आदिवासी बाग में चुनावी बहार

छत्तीसगढ़ में चुनावी दांवपेंच जोरों पर हैं। प्रदेश के 90 विधानसभा क्षेत्रों में 39 आरक्षित हैं, 10 दलितों और 29 आदिवासियों के लिए। सत्ता के दावेदार दलों की नजर में इन सीटों की खास अहमियत है, क्योंकि सरकार बनाने में इनकी प्रमुख भूमिका रही है। माना जाता है कि ‘आदिवासी जिस दल के पाले, सरकार उसके हवाले यानी सरकार किस पार्टी की बनेगी, इसका दारोमदार आदिवासी मतों पर रहता है। विधानसभा चुनाव में अपनी अपनी जीत पक्की करने के लिए सभी दल बेताब हैं, इसलिए अगली सरकार बनाने के लिए, सबसे ज्यादा राजनीतिक छीनाझपटी आदिवासी बहुल इलाकों में है। सियासी वर्ग आदिवासियों को साधने के लिए सुधि लेने के बहाने उनके दर पर हाजिरी बजा रहा है। बस्तर से जशपुर तक नेताओं की सक्रियता देखने लायक है। प्राय: सभी दल मसीहाई अंदाज में आदिवासियों के कल्याण एवं भावी विकास की बढ़-चढ़कर बातें और वादे कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उसके बाद राष्ट्र्रीय स्वंय सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के दौरे को खासी चर्चा मिली। अपने प्रवास के दौरान राहुल गांधी ने आदिवासियों की उपेक्षा का सवाल उठाते हुए उधर भाजपा की केंद्र और राज्य सरकार पर हल्ला बोला, इधर मोहन भागवत ने जशपुर में पाथलगढ़ी से उपजी समस्या को समझने और सुलझाने का प्रयास किया। घोषित रूप से उनका दौरा भले ही गैर राजनीतिक रहा हो, लेकिन अघोषित रूप से वे सरकार की उलझनों को एक हद तक सुलझा गए। इसके पहले बस्तर प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चिर-परिचित अंदाज में आदिवासियों का मन मोहने का प्रयास किया था। प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह इस वर्ग से निकट का संबंध बनाये हुए हैं। उन्होंने धुर नक्सली बहुल इलाके में मोटर साइकिल से यात्रा करके वाहवाही भी लूटी। सभी को भरोसा है कि उनकी मेहनत रंग लाएगी और वोट के रूप में वे जनजातियों का दुलार पाने में कामयाब होंगे।
इससे इतर आदिवासियों के एक वर्ग का मानना है कि आदिवासी मतदाताओं के लिए भी यह कोई नई बात नहीं है। उन्हें भली-भांति मालूम है कि बागों में बहार चुनावी मौसम तक ही है। आमतौर पर लोंगों का अनुभव रहा है कि सारे के सारे राजनीतिक दलों को मतदाताओं की याद चुनाव सिर पर आने के बाद ही आती है। भूखों के लिए खाना, बेघरों के लिए घर, बेरोजगारों के लिए नौकरी, आने-जाने के लिए सड़क, पढ़ाई के लिए अच्छे स्कूल, इलाज के लिए आधुनिक अस्पताल,भरपूर बिजली, पीने के लिए साफ पानी, अमन-चैन जैसे बासी वादे प्राय: हर दल चुनाव के वक्त रस्मी तौर पर हर बार करता है और चुनाव खत्म होने के बाद भूल जाता है।
चुनावी वादों और जमीनी सच में काफी फर्क है। आदिवासियों के कल्याण के बारे में चाहे जितनी बातें की जाएं, हकीकत उससे बिलकुल अलग है। जंगल-जमीन के पट्टे, बाँधों से सिंचाई का पानी दिए जाने और मनरेगा के अटके भुगतान को लेकर आदिवासियों में खासी नाराजगी है। हाल ही में 31 साल पुराने समझौते को पूरा करने के लिए नगरी सिहावा के आदिवासी एक बार फिर राजधानी रायपुर में बेमुद्दत धरने पर हैं। मसला जमीन के पट्टे का है। सिहावा विधानसभा में आदिवासी आबादी का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। जंगल की जमीन पर कई पुश्तों से खेती करते आ रहे सैकड़ों आदिवासियों को जमीन का पट्टा नहीं मिला है। उन्हें पचासों बार आश्वासन मिल चुका है, लेकिन पट्टा नहीं मिला। इससे आदिवासी असंतुष्ट हैं। इसके पहले सर्व आदिवासी समाज ने जमीन के कानून में संशोधन को आदिवासियों के हित के खिलाफ बताते हुए जमकर मोर्चा लिया था। बढ़ती नाराजगी को देखते हुए सरकार ने तब संशोधन को लागू नहीं करने का आश्वासन दिया था। आदिवासी अंचलों मे सिंचाई के लिए बड़े-बड़े वादे चुनावी वक्त में करते हुए आदिवासी शक्ति का स्मरण और गुणगान करना सियासतदानों की फितरत है, जिसे बाद में भूल जाना उनकी आदत है। इसे लेकर इस बार आदिवासी समाज में भारी आक्रोश है। फलस्वरूप विधानसभा चुनाव से पहले आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग ज़ोर पकड़ती जा रही है। हाल ही में आदिवासी सर्व समाज महासभा के जलसों में यह मांग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उठ चुकी है। अनेक स्थानों पर वन भूमि अधिकार कानून के तहत दी जाने वाली जमीन के पट्टों पर हील-हवाला का मुद्दा छाया हुआ है। नगरी सिहावा के आदिवासी नेता बंशी श्रीमाली के अनुसार कई गांवों में पुश्तैनी कब्जे वाले जमीन के पट्टे नहीं दिए जा रहे हैं, जबकि सालों से पक्केे पट्टे का आश्वासन मिल रहा है, लेकिन अभी तक वादा आधा-अधूरा ही है। पीढिय़ों से जंगल की जमीन से खदेड़े गए लोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या है। अकलतरा के आदिवासी नेता फेकन सिंह का कहना है कि दलों के वादे वे बचपन से सुनते आए हैं, लेकिन विकास के नाम पर आदिवासी के झोंपड़े को उजड़ते तो देखा है, मगर बसते बहुत कम देखा। कोरिया जिला के दयाराम कोल का मानना है कि चुनाव के मौसम में मतदाता के दर पर वोट मांगने वालों की कतार लगती है, लेकिन चुनाव के बाद सब कुछ बदल जाता है। हारने वाला वोटरों को कोसता है और जीतने वाला सबसे पहले गरीब मतदाताओं से किए गये वादों को भूल जाता है। सुकुलराम के अनुसार, स्वस्थ समाज के निर्माण की बातें करने वाली राजनीति खुद बीमार है, लेकिन दलों की नजर में आदिवासियों की नाराजगी भी चुनाव की तरह वक्ती है। चुनाव के समय उनका दर्द उबाल खाता है, लेकिन मान-मनौवल के बाद मान जाते हैं। धुर दक्षिणपंथी से लेकर वामपंथी नेता तक को पूरा भरोसा है कि मतदाता इस बार भी उनकी बात न केवल सुनेंगे, बल्कि हमेशा की तरह मानेंगे भी। भारतीय जनता पार्टी को रमन सरकार के 15 सालों के काम के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने का भरोसा है। पिछले विधानसभा चुनाव में बस्तर संभाग में अपेक्षाकृत बढिय़ा प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस को अगली सरकार बनाने की पूरी उम्मीद है तो छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस को भी यकीन है कि आदिवासी समुदाय के उनके नेता पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में ही छत्तीसगढ़ की नयी सरकार बनेगी। कई छोटे दल भी आदिवासियों की नब्ज टटोल रहे हैं। उन्हें लगता है कि आदिवासी समाज परिवर्तन चाहता है। इस बार बहुत सोच-समझकर वोट देगा। सर्व आदिवासी समाज के अपने पैंतरे हैं, वह आदिवासियों के बीच सत्ता की भूख जगाने की कोशिश में है। आदिवासी मुख्यमंत्री के नारे को जनजाति वर्ग में काफी तवज्जो मिल रही है, लेकिन आदिवासी समाज के मतदाताओं और दलों के बीच आंख मिचौली अपनी जगह है। बहरहाल, चुनावी मौसम में सारे नेता आदिवासी वोटों की अच्छी फसल काटने की जुगत में लगे हुए हैं।

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