अमीर गरीब के बीच अभी और चौड़ी होगी खाई

समय बदल गया है, उसके साथ काम करने की सोच में भी परिवर्तन आ गया है। गांधी जी का ग्राम विकास का नजरिया बिसार दिया गया। शायद इसीलिए ग्रामीण विकास के सम सामयिक राजनीतिक रुझान ने भारत के बुद्धिजीवियों को उसके अवरोधों पर चिंतन-मनन करने के लिए विवश कर दिया। तभी तो सामाजिक विज्ञान अकादमी की आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज में संपन्न हुई तीसरी कांग्रेस का विषय ‘ग्रामीण विकास’ रखा गया।
सेमिनार का शुभारंभ करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. डी. हजेला ने कहा कि स्वतंत्र भारत में औद्योगीकरण पर तो पूरा ध्यान दिया गया, लेकिन ग्राम विकास पर नहीं। तब भी आजादी के इतने वर्षों में हम अन्न के मामले में आत्मनिर्भर होते चले गए। हमारी आर्थिक प्रगति कृषि पर निर्भर है। ऐसा आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है। प्रगति का सेहरा औद्योगीकरण के सिर बांधना उचित नहीं है। कृषि में श्रम शक्ति के जरिये उत्पादन तकनीक का सहारा लेकर हम और भी अधिक विकास कर सकते हैं। जहां तक संभव हो, अनुसंधान कर भारत में उपलब्ध असीम मानव शक्ति को काम में लगाया जाना चाहिए।
डॉ. हजेला ने जोर देकर कहा कि विकास का दूसरा जरिया शिक्षा होती है, जिससे साक्षरता बढ़ाकर हम भारत की जन्म दर घटा सकते हैं। यह तभी संभव है, जब सभी राजनीतिक पार्टियां, समाजशास्त्री, बुद्धिजीवी, शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी कंधे से कंधा मिलाकर काम करें। अध्यक्षीय भाषण में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के अध्यक्ष डॉ. ए. डी. पंत ने समाजशास्त्रियों से अपेक्षा की कि वे राजनीतिज्ञों का दिशा-निर्देशन करें। देश के कोने-कोने से आए समाजशास्त्री जब ग्राउंड में आए तो वक्ष पर लगे कार्ड देखकर लगा कि जैसे आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज के ग्राउंड में लघु भारत समा गया है, ठीक वैसे ही, जैसे नानाराव पार्क में इंदिरा कांग्रेस के सम्मेलन में भाग लेने के लिए पधारे सारे देश के कांग्रेसी प्रतिनिधि। ऐतिहासिक महत्व के दो सम्मेलन कानपुर में एक ही दिन और एक ही तारीख में हुए, जिन्हें देखकर अपने कानपुर पर गर्व हुआ, क्योंकि यह गणेशशंकर विद्यार्थी का शहर ठहर गया।
मध्याह्न सत्र में विश्वभारती, शांति निकेतन के प्रख्यात समाजशास्त्री और नेहरू-फेलो डॉ.वी. के. राय बर्मन, डॉ. रामनाथ मिश्र, सतीशचंद्र पांडेय तथा हेमलता स्वरूप के अलावा तीन अलग-अलग सत्रों में बीस से अधिक समाजशास्त्रियों ने अपने विचार व्यक्त किये। ‘ग्राम विकास का त्वरीकरण’ विषयक गोष्ठी के प्रथम सत्र में डॉ. हेमलता स्वरूप की अध्यक्षता में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के प्राध्यापक डॉ. राजसिंह ने अपने आलेख में स्पष्ट किया कि ग्राम विकास का विचार नया नहीं है, क्योंकि आजादी के पूर्व महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर ने ग्राम विकास पर जोर दिया था। वर्तमान संदर्भ में ग्राम विकास के अंतर्गत कई बातें आ गयी हैं, मसलन कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई तथा पशुपालन आदि। डॉ. सिंह ने विशेषत: ग्राम विकास में सामाजिक-आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण घटक पंचायतों की कमियों और समस्याओं को उजागर किया। दूसरा आलेख प्रोफेसर रमाशंकर ने पढ़ा, जिसमें बांदा जिले के एक गांव का अध्ययन किया गया था।
जे. बी. कॉलेज, बड़ौत के डॉ. डी. सी. चतुर्वेदी ने श्रमशक्ति के बजाय यांत्रिक शक्ति को विकास का आधार बनाने वाली वर्तमान और पूर्व सरकारों की आलोचना करते हुए कहा कि जमींदारों का उन्मूलन सामंतवाद को नष्ट कर पूंजीवादी तरीके से विकास का मार्ग प्रशस्त करने के लिए किया गया, न कि समाजवाद लाने के लिए। इसकी वजह से गांवों में अमीरों का एक नया वर्ग पैदा हो गया, जिसके पास जमीन बढ़ती चली गयी और तमाम लोग भूमिहीन होते चले गये। इस समस्या को भूमिहीनों की सहकारी समितियों और उन्हें उपलब्ध भूमि तथा आर्थिक सहायता से सुलझाया जा सकता है। डी. ए. वी. कॉलेज, वाराणसी के प्रोफेसर विश्वास ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में वर्ण और वर्गगत विसंगतियों का खुलासा करते हुए कहा कि यहां के खेतों में काम करने वाले ज्यादातर लोग भूमिहीन हैं और भूमिधर किसी तरह का काम न करते हुए भी संपन्न हैं। इसके लिए आवश्यक है कि अधिक भूमि वालों से भूमि छीनकर भूमिहीनों में बांट दी जाए। पढ़े गये आलेखों पर हुई बहस का समापन किया डॉ. रामनाथ मिश्र ने। डॉ. मिश्र ने कानपुर जिले की एक ग्राम पंचायत का प्रधान होने के नाते व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर कहा कि पंचायत को ग्राम विकास का महत्वपूर्ण घटक बनाया जा सकता है। डॉ. रामनाथ मिश्र ने डॉ. बलजीत ङ्क्षसह की उस किताब की चर्चा करते हुए अपनी बात समाप्त की, जिसमें कहा गया है कि गांवों का विकास सहकारी समितियों के सुसंचालन से ही किया जा सकता है। डॉ. मिश्र ने यह भी कहा कि आजादी के बाद वर्गगत व्यवस्था और मजबूत हुई है।
भारत में न जाने कितनी स्वयंसेवी संस्थाएं हैं, अकादमियां भी बहुत हैं और किसी न किसी विषय पर उनके सेमिनार और अधिवेशन होते ही रहते हैं और वे किसी न किसी निष्कर्ष पर पहुंचकर समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं, पर उन्हें व्यावहारिक रूप में परिणत कर समस्या का कारगर हल होते कम ही देखा गया है, पर आचार्य नरेंद्रदेव कॉलेज में आयोजित भारतीय सामाजिक विज्ञान अकादमी के तीसरे अधिवेशन की बात ही कुछ और है। देशभर के समाजशास्त्रियों की बहस के बाद ग्राम विकास को तीव्र करने के लिए सरकार को जो सुझाव दिये गए, वे काफी महत्त्वपूर्ण हैं। कानपुर विश्वविद्यालय की समाजशास्त्र की समिति के सदस्य डॉ. रामनाथ मिश्र ने जवाहरलाल नेहरू की औद्योगीकरण की नीति की आलोचना करते हुए उसमें जनशक्ति की बजाय मशीन शक्ति के उपयोग को बढ़ती हुई बेकारी का प्रमुख कारण बताते हुए सुझाव दिया कि औद्योगीकरण को रोकने की बजाय उसमें अधिकाधिक जनशक्ति को लगाकर आगे बढ़ा जाना चाहिए।
चार दिन की बहस का निष्कर्ष पेश करते हुए हेमलता स्वरूप ने कहा कि जब तक वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पद्धति को बदला नहीं जाता, तब तक किसी भी तरह का ग्राम विकास संभव नहीं। इस पद्धति से तो गरीबी, बेकारी तथा विषमता बढ़ेगी। अकादमी इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि गांवों का विकास सिर्फ कृषि से संभव नहीं है, औद्योगीकरण भी कृषि जितना ही जरूरी है। कृषि और औद्योगीकरण को एक-दूसरे का पूरक बनाकर ही सही मायने में देश के गांवों का विकास किया जा सकता है। देश के 16 प्रतिशत लोग देश की 66 प्रतिशत भूमि के मालिक हैं और 66 प्रतिशत लोगों के पास केवल 16 प्रतिशत भूमि है और यह 16 प्रतिशत लोग विकास के सारे स्रोतों को हड़प लेते हैं। ग्राम विकास का कोई भी कार्यक्रम तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक अल्पभूमि वाले 66 प्रतिशत लोगों को सजग और सक्षम नहीं किया जाता। बगैर यह किये ग्राम विकास का कोई भी कार्यक्रम गांवों के धनी लोगों को और धनी बनाएगा। इसके लिए अकादमी की ओर से हुए सेमिनार का निष्कर्ष यह है कि भूमि सुधार को कारगर तरीके से लागू कर सहकारिता के आधार पर कृषि को बढ़ावा देते हुए भूमिहीनों को भूमि प्रदान की जाए। भूस्वामियों और भूमिहीनों के बीच समन्वय स्थापित हो। प्राकृतिक और कृत्रिम तरीकों से मिट्टी को उपजाऊ बनाया जाए। तालाबों का विकास हो। नयी नहरें खोदी जाएं। कंपोस्ट और हरी खाद को बढ़ावा मिले। कृत्रिम पशु गर्भाधान, मछली पालन, मिट्टी के बर्तन और कुटीर उद्योग-धंधों को प्राथमिकता के आधार पर विकसित किया जाए। सामान्य पद्धति से शिक्षा ग्रामाभिमुख हो। ग्रामीणों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए। जहां तक संभव हो, जन जागरण करते हुए प्राकृतिक तरीके से परिवार नियोजन लागू किया जाए। शिक्षा में परिवार नियोजन को स्थान मिले। यों तो महिलाओं ने प्रगति की है, पर गांवों की महिलाएं हिंदुस्तान के सबसे कमजोर तबके में आती हैं और ग्राम विकास का केंद्र गांव की महिलाएं ही हो सकती हैं। इसलिए उनके विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुछ नौजवानों के मन में इस तरह की किसी संस्था का विचार पहले-पहल आया, जिसमें एन. पी. चौबे प्रमुख हैं, जो इस अकादमी के सचिव और ईश्वरशरण डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद में प्रोफेसर हैं। अकादमी का पहला अधिवेशन इलाहाबाद में, दूसरा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हुआ। तीसरे अधिवेशन में देश के 17 विश्वविद्यालयों से दो सौ प्रतिनिधि आए, जिनमें 40 महिलाएं थीं। ज्यादातर आलेख और वक्तव्य अंग्रेजी में होने के लिए शासन जिम्मेदार है। वह आज भी औपनिवेशिक दासता से ग्रस्त है। अधिवेशन में भाग लेने वाले ज्यादातर लोग विश्वविद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन करते हैं। वहां पर जब कभी प्रमोशन या फेलोशिप की बात आती है तो देखा जाता है कि व्यक्ति के कितने आर्टिकल विदेशी जर्नल्स में छपे हैं। कोई व्यक्ति कितना भी महत्वपूर्ण काम करे, लेकिन उसका प्रकाशन अंग्रेजी में न हो तो उसे महत्व नहीं मिलता। महापंडित राहुल सांकृत्यायन को देखिए, जिन्होंने हिंदी में लिखा, पर उन्हें कितना महत्व मिला। कुछ किताबें अगर वे अंग्रेजी में न लिखते या अनूदित न करवाते तो शायद हिंदी वाले उन्हें इतना महत्व भी न देते। इसके विपरीत डी. डी. कौशांबी अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र के सुपरिचित मनीषी माने जाते हैं। राहुल ने हिंदी का भला किया, लेकिन अपना बुरा कर बैठे। हम सब राहुल तो नहीं हो सकते।

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