रखने के लिए यह देश और उसकी सेना बलिदानों की इतनी ऊंची कीमत अदा कर चुके हैं कि अब वहां से पैर खींचना संभव नहीं है।
वैसे भी चीन के अक्साई चिन पर कब्जा करने और पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान को हड़प लेने के बाद यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि सेना उसे किसी भी कीमत पर गवां नहीं सकती। सन् 1987 के बाद से भारतीय सेना जम्मू-कश्मीर में और एलओसी पर 6500 जवानों की शहादत झेल चुकी है। यह सही है कि इस दौरान 24 हजार आतंकियों का भी सफाया किया गया, लेकिन सेना ने जो कीमत चुकाई, वह बहुत ऊंची है।
साथ ही देश ने सैन्य और अन्य साधनों के लिए पिछले 70 सालों में जो बेशुमार धन लुटाया है उसका तो कोई हिसाब ही नहीं है। खुद अपने ही एक क्षेत्र को अपने कब्जे में बनाए रखने के लिए इससे ऊंची कीमत भला और क्या चुकाई जा सकती है? जाहिर है कि इस देश और सेना के पास अब केवल एक ही विकल्प बचा है कि आगे की ओर ही बढ़ा जाए और भूलकर भी मुडक़र पीछे न देखा जाए।
आजादी के पिछले 70 सालों में हमने सारा समय कश्मीर में राजनीतिक प्रयोगों में ही गंवाया है। जाहिर है कि ये प्रयोग ज्यादातर सत्ता में रही कांग्रेस ने ही किए। इन प्रयोगों में भी रह-रहकर दो ही बातें ज्यादा सामने आती रही हैं। या तो जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक सरकारें होती हैं या फिर उनकी विफलता के बाद वहां राष्ट्रपति शासन शुरू हो जाता है और सेना के हाथ में भी कुछ निर्णायक ताकत आ जाती है। दूसरा प्रयोग यह होता है कि जम्मू-कश्मीर मसले को लेकर हम या तो पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता शुरू कर देते हैं या फिर उसे अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर देते हैं। इसके अलावा भी कांग्रेेस ने कुछ और प्रयोग समय-समय पर किए हैं जो ज्यादातर आत्मघाती ही साबित हुए हैं। मसलन, नेहरू शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बनवाना चाहते थे। उन्होंने ही इस मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ में पहुंचाया और वहां जनमत संग्रह की बात कही। इंदिरा गांधी ने यदि सन् 1971 की लड़ाई को कुछ और खींच दिया होता तो शायद गिलगित-बाल्टिस्तान भी आजाद हो गए होते। या फिर उन्होंने शिमला समझौते में भुट्टो पर एलओसी को ही अंतर्राष्ट्रीय बार्डर मानने का दबाव डाला होता तो भी इस समस्या का अंत हो गया होता। अपनी इन गलतियों की सजा हम आज तक भुगत रहे हैं और कब तक भुगतते रहेंगे इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। फिलहाल एक बार फिर राष्ट्रपति शासन शुरू होने के साथ वहां एक और राजनीतिक रात्रि की शुरूआत हो गई है। यह रात्रि कुछ ऐसी है कि इसका सवेरा कब होगा, इसे लेकर फिलहाल कोई कयास तक लगा सकता।

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