आजादी की लड़ाई और नायकों की भूलें

कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीतकर सुभाषचंद्र बोस ने नायकत्व सिद्ध कर दिया था, लेकिन गांधी ने उसे अपनी व्यक्तिगत हार करार दिया तो सुभाष ने जीते हुए पद को छोडक़र उनके मान की रक्षा करते हुए दूसरी राह पकड़ ली। संसद में जैसे दलितों के लिए सीटें आरक्षित हैं, वैसे ही मुसलमानों के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए वे लोग मन बना लेते और जिन्ना को देश का प्रधानमंत्री बनाने की गांधी की राय पर राजी हो जाते तो शायद जिन्ना अलग पाकिस्तान की जिद पर न अड़ते। तब शायद भारत विभाजन टल भी सकता था। जिन्ना कुछ समय के मेहमान थे। उनके बाद नेहरू प्रधानमंत्री बन ही जाते, लेकिन हमारे नायक ऐसा कर पाने से चूक गए। गोआ में दलाईलामा ने यही कहकर विभाजन की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है…
कामतानाथ का ‘कालकथा’ हिंदी का बड़ा उपन्यास है। उनकी तरह लखनऊ के ही सितारे सर्जक मनोहरश्याम जोशी की कामना हिंदी का अपना ‘वार एंड पीस’ रचने की थी । ‘कसप’, ‘कुरु-कुरु स्वाहा’, ‘हरिया हरक्यूलीज की हैरानी’ और ‘हमजाद’ के जरिये वे उधर बढ़े भी और जाते-जाते साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेतेे गए। ‘कालकथा’ के छपते ही कामता भी बहुत कुछ के हकदार हो गए थे, लेकिन ‘कलिकाल’ के सामने कहां मिल सका ‘कालकथा’ को उसका हक? मनोहरश्याम जोशी तो अपना ‘वार एंड पीस’ साकार नहीं कर सके, लेकिन जाने से पहले कामतानाथ ‘कालकथा’ के रूप में हिंदी को उसका ‘वार एंड पीस’ सौंप गए। भले ही बड़े सम्मान उन्हें नहीं मिले, लेकिन पाठकों के बीच वे बड़े उपन्यासकार के रूप में स्थापित हो गए। यहां याद आ रहा है हेमिंग्वे के नोबेल विजेता उपन्यास ‘द ओल्ड मैन एंड द सी’ का एक अंश: ‘‘उसने अपने बचपन के अफ्रीका का सपना देखा, जिसमें नजर आए लंबे-लंबे समुद्र तट और वे झक्क सफेद तट भी, जो इतने सफेद थे कि आंखें चुंधिया जाएं और फिर उसने देखे ऊंचे-ऊंचे अंतरीप और भारी भूरे पहाड़। अब वह हर रात तट पर रहकर सपने में समुद्र का शोर सुनता और मूल अफ्रीकियों को उससे निकलते देखता है। सपने में ही उसने एक दिन डेक के कोलतार और पुराने सन की महक महसूस की और वह अफ्रीकी गंध भी, जिसे वहां की माटी की महक से सराबोर हवा सुबह-सुबह उस तक ले आती है, लेकिन एक रात उसने समुद्र से उभरते द्वीप की कुछ चोटियां भी देखीं और फिर उस द्वीप की सडक़ें और बंदरगाह भी। अब उसे तूफान, औरतें, दुर्घटनाएं और विशाल मच्छ सपने में नहीं आते। सपने के धुंधलके में अब वह कुछ स्थानों पर बिल्लियों की तरह समुद्र तट पर खेलते शेरों के बच्चों को पहले की तरह दुलराते हुए भी देखता है।’’
हेमिंग्वे के उपन्यास ‘द ओल्ड मैन एंड द सी’ के इस अंश को पढ़ते हुए सहसा याद आए कामतानाथ के उपन्यास ‘समुद्र तट पर खुलने वाली खिडक़ी’, ‘तुम्हारे नाम’ और ‘सुबह होने तक’ जैसे उनके उपन्यासों के अनेक अंश। ‘एक और हिंदुस्तान’ तथा ‘पिघलेगी बर्फ’ के अंश भी याद आए। हेमिंग्वे को पढ़ते हुए हमने अक्सर लक्ष्य किया कि कामता की भाषा भी हेमिंग्वे की तरह सहज है,एकदम पारदर्शी। इस संदर्भ में हेमिंग्वे की कहानी ‘डेथ इन द ऑफ्टर नून’ का अंश भी देखने योग्य है: ‘‘बड़ी बात है टिके रहकर अपना काम कर लेना, सुनना, सीखना और समझना। जब लगे कि हम कुछ जानते हैं, तब लिखना, न उससे पहले और न ही बहुत दिन बाद। जो लोग दुनिया को बचाना चाहते हैं, उसे यदि हम उसकी समग्रता में देख सकें तो फिर उसका जो भी हिस्सा ईमानदारी से रचेंगे, वह उसकी समग्रता का बोध देगा। असल बात है काम करना और बनाने की कला सीख लेना।’’ हेमिंग्वे की बनाने की यह कला कामता की रचनाओं में बहुतायत में मिलती है। परिदृश्य को समग्रता में देखने की पारदर्शी दृष्टि और कला में सहजता कामता की रचनाओं का ऐसा गुण है, जिसके चलते वे प्रेमचंद, रेणु, अमरकांत और भीष्म साहनी की पांत में सहज ही शामिल हो जाते हैं। उनके उपन्यास ‘कालकथा’ के चारो खंड देख लेने के बाद तो वे हमें ‘हिंदी के तोल्स्तॉय’ लगने लगे हैं। हिंदी के सबसे बड़ी उपन्यासक के रूप में ‘कालकथा’ बड़े से बड़ा पुरस्कार पाने का अधिकारी था, लेकिन सारी पात्रता के बावजूद कामता को ‘भारत भारती’ या ‘व्यास सम्मान’ तक नहीं मिल सका, पर ‘महात्मा गांधी सम्मान’ पाकर ही संतुष्ट रहे ेेकामता अंत तक सृजन में मगन रहे। उसे ही वे अपना प्राप्य मानते थे। कमलेश्वर और ज्ञानरंजन जैसे सर्जक-संपादक उन्हें महत्वपूर्ण मानते हैं, उनके लिए इतना जानना भर पर्याप्त रहा।
अपनी कहानी ‘रिश्ते-नाते’ से कामतानाथ शहर से गांव की ओर जो प्रस्थान करते हैं, वो उनके उपन्यास ‘कालकथा’ में खुलकर सामने आ गया, जिससे पता चलता है कि उन्हें उत्तर भारत के ग्रामीण जन और जीवन की गहरी समझ ही नहीं थी, उसका व्यापक जीवनानुभव भी उनके पास था, प्रेमचंद की तरह। ऐसे कथाकार की संपूर्ण कहानियां उसके जीवनकाल में छपकर आ जाएं, उसके लिए इससे ज्यादा सुखद घटना क्या हो सकती है,पर कामतानाथ की ‘संपूर्ण कहानियां’ में उनकी सब कहानियां नहीं हैं। कुछ और कथाएं भी उन्होंनें लिखीं, जो पत्रिकाओं में तो छपीं, लेकिन ‘संपूर्ण कहानियां’ में कामता ने उन्हें शामिल नहीं किया। उन्होंने उन्हें डिसओन कर दिया, क्योंकि ‘संपूर्ण कहानियां’ एक जिल्द में छपने से पहले उन्होंने खुद फाइनल कीं। मेरी राय थी कि अन्य कहानियों को भी ‘संपूर्ण कहानियां’ में शामिल होना चाहिए, पर कामता माने ही नहीं।
22 सितंबर, 1934 को लखनऊ में जन्मे कामतानाथ पढ़ाई-लिखाई के दौरान पाठ्यक्रम में दूसरी जबान के रूप में भी हिंदी न पढ़ सके। फिर भी हिंदी के पहली पांत के कहानीकारों में शुमार हुए तो इसकी वजह यह थी कि स्वाध्याय से उन्होंने न सिर्फअच्छी हिंदी सीखी, बल्कि अनेक कालजयी कहानियां और कई महत्त्वपूर्ण उपन्यास हिंदी को सौंप गए। पाठ्यक्रम में उन्होंने उर्दू पढ़ी और फारसी का ज्ञान भी पाया, लेकिन जब चुनने की सरमय आया तो हिंदी की जगह अंग्रेजी को चुन लिया, लेकिन कामता की कहानियां पढ़ते हुए आभास तक नहीं होता कि उन्होंने विधिवत हिंदी नहीं पढ़ी। प्रेमचंद की तरह उन्हें भी हिंदी खुद सीखनी पड़ी। उनकी तरह वे भी उर्र्दू-फारसी पढक़र बड़े हुए और हिंदी में लिखकर बड़े कथाकार सिद्ध हुए।
बहुचर्चित कहानी ‘छुट्टिïयां’ से सृजन शिखर की ओर बढ़ते कामतानाथ ने जब ‘अंत्येष्टिï’ जैसी कहानी लिखी तो लोगों ने मान लिया कि वे उच्च कोटि के कहानीकार हैं। ‘छुट्टिïयां’ में उन्होंने अगर मध्यवर्गीय मानुष के मामूली जीवन को प्रामाणिकता से अंकित किया है तो ‘अंत्येष्टिï’ में मां की मौत के बाद की स्थितियों का यादगार चित्रण है। चर्चित कहानी ‘तीसरी सांस’ में रेलवे केबिन के निचाट अकेलेपन में रहते हुए आने-जाने वाली ट्रेनों को लाल-हरी झंडी दिखाते रेलकर्मी के कठिन और कठोर जीवन का जो आख्यान कामता ने रचा है, उसे पढक़र मानना पड़ता है कि ऐसा सृजन कोई उस्ताद कथाकार ही कर सकता है। इसी तरह ‘अंत्येष्टिï’ में हम निम्न मध्यवर्गीय मानुष के एक-एक सपने और आकांक्षा को टूटते हुए सुन सकते हैं, जिसमें न तो चौंकाने वाली घटनाएं हैं, न ही नकली संवाद। बड़ी सादगी से कहानी का ताना-बाना बुना गया है। इसमें कथानायक को मां के शव के साथ श्मशान पहुंचकर कुछ नए अनुभव हासिल होते हैं, जिनके सहारे वह अतीत में उतरता है, जो उसका कम, मां का अधिक है। कहानी की मूल कथा बस इतनी-सी है। समाप्तप्राय पीढ़ी की इस कहानी में कथानायक चुभन महसूस करता है।
सामाजिक रूढिय़ों की व्यर्थता का बोध कराती कामता की यह कहानी निर्मम निस्संगता से व्यवस्था से टकराती है, जिसमें कहीं भी अमूर्त बिंब नहीं हैं। साफगोई और संजीदगी से सारी बातें कही गई हैं। शायद इसीलिए यह मानव मन के सहज, स्वाभाविक और कोमल भावों की पवित्र कथा लगती है, जिसके जरिए जीवन को कुछ और गहरे उतरकर जाना-समझा जा सकता है। ‘छुट्टिïयां’ से ही वे बड़े कथाकार के रूप में समकालीन कथा परिदृश्य पर उभर आए थे। वस्तुत: वही था शिखर की ओर उनका उठान और उड़ान बिंदु। इस कहानी में नायक का छोटा भाई घर में अफीम रखने के आरोप में पकड़ा जाता है। होली की छुट्टियों में घर आने पर नायक को इसका पता चलता है। मां उससे छोटे भाई को छुड़ा लाने को कहती है, क्योंकि मंझले को उसकी कोई चिंता नहीं। किसी तरह भाग-दौडक़र नायक छोटे भाई को छुड़ा लाता है और फिर पारंपरिक ढंग से होली का त्योहार संपन्न होता है। इस सामान्य-सी स्थिति पर कामता ने ‘छुट्टियां’ जैसी बड़ी कहानी लिख दी। उन्होंने संयत और आवेशहीन संवाद अदायगी से सहज मानवीय संबंधों की रागात्मकता और निस्संगता का अविस्मरणीय आख्यान रच दिया है। बहुत कठिन होता है ऐसी सहजता हासिल कर पाना, पर ‘छुट्टिïयां’ में कामतानाथ ने सहजता के शिखर छू लिये हैें। इसीलिए यह कामता की ही नहीं, समूचे कथा दौर की प्रतिनिधि कहानी बन गई। इस कहानी के परिवेश, पात्र, शिल्प, भाषा और स्थितियों में ऐसा अपनापन है कि पाठकों को यह अपनी ही कहानी लगने लगती है, आसपास चलते-फिरते तीन भाइयों और मां के रिश्तों की गरमाहट में पैठ रहे ठंडेपन की कहानी। एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में हमने कामता की कहानी ‘लाख की चूडिय़ां’ शामिल की थी, लेकिन वह उनके प्रकाशित संग्रहों न थी। अन्य साठ कहानियां भी उनके संग्रहों में न थीं, जिन्हें ‘संपूर्ण कहानियां’ (भावना प्रकाशन, दिल्ली) में पढ़ सकते हैं।
‘लाख की चूडिय़ां’ कुटीर उद्योग और शहरी कारखाने में चलने वाली सनातन प्रतिद्वंद्विता का करुण आख्यान है। गांव में रहकर लाख की चूडिय़ां बनाने वाले मनिहार के पस्त-होने का कारण बनती हैं कारखाने में बनी रंग-बिरंगी चूडिय़ां, जबकि उसके जीवन का कारोबार कुटीर उद्योग में बनने वाली लाख की चूडिय़ों से चल रहा था। गांव में होने वाले शादी-ब्याह के मौकों पर उनकी वजह से उसका बड़ा मान था, लेकिन औद्योगीकरण ने उससे उसका सब कुछ छीन लिया। कामतानाथ के नौ संग्रहों में आने से शेष रही उनकी प्रमुख कहानियां थीं: नास्तिक, बदाली, फूल का मोल, जिस रात लखनऊ में चिराग नहीं जले, संतान, मुन्ने मियां, बहादुर बाबा, भूतनाथ, स्वर्गवास, कम्युनिस्ट, लड़ाई, अपने-अपने ताजमहल, शरीफ, फैसला, रामायण पाठ, मूर्ख, ममी, नौटंकी, घड़ा, दलाल, बॉलकनी, तरबूज, महात्मा बुद्ध की वापसी, मेहमान, शब्द, दंगा, जुम्मन काका, दोस्त, अंजीर का पेड़, युद्ध, अंत, गवाह, सुखी दाम्पत्य और क्लर्क आदि। कामतानाथ की ‘संपूर्ण कहानियां’ पढक़र हम जान सकते हैं कि महानगरीय शोर-शराबे से दूर चुपचाप सृजनरत रहे हिंदी के इस उस्ताद कथाकार का रचना संसार कितना व्यापक और वैविध्यपूर्ण है, जिसमें एक तरफ गांव के लोगों की जीवन स्थितियों का चित्रण है तो दूसरी तरफ छोटे शहर से लेकर महानगर तक का जीवन यथार्थ।। भिन्न-भिन्न आस्थाओं के लोग यहां हैं तो ट्रेड यूनियन लीडर और श्रमजीवी भी।कामता जैसा विषय वैविध्य समकालीनों में किसी के पास न था। शायद इसीलिए कमलेश्वर उन्हें खतरनाक मौन अन्वेषण का कथाकार मानते थे और विश्वंभरनाथ उपाध्याय मानते थे कि सामान्य विवरण से परिवेश के समूचे सत्य को उभारने की कामतानाथ जैसी कला किसी और के पास नहीं।
‘संपूर्ण कहानियां’ में कामतानाथ की एक सौ पैंतीस कहानियां हैं, जिनमें फरवरी, 1961 में ‘स्वतंत्र भारत’ में प्रकाशित पहली कहानी ‘मेहमान’ है तो सन्ï 2006 में प्रकाशित आखिरी ‘कैद-ए-हयात’ भी। अंत्येष्टिï, उसका बच्चा, सोवियत संघ का पतन क्यों हुआ, तीसरी सांस, शिकस्त, निमाई दत्ता की त्रासदी, रिश्ते-नाते, छुट्टिïयां, चिरागां, मकान, सब ठीक हो जाएगा और संक्रमण उनकी उत्कृष्ट कहानियां इसमें हैं। कामतानाथ की कहानियों से जब-जब गुजरा, हेमिंग्वे के ‘द ओल्ड मैन एंड द सी’ का वह बूढ़ा याद आया, जो अथाह समुद्र में नाव में डगमग डोलता जिजीविषा का ऐसा प्रतिमान गढ़ता है, जिस पर हेमिंग्वे को नोबेल पुरस्कार मिला। ऐसे ही कामतानाथ की कहानी ‘संक्रमण’ ने हजारों पाठकों और दर्शकों को तो जद में लिया ही लिया, नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेता तक उससे इस कदर अभिभूत हुए कि उन्होंने सैकड़ों बार उसका मंचन कर उसकी प्रासंगिकता उजागर की। किसी लेखक की किसी हिंदी कहानी का इस तरह थियेटरमय हो जाना अपने आप में एक इतिहास है, शिवमूर्ति की कहानी ‘कसाईबाड़ा’ की तरह। ‘संक्रमण’ वस्तुत: कामता की वैसी ही कहानी बन गई, जैसी गुलेरी की ‘उसने कहा था’, प्रसाद की ‘पुरस्कार’, प्रेमचंद की ‘पूस की रात’, रांगेय राघव की ‘गदल’, मोहन राकेश की ‘मलबे का मालिक’, रेणु की ‘तीसरी कसम’, शेखर जोशी की ‘कोसी का घटवार’ और ज्ञानरंजन की ‘अमरूद का पेड़’। आंदोलनों से संबद्ध रहते हुए भी उनकी लफ्फाजी, नारेबाजी, शोरगुल और चीख-पुकार से कामता की कहानियां प्राय: मुक्त ही रहीं, हालांकि उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता को ढूंढऩा मुश्किल नहीं। ‘छुट्टियां’ का अंश देखें : ‘जब स्वतंत्रता नहीं मिली थी, तब जीवन मामा कांग्रेस की बड़ी तारीफ करते थे। स्वतंत्रता मिलने के बाद अब वह कांग्रेस की बुराई और कम्युनिस्टों की तारीफ करने लगे हैं।’
कामता ने ‘संपूर्ण कहानियां’ की भूमिका में कुछ ऐसे प्रसंग दर्ज किए हैं, जिन्हें पढक़र उनके कथा संसार में अतिरिक्त सुख पा सकते हैं। भूमिका में वे बताते हैं कि उनके परिवार में साहित्यिक माहौल का अभाव था। पिता अंग्रेजी और उर्दू जानते थे। हिंदी की कोई किताब उनके घर में न थी, रामायण और महाभारत तक नहीं। वैसी धार्मिक किताबें उर्दू में थीं, जिन्हें पिता कपड़े में बांधकर रखते थे। अलिफ लैला, गुल सनोवर और किस्सा हातिम ताई भी थीं, जिन्हें वे दूसरे बस्ते में रखते थे। कामता ने भी शुरू में उर्दू पढ़ी और चोरी-छिपे उन किताबों को उर्दू में ही पढ़ा। बाद में बुआ के घर जाने पर गर्मी की छुट्टियों में ‘चंद्रकांता संतति’ और ‘भूतनाथ’ जैसी किताबें हिंदी में पढ़ीं। प्रेमचंद की उर्दू कहानियों का संग्रह ‘प्रेम पच्चीसी’ और ‘प्रेम बत्तीसी’ पढऩे पर कामता को साहित्य का नया रूप देखने को मिला। ‘शंकर्स वीकली’ में अंग्रेजी कविता भेजी तो छपने के बाद राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के हस्ताक्षर में सर्टीफिकेट प्राप्त हुआ। शुरू में कुछ कविताएं लिखीं, जिनमें से कुछ को नामवर ने ‘जनयुग’ में छापा था।
किसी भी नए लेखक की तरह आरंभ में कामता भी सोचा करते थे कि उनकी कहानियां भी छप सकती हैं क्या? डर और संकोच के कारण उन्होंने कोई कहानी कभी छपने के लिए नहीं भेजी, हालांकि लिखने तभी लगे थे, जब हाई स्कूल में पढ़ते थे। स्वाध्याय से उन्होंने हिंदी सीखी और रचनाकार के रूप अपनी अलग भाषा-शैली विकसित की-सहज, सरल और सादगी भरा अंदाजे-बयां, आत्मीय, विश्वसनीय और प्रामाणिक। उन्हें कथा संसार में प्रवेश दिलाने का श्रेय उनके मित्र गिरधारीलाल पाहवा को है, जिन्होंने उनकी कहानी ‘मेहमान’ टाइप कराकर ‘स्वतंत्र भारत’ में भेज दी, जो सन्ï 1961 में छप गई। प्रोत्साहित होकर उसी वर्ष उन्होंने ‘देवी का आगमन’ और ‘स्वर्गवासी’ जैसी कहानियां लिखीं, जो ‘सारिका’ और ‘कहानी’ जैसी तब की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपीं। उसके बाद लिखी गई कहानी ‘लाशें’ की काफी चर्चा हुई। ‘उसका बच्चा’ भी उस समय की उनकी चर्चित कहानी है, हमारे आसपास की, घर-परिवार की, जमीन से गहरे तक जुड़ी हुई। सहज और स्वाभाविक संवाद लिये एक-एक चरित्र को उभारती कामता की यह कहानी न जाने कब खत्म हो जाती है, रह जाता है तो बस जीवन का सच। बच्चे की मृत्यु पर केंद्रित यह कहानी मानवीय रिश्तों की कशमकश को सहजता से दर्ज करती है, हालांकि ‘लाशें’ पर अकहानी की छाया है, लेकिन बाद के दौर में कामता खुद को उससे बचाकर आगे बढ़े। ‘मकान’ वर्तमान के साथ अतीत में जीने की कहानी है तो ‘पहाड़’ कामता का एक अलग ही एडवेंचरस रूप सामने लाती है, जिसे बाद में उनके उपन्यास ‘समुद्र तट पर खुलने वाली खिडक़ी’ में विस्तृत रूप में देखा गया, उससे पहले ‘एक और हिंदुस्तान’ से उनकी छवि अच्छे उपन्यासकार की बनी तो फिर वह ‘कालकथा’ तक और चमकती चली गई।
कहानी की अपनी इयत्ता को बचाए रखते हुए कामता ने उसे स्लोगन नहीं बनने दिया। कथा नायकों को विशिष्ट बुद्धिजीवी बनाए बिना उन्होंने व्यवस्था को एक्सपोज ही नहीं किया, उसका विरोध भी किया। इसके लिए उनकी कहानी ‘युद्ध’ पढ़ सकते हैं। ऐसे ही ‘पूर्वाद्र्ध’ उस ट्रेड यूनियनिस्ट की व्यस्तता की कहानी है, जिसके पास परिवार के लिए समय ही नहीं बचता। वह उस ट्रेड यूनियनिस्ट के जीवन की स्थिति का महज वर्णन नहीं, बयान भी है, अपने समय की सच्चाइयों का, आदमी के दु:ख-दर्द और उसकी परेशानियों का। आत्मीयता और सहजता का दामन थामे कामता की यह कहानी दूर तक और देर तक पाठक का पीछा करती है।
काल कथा
इतिहासपरक साहित्य से पाठकों का जीवनबोध विकसित होता है, पर कुछ लेखकों का ऐसा लेखन जीवनबोध को विकसित करने की बजाय उन्हें अतीतजीवी बनाता है। हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में पाठकों को अतीतजीवी बनाते साहित्य का अंबार लगा है, लेकिन भैरप्पा और महाश्वेता देवी जैसे सर्जक अपने इतिहासपरक, यहां तक कि मिथक आधारित लेखन तक से पाठक को अतीतजीवी नहीं बनाते, उल्टे उसका जीवनबोध विकसित करते चलते हैं। भैरप्पा का ‘पर्व’ और ‘अनावरण’ हो, शिवप्रसाद सिंह का ‘नीला चांद’ या महाश्वेता देवी का उपन्यास ‘झांसी की रानी’, सब यही काम करते हैं। जीवन को समझने-समझाने का ऐसा ही काम ‘काल कथा’ लिखकर कामतानाथ ने किया है।
इतिहास को इतिहासकार अपनी नजर से देखता है और साहित्यकार अपनी नजर से, लेकिन यदि दोनों विवेकशील दृष्टिक रखते हों तो दोनों ही अपने लेखन से पाठक का जीवनबोध विकसित कर सकते हैं। इतिहास को देखने के दोनों के तरीके बेशक भिन्न हो सकते हैं, लेकिन परिणाम लगभग एक जैसे। भारत की आजादी की लड़ाई पर लिखी गई तमाम ऐतिहासिक किताबों से लेकिन एकदम भिन्न और सार्थक परिणाम देने वाला उपन्यास है कामतानाथ का ‘कालकथा’, जहां एक निश्चित समय है और है उसकी प्रामाणिक कथा। अंग्रेजों की सत्ता है और उससे संघर्ष करते योद्धा, जिनमें महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय, लाजपतराय, चितरंजन दास, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, शिव वर्मा, अशफाकउल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल, मोहनलाल सक्सेना, गणेशशंकर विद्यार्थी और जिन्ना जैसे सिद्ध-प्रसिद्ध लोग शामिल हैं। मुंशी रामप्रसाद का छोटा बेटा रतन, उसके चाचा बबउनू, सज्जन, मुनव्वर, बांके, बच्चल सिंह, ललई पंडित, बच्चन, हेमंत, असित, प्रीति, लक्ष्मी, अब्दुल गनी, जमना देवी, शारदा, रज्जो, मुन्नी बाई, छैलबिहारी, बासुदेव नारायण, तहफ्फुज, वाहिद, शम्मो, जसोदा, नजमा, सिल्लो, मेवा लाल और कासिम जैसे पचासों लोगों का जीवन ‘कालकथा’ में है और है कॉलेज में पढऩे वाले तेज शंकर का जीवन वृत्तांत भी, जो रतन का हमउम्र है, उस समय की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों को जानने-समझने का प्रयास करने वाला एक नौजवान। सामान्य जनजीवन के बीच से उभरे इस समझदार युवक के नजरिए से कामतानाथ ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद के उस ‘काल’ और उसकी ‘कथा’ को पकडऩे का प्रयास किया है। ‘कालकथा’ के एक प्रसंग में सवाल उठता है कि मोतीलाल नेहरू के लिए देश प्रेम बड़ा था या पुत्र प्रेम? लोगों ने गांधी से पूछा तो उन्होंने इसका सीधा उत्तर न देकर सिर्फ इतना कहा कि उनका देश प्रेम भी उनके पुत्र प्रेम का ही उत्पाद है। मोतीलाल नेहरू ने गांधी को पत्र लिखकर इच्छा व्यक्त की थी कि कांग्रेस अध्यक्ष का ताज कम से कम एक बार उनके जीवन काल में ही जवाहरलाल के सिर की शोभा बने और गांधी ने सन् 1929 में उनकी यह इच्छा पूरी कर दी, कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे देवीलाल ने प्रधानमंत्री का ताज ऐन वक्त पर विश्वनाथ प्रताप सिंह के सिर पर सजा दिया था। सन् 1929 में जवाहरलाल के प्रति गांधी का झुकाव खुद अपने लिए आ रहे कांग्रेस अध्यक्ष के ताज को उनके सिर की शोभा बना देने से स्पष्ट हो गया था।
गांधी अच्छी तरह जानते थे कि सुभाष उनकी एक न सुनेंगे। इसलिए प्राय: उनके विरुद्ध रहे। हालांकि प्रधानमंत्री बनने पर नेहरू ने ही कहां उनकी सुनी या उनकी नीतियां लागू कीं। आजाद हिंद फौज का गठन कर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ देने के सुभाष के अभियान के पीछे नेहरू के प्रति गांधी के इसी अतिरिक्त झुकाव का हाथ रहा, क्योंकि सुभाषचंद्र बोस की कोई भी जीत गांधी की व्यक्तिगत हार होती थी। हम सब जानते हैं कि गांधी एक बार हार भी गए थे, लेकिन सुभाषचंद्र बोस ने उन्हें बचा लिया, पर स्वाधीनता मिलने से पहले ही गांधी ने राजनीतिक खेल शुरू कर दिया था, अन्यथा भारत के पहले प्रधानमंत्री सुभाषचंद्र बोस होते, जिन्ना होते या फिर होते सरदार वल्लभ भाई पटेल। कामता का ‘कालकथा’ ऐसी स्थितियों की ओर संकेत करता न्याय के तराजू पर भारत के तत्कालीन इतिहास को तोलता हुआ विकसित करता है एक नया जीवनबोध ताकि पाठक अपने इतिहास को नए तरीके से देख सकें।। जीवन को जीते हुए हम उसे प्राय: समझ नहीं पाते। इतिहास अपने साथ हमें जीवन को समझने की तमीज देता है, खासकर साहित्य के जरिये पुनर्सृजित इतिहास। इतिहास चाहे राजा का हो या संन्यासी का, किसी देश या समुदाय का, पाठक को जीवन का नया पाठ सौंपता है। कामतानाथ का उपन्यास ‘कालकथा’ भी यही काम करता है।
इतने वर्षों में हमारा पड़ोसी चीन और उसका पड़़ोसी जापान कहां से कहां पहुंच गए। विभाजित जर्मनी कैसे अपनी पराजय और विभाजन के दंश से मुक्त होकर फिर से एक होकर दुनिया को चुनौती देने लगा है और हम! हम अभी कश्मीर में भाड़े के टट्टुओं और कुछ सिरफिरों से बातचीत में ही उलझे हुए हैं, जैसे सन् 1929 में गांधी और हमारे नेता लॉर्ड इरविन से भारत को औपनिवेशिक स्वराज देने की वार्ता में उलझे हुए थे, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही नेहरू ने बिना किसी झिझक के पूर्ण स्वराज की घोषणा कर दी। इसके पीछे दबाव था चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों के साहसिक कारनामों का, जनता को दिखाए गए आजाद और समाजवादी भारत के निर्माण के स्वप्न का, जिसे गांधी जी तो नहीं समझ पाए, लेकिन नेहरू समझ गए, जिसे सही समय पर अमली जामा पहनाया और प्रधानमंत्री बनकर देश को आजीवन वही स्वप्न दिखाते रहे।
पाठक को भारत के निकट अतीत और वर्तमान को देखने की ऐसी दृष्टि और अंतर्दृष्टि सौंपता कामतानाथ का उपन्यास ‘कालकथा’ जिसने नहीं पढ़ा, समझो उसने आधुनिक भारत को ऐतिहासिक दृष्टि से पेश करने वाले सच्चे अर्थ में हिंदी के पहले महाकाव्यात्मक उपन्यास को नहीं पढ़ा। ‘गोदान’ के जरिये प्रेमचंद ने गांवों और शहरों के समग्रता में जीवन को चित्रित कर महाकाव्यात्मक उपन्यास लेखन का जो बिरवा रोपा था, कामतानाथ के उपन्यास ‘कालकथा’ में वह अपना शिखर पा गया, लेकिन कामतानाथ का ‘कालकथा’ वृंदावनलाल वर्मा के उपन्यासों जैसा इतिहास परक नहीं है, क्योंकि इसमें चंद्रशेखर आजाद और नेहरू और महात्मा गांधी और भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस और जिन्ना आदि का यथास्थान अवतरण तो है, लेकिन उपन्यास के केंद्र में है उन दिनों के संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) के उन्नाव जनपद के ग्राम जीवन के साथ कानपुर और बनारस से लेकर कोलकाता लखनऊ लाहौर और अमृतसर तक का नागर जीवन और उसके बीच चल रहा भारत का स्वाधीनता का आंदोलन। तब हिंदू-मुसलमान के बीच इतना अलगाव नहीं था और देश इस तरह बंटा भी नहीं था। लाहौर, रंगून और ढाका तब हमारे अपने ही शहर हुआ करते थे और हमारे बाप-दादे वहां नौकरियां करने या काम-धधा पाने आया-जाया करते थे।
सन् 1918 में मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड योजना का सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने तो स्वागत किया, लेकिन चितरंजन दास ने खारिज कर दिया और तिलक ने मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहा कि ‘जो मिल रहा है, उसे ले लो और बाकी के लिए संघर्ष जारी रखो।’ और फिर आयी रौलेट कमेटी रिपोर्ट। युद्ध के समय किसी को भी बंदी बनाने का विशेषाधिकार प्राप्त करने का बिल असेंंबली में पेश हुआ तो गांधी ने एक दिन की देशव्यापी हड़ताल की अपील कर दी, जिससे सारे देश में बाजार बंद रहे, जुलूस निकले और प्रदर्शन हुए। पुलिस ने कई जगह गोलियां चलाईं। अमृतसर में अनेक कांग्रेसी नेता धोखे से गिरफ्तार किए गए। कसूर और गुजरांवाला में भी उपद्रव हुए। अनेक लोगों को कैद कर मुकदमा चलाया गया। कुछ को फांसी और कुछ को काला पानी की सजा हुई। इन घटनाओं से क्षुब्ध होकर रवींद्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेज सरकार से मिली ‘सर’ की उपाधि वापस कर दी। दिसंबर, 1919 में अमृतसर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में प्रतिनिधि शुल्क देकर दर्शक की हैसियत से शरीक हुए तेज शंकर का आंखों देखा हाल तो ‘कालकथा’ में है ही, उन्नाव जनपद के गांव चंदनपुर, गाजीखेड़ा और दुर्जनखेड़ा जैसे कई गांवों का आंखों देखा हाल भी यहां है और लखनऊ जैसे शहर का तो रहने वाला ही है तेज शंकर। लखनऊ जेल का जीवन उसने नेहरू के साथ देखा था। सो ‘कालकथा’ का एक बड़ा हिस्सा तेज शंकर की आंखों से देखा गया। आंदोलन का क्रांतिकारी पक्ष और शेष ग्रामीण जीवन सज्जन की आंखों देखा और जिया गया। रतन की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं और महत्त्वपूर्ण है बच्चन का जीवन संघर्ष भी।
प्रथम विश्व युद्ध के आखिरी दिनों के आसपास गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रारंभिक चरण के समापन के बाद उसके अगले चरण के आरंभ 31 दिसंबर, 1929 की मध्यरात्रि को लाहौर में रावी के तट पर जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में की गई पूर्ण स्वराज की घोषणा और भारत विभाजन तक के काल खंड को अपनी काया में समेटे कामतानाथ का ‘कालकथा’ बड़ा ही नहीं, बहुत बड़ा उपन्यास है, जिसने उन्हें हिंदी के बड़े उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। लोगों को कामतानाथ कहानीकार तो प्राय: बड़े लगते रहे, लेकिन बड़े उपन्यासकार नहीं, जबकि ‘एक और हिंदुस्तान’, ‘सुबह होने तक’, ‘समुद्र तट पर खुलने वाली खिडक़ी’, ‘बर्फ पिघलेगी’ और ‘तुम्हारे नाम’ जैसे छोटे-बड़े कई उपन्यास वे पहले ही लिख चुके थे, जो हिंदी के अच्छे उपन्यासों में शुमार हैं। फिर भी, कामतानाथ माने कहानीकार ही जाते रहे, अच्छे और बड़े कहानीकार, लेकिन ‘कालकथा’ ने उन्हें बड़ा उपन्यासकार भी सिद्ध कर दिया।
बीसवीं सदी के सातवें दशक में उभरे कथाकारों में कामतानाथ लाजवाब हैं, जो ट्रेड यूनियन से जुड़े होने के कारण विभिन्न सामाजिक-आर्थिक आंदोलनों से तो संबद्ध रहे ही, कथाकार होने के कारण विभिन्न कथा आंदोलनों से भी जुड़ते रहे, लेकिन कामतानाथ को कामता बनाने वाली विशेषता है उनकी साफ-सुथरी वैज्ञानिक दृष्टि, सहज भाषा में पारदर्शी अभिव्यक्तिऔर समग्रता में स्थितियों का विश्वसनीय अंकन कर सकने की क्षमता।
जीवन मामा जिस कांग्रेस के प्रशंसक थे, उसी कांग्रेस द्वारा चलाए गए आजादी के आंदोलन को कामतानाथ ने ‘कालकथा’ की पृष्ठभूमि में रखकर बताया कि किस तरह शहरों के लोग स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बने, कष्ट सहे और हर तरह की कुर्बानी दी और किस रूप में गांवों के लोग भी इस आंदोलन से जुड़े और उन्होंने किस तरह स्वाधीनता संघर्ष में योगदान किया। शहरों से लेकर गांवों तक उन दिनों आजादी की हवा किस तरह बही और मोतीलाल नेहरू ने भी आजादी के लिए कितनी कुर्बानियां दीं: ‘‘असहयोग आंदोलन की छिटपुट शुरुआत कलकत्ता अधिवेशन के तुरंत बाद हो गई थी, लेकिन नागपुर अधिवेशन के बाद तो पूरे देश में स्फूर्ति की लहर-सी दौड़ गई। पंडित मोतीलाल नेहरू ने संयुक्त प्रांत की काउंसिल की सदस्यता से इस्तीफा देते हुए वकालत छोडऩे की घोषणा पहले ही कर दी थी। अपनी बग्घियों, फिटनों, घोड़ों, गाडिय़ों, विलायती कुत्तों, कांच और चीनी मिट्टी के बहुमूल्य बर्तनों को भी तिलांजलि दे दी। बेटी कृष्णा को इलाहाबाद के सरकारी स्कूल से निकाल लिया। पाश्चात्य ढंग का रसोईघर और घरेलू बार खत्म कर दिया। फालतू हो गए नौकरों, रसोइयों तथा सईसों को समुचित मुआवजा देकर मुक्त कर दिया। घर के बेशकीमती परदों, कालीनों, मेजपोशों और पहनने के ढेरों विदेशी वस्त्रों, विलायती साडिय़ों, यूरोप में सिले सूटों को सार्वजनिक रूप से आग के हवाले कर दिया। वस्त्र इतने अधिक थे कि जलने में कई घंटे लगे। आनंद भवन के सामने जलाई गई इस होली को देखने के लिए सारा इलाहाबाद उमड़ पड़ा। रातोंरात आनंद भवन बदल गया। राजाओं जैसे ठाठ का स्थान तपस्वियों के आश्रम की सादगी ने ले लिया।’’
इसी तरह बिहार के मजहरुल हक राजकुमारों जैसी शानो-शौकत, विदेशी वस्त्रों और विलायती शराब के शौक के लिए पूरे देश में मशहूर थे, पटना में अपनी विशाल कोठी छोडक़र गंगा तट पर बनी कुटिया में रहते हुए विदेशी वस्त्र त्यागकर खद्दर का कुर्ता-पाजामा पहनने लगे, लंबी दाढ़ी रख ली, जमीन पर सोने लगे और विलायती शराब की बोतलें गंगा में फिंकवाकर एकदम सूफी हो गए।
मोतीलाल नेहरू और मजहरुल हक कोई अपवाद न थे। देश के कोने-कोने में इस तरह की घटनाएं आम हो गईं। बड़ी संख्या में जन-प्रतिनिधियों ने काउंसिलों से इस्तीफे दे दिए, हजारों-लाखों रुपये प्रतिवर्ष की प्रैक्टिस करने वाले वकीलों ने वकालत से संन्यास ले लिया। लाखों की संख्या में विद्यार्थियों ने विश्व विद्यालय, स्कूल और कॉलेज छोड़ दिए। पूरा देश ‘अल्ला-हो-अकबर’, ‘वंदे मातरम्’, ‘भारत माता की जय’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारों से गूंज उठा। जगह-जगह विदेशी वस्त्रों की होली जलाई जाने लगी।
तेज शंकर ने भी कॉलेज जाना बंद कर दिया और निर्णय ले लिया कि वह भी विदेशी वस्त्रों की होली जलाएगा। इसके लिए उसने एक महीने तक प्रभात फेरी निकाली। मुहल्ले के युवकों और बच्चों की टोली बनाई, जो सूरज निकलने से पहले ही मुहल्ले भर में, गली-गली में ‘वंदे मातरम्’, ‘भारत माता की जय’, ‘महात्मा गांधी की जय’ जैसे नारों के साथ राष्ट्रीय गीत गाते हुए निकलती। बच्चन भी इस टोली में नित्य प्रति होता ही। कभी-कभी
बबउनू बाबा भी शामिल हो जाते। गीत और ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष के बाद तेज शंकर जगह-जगह रुककर भाषण देता, ‘‘भाइयो-बहनो, माताओ और देवियो, गांधी जी ने कहा है कि एक वर्ष में देश में ‘स्वराज’ आ जाएगा। हमारी बरसों की गुलामी समाप्त हो जाएगी। इसके लिए जरूरी है कि हम विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करें और अधिक से अधिक स्वदेशी चीजों को प्रयोग में लाएं। घर-घर में चरखा हो, जिस पर सूत काता जाए, खद्दर के वस्त्र पहनें, महिलाएं भी खद्दर के वस्त्र पहनें। कचहरियों का बहिष्कार करें। आपस में मिल-जुलकर रहें। हिंदू-मुस्लिम एकता बनाए रखें। आपको यह भी ज्ञात हो कि गांधी जी के आदेश पर देश में जगह-जगह विदेशी वस्त्रों की होली जलाई जा रही है। इस क्षेत्र में भी अगले महीने की तेरह तारीख को सती मैया के चौरे के पास वाले मैदान में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई जाएगी। सभी माताओं, बहनों और भाइयों से अनुरोध है कि उस दिन कम से कम एक वस्त्र हर घर से उस होली के लिए दान में दें। प्रात: हमारी टोली इसी प्रकार आएगी और आपसे उन वस्त्रों को ले जाएगी। आप सबसे यह भी अनुरोध है कि आप होली देखने भी अवश्य आएं। माताएं और बहनें भी आएं। उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध होगा। उस दिन प्रांत के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी यहां उपस्थित होंगे और असहयोग आंदोलन के बारे में आपको बताएंगे।’’ इसके बाद फिर नारे लगते और टोली दूसरी गली की ओर मुड़ जाती। लोग छज्जों पर खड़े होकर बच्चों और युवाओं की इस टोली को गाना गाते, नारे लगाते देखते। कभी-कभी कोई महिला टोली के मुड़ते ही घूंघट के अंदर से हाथ जोडक़र उन्हें प्रणाम कर लेती, जैसे वह साधारण लोगों के बजाय साधु-संतों की टोली हो। तेज शंकर के इन कामों की उसके बहनोई चौथे साहब को भी खबर थी।
इसके उलट काम चल रहे थे जिन्ना के, जिनसे उनकी पत्नी रति तक सहमत न थी। नागपुर से बंबई लौटते हुए उसने जिन्ना से प्रतिवाद कर दिया,‘‘आपको गांधी को ‘महात्मा’ और मुहम्मद अली को ‘मौलाना’ कहने में क्या आपत्ति है?’’ जिन्ना ने घूरकर पत्नी की ओर देखा, जो उनके सामने वाली बर्थ पर बैठी थी।
‘‘क्यों कहता मैं? न मैं गांधी को महात्मा मानता हूं और न ही मुहम्मद अली को मौलाना।’’ उन्होंने कहा।
‘‘आपके मानने न मानने से कुछ फर्क पड़ता है क्या? बाकी लोग तो उन्हें इन्हीं उपनामों से संबोधित कर रहे हैं।’’
‘‘मैं दूसरों से ऑर्डर नहीं लेता।’’
‘‘दूसरों की भावनाओं की कद्र करना भी बेजा बात है क्या?’’
जिन्ना ने रति की ओर घूरकर देखा, कहा कुछ नहीं। रति भी खामोश हो गई। एक क्षण वह ऐसे ही बैठी रही। बर्थ पर उलटकर रखी ब्राउनिंग का कविता संग्रह पढऩे लगी।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव पंडित मोतीलाल नेहरू का प्रांतीय कमेटियों को निर्देश आया कि स्वयंसेवकों से कहा जाए कि वह शहर की बजाय गांवों में जाकर चरखे और स्वदेशी का प्रचार करें। वहां के लोगों को कांग्रेस का मेंबर बनाएं और असहयोग आंदोलन के बारे में जानकारी दें। गांधी जी का कहना है कि एक वर्ष के अंदर कांग्रेस के कम से कम एक करोड़ सदस्य बनाए जाएं तथा कम से कम पच्चीस लाख चरखे गांवों में चालू कराए जाएं। हमें गांधीजी के इस निर्देश का पालन करना है।
तेज शंकर को पता चला तो वह भी गांव जाने के लिए तैयार हो गया। उसके सामने समस्या यह थी कि वह किस गांव जाए। उसका अपना गांव यहां से कोसों दूर मध्य प्रांत में था और फिर पिछले चौदह-पंद्रह बरस से वहां गया भी न था। बस, एक धुंधली-सी याद उसे अपने गांव की है। इसके अलावा कोई दूसरा गांव उसने देखा नहीं। इस बारे में बबउनू बाबा से उसकी बात हुई तो उन्होंने उसके सामने प्रस्ताव रखा कि क्यों न वह उनके गांव चले। न होगा तो वह भी कुछ दिन की छुट्टी लेकर उसके साथ चलेंगे और कुछ दिन बाद लौट आएंगे। तेज शंकर ने रतन से बात की तो उसने भी बबउनू बाबा के सुझाव का स्वागत किया। उसने कहा, ‘‘मैं दद्दा और बप्पा को चिट्ठी लिख दूंगा। वे ठहरने का प्रबंध कर देंगे।’’
‘‘ठीक है।’ उसने कहा, ‘वैसे बबउनू भी साथ चलने को कह रहे हैं।’’
‘‘फिर चिट्ठी-पिट्ठी की क्या जरूरत। बाबा जाएंगे, तब तो कोई दिक्कत ही नहीं। वह सब इंतजाम कर देंगे।’’ रतन ने कहा। दो-तीन दिन बाद तेज शंकर पढऩे के लिए कुछ पुस्तकें, पहनने के लिए वस्त्र, दरी, चादर और अपना चरखा लेकर बबउनू बाबा के साथ चंदनपुर के लिए रवाना हो गया। यह है कामतानाथ के ‘काल कथा’ की वह चाबी, जिससे इसकी कथा खुलती और लखनऊ से निकलकर अवध के गांव चंदनपुर पहुंचती है, जहां के मुंशी रामप्रसाद का छोटा बेटा रतन लखनऊ आता है नौकरी करने, जिसके चाचा बबउनू पहले से ही लखनऊ में हैं। रतन के भाई फतेह बहादुर कचहरी में पेशकार हैं। खानदान के और भी कई लोग लखनऊ में हैं, जिनमें से राजनीतिक चेतना से लैस एक तेजस्वी युवक तेज शंकर के नजरिये से कामतानाथ ने भारत के उस हलचल भरे दौर को देखा ही नहीं, उसकी जांच-पड़ताल कर उसे ‘कालकथा’ के रूप में लिख दिया है।
समय-समय पर कामतानाथ की कहानियों की चर्चा तो बहुत होती रही, पर अपनी चर्चा के प्रति उनकी उदासीनता और फक्कड़पने के कारण उनके कहानी संग्रह जरा देर से छपे और सामान्य लेखकों की औसत किताबों के अंबार तले दब गए। कायदे से उनकी किसी किताब की समीक्षा तक कभी नहीं हो सकी। कामतानाथ के उपन्यास ‘कालकथा’ के साथ भी यही हुआ। इस पर दिल्ली में गोष्ठी हुई तो लोगों ने बिना पढ़े

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