अफ्रीका के आजाद परिंदे

अफ्रीकी सर्जक न्गुगी वा थ्योंगो ने अपनी किताब ‘रिटर्न टू द रूट्सÓ में लिखा है कि लेखकों को याद रखना चाहिए कि कोई भी विदेशी भाषा कभी भी हमारी भाषाओं के साहित्य या उनके रंगकर्म का विकास नहीं कर सकती। उधार ली हुई भाषा और दूसरों की नकल करते हुए हम अपने साहित्य और संस्कृति का विकास नहीं कर सकतेे। अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी जनता के वीरतापूर्ण इतिहास की जड़ों में जाकर ही हम ऐसी राष्ट्रीय संस्कृति और साहित्य की रचना कर सकते हैं, जो विदेशियों के मन में ईष्र्या और देशवासियों के मन में गर्व की भावना भरने में सक्षम हो। यही कोई दो करोड़ की आबादी वाले देश केन्या के लेखक के ये उद्गार तीसरी दुनिया के हर उस देश के संदर्भ में मनन करने योग्य हैं, जहां विदेशी गुलामी का लंबा दौर चला और आजादी मिलने के बावजूद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक साम्राज्यवाद नए रूप में पांव जमा रहा है। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया का बहुत बड़ा हिस्सा फिर साम्राज्यवाद की चपेट में है। इस बार शिकंजा इतना सूक्ष्म, इतना मायावी और इतना मजबूत है कि कोई कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं है, लेकिन साहित्य की दृष्टि से यही तो वह समय होता है, जब सच्चे रचनाकार के साहस और निष्ठा की परीक्षा होती है। न्गुगी वा थ्योंगो ने साहस और निष्ठा का परिचय देते हुए वही कहा, वही किया और वही लिखा, जो कठिन समय में अपने देशवासियों के लिए उन्हें करना, कहना और लिखना चाहिए था। न्गुगी का साहित्य शासक वर्ग को रास नहीं आया तो उसने उन्हें न सिर्फ गिरफ्तार किया, बल्कि ऐसी स्थितियां पैदा कर दीं कि उन्हें निर्वासन के लिए विवश होना पड़ा। भारत की तरह केन्या में भी सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी है, जबकि हिंदी की तरह वहां भी स्वाहिली के रूप में एक समृद्ध भाषा मौजूद है। केन्या की आबादी में एक बड़ी संख्या भारतीयों की है, जिन्होंने देश की स्वाधीनता के लिए तमाम कुर्बानियां दीं। वहां अंग्रेजों के खिलाफ मजदूरों और किसानों ने जमकर संघर्ष किया, जिससे केन्या को आजादी मिली। माऊ-माऊ विद्रोह का उल्लेख केन्याई साहित्य में प्राय: होता रहा है। किबोई मुरीथी की कृति ‘वार इन द फॉरेस्टÓ के अलावा न्गुगी वा थ्योंगो के उपन्यासों ‘वीप नाट चाइल्डÓ, ‘द रिवर बिटवीनÓ तथा ‘ए ग्रेन ऑफ ह्वीटÓ में माऊ-माऊ विद्रोह का अविस्मरणीय चित्रण हुआ है, लेकिन न्गुगी की परीक्षा की घड़ी तब आयी, जब उन्होंने एक किसान नेता पर केंद्रित नाटक ‘द ट्रायल ऑफ देदान किमाथीÓ लिखा। इससे पहले मित्र के साथ वे एक नाटक ‘आई विल मैरी ह्वेन आई वांटÓ लिखकर तहलका मचा चुके थे। ‘पेटल्स ऑफ ब्लडÓ लिखने के बाद वे गिरफ्तार कर लिये गए।
अफ्रीकी सर्जक न्गुगी वा थ्योंगो ने अपनी किताब ‘रिटर्न टू द रूट्सÓ में लिखा है कि लेखकों को याद रखना चाहिए कि कोई भी विदेशी भाषा कभी भी हमारी भाषाओं के साहित्य या उनके रंगकर्म का विकास नहीं कर सकती। उधार ली हुई भाषा और दूसरों की नकल करते हुए हम अपने साहित्य और संस्कृति का विकास नहीं कर सकतेे। अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी जनता के वीरतापूर्ण इतिहास की जड़ों में जाकर ही हम ऐसी राष्ट्रीय संस्कृति और साहित्य की रचना कर सकते हैं, जो विदेशियों के मन में ईष्र्या और देशवासियों के मन में गर्व की भावना भरने में सक्षम हो। यही कोई दो करोड़ की आबादी वाले देश केन्या के लेखक के ये उद्गार तीसरी दुनिया के हर उस देश के संदर्भ में मनन करने योग्य हैं, जहां विदेशी गुलामी का लंबा दौर चला और आजादी मिलने के बावजूद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक साम्राज्यवाद नए रूप में पांव जमा रहा है। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया का बहुत बड़ा हिस्सा फिर साम्राज्यवाद की चपेट में है। इस बार शिकंजा इतना सूक्ष्म, इतना मायावी और इतना मजबूत है कि कोई कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं है, लेकिन साहित्य की दृष्टि से यही तो वह समय होता है, जब सच्चे रचनाकार के साहस और निष्ठा की परीक्षा होती है। न्गुगी वा थ्योंगो ने साहस और निष्ठा का परिचय देते हुए वही कहा, वही किया और वही लिखा, जो कठिन समय में अपने देशवासियों के लिए उन्हें करना, कहना और लिखना चाहिए था। न्गुगी का साहित्य शासक वर्ग को रास नहीं आया तो उसने उन्हें न सिर्फ गिरफ्तार किया, बल्कि ऐसी स्थितियां पैदा कर दीं कि उन्हें निर्वासन के लिए विवश होना पड़ा। भारत की तरह केन्या में भी सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी है, जबकि हिंदी की तरह वहां भी स्वाहिली के रूप में एक समृद्ध भाषा मौजूद है। केन्या की आबादी में एक बड़ी संख्या भारतीयों की है, जिन्होंने देश की स्वाधीनता के लिए तमाम कुर्बानियां दीं। वहां अंग्रेजों के खिलाफ मजदूरों और किसानों ने जमकर संघर्ष किया, जिससे केन्या को आजादी मिली। माऊ-माऊ विद्रोह का उल्लेख केन्याई साहित्य में प्राय: होता रहा है। किबोई मुरीथी की कृति ‘वार इन द फॉरेस्टÓ के अलावा न्गुगी वा थ्योंगो के उपन्यासों ‘वीप नाट चाइल्डÓ, ‘द रिवर बिटवीनÓ तथा ‘ए ग्रेन ऑफ ह्वीटÓ में माऊ-माऊ विद्रोह का अविस्मरणीय चित्रण हुआ है, लेकिन न्गुगी की परीक्षा की घड़ी तब आयी, जब उन्होंने एक किसान नेता पर केंद्रित नाटक ‘द ट्रायल ऑफ देदान किमाथीÓ लिखा। इससे पहले मित्र के साथ वे एक नाटक ‘आई विल मैरी ह्वेन आई वांटÓ लिखकर तहलका मचा चुके थे। ‘पेटल्स ऑफ ब्लडÓ लिखने के बाद वे गिरफ्तार कर लिये गए।
आनंदस्वरूप वर्मा द्वारा संपादित ‘आज की अफ्रीकी कहानियांÓ में न्गुगी वा थ्योंगो की ‘शहादतÓ और ‘अंधेराÓ जैसी कहानियां संकलित हैं। ‘शहादतÓ में माऊ-माऊ विद्रोह का चित्रण है, जिससे पता चलता है कि अफ्र्रीकी मनुष्य हिंसक ही नहीं है, उसके हृदय में भी उदारता और सहज मनुष्यता मौजूद है, बल्कि मनुष्यता के मामले में तो गोरों से बहुत-बहुत आगे हैं अफ्रीका के काले लोग। वह दुनिया काली चाहे जितनी हो, पर उसके बाशिंदों के दिल उजले हैं, जिस पर अफ्रीकी गर्व कर सकते हैं और विदेशी ईष्र्या। न्गुगी की दूसरी कहानी ‘अंधेराÓ में एक पादरी के बेटे की हृदयहीनता तो काली लड़की के निश्छल मन और निर्मल हृदय में छिपे प्यार का चित्रण है। इससे अफ्रीकी लड़की के उदार चरित्र का हृदयग्राही चित्र सामने आ जाता है। कोई दस करोड़ की आबादी वाला देश नाइजीरिया भी केन्या और भारत की तरह अंग्र्रेजी हुकूमत को झेल चुका है। हौसा और इबो जैसी राष्ट्रीय भाषाओं के होते हुए वहां भी सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी है।
अफ्रीकी साहित्य की दृष्टि से नाइजीरिया गौरवपूर्ण स्थान का अधिकारी है। बोले सोयिंका, चिनुआ अचेबे, क्रिस्टोफर ओकिग्बे, गैब्रियल ओकारा, पाल एंडू, जेपी क्लार्क, साइप्रन एक्वेंसी, बेन ओकरी, इलेची अमाड़ी और ओडिया ओफेमुन जैसे रचनाकार नाइजीरिया से बाहर भी पढ़े जाते हैं। बोले सोयिंका को नोबेल और बेन ओकरी को बुकर पुरस्कार मिला। चिनुआ अचेबे ने भी दुनिया का ध्यान अपने साहित्य की ओर खींचा है।
‘लागोस का अजनबीÓ (साइप्रन एक्वेंसी) में एक कस्बाई लड़की लिलियन के राजधानी लागोस के डरपोक नागरिक ओकोन्या से मिलने और बिछडऩे की कथा है तो ‘पुल के नीचे की हंसीÓ (बेन ओकरी) में सैनिक उथल-पुथल और तानाशाही के बीच पिसते नाइजीरियाई नागरिकों, बच्चों और स्त्रियों के साथ होने वाली ज्यादतियों का रोंगटे खड़े कर देनेवाला वृत्तांत है। इन कहानियों में मनुष्य की भीतरी उथल-पुथल के साथ सामाजिक हलचलों का विश्वसनीय चित्रण हुआ है। ‘पुल के नीचे की हंसीÓ से एक दृश्य देखें: ‘बस के लिए दौड़ते समय मैंने कोशिश की कि दूर खाली पड़े खेतों में चुपचाप खड़े अपने दोस्तों को देखने के लिए पीछे न मुडूं। इसके बाद घरघराती हुई लारियों, शोर फैलाती बसों, शहर से गांवों की ओर भागते लोगों की भीड़, रोती-बिलखती औरतों, कराहते बच्चों, हरी वर्दी और लोहे के टोपों में चारों तरफ फैले सैनिकों, उनकी अपरिचित बंदूकों और दहशत से भरी भीड़ ने मेरे दिमाग से उन दोनों के ख्याल को बिल्कुल मिटा ही दिया।Ó
एक और दृश्य देखें : ‘इसे कैसे खूबसूरत समय का नाम दिया जा सकता है, जब उस शाम दुर्गंध इतनी तेज हो गई कि कस्बे के गणमान्य लोगों को गैस मास्क बांटने पड़े ताकि दुर्गंध से वे अपने को बचा सकें और उन्हें बड़े-बड़े लट्ठे देने पड़े ताकि वे पुल के नीचे आसानी से पानी के बहने के लिए लाशों को उन लट्ठों से हटाकर किनारे लगाते रहें। हमने इन गणमान्य लोगों को एक कतार में सड़क पर जाते देखा। इनमें डॉक्टर थे, सरकारी अफसर थे, व्यापारी और कांस्टेबल थे। चलते हुए उनकी तोंदे हिल रही थीं और चेहरे पर गैस मास्क लगे हुए थे। ये जिधर से गुजरते, माताएं थूक देतीं और बच्चों के मुंह से चीख निकल पड़ती।Ó
अंग्रेजों का उपनिवेश रहा उगांडा कोई डेढ़ करोड़ की आबादी वाला देश है, जहां स्वाहिली और लुआंडा जैसी भाषाओं के बावजूद अंग्रेजी का सिक्का चल रहा है। यहां का तीन-चौथाई व्यापार भारतीय मूल के लोगों के हाथ में था, जिसे ईदी अमीन के शासन काल में खत्म कर दिया गया तो एशियाई मूल के ज्यादातर लोगों ने उगांडा छोड़ दिया। ओकोट पी. विकेट वहां के प्रसिद्ध लेखक हैं। राजधानी कंपाला से रजत नियोगी ‘ट्रांजिशनÓ जैसी पत्रिका निकाला करते थे, पर सैनिक तानाशाहियों के चलते कंपाला में साहित्य, संस्कृति और कला का कोई नामलेवा नहीं रहा। ओकोट असमय काल कवलित हो गए और बायरन कवाडा को ईदी अमीन ने मरवा दिया। सरुमागा को केन्या में निर्वासन के बावजूद अपने प्राण गंवाने पड़े। सिर्फ जॉन नागेंडा लंदन में निर्वासित जीवन जीते हुए लिखते रहे। ‘द सीजन ऑफ थोमान टेबोÓ उनका चर्चित उपन्यास है। नागेंडा बाद में मानवाधिकार आयोग के सदस्य बने और सैनिक शासन के शिकार लोगों की दर्दनाक कहानियां सुनकर दुनिया को उनसे अवगत कराया। बारबरा किमैन्ये जैसे इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ दें तो साहित्य की दृष्टि से उगांडा में अब कोई बड़ा सर्जक नहीं है। बारबरा की कहानी ‘विजेताÓ स्त्री और पुरुष मनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान है। इसी तरह सियरालिओन के कथाकार एबिओसे निकॉल की कहानी ‘जिंदगीÓ अंधविश्वासों के बीच जीते अफ्रीकी मनुष्य के जीवन का चित्र पेश करती है। सियरालिओन भी अंग्रेजों का उपनिवेश रहा और यहां भी अंग्रेजी ही चल रही है।
फ्रांसीसियों का उपनिवेश रहा सेनेगल कोई सत्तर लाख नागरिकों का देश है, जहां का साहित्य फ्रांसीसी से वाया अंग्रेजी हम तक पहुंचता है। लियोपोल्ड सेंगोर, सेंबेन ओस्मान तथा जोसेफ जोबेल सेनेगल के सुपरिचित लेखक हैं। सेंगोर तो राष्ट्रपति भी चुने गए थे। सेंबेन ओस्मान के उपन्यास ‘गॉड्स विट्स ऑफ वुड्सÓ में रेल कर्मचारियों की हड़ताल का जीवंत चित्रण है तो उनके दूसरे उपन्यास ‘खालाÓ में आजादी के बावजूद फ्रांसीसियों की दखलंदाजी का विचारोत्तेजक वृत्तांत। इस पर फिल्म बनी तो देश-विदेश में धूम मच गई और उसने अनेक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किए, पर सेनेगल के सत्ताधारियों को फिल्म पसंद नहीं आयी और उसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई।
सेंबेन ओस्मान की कहानी ‘काली लड़कीÓ संकलन में शामिल है, जो फ्रांस, खासकर पेरिस की खूबसूरती अैर रंगीनी की सुनी-सुनाई कहानियों से प्ररित होकर मेड बनकर आयी डीओना की यातना की दास्तान है। फ्रांस में यंत्रवत गुलाम बना दी गई डीओना को रह-रहकर अपना गांव याद आता। वहां की झाडिय़ां और कसामांका के जंगल। गांव की जिंदगी कितनी खुशगवार थी। फ्रांस ने डीओना को आत्महत्या के सिवा क्या दिया? जोसेफ जोबेल की कथा ‘कितने खूबसूरत फूलÓ में गरीब लड़के द्वारा फूल तोड़कर बेचने पर हुई पुलिस कार्रवाई का चित्रण है।
अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के उपनिवेश रहे देशों के अलावा पुर्तगालियों के भयावह शासन से मुक्त हुए मोजांबीक की आबादी यही कोई सवा करोड़ के आसपास है और आजाद होने के बावजूद सरकारी कामकाज की भाषा पुर्तगाली बनी हुई है। दक्षिण अफ्रीका की आबादी सवा चार करोड़ के आसपास है और जुलू तथा खोजा जैसी राष्ट्रीय भाषाओं के रहते सरकारी भाषा के पद पर अंग्रेजी आसीन है। सहभाषा का दर्जा अफ्रीकान को मिला हुआ है। कोई ढाई प्रतिशत एशियाई मूल के लोग यहां रहते हैं, जिनमें से ज्यादातर भारतीय हैं। भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने की लड़ाई का पूर्वाभ्यास गांधी ने यहीं किया था। सन् 1902 में डचों को हराकर अंग्रेजों ने यहां उपनिवेश कायम किया, जो 1994 में मंडेला के राष्ट्रपति चुने जाने पर खत्म हुआ। गोरों के नस्लवादी शासन के दौरान अलेक्स ला गुमा, लीविस न्कोसी, डेनिस ब्रूटस, एल्फ्रेड हचिंसन, ब्लॉक मादिसेन और रेमंड कुएनेने जैसे लेखक जेल यातना से लेकर निर्वासित होने तक के लिए मजबूर हुए, पर अपने क्रांतिधर्मा साहित्य की मशाल को उन्होंने बुझने नहीं दिया।
अलेक्स ला गुमा ने अपने उपन्यास ‘ए वाक इन द नाइटÓ तथा ‘एंड ए थ्री फोल्ड कार्डÓ जेल जीवन में ही लिखे। तीसरा उपन्यास ‘द स्टोन कंट्रीÓ निर्वासन के दौरान पूरा किया और चौथा ‘इन द फॉग ऑफ सीजंस एंडÓ पूरा करने के कुछ ही दिन बाद क्यूबा में उनका निधन हो गया। सन् 1975 में मिरियम तलाली के उपन्यास ‘म्यूरिएल एट मेट्रोपॉलिटनÓ पर प्रतिबंध लगा तो डेनिस ब्रूटस को कुछ भी न लिखने की हिदायत दी गई।
बावजूद इसके ब्रूटस ने फर्जी नाम जॉन ब्रून से अपने कविता संग्रह प्रकाशित करवा दिए, जिन्हें दक्षिण अफ्रीकी पाठकों ने हाथों-हाथ लिया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद अफ्रीकी लेखकों का मुंह कभी बंद न हुआ, न ही उनकी कलम की धार को कुंद किया जा सका, जिसकी परिणति अफ्रीका में गोराशाही के खात्मे के रूप में हुई।
‘आज की अफ्रीकी कहानियांÓ में अलेक्स ला गुमा (अंधेरी कोठरी), रिचर्ड राइव (बेंच), एलेन पैटन (शराब की दुकान), माइकल पिकार्डी (वह मेरा दोस्त था) तथा अहमद इशॉप (हाजी) आदि की कहानियां संग्रहीत हैं। दक्षिण अफ्रीका की इन कहानियों में कालों को ही नहीं, गोरों को भी मिली यातना और दु:ख को शब्द मिले हैं। ‘बेंचÓ में ‘केवल गोरों के लिए आरक्षित बेंच पर कार्ली के बैठने की साहसिक कथा है तो ‘शराब की दावतÓ (एलेन पैटन) में बीए तक पढ़े एक काले सिमेलेन को एक अद्र्धशिक्षित किंतु धनाढ्य गोरे वॉन रेंजवर्ग द्वारा वर्जित समय में अपने घर में शराब पिलाने की अविस्मरणीय कथा है। ऐसे ही माइकल पिकार्डी की कहानी ‘वह मेरा दोस्त थाÓ एक गोरी युवती मार्था और काले युवक एमोस के सहज स्वाभाविक स्नेह संबंधों में पुलिस के अमानवीय हस्तक्षेप का खुलासा करती है। एक सहृदय गोरे डॉक्टर द्वारा राजनीतिक कार्यकत्र्ता न्यूक्स का वर्जित और गैरकानूनी इलाज करने का वृत्तांत है अलेक्स ला गुमा की कहानी ‘अंधेरी कोठरीÓ में तो अहमद इसॉप की कहानी ‘हाजीÓ में दो मुस्लिम भाइयों में से एक के द्वारा क्रिश्चियन युवती से शादी कर भाई से संबंध विच्छेद करने का दु:ख और फिर उसके मरणासन्न होने पर मुस्लिम भाई द्वारा उसे अपने घर लाकर न रखने का मार्मिक वृत्तांत है।
काली दुनिया के गरीब लोगों के मन में पलते गोरी दुनिया के खूबसूरत ख्वाबों को चकनाचूर होते देखना हो या सिर्फ गोरों के लिए आरक्षित बेंच पर एक काले के बैठ जाने का संघर्ष, एक गोरे द्वारा एक काले को शराब की दावत देना हो या गोरे डॉक्टर द्वारा काले राजनीतिक कार्यकर्ता का इलाज अथवा एक गोरी युवती द्वारा एक काले युवक को रात में अपने पास रोकना या एक गोरी औरत को बचाने की कोशिश करता उसी औरत के रिवाल्वर का शिकार हुआ काला सेवक हो, हर कहीं काली दुनिया के मनुष्य की निश्छल और सहज मानवीयता में पगी उजली छवि अंकित हुई है। साथ में हुआ है नस्लवादी काले कानूनों की भयावहता और अमानवीयता का विरोध। कई बार श्वेतों के द्वारा भी। अफ्रीका का श्वेत और अश्वेत लेखन दरअसल अश्वेतों को मनुष्य के रूप में पहचाने जाने की जद्दोजहद का लेखन है। अपने प्रभावशाली कथ्य के कारण पाठक को अपनी जद में ले लेने की अद्भुत सामथ्र्य उसमें है और है कलागत कौशल के शिखरों का स्पर्श भी। परिवेश के यादगार चित्र और अविस्मरणीय चरित्र भी खूब हैं और है काले मनुष्यों के मन में खदबदाते ज्वालामुखी का संकेत भी, जिसने समय आने पर एक-एक कर सारे अफ्रीकी राष्ट्रों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।
इतिहास के कुछ नए पाठ
अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या से हिंदी वालों की संख्या तो शायद कम नहीं है, पर दुनिया की संपर्क भाषा अंग्रेजी ही है, हिंदी का नंबर उसके बाद आता है। कभी फ्रेंच को अंग्रेजी से ऊंचा दर्जा हासिल था, लेकिन लोगों ने अंग्रेजी को निरंतर बहुविध समृद्ध किया तो आज वह भी फे्रंच की तरह दुनिया की समृद्ध भाषाओं में शुमार है। भारत में भी अंग्रेजी की हैसियत हिंदी से कम नहीं, बल्कि ज्यादा ही है। आज शायद समय की मांग है कि हिंदी पाठकों को देश-विदेश के समकालीन अंग्रेजी लेखकों की कृतियों के बारे में भी जानना चाहिए, पर ऐसी सामग्री देने वाले लेखक हिंदी में हैं कितने? विष्णु खरे, विजय कुमार, जितेंद्र भाटिया, सुरेश सलिल, नीलाभ और वीरेंद्रकुमार बरनवाल जैसे गिने-चुने लोग ही यह काम ठीक तरह से करते रहे हैं। लोगों की उस सूची में अनंत विजय का नाम भी शामिल है, जिन्होंने ‘हंसÓ, ‘नया ज्ञानोदयÓ और ‘पुस्तक वार्ताÓ के जरिये समकालीन अंग्रेजी लेखकों की कृतियों पर हिंदी पाठकों को लगातार ज्ञानवर्धक सामग्री पढऩे को दी, जिसका संचयन ‘विधाओं का विन्यासÓ नाम से छपा है। कहानी, उपन्यास, कविता और नाटक के अलावा विधा के रूप में आत्मकथा, जीवनियां और संस्मरण दुनिया भर में खूब पढ़े जा रहे हैं, जो कभी-कभी बेस्टसेलर भी सिद्ध होते हैं। शायद इसीलिए अनंत विजय की पुस्तक ‘विधाओं का विन्यासÓ में अंग्रेजी की आत्मकथाओं, संस्मरणों और जीवनियों पर टिप्पणियों की भरमार है।
अनंत ने अंग्रेजी की तरफ आकर्षित होने का कारण किताब की भूमिका में बताया है कि हिंदी की साहित्यिक कृतियों में एकरसता और एक खास मैनरिज्म की वजह से कुछ नये की तलाश उन्हें अंग्रेजी की ओर ले गयी तो समकालीन भारतीय और विदेशी अंग्रेजी लेखकों की रचनाओं से उनका परिचय हुआ। पहले माना जाता था कि भारत में श्रेष्ठ अंग्रेजी लेखन नहीं हो रहा है, लेकिन बाद में सलमान रश्दी, किरण देसाई, अरविंद अडिगा, अमिताव घोष, अरुंधति राय, पंकज मिश्रा, ताबित खैर और अमिष त्रिपाठी जैसे लेखकों ने अपनी रचनाओं से पश्चिमी आलोचकों को झकझोर कर रख दिया। उसके बाद तो भारत के लेखकों को बुकर समेत अनेक प्रतिष्ठिïत पुरस्कार मिलने शुरू हो गए।
यह वह दौर था, जब भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों की वजह से खुलेपन का फायदा हर क्षेत्र को मिलने लगा तो विदेशी कंपनियों को भारत में एक बड़ा बाजार दिखाई दिया। आर्थिक उदारीकरण का फायदा यह हुआ कि देश के अन्य क्षेत्रों की तरह प्रकाशन क्षेत्र में भी विदेशी प्रकाशकों की आवाजाही बढ़ी। नतीजा यह हुआ कि भारत के पाठकों का विदेशी लेखकों की रचनाओं से परिचय होने लगा। धीरे-धीरे ही सही, भारतीय लेखक भी अनूदित होकर विदेशी पाठकों को उपलब्ध होने लगे।
अनंत विजय की पुस्तक ‘विधाओं का विन्यासÓ में एक तरफ देवानंद की आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफÓ की चर्चा है तो ओमपुरी की नंदिता पुरी लिखित जीवनी ‘अनलाइकली हीरोÓ की भी। प्रणय गुप्ते लिखित ‘अ पॉलिटिकल बॉयोग्राफी ऑफ इंदिरा गांधीÓ तथा सोनिया गांधी की जेवियर मोरो लिखित जीवनी ‘द रेड साड़ीÓ पर भी यहां रोचक सामग्री है। जतिन गांधी की लिखी जीवनी ‘राहुलÓ तथा राजमोहन गांधी की ‘मोहनदासÓ और लेलीवेल्ड की ‘द ग्रेट सोलÓ पर भी अनंत विजय ने लिखा है। एपीजे अब्दुल कलाम, सोमनाथ चटर्जी, इंद्रकुमार गुजराल तथा नीतीश कुमार पर केंद्रित अंग्रेजी कृतियों की चर्चा तो यहां है ही, रामचंद्र गुहा और गोपालकृष्ण गांधी लिखित आधुनिक भारत के निर्माताओं पर केंद्रित वृत्तांतों पर भी बात की गयी है। केनेडी, टोनी ब्लेयर, कास्त्रो और लादेन पर आयी कृतियों की भी चर्चा है। यहां विनोद मेहता, कुलदीप नैयर और सलमान रुश्दी हैं तो चेतन भगत भी। वी.एस. नायपाल, अमत्र्य सेन, प्रणब मुखर्जी और सुधीर कक्कड़ आदि अंग्रेजी लेखकों की कृतियों के बहाने ‘विधाओं का विन्यासÓ में अनंत ने अंग्रेजी भाषा और साहित्य की काफी धरती नाप ली है। आत्मकथा ‘मैटर्स ऑफ डिस्क्रीसनÓ में इंद्रकुमार गुजराल कहते हैं कि मैंने वी.पी. सिंह पर बहुत ज्यादा विश्वास करना शुरू कर दिया और भूल गया कि विश्वनाथ प्रताप सिंह उस पार्टी की राजनीति में दीक्षित हैं, जो यह सिखाती है कि पलक झपकते किसी को धोखा दिया जाना गलत नहीं है।
सन्ï उन्नीस सौ नब्बे के दशक में देश में हुई राजनीतिक उथल-पुथल के केंद्र में रहे इंद्रकुमार गुजराल ने अपने समय पर जमकर लिखा है। इंद्रकुमार गुजराल भारत के उन चुने हुए राजनेताओं में रहे, जिनकी छवि पढ़े-लिखे, संवेदनशील और विचारवान नेता की रही।
‘मैटर्स ऑफ मॉडर्न इंडियाÓ में रामचंद्र गुहा ने उन उन्नीस भारतीय नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और समाज सुधारकों को जगह दी है, जिन्होंने स्वतंत्रतापूर्व और स्वातंत्र्योत्तर भारत को गहरे तक प्रभावित किया। वे राजनेता भर नहीं थे, अपने लेखन से भी उन्होंने समाज और देश को नई दिशा दी और जनमानस को आंदोलित किया। यह किताब राजा राममोहन राय से शुरू होती है, जिन्हें गुहा पहला ऐसा भारतीय विचारक मानते हैं, जिसने पश्चिम की चुनौतियों को गंभीरता से लिया। वे आधुनिक भारत के पहले ऐसे विचारक रहे, जिसने अंधविश्वास और कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाया।
मिमी अल्फ्रेड ने ‘वंस अपान ए सीक्रेटÓ में लिखा है कि उन्होंने राष्टï्रपति के प्रेस कार्यालय, ह्वाइट हाउस में बतौर इंटर्न ज्वाइन ही किया था कि एक दिन डेव ने उन्हें फोन कर राष्टï्रपति भवन के स्वीमिंग पूल में दोपहर की तैराकी का आनंद लेने का निमंत्रण दिया, जिसे मिमी ने स्वीकार कर लिया। ह्वïाइट हाउस के उसी स्वीमिंग पूल में उनकी और केनेडी की पहली मुलाकात बेहद नाटकीय अंदाज में हुई। मिमी और ह्वाइट हाउस के प्रेस कार्यालय में काम करने वाली दो लड़कियां परिसर में बने स्वीमिंग पूल में स्नान का आनंद ले रही थीं कि अचानक केनेडी प्रकट हुए। अब उस लड़की की मन:स्थिति की कल्पना कीजिए, जो चंद रोज पहले सुदूर इलाके से राष्टï्रपति भवन में बतौर इंटर्न आयी हो और दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी स्वीमिंग पूल में खड़ा उससे दोस्ताना व्यवहार कर रहा हो। उसके बाद डेव फिर एक दिन मिमी को राष्टï्रपति भवन में घुमाने के लिए निकला, तब भी केनेडी अचानक प्रकट हुए और उन्हें ह्वाइट हाउस घुमाने के बहाने अपने बेडरूम में ले गए। पहले तो उनके कंधे पर हाथ रखा और फिर कपड़े उतारकर उनके साथ सेक्स किया। मिमी खुद इस बात को लेकर भ्रम में थीं कि केनेडी ने उनके साथ जबरदस्ती की या फिर इसमें उनकी अपनी रजामंदी भी शामिल थी।
बेहद साफगोई से मिमी ने स्वीकार किया है कि उनके मन में उस वक्त जबरदस्ती का कोई भाव न था। अठारह साल की उम्र में पैंतालीस साल के पुरुष से शारीरिक संबंध बनाने का बेहद शालीन, लेकिन सेंसुअल चित्रण उनकी किताब में हुआ है। वर्णन में कहीं कोई अश्लीलता नहीं है। सेक्सुअल एनकाउंटर के बाद एक लड़की की मन:स्थिति का जो चित्रण मिमी ने किया है, वह बेहद पठनीय है। उनके मन में यह द्वंद्व चलता रहता है कि अपने से दोगुनी उम्र के पुरुष से संबंध बनाना कहां तक उचित है? वहीं मन के कोने में यह बात तसल्ली भी देती है कि दुनिया के सबसे पॉवरफुल व्यक्ति से उसके जिस्मानी ताल्लुकात हैं।
ऐसे रंगीले राष्टï्रपति केनेडी की हत्या की गुत्थी आज तक अनसुलझी है। ब्रायन लैटल की पुस्तक ‘कास्त्रोÓज सीक्रेट्ïस : द सीआईए ऐंड क्यूबाÓज इंटेलीजेंस मशीनÓ में दो बातों के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की गयी है कि कास्त्रो ने कैनेडी के कत्ल की पहले से जानकारी न होने के बारे में झूठ बोला था, लेकिन ब्रायन इस बात को लेकर बेहद सावधान हैं कि पुस्तक से कहीं भी यह ध्वनित न होने पाए कि केनेडी के कत्ल की साजिश रचने में कास्त्रो की कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका थी। ब्रायन ने यह स्वीकार किया है कि उन्हें नहीं मालूम कि फिडेल कास्त्रो ने कत्ल का हुक्म दिया था या नहीं, उन्हें यह भी नहीं मालूम कि कास्त्रो के इशारे पर कातिल काम कर रहा था या नहीं। उन्हें अपने शोध के दौरान इस बात का कोई संकेत नहीं मिला। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि फिडेल कास्त्रो को केनेडी से अपनी जान का खतरा था। इतिहास में इस बात के पर्याप्त सबूत हैं। बगैर अमेरिकी कांग्रेस की जानकारी और जनता को विश्वास में लिये जॉन एफ. और रॉबर्ट केनेडी ने आठ बार फिडेल के कत्ल की साजिश रची और हर बार नाकाम रहे। दरअसल फिडेल कास्त्रो की खुफिया जानकारियां और रणनीतियां अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और उनकी रणनीति से बेहतर थीं। इसी वजह से अमेरिका तमाम कोशिशों के बावजूद क्यूबा को झुका नहीं पाया।
अनंत विजय हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में आवाजाही करने वाले सर्जक ही नहीं हैं, वे हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी में भी बेरोकटोक आना-जाना कर लेने वाले लेखक हैं। इतना ही होता तो भी गनीमत थी, वे तो साहित्य से पत्रकारिता और पत्रकारिता से साहित्य में भी सहज रूप से प्रवेश कर जाते हैं और कमाल की बात यह कि प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रॉनिक से प्रिंट मीडिया में आना-जाना भी उनके बाएं हाथ का खेल है। ऐसी प्रतिभाएं हिंदी में कम ही हैं। अनंत की भाषा इतनी पारदर्शी है कि पाठक को पाठ की राह में कहीं भी कंकड़-पत्थर नहीं मिलते। देश और दुनिया की एक से एक दुर्लभ जानकारियों से भरी अनंत की यह पुस्तक हर आम और खास पाठक को पढऩी चाहिए।

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