आम आदमी पार्टी और कांगे्रस में बढ़ती दूरियां

इस बात को बहुत समय नहीं हुआ जब राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम थी कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में अंदर ही अंदर कुछ तालमेल बनाने की बात हो रही है। इस चर्चा को इसलिए तरजीह मिली थी, क्योंकि आम आदमी पार्टी की सरकार अपने साढ़े तीन साल के कार्यकाल में भाजपा की केंद्र सरकार और उसके प्रतिनिधि दिल्ली के उपराज्यपाल से जरूरतों और अधिकारों को लेकर लगातार उलझती रही। इस तरह की चर्चाओं को हवा देने वालों का मानना था कि यदि कोई तालमेल हो जाता है तो पंजाब में चुनाव हार चुकी और कई अन्य राज्यों में राजनीतिक जमीन तलाश रही आम आदमी पार्टी को अपने गृह प्रदेश दिल्ली और अन्य जगहों पर भी कुछ न कुछ संजीवनी मिल जाएगी। ऐसा कुछ हो पाता, उससे पहले ही दिल्ली के तत्कालीन कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अजय माकन, जो अब इस्तीफा दे चुके हैं, इस आरोप के साथ सामने आ गए कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच ऐसा कुछ नहीं चल रहा और इस तरह की अफवाहों को आम आदमी पार्टी ही हवा दे रही है।
इन चर्चाओं को हवा चाहे जो दे रहा हो, इन पर विराम लगने की एक बड़ी वजह यह थी कि कांग्रेस आम आदमी पार्टी के साथ पहली समर्थित सरकार बनाने के बाद से उस पर लगातार हमलावर ही रही है। इसके पीछे कांग्रेस का गणित यह था कि वह यही मानकर चल रही थी कि दिल्ली में हमेशा से बस दो ही पार्टियों का वजूद रहा है-कांग्रेस और भाजपा। इस हालत में उसके लिए हमेशा पहला या दूसरा स्थान सुरक्षित रहा और मौजूदा तीसरे पायदान पर उसे धकेलने का काम यदि किसी ने किया है तो वह आम आदमी पार्टी ही है। इसलिए कांग्रेस का हमेशा यही मानना रहा कि यदि दिल्ली में उसे अपना कम से कम दूसरा स्थान सुरक्षित रखना है तो वह आम आदमी पार्टी के विरोध से ही संभव है। इसीलिए कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से तालमेल की बात चल निकलने के बाद भी पैर वापस खींच लिए।
दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी की कांग्रेस की तरफ हाथ बढ़ाने की मजबूरी यह थी कि जब से उनकी सरकार बनी थी, पहले उपराज्यपाल नजीब जंग और उसके बाद अनिल बैजल से उसके रिश्ते लगातार तनावपूर्ण रहे। इससे ज्यादा तनाव और क्या होगा कि दिल्ली सरकार के मुखिया अरविंद केजरीवाल और उनके मंत्रियों ने उपराज्यपाल आवास पर ही धरना और भूख हड़ताल शुरू कर दी। क्योंकि उपराज्यपाल स्वाभाविक रूप से केंंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है, इसलिए इस रस्साकशी को बढ़ाने में भाजपा ने भी कोई कसर छोड़ी होगी, ऐसा नहीं लगता। फिर एक जनांदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी अपना पुराना चेहरा बदलने को तैयार नहीं थी। यहां तक कि जब केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर काम करने वाले अधिकारियों से उनकी पटरी नहीं बैठी तो मुख्य सचिव तक से मारपीट हो गई।
इसलिए जब हाईकोर्ट से लेकर सरकारी अधिकारी तक आम आदमी पार्टी के खिलाफ लामबंद थे तब उसे लग रहा था कि कांग्रेस से हाथ मिला लेना शायद उसके लिए संजीवनी का काम कर जाए। इससे हो सकता है कि वह एक नई ताकत के साथ भाजपा और उसके अधिकारियों के खिलाफ खड़ी हो जाए। अफसोस कि ऐसा होता उससे पहले ही इस योजना को पलीता लग गया और वह भी ऐसा कि साथ आने की कोशिश कर रही कांग्रेस और आम आदमी पार्टी पहले से भी ज्यादा बड़े राजनीतिक दुश्मन के तौर पर आमने-सामने डट गईं। यहां तक कि अब तक सारे विपक्ष के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती आई आम आदमी पार्टी ने स्वयं को राज्यसभा उपसभापति के चुनाव से अलग कर लिया। यह किसी को भी अचंभे में डालने वाला कदम था, क्योंकि इसी आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन दिया था। उपसभापति के चुनाव से पहले ही मुजफ्फरपुर कांड के खिलाफ दिल्ली में आयोजित सर्वदलीय धरना-प्रदर्शन में आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मंच साझा करने से साफ इनकार कर दिया। आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह ने राज्यसभा में साफ कहा कि उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन दिया था, लेकिन अब अगर कांग्रेस को उनके समर्थन की जरूरत नहीं है तो उनकी पार्टी ही क्यों आगे आए।
आप नेता राघव चढ्ढा तो संजय सिंह से भी दो कदम आगे निकल गए। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के साफ-साफ कह दिया कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही विपक्ष के महागठबंधन में सबसे बड़ा रोड़ा हैं। यही नहीं, उन्होंने उन्हें भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी भी बता दिया। कभी दिल्ली में आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर सरकार बनवाने वाली कांग्रेस से शायद अभी उनकी दूरियां पूरी नहीं हुई थीं। इसलिए तुरंत ही इस घमासान में आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल भी कूद गए। रोहतक में उन्होंने साफ कर दिया कि आगामी लोकसभा चुनाव में वे न तो पीएम पद के दावेदार हैं और न ही वैसे किसी गठबंधन में उनकी दिलचस्पी है, जिसके बारे में कई पार्टियां बढ़-चढक़र बोल रही हैं। उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्रीय दल जिस महागठबंधन को आकार लेता देख रहे हैं, वे उसके पक्षधर इसलिए नहीं हैं, क्योंकि इन दलों की देश के विकास में कोई भूमिका ही नहीं रही है।
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच की इस रस्साकशी में आखिरी आहुति डाली कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष अजय माकन ने। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी राजनीतिक लाभ लेने के लिए इस मसले पर दोहरे मापदंड अपना रही है।
उन्होंने पूछा कि यदि कांग्रेस ने सन् 2013 में उन्हें समर्थन न दिया होता तो क्या उन्होंने सरकार बना ली होती? उन्होंने आरोप लगाया कि इस समर्थन के बावजूद आम आदमी पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे और भाजपा को सभी सीटें जीतने में प्रत्यक्ष मदद की। उन्होंने आरोप लगाया कि महाभियोग प्रस्ताव में भी उन्होंने भाजपा को समर्थन दिया था। दोनों तरफ के बयानवीरों के इन आरोपों से साफ है कि कोई भी किसी को रियायत देने को तैयार नहीं। ऐसे में यही कह सकते हैं कि दोनों के बीच नजदीकियों का सफर खत्म हो चुका है और फिलहाल पैदा हुई दूरियों का सफर कब खत्म हो, इस बारे में कोई कुछ नहीं बता सकता।

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