आगे रास्ता बंद है

हम समय में रहते हैं। सबसे कम अपने समय को समझ पाते हैं। देश का नागरिक होते हुए भी देश की बाबत नासमझ रहते हैं। साहित्य को रचते हैं और हम बहुत कम साहित्य, संवेदना और सरोकार को जी पाते हैं। यह सब इसलिए क्योंकि अब सत्य हमारे लिए सबसे गैरजरूरी चीज बन गया है। हमें पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया गया था कि स्वप्न दुर्गम सत्य तक पहुंचने का एक रास्ता हो सकता है, लेकिन जमाने ने बीच सडक़ पर एक तख्ती लगा दी – ‘आगे रास्ता बंद है, आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है।’
अगर हम वहां से दांये या बांये मुडक़र दूसरा रास्ता पकड़ते हैं तो इस बात को पूरी संभावना है कि वहां भी कुछ दूर चलने पर अचानक आपको रोक दिया जाए। एक तख्ती की ओर इशारा किया जाए, जहां लिखा हो-यह आम रास्ता नहीं है।
एक ऐसे दौर में जब सडक़ें चौड़ी और चिकनी हो रही हों, पगडंडी या सिंगल से आठ लेन-दस लेन की हो रही हों। सडक़ें अब शहर के बीचों-बीच नहीं, बल्कि बाइपास से गुजरती हैं। यह सब कुछ इसलिए ताकि गति बनी रहे। गाडिय़ों की गति तेज करने के लिए सडक़ों का विस्तार किया जा रहा है। सरकार भी दावा करती है कि हजारों किलोमीटर की सडक़ें बन गयी हैं। सडक़ों का जाल पूरे देश में फैल गया है, लेकिन सडक़ों के इस ‘शक्ति जाल’ में आम आदमी के लिए रास्ता बंद है। एक-एक कर उसके सारे रास्ते बंद किए जा रहे हैं। बंद रास्तों के बाबत कोई भी कुछ भी नहीं बोलता। यह बेजुबानी वक्त के बेरहम हो जाने का सबूत है। अगर ऐसा नहीं होता तो आदमियों के बीच इतने विभाजन नहीं होते।
अब आदमी भर होना बड़ी बात नहीं है। आदमी के बीच आदमी है- गोरा आदमी, काला आदमी, हिन्दू आदमी, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदमी। आगे विस्तार में जाने की बजाय नजीर अकबराबादी का ‘आदमीनामा’ पढ़ा जा सकता है। अमीर-गरीब अब पुरानी बात हो गयी। इन दिनों दो ही आदमियों का विभाजन है। सफल और असफल आदमी। सफलता के हकदार बेशुमार हैं, लेकिन असफलता एक नजायज संतान है- महाभारत काल के कर्ण सरीखी। सफलता-असफलता दोनों के लिए ही समाज के पास अलग-अलग मापदंड हैं।
बेलौस ढंग से बदलते कमीनेपन की वजह से यथार्थ की पसलियां में धडक़ता दिल अब सिर्फ रक्त को साफ करने वाला पम्प है। उसमें न संवेदना बची है, न मनुष्यता है। संवेदना के सारे रास्ते शहर के दाएं-बाएं होकर बाईपास की तरह गुजर जाते हैं। हम इन रास्तों पर बहुत तेजी से साथ दौड़े जा रहे है। जो उजाड़ हैं और जहां जीवन नहीं है।
वे हमें ठहराना नहीं चाहते। हमसे कहा गया है कि रुकना कमजोरी है। हम इसलिए सक्रिय रहते हैं ताकि हमारा खालीपन छिप जाए। हमने मान लिया है कि अगर हम सक्रिय न रहे या न दिखाई दिए तो हमारे भीतर अर्थहीनता और मायूसी लाजमी तौर पर आकार लेगी। इसलिए हम कामयाबियों के चोर दरवाजे से दाखिल होकर उन्मादी महत्वाकांक्षाओं की हवेली में भटकते रहते हैं- इस बुर्ज से उस मुंडरे तक। जहीर कश्मीरी के बारे में मशहूर था कि वह बहुत शराब पीते थे। अपना दिन शराब से शुरू करते थे। यह सिलसिला उनकी मृत्यु तक चला। एक बार वह सडक़ पर गिर गए। उनको उठाने के लिए जब लोग उनके पास आए तो वह भडक़ गए। बोले- ‘छोड़ दो मुझे और जाओ, मेरे जिस्म को देखकर मुझे पहचाने वालो, मैं अपने जिस्म में नहीं, अपने विचारों में जिंदा हूं।
अब कोसल में विचारों की कमी है। वहां एक मणिकर्णिका घाट उग आया है, जहां सत्यवादी हरिश्चंद्र का चंडाल बनना पड़ा। जो सच बोलता है, उसके लिए शहर का बूढ़ा आदमी मणिकर्णिका घाट का रास्ता बताता है। जो कमजोर है। उनके लिए आगे के सारे रास्ते बंद होते जा रहे है। देश में पिछले कई साल से नौकरियों के लालेे पड़ गए हैं। पच्चीस करोड़ युवा देश में बेरोजगार है। उद्योग बंद हो रहे हैं। धंधा मंदा है। आदमी, जिनका नाम नीरव मोदी, ललित मोदी अथवा विजय माल्या कुछ भी हो सकता है, वह अरबों रुपये का चूना लगाकर देश से बाहर चला जाता है और दूसरा एक आदमी है, जो बैंक का कर्ज न चुकाने की वजह से खुदखुशी कर लेता है।
युवाओं के रास्ते रोजगार के मोड़ पर बंद हो जा रहे हैं और वह
उन्माद की गली की तरफ मुड़ जाते हैं। किसानों के रास्ते खुशहाली के माइलस्टोन तक नहीं पहुंच पाते। वह सरकार के टी प्वाइंट पर पहुंचकर कभी दाएं मुड़ते हैं, कभी बाएं। दोनों तरफ के रास्ते उनको खुदखुशी की तरफ
ले जाते हैं। सरकारें चाहे जिसकी भी रही हो, मगर पिछले दशकों में
लाखों किसानों की खुदखुशी यह साबित करती है कि हम प्रेमचंद के ‘गोदान’ और ‘पूस की रात’ से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। समय बदला है,
मगर सच जस का तस है। भयावह और जानलेवा। स्त्रियों की राह ‘पुरुष’ के चौराहे पर जाकर गोल-गोल घूमती है। हर राह स्त्री की संवेदना, उसके वजूद और उसके सम्मान को रौंदकर गुजरती है। कोई भी राह उसको अपने गंतव्य तक पहुंचाने वाली नहीं।
मेरे एक मित्र आईटीओ चौराहे के पास एक अखबार के दफ्तर में देश-दुनिया की खबरों से गुजरते हैं। सत्ता-व्यवस्था की चालों को देखते हैं।
समय की नयी धुन, जो डीजे सरीखी कर्णभेदी है, को सुनते हैं। वे मुझसे कहते हैं कि ‘हम नादान थे, जो बदल रहे समय को नहीं समझ नहीं पाए। दुनिया बहुत तेजी के साथ बदल रही थी और हम अपनी दुनिया में मगन
थे, जो दुनिया थी ही नहीं। एक काल्पनिक-आदर्शवादी सैद्धांतिक
झोपड़ी थी, जिसे बाजार की आंधी ने उड़ा दिया। हमारे एक-एक कर यह सारे रास्ते बंद हो रहे थे और हम सच्चाई की पंगडंडी पर घीसू-माधव
की तरह नाच रहे थे। हमारी बातों में मायूसी है, क्योंकि माहौल में मायूसी मालूम हो सकती है। हम समाज से सोसायटी, मनुष्य से वोटर, आई कार्ड से आधार कार्ड उपभोक्ता में बदल दिए गए हैं, लेकिन अंतिम राह कभी
भी अंतिम नहीं होती। रास्तों का कभी अंत नहीं होता। यूटर्न का विकल्प हमेशा बचा रहता है तो रास्ते बनाए भी जा सकते हैं। रास्ता जगह से नहीं, जीवट दिशा में चलने से बनता है। बकौल ब्रेख्त हमें आखिरी सांस तक प्रयास करते रहना चाहिए।

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